इतिहास

गुप्तकालीन प्रमुख मन्दिर | भूमरा का शिव मन्दिर | वगढ़ का दशावतार मन्दिर | भितरगाँव का मन्दिर | अहिच्छत्र का मन्दिर | सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर

गुप्तकालीन प्रमुख मन्दिर | भूमरा का शिव मन्दिर | वगढ़ का दशावतार मन्दिर | भितरगाँव का मन्दिर | अहिच्छत्र का मन्दिर | सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर

गुप्तकालीन प्रमुख मन्दिर

(1) भूमरा का शिव मन्दिर-

मध्य प्रदेश के सतना जिले में मध्य रेलवे के मानिकपुर जबलपुर रेलमार्ग पर स्थित ऊँचेहरा रेलवे स्टेशन से लगभग 9.50 किमी की दूरी पर भूमरा का प्रस्तर निर्मित शिव मंदिर है। इसका अन्वेषण सन् 1920 में आर0 डी0 बनर्जी ने किया था। केवल ‘गर्भगृह’ ही अवशिष्ट रह गया है। गर्भगृह में एकमुखी शिवलिंग स्थापित है। मन्दिर की छत चिपटी है, द्वार की चौखट अलंकृत है। ललाटबिम्ब के रूप में शिव की भव्य मूर्ति है। गर्भगृह के प्रवेश-द्वार की शाखाओं के नीचे मकरवाहिनी गंगा तथा कूर्मवाहिनी यमुना की मूर्तियाँ निर्मित हैं। गर्भगृह के चतुर्दिक स्तम्भयुक्त एक मण्डप तथा प्रदक्षिणापथ रहा होगा क्योंकि इसके चारों ओर का चबूतरा प्रदक्षिणापथ का द्योतक है। मण्डप के स्तम्भ तथा द्वार के जो अवशेष मलबे की सफाई करने पर मिले हैं वे अत्यन्त अलंकृत हैं। भूमरा तथा नचना-कुठार के मन्दिर संभवतः परिखाजक शासकों के समय (500-550 ई०) में बने थे।

(2) देवगढ़ का दशावतार मन्दिर

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में बेतवा नदी के तट पर देवगढ़ नामक स्थान पर गुप्तकाल का एक ध्वस्त विष्णु मन्दिर है जिसमें गुप्तकाल की वास्तुकला के शिल्प का चरमोत्कर्ष दिखलाई पड़ता है। देवगढ़ के दशावतार मन्दिर का निर्माण आनंद केंटिश कुमारस्वामी के अनुसार गुप्तकाल के अंतिम वर्षों में हुआ था। इस मन्दिर का निर्माण लगभग 1.50 ऊँचे अधिष्ठान (चबूतरा) पर किया गया था। वर्गाकार मन्दिर की प्रत्येक दीवाल 5.50 मीटर लम्बी है। मन्दिर के चबूतरे पर चढ़ने के लिए चतुर्दिक 4.50 मीटर लम्बी सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इस मन्दिर की कतिपय विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। गुप्तकाल के अन्य मन्दिरों की छतें जहाँ पर सपाट हैं, वहाँ पर इसमें पिरामिडनुमा शिखर मिलता है जिसकी ऊँचाई किसी समय लगभग 12 मीटर थी। शिखर के माध्यम से मन्दिर की ऊँचाई में वृद्धि का प्रयास किया गया है।

इसके सुन्दर गर्भगृह के चतुर्दिक् एक ही स्थान पर सपाट छत वाले चार मण्डप बने हुए थे जिनमें से पश्चिम के द्वार से होकर गर्भगृह में प्रवेश किया जा सकता था, शेष तीन ओर की दीवालों में एक-एक रथिकाएँ हैं, जो गर्भगृह की उन बाहरी दीवालों की रक्षा करती थीं जिन पर पौराणिक देवी-देवताओं की नयनाभिराम मूर्तियाँ बनी हुई हैं। रथिकाओं का विस्मयकारी अलंकरण मन को मोह लेता है। मन्दिर की काया पर रामायण के दृश्य कटे हुए हैं। कृष्ण लीला की मूर्तियों का भी इस मन्दिर में निर्माण किया गया है। गजेन्द्र-मोक्ष एवं नर-नारायण का मूर्तन विशेष कुशलता के साथ इन रथिकाओं में किया गया है। इस मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश-द्वार  अत्यन्त आकर्षक है। द्वार-शिला पर शेषशायी विष्णु की सजीव मूर्ति उकेरी हुई है। प्रवेश-द्वार के दोनों ओर गंगा, यमुना खड़ी हुई हैं। द्वारपालों का भी द्वार-स्तम्भों पर उत्कीर्णन हुआ है। मिथुनों की मूर्तियाँ भी यत्र-तत्र मिलती हैं। दीवालों और चौखटों पर निर्मित मूर्तियों का सुडौलपन तथा नख-शिख हदयग्राही है। सर्वत्र सुरुचिपूर्ण मूर्तियों एवं पौराणिक दृश्यों की भरमार है।

(3) भितरगाँव का मन्दिर-

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के भितरगाँव नामक स्थान पर ईंटों से बने हुए मन्दिर की नक्काशी दर्शनीय है। मन्दिर का निर्माण एक वर्गाकार चबूतरे पर है। वर्गाकार गर्भगृह (4.50 मीटर), वर्गाकार मण्डप अथवा गूढ़ मण्डप तथा दोनों को जोड़ते हुए लघु अन्तराल, चे भितरगाँव मन्दिर के प्रमुख अंग हैं। नक्काशीदार ईंटों से भितरगाँव के मन्दिर के गर्भगृह’ तथा मण्डप की दीवालें निर्मित हैं। मंदिर के ‘गर्भगृह’ की दीवाल ‘भद्ररथ’ एवं ‘कर्ण रथ’ के द्वारा ‘त्रिरथ’ बनायी गई थी। गुप्तकाल में नक्काशीदार ईंटों के बहुतायत से उपयोग के साक्ष्य मिलते हैं। यह शिखरयुक्त मन्दिर है। मन्दिर के चारों ओर दोहरी बरसाती में छज्जे (Cornice) लगे हुए हैं। ईंटों की दर्शनीय जालियाँ बनी हुई हैं। उठते हुए शिखर पर सर्वत्र चैत्य मेहराबें बनी हुई हैं जिनमें से कुछ ही अब बच रही हैं। बाहरी दीवालों पर बने गवाक्षों या आलों में देवताओं की मिट्टी की बनी हुई मूर्तियाँ और रामायण एवं महाभारत के कथानकों से सम्बन्धित मूर्तियाँ जड़ी हुई हैं, जिनमें से अनेक अब चोरी हो गयी हैं! बड़ी-बड़ी मृण्यमूर्तियों से युक्त भितरगाँव का मन्दिर असाधारण एवं अनोखा है।

(4) अहिच्छत्र का मन्दिर-

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में रामनगर कस्बे के पास अहिच्छत्र का प्राचीन टीला स्थित है। अहिच्छत्र के उत्खनन के फलस्वरूप ईंटों के बने हुए एक शिव मन्दिर के अवशेष मिले हैं। अहिच्छन का शिव मंदिर ‘एडूक’ मंदिर है। एक के ऊपर एक बने हुए तथा क्रमशः छोटे होते गये ईंटों के वर्गाकार पाँच चबूतरे अथवा भद्रपीठ प्राप्त होते हैं। पीठिका का प्रत्येक तल अपने ऊपर के चौकोर चबूतरे के चारों ओर प्रदक्षिणापथ का कार्य करता था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इस मन्दिर में सबसे ऊपरी भद्रपीठ पर गर्भगृह में एक शिवलिंग स्थापित रहा होगा। मिट्टी की बनी हुई अनेक विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं। मकर पर बैठी हुई गंगा तथा कूर्म पर आरूढ़ यमुना की आदमकद प्रतिमाएँ मिली हैं जो आजकल नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। अहिच्छत्र के मन्दिर के निर्माण का समय 450 तथा 500 ईसवी के बीच में निर्धारित किया गया है।

(5) सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर-

मध्य प्रदेश के रायपुर जिले में स्थित सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर के अतिरिक्त राममन्दिर एवं जानकी मन्दिर भी ईंटों द्वारा बनाये गये थे। सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर का अब केवल ‘गर्भगृह’ ही अवशिष्ट रह गया है। इस मन्दिर में भी संभवतः शिखर रहा होगा। गर्भगृह की बाहरी दीवालों पर सर्वत्र मेहराब बने हुए हैं। गर्भगृह के प्रवेश-द्वार तथा चौखट पर हिन्दू देवी-देवताओं की मृणमूर्तियों की शोभा दर्शनीय है। इसको गुप्तोत्तर काल में रखा जा सकता है।

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Pankaja Singh

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