इतिहास

जैन धर्म की प्राचीनता | जैन धर्म के तीर्थंकर | पार्श्वनाथ की जीवन | महावीर स्वामी की जीवन | महावीर की शिक्षा

जैन धर्म की प्राचीनता | जैन धर्म के तीर्थंकर | पार्श्वनाथ की जीवन | महावीर स्वामी की जीवन | महावीर की शिक्षा

जैन धर्म की प्राचीनता

कतिपय विद्वानों का मत है कि जैन धर्म प्रागैतिहासिक काल में ही जन्म ले चुका  है। कुछ अन्य विद्वानों के विचारानुसार सिन्धु घाटी से प्राप्त योगिराज की मूर्ति किसी जैन तीर्थकर की है। कुछ विद्वान जैन धर्म को बौद्ध धर्म का अंग मानते हैं। प्रतीत होता है कि उपरोक्त तीनों मत केवल अनुमान पर आधारित है। यदि प्राप्त प्रमाणों तथा साहित्यिक सामग्री का विवेचनात्मक निरीक्षण किया जाये तो हमें इस तथ्य की प्राप्ति होती है कि जैन धर्म का जन्म वैदिक काल के अन्तिम चरणों में हुआ था। परन्तु जैन ग्रन्थों के अनुसार पार्श्वनाथ से पहले जैन धर्म के 22 तीर्थकर हो चुके थे-तो निश्चय ही यह धर्म वैदिक धर्म का समकालीन रहा होगा। इस कारण जैन धर्म की प्राचीनता को और पीछे ले जाया जा सकता है। परन्तु पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी के पूर्व के किसी तीर्थकर के विषय में कोई सूचना नहीं मिलती। इस विवाद में न पड़ कर हम इतना निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि धार्मिक क्रान्ति के समय जैन धर्म ने नवीन परिवेश धारण करके धार्मिक जगत को अत्यधिक प्रभावित किया।

जैन धर्म के तीर्थंकर

जैन धर्म के सन्त तथा अधिष्ठाता तीर्थकर कहलाते हैं। तीर्थकरों को जितेन्द्रिय ज्ञानी माना जाता है। जैन धर्म के अनुसार ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ उस निमित्त से है जिसका अवलम्ब लेकर मनुष्य सांसारिक मोह माया से विरक्त हो दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष प्राप्त करता है। अत: ‘तीर्थकर ऐसे महात्मा पुरुष तथा ज्ञानी थे जो निमित्त की खोज करके मोक्ष प्राप्ति का साधन निर्दिष्ट करते थे। जैन साहित्य के अनुसार जैन धर्म के चौबीस तीर्थकर हुए हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-

(1) ऋषभ, (2) अजीत, (3) सम्भव, (4) अभिनन्दन, (5) सुमति, (6) पद्मप्रभ, (7) सुपार्श्व, (8) चन्द्रप्रभ, (9) सुविधि, (10) शीतल, (11) श्रेयाँस, (12) वासुपूज्य, (13) विमल, (14) अनन्त, (15) धर्म, (16) शान्ति, (17) कुन्थ, (18) अर, (19) मतिल, (20) मुनि सुब्रत, (21) नेमि, (22) अरिष्ट नेमि, (23) पार्श्वनाथ, (24) महावीर स्वामी।

उपरोक्त तीर्थकरों में से अधिकांश के विषय में न तो कोई ऐतिहासिक जानकारी है और न ही उनके जीवन-चरित, कार्य-कलापों आदि का विवरण ही प्राप्त है। अनुश्रुतियों के अनुसार प्रथम जैन तीर्थकर ऋषभदेव जम्बू द्वीप के प्रथम राजा थे और अपने पुत्र भरत को राज्याधिकारी बना कर वे स्वयं तीर्थकर हो गए। इनके पश्चात् जैन धर्म के बाइसवें तीर्थकर अरिष्ट नेमि तक के किसी तीर्थकर  के विषय में कोई प्रमाण नहीं मिला है । अतः जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ के समय से ही हमें जैन धर्म का क्रमानुसार विवरण प्राप्त होता है। जैन धर्म के वास्तविक अर्थों से सामीप्य प्राप्त करने में इसके तेइसवें तथा चौबीसवें तीर्थकर क्रमशः पार्श्वनाथ तथा महावीर स्वामी के जीवन चरित एवं विचारों से पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है। इन दोनों तीर्थकरों का विवरण इस प्रकार है-

पार्श्वनाथ की जीवन

जीवन चरित- जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति थे। जैकोबी महोदय तो इन्हें जैन धर्म का संस्थापक ही मानते हैं। ब्राह्मणों की परम्परा के अनुसार पार्श्वनाथ की गणना भगवान के चौबीस अवतारों में की जाती है। कल्पसूत्र के अनुसार पार्श्वनाथ का जन्म महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पूर्व हुआ था। उनके पिता अश्वसेन वाराणसी के राजा थे तथा उनकी माता का नाम वामा था। उनका प्रारम्भिक जीवन उत्तराधिकारी राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ तथा युवावस्था में उनका विवाह कुशस्थल देश की राजकुमारी प्रभावती के साथ हुआ। तीस वर्ष की आयु में वे गृह त्याग कर सन्यासी हो गये तथा 8 3 दिनों तक कड़ी तपस्या करने पर 84वें दिन हृदय में ज्ञान ज्योति का प्रकाश प्रस्फुटित हुआ। इनकी ज्ञान प्राप्ति का स्थान सम्मेय पर्वत था। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् सत्तर वर्ष तक इन्होंने अपने मत तथा विचारों का प्रचार किया तथा सौ वर्ष की आयु में उन्होंने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया। उनके प्रचार कार्य में अन्य अनेक प्रचारकों के अतिरिक्त उनकी माता वामा तथा पत्नी प्रभावती ने प्रचुर योगदान किया। पार्श्वनाथ ने चार गणों या संघों की स्थापना की। प्रत्येक गण एक गणधर के अन्तर्गत कार्य करता था। उनके अनुयायियों में स्त्री और पुरुष को समान महत्व प्राप्त था।

प्रमुख सिद्धान्त- पार्श्वनाथ ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् अपने सिद्धान्तों की व्याख्या की तथा आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए चार व्रतों के पालन की व्यवस्था की-

(1) जीवित प्राणियों के प्रति हिंसा नहीं करनी चाहिये,

(2) सदा सत्य बोलना चाहिये,

(3) चोरी नहीं करनी चाहिए, तथा

(4) सम्पत्ति के प्रति मोह नहीं करना चाहिए।

जैन धर्म के उपरोक्त चारों व्रतों का उल्लेख (1) अहिंसा, (2) सत्य, (3) अस्तेय तथा (4) अपरिग्रह के नाम से किया गया है ! ये व्रत सीधे-सादे, सरल, व्यावहारिक एवं अनुकरणीय थे। पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित इन व्रतों को जनसाधारण ने बड़ी सरलता से ग्रहण किया। वे ब्राह्मण धर्म की अनेक मान्यताओं के विरोधी थे। वे देववाद एवं यज्ञों को निरर्थक मानते थे। उनके मतानुसार जाति व्यवस्था, वर्ण भेद तथा सामाजिक असमानता आदि अप्राकृतिक, असमाजिक तथा तथ्यहीन थे। नारी तथा पुरुष को एक दूसरे का पूरक मानते हुए वे उन्हें समान रूप से मोक्ष का अधिकारी मानते थे। उन्होंने अहिंसा को सर्वाधिक महत्व दिया। पार्श्वनाथ के अनुयायियों को ‘निर्ग्रन्थ’ कहा जाता था।

महावीर स्वामी की जीवन 

जीवन चरित- छठी शताब्दी ई० पू० में वज्जि गणराज्य संघ में ज्ञात्रिक कुल के प्रधान सिद्धार्थ थे। सिद्धार्थ का विवाह वैशाली के प्रसिद्ध शासक चेटक की बहन त्रिशला के साथ हुआ। चेटक राजा ने अपनी पुत्री का विवाह मगध नरेश बिम्बिसार के साथ किया था। बिम्बिसार का पुत्र अजातशत्रु था। इस विवरण के देने का अभिप्राय यह है कि सिद्धार्थ बहुत सम्माननीय तथा उच्चकुल से सम्बन्धित थे। सिद्धार्थ के तीन सन्तानें थीं-एक कन्या तथा दो पुत्र। सबसे छोटे पुत्र का नाम वर्धमान था। यही वर्धमान कालान्तर में महावीर स्वामी के रूप में जैन धर्म के प्रमुख प्रतिष्ठाता बने । कल्पसूत्र तथा सूत्रकृदंग के अनुसार महावीर स्वामी के जन्म पर देवता ने यह भविष्यवाणी की थी कि यह शिशु या तो चक्रवर्ती सम्राट अथवा परम ज्ञानी महात्मा बनेगा।

महावीर की माता के दो अन्य नाम भी मिलते हैं प्रियकारिणी तथा विदेहदत्ता। इसी प्रकार इनके पिता के दो अन्य नामों का उल्लेख मिलता है यथा प्रयास तथा यसान्स। इन नामों की उपलब्धि ने महावीर स्वामी के जीवन चरित को मतभेद का पुट दे दिया है। जैन साहित्य का अनुसरण करने पर हमें ज्ञात होता है कि महावीर स्वामी ब्राह्मण ऋषभदत्त की पली देवानन्दा के गर्भ में प्रगट हुए परन्तु देवताओं की इच्छा थी कि इनका जन्म ब्राह्मण के घर में नहीं होना चाहिए और क्योंकि सभी तीर्थकर क्षत्रिय वंशी थे अतः इन्द्र ने महावीर को क्षत्रिय नारी त्रिशला के गर्भ में स्थानान्तरित कर दिया।

वर्धमान (महावीर) का प्रारम्भिक जीवन राजकुमारों की भाँति व्यतीत हुआ था और उन्होंने अनेक राजकीय विद्याओं में कुशलता प्राप्त की। ऐसा सम्भवतः इसलिए हुआ कि उनके पिता देवज्ञों की भविष्यवाणी के अनुरूप उन्हें चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहते होंगे। युवावस्था आते ही पिता ने झटपट उनका विवाह यशोदा नामक राजकुमारी से कर दिया। ऐसा करने में उनका उद्देश्य पुत्र को सांसारिक मोहबन्धन में जकड़ना रहा होगा। वर्धमान ने विवाहोपरान्त सांसारिक जीवन भोगना शुरू कर दिया तथा उन्हें एक पुत्री की प्राप्ति हुई। तीस वर्ष की आयु होने पर उनके पिता का देहावसान हो गया। फलतः चक्रवर्ती सम्राट् बनाने के आकांक्षी पिता के नियन्त्रण की समाप्ति हो गई। अब वर्धमान के हृदय में विरक्ति उत्पन्न होने लगी तथा उन्होंने घर त्याग कर सन्यास धारण कर लिया। वर्धमान के परिवार के सदस्य शुरू से ही पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित जैन सिद्धान्तों के अनुयायी थे, अतः सन्यास धारण करने पर महावीर भी जैन भिक्षु के रूप में दीक्षित हुए। भिक्षु जीवन में उन्होंने घोर तपस्या, शारीरिक यन्त्रणा तथा आत्महनन आदि माध्यमों के द्वारा ज्ञान प्राप्ति की चेष्टा की।

भिक्षु जीवन तथा ज्ञान प्राप्ति के प्रयास में उन्होंने जिस घोर शारीरिक यन्त्रणा को सहन किया उसका वर्णन आचारंग सूत्र के इन शब्दों में किया गया है-“वे नंगे और गृहविहीन होकर भ्रमण करने लगे। लोग उन्हें मारते तथा ताने दिया करते थे परन्तु वे अपनी साधना में निमग्न रहते थे। लाढ़ नामक स्थान के निवासियों ने उनपर अकथनीय अत्याचार किये। उन पर डंडों से मार पड़ती, लातें बरसाती, कुत्ते छोड़े जाते, फल, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा लीद फेंकी जाती थी। लोग नाना प्रकार से उनकी तपस्या भंग करना चाहते थे परन्तु रण भूमि के वीर सेनानी की भाँति वे सब कुछ सहन करते रहे। चोट लगने पर वे चिकित्सा नहीं कराते थे और न ही कोई औषधि लेते थे। वेस्लान नहीं करते थे, दाँत साफ नहीं करते थे, हाथ-मुँह भी नहीं धोते थे। जाड़े में छाया स्थान पर तथा भीषण गर्मी होने पर धूप में बैठकर ध्यान लगाते थे। वे केवल जल ही ग्रहण करते थे। कभी-कभी वे केवल छठे, आठवें, दसवें तथा बारहवें दिन आहार लेते तथा तृष्णा रहित होकर अपनी साधना में लीन रहते थे।

बारह वर्ष की घोर यंत्रणापूर्ण तपस्या के उपरान्त तेरहवें वर्ष महावीर का कपल्य (ज्ञान) प्राप्त हुआ। उनके ज्ञान प्राप्ति का स्थान ‘जम्भियगाम’ (जृम्भिका) के निकट उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) नदी पर स्थित था।

महावीर स्वामी ने अपनी इन्द्रियों को वशीभूत कर लिया था, अतः उन्हें ‘जिन’ कहा गया है। तपस्वी जीवन में महान पराक्रम प्रदर्शित करने के कारण वे “महावीर” कहलाये। कैवल्य (ज्ञान) प्राप्त करने के कारण वे ‘केवलि” अथवा “केवलिन” कहे जाते हैं। बौद्ध साहित्य में उन्हें “निगण्ठ- नारपुत्र” कहा गया है। उन्हें अर्हत (पूज्य) भी कहा जाता है।

महावीर द्वारा धर्म प्रचार

“कैवल्य” प्राप्ति के उपरान्त महावीर स्वामी ने उसके प्रचार तथा प्रसार का क्रम प्रारम्भ किया। तपस्वी जीवन में अनेक घोर करों को भोगने के कारण महावीर स्वामी में अलौकिक सहिष्णुता आ गई थी, अत: धर्म प्रचार के मार्ग में आने वाली बाधाओं का सहज ही सामना करते हये वे अकेले ही प्रचार कार्य में जुट गये। कुछ समय उपरान्त नालन्दा में उन्हें अपना प्रथम सहयोगी गोशाल मिला परन्तु लगभग 6 वर्ष पश्चात् उसने महावीर का साथ छोड़ दिया। यह धार्मिक क्रांति का युग था तथा देश में अनेक मत तथा अपने अपने विचारों का प्रचार कर रहे थे। महावीर स्वामी के समक्ष दो विकल्प थे-या तो वे प्रचलित मतों का विरोध करते अथवा उनसे सहिष्णूता स्थापित करते। महावीर स्वामी ने मध्य मार्ग अपनाया। भाग्य ने उनका साथ दिया तथा उन्हें अनेक राज्यों तथा शासकों का समर्थन प्राप्त हो गया। लिच्छवी राज चेटक की पुत्री तथा चम्पा नरेश दधिवाहन के पत्नी पदमावती उनकी प्रथम शिष्या बनीं। मगध नरेश बिम्बिसार, सिन्धु सौवीर के नरेश उदायिन, कौशाम्बी नरेश स्तानिक, अवन्ति नरेश प्रद्योत आदि ने महावीर स्वामी के धर्म प्रचार में बड़ा सहयोग दिया। महावीर स्वामी के प्रचारक शिष्यों में कामदेव, चुलानिपिया, सुरदेव, चुल्लसयग, आनन्द, कुन्ड कोलिय, महासयग, साल्हीपिया, नन्दिनीपिया, संद्धाल तथा पुत्त विशेष उल्लेखनीय हैं।

निर्वाण- अथक परिश्रम, कठोर जीवन तथा व्यावहारिक क्षमता द्वारा महावीर स्वामी ने अपने जीवनकाल में ही जैन धर्म को उन्नति के शिखर पर पहुँचाकर 546 ई० पू० में निर्वाण प्राप्त कर लिया।

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Pankaja Singh

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