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महात्मा गाँधी | महात्मा गाँधी के प्रमुख विचार | महात्मा गाँधी के प्रमुख विचार की विवेचना

महात्मा गाँधी | महात्मा गाँधी के प्रमुख विचार | महात्मा गाँधी के प्रमुख विचार की विवेचना

महात्मा गाँधी

महात्मा बुद्ध के अवतरण के लगभग 2500 वर्ष के उपरान्त, जिस अकेले व्यक्तित्व ने भारतीय संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया-वह महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व था। खान-पान, रहन-सहन, सामाजिक व्यवहार, भाव-विचार, धर्म, दर्शन, कर्म, राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता आदि सभी पर महात्मा गाँधी के विचारों की गहरी छाप है। ‘दिनकर’ जी के शब्दों में, “आज का भारत महात्मा गांधी का भारत है और गाँधी नाम आज के भारत नाम का पूरा पर्याय है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।”

महात्मा गाँधी के प्रमुख विचार

महात्मा गाँधी ने अपने विचारों द्वारा सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग को प्रभावित किया। आधुनिक भारतीय राजनीति, समाज, धर्म, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में जो कुछ भी है-उसमें किसी न किसी रूप में गाँधी जी के विचारों तथा मान्यताओं को सहज ही अनुभव किया जा सकता है। यहाँ पर हम उनके प्रमुख विचारों का उल्लेख निम्नलिखित रूप से करेंगे।

(1) अहिंसा- शस्त्रबल का सामना करने के लिये गाँधी जी ने आत्मबल अथवा. अहिंसा का आश्रय लिया। उनके अनुसार आत्मबल को साधन के रूप में प्रयुक्त करके ही मनुष्य विकास कर सकता है। महात्मा गांधी का विचार था कि जब तक मनुष्य पाशविक शक्ति का प्रयोग करेगा-वह वास्तविक मानव कहलाने का अधिकारी नहीं है। अहिंसा में उनकी इतनी गहन अनुरक्ति थी कि वे अहिंसा को त्याग कर स्वाधीनता प्राप्त करने के पक्ष में नहीं थे। इस दृष्टिकोण के कारण महात्मा गाँधी घोर मानवतावादी थे। उनकी अहिंसा का उद्देश्य भारत को स्वाधीनता दिलाने मात्र से सम्बन्धित नहीं था, वरन् वे अहिंसा द्वारा मनुष्य में पाशविक प्रवृत्ति को समाप्त कर देना चाहते थे।

(2) मन तथा कर्म- गाँधी जी के विचारों तथा पद्धतियों का अवलोकन करने पर विदित होता है कि उन्होंने जो कुछ भी कहा-उसमें कोई नवीनता नहीं थी। ‘हरिजन’ के एक लेख में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि “नये सिद्धान्तों को जन्म देने का मैं दावा नहीं करता हूँ। मैंने तो केवल अपने ढंग पर सनातन सत्यों को दैनिक जीवन और समस्याओं पर लागू करने का प्रयास किया है।” इस आधार पर गाँधी जी ने मन तथा कर्म में एकात्मकता स्थापित की। गाँधी जी के विचारानुसार जीवन की सार्थकता ज्ञान में नहीं, वरन् कर्म में है।

(3) धर्म की सर्वोपरिता तथा राजनीति- गाँधी जी का विश्वास था कि मनुष्य का जन्म धर्म की साधना के लिये होता है। उन्होंने कहा है कि “मेरा उद्देश्य धार्मिक है।…….. मनुष्य में जो क्रियाशीलता है वही उसका धर्म भी है। जो धर्म मनुष्य के दैनिक कार्यों से अलग होता है, उससे मेरा परिचय नहीं है।” गाँधी जी ने धर्म को सर्वोपरि मानते हुए उसका प्रयोग राजनीति के क्षेत्र में किया। उनकी मान्यतानुसार धर्म विहीन राजनीति द्वारा स्थायित्व की प्राप्ति नहीं की जा सकती। गाँधी जी ने धर्म को जीवनव्यापी मानकर, संसार के समक्ष यह प्रमाणित किया कि धर्म के आधार पर राजनीति, आर्थिक गतिविधियों तथा आचरण को निर्धारित करके ही मानवता का कल्याण किया जा सकता है।

(4) अनेकान्तवाद- अनेकान्तवाद का अर्थ तथा उद्देश्य परस्पर विरोधी मान्यताओं, विश्वासों तथा परम्पराओं में सामंजस्य स्थापित करना है। गाँधी जी भी समन्वय, समझौते तथा सामंजस्य में विश्वास रखते थे। उन्होंने लिखा है कि “मेरा अनुभव है कि मैं अपनी दृष्टि में सदा सत्य ही होता हूँ, किन्तु मेरे ईमानदार आलोचक तब भी मुझमें गलती देखते हैं। पहले मैं अपने को सही और उन्हें अज्ञानी मान लेता था। किन्तु अब मैं मानने लगा हूँ कि अपनी-अपनी जगह हम दोनों ही ठीक हैं।  ….आज मैं अपने विरोधियों को प्यार करता हूँ, क्योंकि अब मैं अपने को विरोधियों की दृष्टि से भी देख सकता हूँ। मेरा अनेकान्तबाद, सत्य-अहिंसा के युगल सिद्धान्तों का ही परिणाम है।”

सत्य- गाँधी जी ने सत्य वचन, सत्यकर्म तथा सत्यचिन्तन पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार सत्य का अर्थ तथा पालन सत्य भाषण मात्र नहीं है। विचार, वाणी और आचार का सत्य ही परम सत्य है। जो इस सत्य का पालन करता है उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं होता। गाँधी जी के अनुसार सत्य की प्राप्ति अभ्यास और वैराग्य से होती है। सत्य परमात्मा है, सत्य की आराधना भक्ति है तथा यह ‘मर कर जीने’ का मन्त्र है। गाँधी जी कहा कहते थे कि “मेरे लिये सत्य रूपी परमेश्वर-रत्न चिन्तामणि सिद्ध हुआ है।”

प्रार्थना- महात्मा गाँधी के मतानुसार, “प्रार्थना धर्म का सार है। प्रार्थना याचना नहीं है यह तो आत्मा की आकांक्षा का नाम है। प्रार्थना दैनिक दुर्बलताओं की स्वीकृति है, हृदय के भीतर चलने वाले अनुसंधान का नाम है। यह आत्मशुद्धि का आह्वान है तथा विनम्रता को निमन्त्रण देती है। प्रार्थना मनुष्यों के दुख में भागीदार बनने की भी तैयारी है।”

राजनीति- गांधी जी के राजनैतिक विचारों का आधार धर्म है। उनका कहना था कि “मेरी दृष्टि में राजनीति धर्म से भिन्न नहीं हो सकती। राजनीति को सदैव धर्म की अधीनता में ही चलना चाहिये। धर्महीन राजनीति मृत्यु के पाश के समान है।” संक्षेप में वे राजनीतिज्ञों में सन्त तथा सन्तों में राजनीतिज्ञ थे।

रामनाम तथा श्रीमद्भागवदगीता में अटूट विश्वास- महात्मा गाँधी को राम नाम के जाप तथा कीर्तन में अगाध श्रद्धा थी। अन्त समय में उनके मुख से निकला हुआ शब्द ‘हे राम’ था। गाँधी जी को गीतापाठ से बड़ा प्रेम था। उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि कठिन समस्या आने पर वे गीता से ही प्रेरणा लेते थे।

महात्मा गाँधी के प्रमुख विचार की विवेचना

महात्मा गाँधी की मृत्यु के साथ भारतीय इतिहास का एक युग समाप्त हो गया। यह एक महान युग था। गाँधी जी ने पाशविक बल को त्यागकर केवल सत्य और अहिंसा के बल पर विश्व के सर्वशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। महात्मा बुद्ध तथा ईसा मसीह के समान वे पाप से घृणा करते थे, पापी से नहीं। वे करुणा की मूर्ति तथा दिव्य व्यक्तित्व वाले थे। उन्होंने अपने व्यावहारिक दर्शन द्वारा सत्य, अहिंसा, सदाचार, धर्म, राजनीति तथा संस्कृति को सार्वभौमिक रूप दिया।

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Pankaja Singh

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