इतिहास

द्राविड़ शैली | द्राविड़ शैली में बने मन्दिर | द्राविड़ शैली का संक्षिप्त परिचय | द्राविड़ शैली में बने मन्दिरों का संक्षिप्त परिचय

द्राविड़ शैली | द्राविड़ शैली में बने मन्दिर | द्राविड़ शैली का संक्षिप्त परिचय | द्राविड़ शैली में बने मन्दिरों का संक्षिप्त परिचय

द्राविड़ शैली

विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में मन्दिर वास्तुकला उत्तर भारत की वास्तुकला से कुछ भिन्न शैली के रूप में विकसित हुई। इस शैली को सामान्यतः ‘द्राविड़ शैली’ कहा जाता है। इस शैली के मन्दिर नागर शैली से सर्वथा भिन्न थे। द्राविड़ स्थापत्य का शुभारम्भ आन्ध्र-सातवाहन शासकों के शासन-काल में हो गया था किन्तु छठवीं शताब्दी से तेरहवीं के मध्य दक्षिण भारत में शासन करने वाले पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पाण्ड्य, चोल तथा होयसल आदि प्रमुख राजवंशों के शासन-काल में द्राविड़ शैली की अनेक उपशैलियाँ विकसित हुईं। ये उपशैलियाँ प्रायः राजवंशों के नाम से जाना जाती हैं।

पल्लव मन्दिर स्थापत्य

पल्लव राजाओं ने लगभग छठवीं शताब्दी से नवीं शताब्दी ईसवी के मध्य तमिलनाडु के क्षेत्र में शासन किया। पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला के सन्दर्भ में इस राजवंश का योगदान उल्लेखनीय है। पल्लव वंश में महेन्द्र वर्मा, नरसिंह वर्मा प्रथम, महेन्द्र वर्मा द्वितीय, परमेश्वर वर्मा प्रथम, नरसिंह वर्मा द्वितीय तथा नन्दि वर्मा आदि प्रसिद्ध शासक हुए जिन्होंने स्थापत्य कला के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पल्लव राजवंश के विभिन्न शासकों के नाम पर मन्दिर निर्माण की स्थापत्य शैलियों का वर्गीकरण विद्वानों द्वारा किया गया है। स्थापत्य कला की दृष्टि से इनको दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता

  1. प्रथम वर्ग : (क) महेन्द्र शैली (610-640 ई०), (ख) नरसिंह शैली अथवा मामल्ल शैली (640-690 ई०)।
  2. द्वितीय वर्ग : (क) राजसिंह शैली (600-800 ई0), (ख) नन्दि वर्मा शैली (800-900 ई०)।

प्रथम वर्ग की स्थापत्य शैली को पल्लव मन्दिर कला के प्रारम्भिक चरण का द्योतक माना जाता है। प्रथम वर्ग के मन्दिरों का सम्बन्ध शैलकृत निर्माण शैली से है। द्वितीय वर्ग के स्मारक संरचनात्मक शैली में बनाये गए थे। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पल्लव मन्दिर वास्तुकला में सतत विकास दृष्टिगोचर होता है।

महेन्द्र शैली पल्लव मन्दिर कला की प्रारम्भिक शैली है। इसका समय सन् 610 से 640 के बीच माना जाता है। महेन्द्र वर्मा के अभिलेखों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि उसने ईंट, लकड़ी तथा लोहे के स्थान पर पर्वतों को तराश कर गुफा-मन्दिरों का निर्माण कराया था। इस काल में पर्वतशिलाओं को काट-छाँट कर स्तम्भयुक्त मण्डपों का निर्माण किया गया था। गुफा-मण्डप स्तम्भों पर टिके कक्ष हैं जिनमें एक अथवा एक से अधिक भीतरी प्रकोष्ठ मिलते हैं। गुफा-मण्डप के सामने स्तम्भ युक्त बरामदा प्रायः मिलता है। मण्डप के दोनों ओर गर्भगृह बने हुए हैं। मण्डपों के गर्भगृह में प्रतिमाओं का अभाव है। मण्डगपट्ट का लक्षितायन-मण्डप, त्रिचनापल्ली का शिला-मण्डप तथा उन्दवल्ली का अनंतशयनम् मण्डप महेन्द्र शैली के प्रमुख उदाहरण हैं। इन मण्डपों के द्वार पर द्वारपालों की मानवाकृतियाँ तराश कर बनाई गयी हैं। मण्डपों में स्तम्भों की बहुलता उल्लेखनीय है। इन स्तम्भों की बनावट की मौलिकता ध्यान देने योग्य है। प्रत्येक स्तम्भ 2.25 मीटर ऊँचे हैं। स्तम्भ यष्टि का निचला भाग वर्गाकार या चौकोर है, मध्य का एक तिहाई भाग अठपहलयुक्त है तथा ऊपरी भाग में कपोत (ब्रैकेट बने हुए हैं। स्तम्भों के शीर्ष तथा आधार भाग सिंह की विशेषता बन गयी।

मामल्ल शैली-

मामल्ल शैली का समय नरसिंह वर्मा प्रथम ‘मामल्ल’ के शासन काल से लेकर नरसिंह वर्मा द्वितीय के शासन काल तक अर्थात् सन् 640 से लेकर 690 तक माना जाता है। इस शैली को मामल्ल शैली इसलिए कहा जाता है क्योंकि मामल्ल नरसिंह वर्मा की उपाधि थी। उसने अपने नाम पर मामल्लपुरम् नामक नगर बसाया था। मामल्ल शैली में मण्डपों तथा रथों का निर्माण हुआ। मामल्ल शैली के मण्डप महेन्द्र शैली के मण्डपों से अधिक अलंकृत, सुडौल तथा परिष्कृत हैं। स्तम्भ यद्यपि एकाश्मक हैं किन्तु उनको तराश कर पतला एवं लम्बा बनाया गया है। स्तम्भों पर पूर्णघट (कलश) तथा पदा (कलश पुष्प की आकृति) आदि अलंकरण प्रयोग में लाये गए हैं। आधार पर स्तम्भों में अपने पैरों पर बैठे हुए सिंह कुछ इस प्रकार तराशे गए हैं, मानों ये स्तम्भों का भार अनपे सिर पर उठाये हुए हों।

मामल्ल शैली के अधिकांश मण्डप तमिलनाडु के चिगलपेट जिले में महाबलीपुरम् (मामल्लपुरम्) नामक स्थान पर निर्मित हैं। उल्लेखनीय मण्डपों में वाराह मण्डप, पंच पाण्डव मण्डप, महिषमर्दिनी मण्डप, कोटिकल मण्डप आदि हैं।

महेन्द्र वर्मा के उत्तराधिकारी पुत्र नरसिंह वर्मा (प्रथम) ‘मामल्ल (630-668 ई०) ने शैलकृत मण्डपों के अतिरिक्त पर्वत की प्राकृतिक विशाल चट्टानों को तराश कर अलंकृत एकाश्मक मन्दिरों का निर्माण कराया जो रथों के नाम से प्रसिद्ध हैं। नरसिंह वर्मा मामल्ल द्वारा निर्मित रथों के साथ मामल्ल शैली का विकसित रूप सामने आता है। शैलकृत इन मन्दिरों की बाह्य रूपरेखा एकाश्मक मन्दिर के सदृश है इसलिए इनको ‘रथ’ कहा जाता है। पल्लव काल के प्रसिद्ध ‘पत्तन’ (बन्दरगाह) मामल्लपुरम् (महाबलीपुरम्) में ‘रथ’ बने हुए हैं जो तमिलनाडु के चिंगलपेट जिले में स्थित हैं। मण्डपों की ही भाँति इन रथों का निर्माण भी चट्टानों को तराश (काट-छाँट) कर किया गया है, किन्तु दोनों की निर्माण शैली में अन्तर है। एक ही चट्टान को अन्दर बाहर तराश कर मन्दिर का रूप दिया गया है। इन रथों का वैशिष्ट्य इनकते पतले, लम्बे किन्तु अलंकृत स्तम्भ, कीर्तिमुख युक्त मकरतोरण तथा अष्टकोणात्मक स्तूपिका में है। इन रथों के भीतरी भाग पौराणिक देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के द्वारा अलंकृत हैं।

रथों की निर्माण शैली पर काष्ठ-शिल्प का प्रभाव परिलक्षित होता है। रथों के भीतर शहतीर तथा बँडेरियाँ पत्थर में तराश कर बनायी गई हैं जिनसे उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। एकाश्मक रथों की संख्या आठ है- 1. द्रौपदी रथ, 2. धर्मराज रथ, 3. भीम रथ, 4. अर्जुन रथ, 5. नकुल-सहदेव रथ, 6. गणेश रथ, 7. बलैयन कुट्टई रथ, 8.पिडारी रथ। इनमें से धर्मराज, भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव रथ इक्षिणी छोर पर निर्मित हैं तथा गणेश रथ उत्तरी छोर पर स्थित है। उत्तरी-पूर्वी किनारे पर वलयन कुट्टई तथा पिडारी रथ बने हुए हैं। द्रौपदी रथ की छत का स्वरूप पर्णशाला की अनुकृति प्रतीत होता है। अन्य सात रथों की निर्माण की योजना बौद्ध चैत्यगृहों तथा विहारों के सदृश है। इसका तल-विन्यास वर्गाकार है तथा यह चतुर्वर्गरथ हैं। उर्ध्व विन्यास में अधिष्ठान, पद तथा भित्ति एवं उसके ऊपर झोपड़ी के समान वृत्ताकार छत तथा सबसे ऊपर स्तूपों का निर्माण किया गया है।

धर्मराज रथ त्रिताल विमान का उदाहरण है जिसका आधार वर्गाकार है किन्तु ग्रीवा शिखर अष्टकोणीय है। इसके तीनों तलों पर गर्भगृह तथा देवमूर्तियों मिलती हैं। आदि तल के गर्भगृह के सामने मुखमण्डप मिलता है। मुख मण्डप के ऊपर भी द्वार बना है जिसे कूट, शाल और पञ्जर अभिप्रायों से बनाया गया है। सबसे ऊपरी तल में तराशे गए गर्भगृह में सोमस्कन्द शिव की मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस गर्भगृह की दीवालों पर बने देव प्रकोष्ठों में देवी-देवताओं की सुन्दर मूर्तियाँ निर्मित हैं। तीनों तलों के गर्भगृह का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि उनके चतुर्दिक् सँकरे प्रदक्षिणापथ की योजना भी प्राप्त होती है।

भीम रथ आयताकार तल-विन्यास वाला है तथा शिखर गजपृष्ठाकार (अर्द्धवृत्ताकार) मेहराब के रूप में है। इसके ऊपर स्तूपिकाओं की पंक्ति है। भीम रथ निर्मीयमाण स्थिति में है, आदितल में यह सान्धार है। गर्भगृह के चतुर्दिक स्तम्भों तथा भित्तिस्तम्भों पर आधारित मण्डप की योजना है जिसमें प्रवेश द्वार भी बने । मण्डप के ऊपर कूट, शाल की पंक्ति से निर्मित द्वार का निर्माण किया गया है। अर्जुन रथ द्विताल या अष्टांग वर्ग का विमान है जिसकी मुख्य दीवाल में छिछले कोष्ठ तराशे गए हैं जिनमें सुन्दर देव मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। नकुल-सहदेव रथ निन्धार तथा गजपृष्ठाकार शिखर वाला हैं। इसमें भी सामने की ओर छोटा खुला मुख मण्डप प्राप्त होता है। वलैयन कुट्टई रथ निर्माण की अधूरी अवस्था में है। तलछंद तथा ऊर्ध्वछंद दोनों में वर्गाकार तथा चतुष्कोणीय स्वरूप वाला है। इसे निरन्धार बनाया गया है। उत्तरी पिडरी रथ में सामने की ओर अर्द्ध-मण्डप है। इसके ग्रीवा शिखर में नाशिकाओं का अंकन किया गया है। दक्षिणी पिडरी रथ निर्मीयमाण दशा में मिला है तथा यह द्वितल विमान है। दोनों तल वर्गाकार हैं। दोनों तलों पर शाल तथा कर्णकूट का अंकन मिलता है। इनका निर्माण बौद्ध चैत्यगृहों तथा विहारों के अनुकरण पर किया गया था।

राजसिंह शैली-

राजसिंह शैली में शैलकृत अथवा शिला-घटित मन्दिरों (Rock-Cut Temples) के स्थान पर प्रस्तर-खण्डों के द्वारा चिनाई करके नवीन प्रकार के मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ। नवीन निर्माण शैली के कारण शिल्पियों का कार्य अधिक सुगम हो गया। शिल्पियों को अपनी कार्यक्षमता तथा निपुणता के प्रदर्शन का नवीन अवसर प्राप्त हुआ। शिल्पी मन्दिरों की रचना स्वेच्छापूर्वक कहीं पर भी कर सकते थे। राजसिंह शैली के उल्लेखनीय मन्दिर हैं-

  1. समुद्र तटीय मन्दिर (Shore Temple),
  2. मुकुन्द नयनार मन्दिर,
  3. ओलक्कनेश्वर मन्दिर,
  4. तलगिरीश्वर मन्दिर,
  5. कैलाश नाथ मन्दिर,
  6. बैकुण्ठ पेरुमल मन्दिर।

इनमें से तट-मन्दिर, मुकुन्द मन्दिर तथा ओलक्कन्नेश्वर (ईश्वर) मन्दिर मामल्लपुरम् में स्थित हैं। तलगिरीश्वर मन्दिर तमिलनाडु के अर्काट जिले में पनमलाई नामक स्थान पर है। कैलाश नाथ और बैकुण्ठ-पेरुमल के मन्दिर तमिलनाडु के कांजीपुरम (कांची) में स्थित हैं। मन्दिर-स्थापत्य कला की दृष्टि से राजसिंह शैली के मन्दिरों में तट मन्दिर, कैलाश मन्दिर तथा बैकुण्ठ पेरुमल मन्दिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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