इतिहास

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के योगदान | गाँधी जी का राष्ट्रीय आन्दोलन में सहयोग

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के योगदान | गाँधी जी का राष्ट्रीय आन्दोलन में सहयोग

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के योगदान

भारत के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गाँधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गाँधी जी भारत के महानतम् कर्मयोगी, विचारक और क्रांतिकारी व्यक्ति थे। उनका सम्पूर्ण जीवन भारत की सेवा में व्यतीत हुआ। महात्मा गाँधी आधुनिक भारत के महानतम् निर्माता थे। एक उच्चकोटि के राष्ट्रनायक, राजनीतिज्ञ तथा सुधारक होने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है। वे बुद्ध और ईसा की भाँति भारत की ही नहीं वरन् विश्व की उन महान विभूतियों में से थे जो जाति, समाज, देश और काल की सीमा से परे मानवता को महान् सन्देश देकर युग प्रवर्तक बन जाते हैं। “गाँधी जी की गणना विगत युग के महान् व्यक्तियों में की जा सकती है। वे अल्फ्रेड, वैलिस, वाशिंगटन तथा लफैटे की तरह एक महान् राष्ट्र निर्माता थे। उन्होंने काकसन विलर्वफोस, मैरिसन और लिंकन की भाँति दासता से मुक्त करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। वे सेंट फ्रांसिस, तथा दो और टालस्टाय की तरह अहिंसा के उपदेशक और बुद्ध, ईसा तथा आरस्तू की तरह आध्यात्मिक नेता थे।”

-जे० एच० होम्ज

महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 ई० में काठियावाड़ के पोरबन्दर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता कर्मचन्द गाँधी राजकोट के दीवान थे। उनकी माता पुतलीबाई एक धर्म परायण स्त्री थी। 13 वर्ष की अवस्था में मोहन दास करमचन्द गाँधी का विवाह कस्तूरबा के साथ सम्पन्न हुआ। 18 वर्ष की अवस्था में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1891 ई० में इंगलैण्ड से उन्होंने बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त की और स्वदेश लौटे। भारत आकर उन्होंने वकालत प्रारम्भ की, परन्तु सफलता नहीं मिली। सन् 1893 ई० में एक विवाद के सम्बन्ध में उन्हें दक्षिण जाना पड़ा तथा सन् 1914 तक वे वहीं रहे। दक्षिण अफ्रीका में रहकर कष्ट उठाकर उन्होंने भारतीयों की स्थिति सुधारने का अथक प्रयास किया। भारतीयों को मानवीय अधिकार दिलाने में उन्होंने पूरी चेष्टा की। दक्षिणी अफ्रीका में उन्होंने सत्याग्रह द्वारा सरकार को झुकने के लिए विवश किया। सन् 1914 में गांधी जी भारत आए और गोखले से उनकी भेंट हुई। वे गोखले से प्रभावित हुए और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बना लिया। अहमदाबाद के मदूरों की दशा उन्नत कराने में गाँधी जी ने सहयोग दिया। सन् 1919 ई० से साम्राज्यवादी ताकत से उन्होंने लोहा लेना प्रारम्भ किया और सन्  1946 ई० के साम्प्रदायिक दंगों को शान्त कराने का उन्होंने भरसक प्रयास किया। 30 जनवरी 1948 ई०को गाँधी जी की हत्या कर दी गई।

गाँधी जी का राष्ट्रीय आन्दोलन में सहयोग

(Gandhi’s Contribution in India’s National Movement)

भारत के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गाँधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गाँधी जी ने बिना रक्तपात किये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया।

“आधुनिक काल में किसी व्यक्ति ने अंग्रेजों को अपने अड्डों से मार बाहर निकालने में सफलता प्राप्त नहीं की। नैपोलियन ने प्रयत्न किया, लेकिन असफल रहा, हिटलर को भी निराशा का मुंह देखना पड़ा लेकिन गाँधी जी ने बिना रक्तपात के ही अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया। गाँधी जी की यह सफलता उनके अद्वितीय राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण है।”

(1) आन्दोलन को व्यापक बनाना- गाँधी जी के राजनीति में प्रवेश करने से पूर्व राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति बहुत कम थी। कांग्रेस में उदारवादियों का जोर था, जिनकी ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था। आन्दोलन का वैधानिक रूप व्यापक न था। गाँधी जी ने ही इसे व्यापक रूप प्रदान किया।

(2) जन-आन्दोलन के रूप में बदलना- गांधी जी के कांग्रेस में आने के पूर्व कांग्रेस मध्यम वर्ग की संस्था थी। किन्तु गाँधी जी ने इस संस्था को जनता की संस्था बनाया तथा राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन का रूप प्रदान किया, भारत की अधिकाँश जनता ने इस आन्दोलन में भाग लिया।

(3) राष्ट्रीय आन्दोलन को उच्चकोटि का नेतृत्व प्रदान करना- महात्मा गाँधी ने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को उच्चकोटि का नेतृत्व प्रदान किया। वे आन्दोलन के सम्पूर्ण काल में काँग्रेस पर छाए रहे। जनता और नेता उनकी बात को आदेश मानकर सम्मान से कार्यान्वित करती थी। जनता पर उनका ऐसा प्रभाव था कि वे जैसा चाहते उससे करवा लेते। उनके नेतृत्व में त्याग और बलिदान की उच्च भावनाएँ थीं।

(4) रचनात्मक आन्दोलन का सूत्रपात- गाँधी जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन का संचालन नकारात्मक रूप से न कर सकारात्मक ढंग से किया। उन्होंने गृहु-उद्योग, चर्खा, खादी, मद्यनिषेध आदि कार्यक्रम का सफलतापर्वक संचालन किया।

(5) आन्दोलन को नया रूप प्रदान करना- गाँधी जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को नवीन रूप दान किया। उन्होंने सैनिक अस्त्र-शस्त्रों के स्थान पर सर्वप्रथम अहिंसा, शांति और सत्य को आन्दोलन के अस्त्र-शस्त्र बनाये। इन्हीं अस्त्रों के बल पर गाँधी ने एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय आन्दोलन विश्व के महानतम साम्राज्यवादी राज्य के विरुद्ध किया और स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफल हुए।

(6) असहयोग और सविनय अवज्ञा को आन्दोलन के उपायों के रूप में स्वीकार करना- किसी देश की शासन उसकी सैनिक शक्ति पर नहीं अपितु जनता के सक्रिय सहयोग पर आधारित होता है। इसलिए गाँधी जी ने असहयोग और सविनय अवज्ञा को आन्दोलन के उपायों के रूप में स्वीकार किया। असहयोग और सविनय अवज्ञा करते समय उन्होंने इस बात पर बल दिय कि सत्याग्रही को अहिंसक होना चाहिये।

(7) रचनात्मक कार्य का प्रतिपादन- महात्मा गाँधी का उद्देश्य केवल भारत को स्वतन्त्रत प्रदान करना ही न था अपितु भारत की सर्वक्षेत्रीय उन्नति करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने रचनात्मक कार्यों का प्रतिपादन किया। वे सर्वोदय समाज की स्थापना करना चाहते थे, जिसमें राज्य वर्ग आदि का कोई स्थान न हो और मानव पूर्णतया स्वतंत्र रहे।

(8) जनता में जागरण- महात्मा गांधी का महत्वपूर्ण कार्य भारत की अशिक्षित जनता में जागृति उत्पन्न करना था। उनके व्यक्तित्व में वह आकर्षण था, जिससे साधारण से साधारण व्यक्ति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। वे किसी भी व्यक्ति को प्रणा की दृष्टि से नहीं देखते थे। वे पाप से घृणा करते थे पापी से नहीं। वे शांतिपूर्ण उपायों से किसी समस्या को सुलझाने में विश्वास करते थे। अपने शांतिपूर्ण उपायों के द्वारा ही वे जनता में जागृति उत्पन्न करने में सफल हुए।

(9) राजनीति को धार्मिक बनाना- गांधी जी का यह विश्वास था कि धर्म के बिना राजनीति निराधार है। एक स्थान पर उन्होंने स्वयं लिखा है, “मेरे लिये धर्म के बिना राजनीति मृत्यु जाल की भाँति है क्योंकि यह आत्मा को मार देती है। इसी कारण उन्होंने सदैव राजनीति के नैतिक पहलू पर बल दिया। वे राजनीति को धार्मिक क्षेत्र के समान शुद्ध और पवित्र बनाना चाहते थे।

उन्होंने स्वयं कहा है कि “सत्य में अटूट विश्वास के कारण मैंने राजनीति में प्रवेश किया और जो इस बात में विश्वास नहीं करते उनके कार्य अधूरे रहते हैं।’

(10) साम्प्रदायिकता के कट्टर विरोधी- गाँधी जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया और हिन्दू जाति के कलंक ‘अस्पृश्यता’ को समाप्त करने का भरसक प्रयत्न किया । वे अस्पृश्यता और साम्प्रदायिकता को विष मानते थे। उन्होंने हरिजनों और दलित वर्गों के उत्थान के लिए कई कार्यक्रम बनाए।

(11) विभिन्न आन्दोलन का संचालन- हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में असहयोग (1920), सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930) तथा भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) का विशिष्ट महत्व है। इन तीनों आन्दोलनों को महात्मा गाँधी जी के नेतृत्व और अनुशासन में ही चलाया गया।

“गाँधी जी हाई कमान थे, वे आत्मा की वह शक्ति थे जिसके द्वारा कांग्रेस जनता पर प्रभाव स्थापित कर सकी थी। नेताओं के लिए वे राजनीतिक, भावात्मक और नैतिक दृष्टि से अन्तिम अवलम्ब थे और उनके कार्यों के पीछे महात्मा जी की अद्भुत शक्ति थी।’

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Pankaja Singh

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