इतिहास

सभ्यता तथा संस्कृति का अंतर | संस्कृति का अर्थ | सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध | सभ्यता तथा संस्कृति के सम्बन्धों का वर्णन

सभ्यता तथा संस्कृति का अंतर | संस्कृति का अर्थ | सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध | सभ्यता तथा संस्कृति के सम्बन्धों का वर्णन

सभ्यता तथा संस्कृति शब्दों को प्रायः साथ-साथ प्रयुक्त किया जाता है। इन दोनों शब्दों को एक साथ प्रयुक्त करने का कारण मुख्य रूप से इनकी व्यापकता है। ये दोनों विषय मानव की गाथा के साथ सम्बन्धित हैं अतः इनके बिना मानव इतिहास तथा मानव के क्रियाकलापों का अनुमान, मूल्यांकन तथा उद्देश्य समझ पाना असंभव है। सभ्यता तथा संस्कृति मानव समाज की उपलब्धियों की ओर संकेत करती है। इस प्रकार यह तो निश्चित है कि ये दोनों शब्द मानव जाति के उदय, विकास तथा सामूहिक जीवन से सम्बन्धित हैं। अतः हमारे मास्तिष्क में अति स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि सभ्यता तथा संस्कृति में क्या अन्तर सभ्यता तथा संस्कृति का अन्तर है।

सभ्यता तथा संस्कृति का अंतर

सभ्यता तथा संस्कृति के अन्तर को समझ लेना तभी संभव है जबकि हम इन दोनों के अर्थों को स्पष्ट रूपसे समझ लें।

सभ्यता का अर्थ

सभ्यता का सम्बन्ध उपयोगिता से होता है। मनुष्य केवल उन्हीं कार्यों को करता है जो उसके लिये उपयोगी होते हैं। सभ्य जीवन का प्राराम्भ क्रियाशीलता द्वारा उपयोगिता की प्राप्ति स्वरूप हुआ है। जंगलीपन अथवा बर्बरता की स्थिति से उभर कर जब मनुष्य ने अपनी सुरक्षा, सुविधा तथा समाजीकरण की ओर प्रथम चरण उठाये तभी से उसे ‘सभ्य’ की संज्ञा से विभूषित किया जाने लगा है। दूसरे शब्दों में हम कहते हैंकि जब मनुष्य ने बन्दर की स्थिति को त्याग कर अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सफल प्रयोग करने प्रारम्भ किये तभी वह सभ्यता की स्थिति में आ गया। इस प्रकार सभ्यता बर्बरता के विरुद्ध जीवित रहने की दशा है।

संस्कृति का अर्थ

संस्कृति के अर्थ को सभ्यता के अर्थ के सन्दर्भ में ही समझा जा सकता है। सभ्यता जीवित रहने की दशा में तो संस्कृति इस दशा को दिशा बोध कराती है। भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किये गये प्रयासों से जिन परिणामों की प्राप्ति हुई-उन्हीं परिणामों को संस्कृति की संज्ञा प्राप्त है।’ संस्कृति का सम्बन्ध उपयोगिता से न होकर, उपयोगिता से प्राप्त मूल्यों से है। इस प्रकार संस्कृति का अर्थ सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है।

निष्कर्ष- सभ्यता तथा संस्कृति के उपरोक्त अर्थों से यह स्पष्ट होता है कि जब मनुष्य लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है तो सभ्यता का जन्म होता है और जब मनुष्य को लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है तो उसे क्रियाकलाप, विचार एवं कलल्पना आदि परिष्कृत हो जाते हैं-यह परिष्कार ही संस्कृति है। सभ्यता तथा संस्कृति के अर्थों के आधार पर हम इन दोनों के अन्दर को‌ निम्नलिखित रूप से स्पष्ट कर सकते हैं-

(1) सभ्यता तथा संस्कृति का अन्तर अनिश्चिततापूर्ण है- सभ्यता के श्रेष्ठ गुणों को ही प्रायः संस्कृति के नाम से जाना जाता है। इस दृष्टिकोण से सभ्यता तथा संस्कृति एक दूसरे के पर्यायवाची तो हैं ही, साथ ही इनके अन्तर को तत्काल नहीं समझा जा सकता। संस्कृति रूपी पुष्प सभ्यता रूपी उद्यान में ही खिलते हैं अतः संस्कृति का अन्तर अनिश्चितताओं से भरा हुआ है और इसे स्पष्ट रूप से कह पाना सम्भव नहीं।

(2) सभ्यता तथा संस्कृति भिन्न हैं- सभ्यता भौतिक उपलब्धियों की प्राप्ति हेतु प्रयास करके जीवन के उपकरणों की प्राप्ति करना है तथा संस्कृति का सम्बन्ध मनुष्य के आध्यात्मिक, मानसिक तथा चिन्तन जगत से है।

(3) संस्कृति कठोर होकर सभ्यता बन जाती है- स्पैंगलर महोदय के अनुसार संस्कृति कठोर होकर सभ्यता बन जाती है एक निश्चित आकार ग्रहण कर लेती है। संस्कृति द्वारा सभ्यता को और आगे विकसित होने की क्षमता प्रदान की जाती है।

(4) सभ्यता का सम्बन्ध जीवनोपयोगी साधनों से है तथा संस्कृति का सम्बन्ध आत्मा, मन, मस्तिष्क से हैं।

तथा

(5) सभ्यता ने मनुष्य को केवल सभ्य बनाया तथा संस्कृति ने मानव को ‘सुसंस्कृति भद्र’ बनाया है।

(6) सभ्यता मनुष्य के विकास की कहानी है तो संस्कृति उसके जीवन की अर्थपूर्ण व्याख्या है।

(7) सभ्यता केवल भौतिक उपलब्धियों से सम्बन्धित है तथा संस्कृति भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत का प्रतिनिधित्व करती है।

सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध

(1) मनुष्य द्वारा समाज, सामाजिक प्रयास द्वारा सभ्यता तथा सभ्यता के साथ संस्कृति का क्रमिक विकास हुआ है। यह विकास पूर्णतः एक विकासवादी प्रक्रिया का परिणाम है। जब मनुष्य अपने प्रयास द्वारा निर्धारित लक्ष्य की ओर अग्रसर हुआ तो सभ्यता का विकास प्रारम्भ हुआ। यह सभ्यता सामाजिक वातावरण में ही सम्भव हो पायी थी। जब सभ्यता ने अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की तो कतिपय परिणाम सामने आये-ये परिणाम ही संस्कृति के तत्व हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्ति, समाज, सभ्यता तथा संस्कृति मानवजाति की परगति के बढ़ते हुए हैं। अतः सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध क्रमिक है तथा एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व होना असम्भव है।

(2) मनुष्य की सर्वप्रतम आवश्यकता एवं उसके अपने अस्तित्व को बनाये रखना है। इसके लिये मनुष्य ने विभिन्न उपयोगी कार्य किये-जैसे अन्नोत्पादन, जीवन की सुरक्षा हेतु प्रबन्ध, दैनिक जीवन के उपकरणों का निर्माण आदि। जब उसका अपना जीवन सुरक्षित एवं निश्चिन्त हो गया तो उसका ध्यान अपने मानसिक जगत की ओर गया तथा उसने संस्कृति के गुणों का विकास किया। उदर की क्षुधा तथा तृष्णा शान्त होने पर मानसिक क्षुधा जागृत हुई तो उसने अनेकानेक अभौतिकीय कल्पनाएँ की तथा इनसे मधुर सम्बन्ध, प्रेम, धर्म, कला, साहित्य, सुरुचिपूर्ण निर्माण, आनन्द, चिन्तन और दर्शन आदि सांस्कृतिक क्रियाओं का जन्म हुआ। शनैः शनैः ये सांस्कृतिक क्रियाएँ भी अत्यावश्यक हो गईं। इस प्रकार सभ्यता तथा बिल्कुल एकाकार हो गई।

(3) सभ्यता तथा संस्कृति की आदि गाथा में पहले तो मनुष्य सभ्य हुआ और फिर उसने सांस्कृतिक गुणों का विकास किया परन्तु कुछ ही समय पश्चात् सभ्यता संस्कृति की अनुगामिनी हो गई। अब संस्कृति ने सभ्यता को विकसित होने की क्षमता प्रदान करना शुरू किया और आज हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि संस्कृति के अभाव में सभ्यता का अपना अस्तित्व नहीं हो सकता।

(4) सभ्यता तथा संस्कृति के सम्बन्ध का एक अन्य पक्ष यह है कि इन दोनों के बीच कोई मौलिक भेद नहीं है। सभ्यता तथा संस्कृति आपस में कुछ इस तरह घुल-मिल गई हैं कि उनके मध्य कोई भेद करना असंभव सा है। निवास के लिये एक झोंपड़ी भी पर्याप्त है परन्तु अनेक प्रकार की सुख सुविधाओं से युक्त कलात्मक भवनों का भी निर्माण किया जाता है। उपयोगी वस्तुओं को बनाते समय यह भी प्राप्त किया जाता है कि वे होने के साथ-साथ सुन्दर और कलात्मक भी हों। इस प्रकार मनुष्य के उपयोगी टिकाऊ क्रिया कलापों पर उसकी चिन्तन, कल्पना तथा सौन्दर्य सम्बन्धी अभिरुचियों का प्रभाव पड़ता है। इस दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि अपनी आदि अवस्था के बाद सभ्यता तथा संस्कृति साथ-साथ विकसित होती चली आ रही है।

निष्कर्ष

सभ्यता तथा संस्कृति के सम्बन्धों की उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर हम निष्कर्ष स्वरूप कह सकते हैं कि सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध अतिघनिष्ठ है। सभ्यता के अभाव में संस्कृति का अस्तित्व में आना असंभव था। ‘सभ्य’ मानव ने संस्कृति के प्रारम्भिक रूप का विकास किया और फिर स्वयं संस्कृति सभ्यता के विकास की अनुगामिनी हो गई। मानव समाज की उपलब्धियाँ चाहे वे भौतिक हों अथवा मानसिक-सभ्यता तथा संस्कृति का ही परिणाम हैं।

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Pankaja Singh

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