इतिहास

पाल मूर्तिकला शैली | पाल मूर्तिशैली का जन्म | पाल मूर्तिकला शैली का काल | पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों की विशेषताएं | पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों के मिलने के स्थान | पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों के प्रधान विषय | पाल मूर्तिकला की मूर्तियों का दोष | पालवंश के समय की मूर्तिकला

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पाल मूर्तिकला शैली

पाल वंश के शासन काल में मूर्तिकला की एक नवीन शैली का जन्म हुआ जो इस वंश के नाम पर ही पाल मूर्तिकला शैली के नाम से पुकारी गयी। प्रसिद्ध इतिहासकार तारानाथ नए इसको पूर्वी शैली का नाम दिया है। धीमान तथा उसका पुत्र वितपाल नवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के प्रसिद्ध चित्रकार तथा मूर्तिकार थे। इस शैली का विकास पूर्वी भारत में हुआ। अतः तारानाथ ने इसको पूर्वी मूर्ति शैली का नाम दिया, जो उचित है। इस शैली को मगध मूर्तिशैली भी कहते हैं। यह मूर्ति शैली पश्चिम से उत्तर प्रदेश तक के इलाके को अपने प्रभाव में लिये थी। अतः इन स्थानों पर इसकी उन्नति हो रही थी इसी के साथ-साथ सारनाथ मूर्तिशैली भी रही थी। जिसका प्रभाव पाल मूर्तिशैली पर बिल्कुल भी नहीं पड़ा। दोनों शैलियों का क्षेत्र अलग-अलग रहा। दोनों शैलियाँ एक-दूसरे से अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण एक-दूसरे से मिल नहीं सकीं।

पाल मूर्तिशैली का जन्म-

गुप्त शासन काल में बंगाल, बिहार तथा मगध मूर्तिकला के प्रमुख केन्द्र थे जहाँ के मूर्तिकार अनेक विषयों की मूर्तियाँ बनाया करते थे। जिन पर गुप्तकालीन मूर्तिकला की छाप थी। जब बंगाल में पाल वंश के राज्य की नींव पड़ी और इस वंश के अधिकांश राजा कला प्रेमी हुए। उन्होंने मूर्तिकारों, साहित्यकारों को आदर्श की दृष्टि से देखा इनकी इस विशेषता के कारण कुछ प्रसिद्ध मूर्तिकार पाल वंश के राज्य में आकर बस गए और उन्होंने नवीन वातावरण में अपनी मूर्तियाँ बनायीं। कुछ समय तक उनकी मूर्तियों पर गुप्तकालीन मूर्तिकला शैली की छाप रही, परन्तु शीघ्र इस साम्राज्य के मूर्तिकारों ने अपनी मूर्तियों को नया रूप देना शुरू किया, और पाल मूर्तिकला शैली का जन्म हुआ। कुछ समय के पश्चात् पाल मूर्तिकला अपने स्तम्भ रूप में प्रकट हुई और उसकी मूर्तियों पर भारतीय मूर्तिकला शैलियों की छाप दिखायी नहीं दी।

मूर्तियों बनाने के लिए प्रयोग में लायी गयी सामग्री-इस शैली के मूर्तिकारों ने मूर्तियाँ बनाने में निम्नलिखित सामग्री का प्रयोग किया-

(1) चिकने काले रंग की कसौटी वाले पत्थर- इस प्रकार का पत्थर बंगाल, बिहार, उड़ीसा में बड़ी सरलतापूर्वक मिलता था, जिससे मूर्तियाँ बनायी जा सकती थीं। पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने इस प्रकार के पत्थरों को देखा, परखा तथा उनसे मूर्तियाँ बनायीं जो बनने के पश्चात् अच्छी भी दिखायी दी। अतः फिर तो इस शैली के मूर्तिकारों ने मूर्तियाँ बनाने में इसी प्रकार के पत्थर का अधिक मात्रा में प्रयोग किया। इस पत्थर की बनी मूर्तियाँ अनेक स्थानों पर प्राप्त हो चुकी हैं।

(2) धातुओं का प्रयोग- काले रंग के कसौटी वाले पत्थर के साथ-साथ पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने अनेक धातुओं की मूर्तियाँ भी बनायीं जो अनेक स्थानों पर प्राप्त हुई हैं।

(3) मिट्टी- पाल मूर्तिकला के मूर्तिकारों ने मिट्टी की पूर्तियाँ भी बनायी। मिट्टी की मूर्तियाँ प्राचीन से ही भारत में बनती रही थीं। अतः इस राज्य के समय में भी मिट्टी की मूर्तियाँ पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने बनायीं।

(4) हाथी दाँत की मूर्तियाँ- पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने हाथी दाँत की भी मूर्तियों बनाई। इस प्रकार की मूर्तियाँ विदेशों में भेजी जाती थीं। मगध इस प्रकार की मूर्तियों का प्रमुख केन्द्र था।

(5) काष्ठ की मूर्तियां पाल मूर्तिकला के मूर्तिकारों ने अपनी मूर्तियाँ बनाने में काष्ठ का भी प्रयोग किया होगा। काष्ठ की मूर्तियाँ अभी तक प्राप्त नहीं हुई हैं। परन्तु मूर्तिकला के इतिहास के अध्ययन से ऐसी मूर्तियों का पता चलता है।

मूर्तियां बनाने की विधियाँ- पाल मूर्तिशैली के चित्रकार अपनी मूर्तियाँ गढ़कर, तराश कर, साँचों के द्वारा, बत्ती के द्वारा, कुण्डली द्वारा, ठोस विधि द्वारा बनाते थे। मिट्टी से बनी मूर्तियाँ आँवे में पकायी जाती थीं। पकने के बाद उसको रंगा भी जाता था। दीपावली के त्योहार पर मूर्तियाँ अधिक संख्या में नगरों की बाजारों में बेची भी जाती थीं।

धार्मिक मूर्तियों के प्रमुख विषय- नालन्दा से जो इस शैली की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, उनको मूर्तिकला के विद्वान निम्न 4 भागों में विभाजित करते हैं-

(1) महायान प्रकार की मूर्तियाँ- इस प्रकार की मूर्तियों में बुद्ध और बोधिसत्त्व की मूर्तियों की गणना की जाती है।

(2) तंत्रयान के योगाचार से सम्बन्धित एवं शैव प्रभाव से युक्त मूर्तियाँ।

(3) वैष्णव मूर्तियाँ (4) जैन मूर्तियाँ ।

पाल मूर्तिकला शैली का काल-

मूर्तिकला के विद्वानों ने इस मूर्तिकला शैली का समय आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी माना है। इस काल इस मूर्तिशैली की मूर्तियों में हमें किसी प्रकार का परिवर्तन दिखायी नहीं देता है। इस शैली के मूर्तिकारों ने जो भी बड़ी छोटी मूर्तियाँ मूर्तिकला, के नियमों के आधार पर बनायी हैं उनमें हमें टेक्निकल दोष दिखायी नहीं देते हैं। मूर्तियों के शरीर रचना में भी अनुपात की झलक हैं। प्रत्येक मूर्ति की शारीरिक संरचना भाव-व्यंजकता एवं भंगिमा नियमानुसार है, जिनमें प्रत्येक मूर्ति सुन्दर दिखायी देती है।

पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों की विशेषताएं-

मूर्तिकला के विद्वानों ने पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों की अच्छे शब्दों में प्रशंसा की है। कुछ विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं-

ए०एल०वाशन के शब्दों में, “इस मूर्तिकला की शैली की धार्मिक मूर्तियों में देवताओं की मूर्तियों में शिल्प-शास्त्री नियम पूर्णतः पालन किये गये हैं। उनकी शारीरिक संरचना, भाव व्यंजकता एवं भंगिमा सभी कुछ नियमानुसार हैं। प्रत्येक देवता के अनेक विशेष प्रकार के गुण थे, उनके ये गुण इस शैली की मूर्तियाँ बनाते समय मूर्तिकार ने दर्शाए हैं। शरीर, अंगों तथा आकृतियों के निर्माण में अनुपात का ध्यान रखा गया है और मूर्तिकला के प्रत्येक सिद्धान्त का पालन भी पूरी तरह से किया है। परन्तु इस शैली का मूर्तिकार अपनी लगभग पौरोहित कला में विलक्षण विभिन्नता उत्पन्न करने में सफल हुआ है। गोल तथा सौम्य मुखड़ा, सुपुष्ट मांसपेशियों, चौड़े स्कन्ध तथा कमनीय देहयष्टि पाल मूर्तिकला की प्रमुख विशेषताएँ हैं। साथ ही साथ पाल मूर्तिकला की पूर्तियों की फिनीशिग बड़ी सुन्दर एवं सजीव है क्योंकि उनकी आकृतियों में हमें सुन्दरता की गहरी छाप देखने को मिलती है। उनकी पालिश चमकदार है जिसके कारण मूर्तियों की पाषाण अपेक्षा धातु की बनी हुई दिखायी देता है।

गुप्तकालीन मूर्तियों की समस्त विशेषताओं के दर्शन हमें पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों में अपने निखार रूप में देखने को मिलते हैं। उनमें अच्छा शारीरिक सौन्दर्य अलंकरण एवं भाव पाल व्यंजना सभी का उन्नत रूप गुप्त मूर्तियों के मुकाबले में देखने को मिलता है। परन्तु पाल मूर्तिकला के गुप्तकालीन मूर्तियों के समान भाव उत्पन्न नहीं कर पाये हैं। मूर्तियों की तराश, बनावट तथा सजावट तो गुप्तकालीन पूर्तियों के मुकाबले में अधिक सुन्दर है, परन्तु भावपूर्ण मूर्तियाँ पाल मूर्तियाँ नहीं हैं। ऐसा जान पड़ता है कि पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकार भावपूर्ण नियम की अच्छी जानकारी नहीं रखते थे। इसी कारण वे अपने मूर्तियों को भावपूर्ण नहीं बना सके। ध्यानपूर्वक अध्ययन के पश्चात यह भी कहा जा सकता है कि पाल मूर्तिकला में मूर्तिकारों को अनपी कल्पना में अधिक योग्यता प्राप्त नहीं थी। उनको देवी देवताओं की ऐसी भावपूर्ण मूर्तियाँ बनानी थीं जिनको देखने पर ध्यान केन्द्रित हो उठे। हमारे इस कथन को सही सिद्ध करने में प्रो० भगवत् शरण उपाध्याय जी का कथन बड़ी सहायता देता है, “काले पत्थर की मूर्तियों द्वारा शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि के परिवार कोरे जाने लगे। अवयवों का तीखापन धातु की मूर्तियों से अनुकृत हुआ। परन्तु अभिव्यक्ति की दृष्टि से ये मूर्तियाँ सर्वथा मूक हो गयीं।”

पाल मूर्तिकला की मूर्तियों में इस शैली के मूर्तिकारों ने आभूषण भी अछूते ढंग से बनाये हैं, जो इस शैली की मूर्तियों की एक प्रमुख विशेषता कही जाती है। पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने गहनों के मूर्तिरूप तो सुन्दर बनाये हैं। परन्तु उनके भाव को उभारा नहीं है। पाल मूर्तिकला शैली की नारी मूर्तियों में कोमलता है तथा पुरुष मूर्तियों में शक्ति की झलक है। नारी मूर्तियों का गोल चेहरा, क्षीण कटि प्रथुल जंघाएँ, विस्तृत नितम्ब, कोमल तथा मुलायम शरीर, कमनीय देहयष्टि एवं वक्षस्थल की छाप हैं। पुरुष मूर्तियाँ जो खड़ी मुद्रा में हैं, उनमें पुरुष भाव के दर्शन होते हैं।

पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों के मिलने के स्थान-

इस शैली की मूर्तियाँ जो पाषाण मूर्तियाँ कही जाती हैं, नालन्दा, राजगृह, बोधगया, कुर्किहार, दिनाजपुर, भागलपुर, राजशाही, मयूरभंज आदि स्थानों पर मिल चुकी हैं। इनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये स्थान पाल मूर्तिकला शैली के प्रमुख मूर्ति केन्द्र होंगे। इस शैली की मूर्तियाँ लखनऊ, कलकत्ता, राजशाही के संग्रहालयों में रखी हुई हमें देखने को आज भी मिलती हैं। भारत के बाहर लन्दन, पेरिस, बर्लिन तथा अमेरिका के वोस्टन और न्यूयार्क के संग्रहालयों में भी हैं। पाल मूर्तिशैली की धातु मूर्तियों नालन्दा, चिटगाँव, तथा कश्मीर में भी मिली हैं जो देखने योग्य हैं।

पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों के प्रधान विषय-

बौद्ध, ब्राह्मण तथा जैन धर्म की मूर्तियाँ पाल मूर्तिकला शैली के प्रमुख विषय हैं।

(1) हिन्दू धर्म की मूर्तियाँ- इस श्रेणी के अन्तर्गत हिन्दू धर्म की देवी-देवताओं की मूर्तियाँ आती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, कृष्ण, बलराम, कार्तिकेय, गणेश, इन्द्र, अग्नि, नवग्रह, सूर्य, कामदेव आदि देवताओं की मूर्तियाँ बनायी गयीं। कुछ इनमें से प्राप्त हो चुकी हैं। शेष अब भी‌ मिट्टी के नीचे दबी पड़ी हैं। देवताओं के साथ-साथ देवियों की भी पूर्तियाँ इस शैली के मूर्तिकारों ने बनायी होंगी। क्योंकि भारत में लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, पहिब पर्दिनी, सिंहावाहिनी, दुर्गा सप्तमातृका तथा गंगा यमुना आदि देवियों की मूर्तियाँ बनाने का चलन था।

जैन मूर्तियाँ- पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ भी बनायीं इनमें तीर्थकर प्रतिमाएँ, देवियों की मूर्तियों, विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ऐसी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

बौद्ध मूर्तियाँ- पाल मूर्तिकला शैली के मूर्तिकारों ने बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मूर्तियां भी बनायीं। बुद्ध जी की प्रतिमा का निर्माण बड़ी सुन्दर विधि के साथ हुआ है।

पाल मूर्तिकला की मूर्तियों का दोष-

पाल मूर्तिकला शैली की मूर्तियों में हमें निम्नलिखित दोष भी देखने को मिलते हैं-

(1) मूर्तियों में आध्यात्मिक भावनाओं का अभाव है।

(2) आभूषणों को मूर्तिरूप में भात्रों का अभाव है।

(3) मुख्य भाग पर सजावटी भाग का प्रभाव अधिक है, जिसके कारण मुख्य विषय छुपता हुआ दिखायी पड़ता है। सजावटी भाग की इकाइयाँ अधिक उभरी हुई दशा में दिखायी पड़ती है।

(4) पृष्ठ भूमि काली है क्योंकि काले पत्थर से बनी है।

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Pankaja Singh

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