इतिहास

गान्धार शैली | गान्धार शैली के विषय | गाधार शैली के विषय क्षेत्र की विवेचना

गान्धार शैली | गान्धार शैली के विषय | गाधार शैली के विषय क्षेत्र की विवेचना

Table of Contents

गान्धार शैली-

गान्धार शैली के निर्माण के विषय में विद्वानों के दो मत है, एक मत में फूशे, विन्सेन्ट स्मिथ तथा सर जॉन मार्शल आदि विद्वान इस पर भारतीय प्रभाव स्वीकार नहीं करते। उनके विचार से बुद्ध मूर्ति की कल्पना सर्वप्रथम गान्धार शैली में हुई। गान्धार शैली में बुद्ध की मुखाकृति यूनानी देवता अपोलो के मुख के समान है। वस्त्रादि भी ग्रीक पद्धति के आधार पर निर्मित है। गान्धार कला के शिल्पी विदेशी थे। बाद में भारतीय मूर्तिकारों ने इसी का अनुकरण करके बुद्ध की मूर्ति बनायी।

बुद्ध मूर्ति के प्रथम भारतीय निर्माण के समर्थक गान्धार कता में इसके उद्भव के विरोधी आनन्द कुमार स्वामी, ई० वी० हैवेल तथा काशीप्रसाद जायसवाल आदि हैं। इनका विचार है कि गान्धार शैली वाले क्षेत्र भारतीय कला के नमूने हाथी दाँत तथा काष्ठ शिल्प आदि के रूप में प्रचलित थे। इन्हीं से कुछ विशेष बातों को ग्रहण करके विदेशी शिल्पियों ने गान्धार शैली में बुद्ध मूर्ति की रचना की। बुद्ध की पद्मासन मूर्ति में दोनों चरण तल उल्टे और एक सरल रेखा में दिखाये गये हैं तथा हाथों की कुहनियाँ जाँघों तक पहुँची हुई हैं, केशों के दक्षिणावर्त घूमे हुए छल्ले भी वास्तविक नहीं हैं। कान भी बहुत लम्बे हैं अतः इन सभी कारणों से बुद्ध मूर्ति को गान्धार शैली की उपज नहीं कहा जा सकता। मथुरा की ही बुद्ध प्रतिमा के प्रथम निर्माण को वास्तविक माना जाता है। कनिष्क के राज्य काल की मूर्ति द्वितीय तथा सारनाथ संग्रहालय की मूर्ति पर तीसरे वर्ष की तिथि अंकित है। नारी आकृतियों को प्रसंगवश ही बनाया गया है। साँची आदि में दृश्यों के संयोजन में आरम्भ से अन्त तक की घटना को एक ही फलक पर चित्रित किया गया है। जबकि गान्धार शैली में किसी कथा का एक ही दृश्य  एक फलक पर अंकित किया गया है और उसमें घटना के सबसे प्रभवशाली या व्यंजक रूप को ही चुना गया है। ‘बुद्ध जन्म’ तथा ‘सुन्दरी और नन्द की कथा’ इसके सुन्दर उदाहरण हैं। गान्धार कला में सौन्दर्य और यथार्थ का सुन्दर समन्वय दृष्टिगोचर होता है। भारतीय गुप्त कालीन कला इससे प्रभावित है। भारत के अतिरिक्त चीन तथा जापान आदि देशों की कला पर भी इसका प्रभाव पडा।

पहले दल के प्रमुख प्रतिनिधि हैं-फूशे, विन्सेन्ट स्मिथ तथा सर जॉन मार्शल; और दूसरे दल के मुख्य प्रतिनिधि हैं हैवेल, जायसवाल तथा डाक्टर कुमार स्वामी। इन दोनों ही दलों ने अपने-अपने पक्ष में पर्याप्त तर्क उपस्थित किये हैं जिनका स्थानाभाव के कारण यहां दिग्दर्शन नहीं कराया जा सकता।

रेखांकन, अंग-प्रत्यगों के उभार और गतिशीलता में ये मूर्तियाँ इतनी सजीव लगती थीं ‘मानों कलाकार ने अभीष्ट वस्तु को साकार कर दिया हो। गान्धार कला में यूनानी कला की तरह स्फूर्ति, कल्पना और सुन्दर भावांकन पर्याप्त मात्रा में हुआ है लेकिन भावों की गहराई की दृष्टि से कला उच्च स्तर की नहीं थी। गान्धार कला में मानव के चरम सत्य की अभिव्यक्ति हुई लेकिन अनुभूति की तीव्रता न थी जो भीतरी स्वरूप में रम सकती। इस शैली की मूर्तियाँ भारत में तक्षशिला और पेशावर, अफगानिस्तान सीमा प्रान्त और फारस तक जीवित न रह सकीं।

जो शिल्प शैली गान्धार में पनपी उसे ‘गान्धार कला’ की संज्ञा दे दी गयी। यों विदेशी विद्वानों ने इसे ‘ग्रीको-बुद्धिस्ट’, ‘इन्डो-ग्रीक’, ‘इन्डो-बैक्टीरियन’ के नाम से सम्बोधित किया।

गान्धार प्रदेश में पिछली शताब्दी में अनेक भग्न स्तूपों की खुदाई की गयी। उनमें से प्रतिमाओं का इतना विशाल भण्डार निकला की पेशावर, लाहौर व कलकत्ता के संग्रहालयों के अनेक कक्ष भर गए। सबसे पहली खुदाई सर ई० क्लाव बैले ने जमालगढ़ी में कराई। इसकी मूर्तियाँ इंग्लैण्ड ले जायी गयीं। वहाँ क्रिस्टल भवन में इसकी प्रदर्शनी हुई किन्तु दुर्भाग्यवश उसमें आग लग गई और सारी प्रतिमाएँ वहीं नष्ट हो गयीं। इनके चित्र भी नहीं उतारे जा सके। बैले साहब ने इसके केवल ग्यारह रेखाचित्र बनाए हैं। जमालगढ़ी, तख्ते वाही युसुफजाई, सिकरी आदि के बौद्ध स्तूपों में काले स्लेट की हजारों मूर्तियाँ निकली हैं। गान्धार की समस्त प्रतिमाएँ काले स्लेटी पत्थर की ही हैं। यह मूर्तियाँ किस काल की हैं, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन पर कोई लेख नहीं खुदा, जिसके आधार पर उसका समय निर्धारण किया जा सके। सन जॉन मार्शल ने इन प्रतिमाओं के सम्बन्ध में लिखा है

“Not one of the thousands of known images dare a late in any known era, nor do consideration of style permit us to determine their Chronelogical Sequence with any approach to accuracy.”

गान्धार शैली के विषय-

गान्धार कला के विषय भगवान बुद्ध के जीवन से लिए गए हैं। शायद ही कोई ऐसा प्रसंग शेष बचा हो जिसका वर्णन यहाँ के शिल्पों की शैली में न हुआ हो। उनके भू पर अवतरित होने से लेकर महापरि निर्वाण तक के सारे प्रसंग इस शिल्प में ऑक दिए हैं।

गान्धार शिल्प की शैली विदेशी होते हुए भी इसके विषय सर्वथा भारतीय है। इनमें से कुछ कथानक भारतीय शिल्पियों को इतने प्रिय हैं कि वे सभी शिल्प शैलियों में प्रस्तरांकित हुए हैं।

गान्धार कला का एक फलक कलकत्ता संग्रहालय में भी है, जिसमें माया देवी सो रही हैं। एक हाथी दौड़ता हुआ उनकी ओर आ रहा है। रानी की शैया के निकट ही एक दासी खड़ी है। हाथी के मुँह के पीछे प्रभा मण्डल दिखाई दे रहा है। गान्धार शैली की प्रतिमाओं में बुद्ध और कभी-कभी बोधिसत्व के मुख के पीछे प्रभा मण्डल दिखाई देता है किन्तु वह कुषाण अथवा गुप्तकालीन प्रतिमाओं के प्रभामण्डल की भाँति कमलों की बेलों अथवा पुष्पों से अलंकृत नहीं रहता वरन् सादा और सपाट रहता है। गान्धार शैली को कुछ ही बुद्ध प्रतिमाओं में अंलकरणों से भरा हुआ प्रभामण्डल दिखाई देता है, किन्तु सम्भवतः ये बाद की कृतियाँ हैं।

कला का स्त्रोत उसके निर्माता को अन्तर की प्रेरणा होती है। अजन्ता के अन्धेरे गुहा मन्दिरों को केवल अन्तर के प्रकाश से ही आलोकित कर उन दिव्य चित्रावलियों की रचना हो सकती थी। गान्धार शैली के कलाकार को यह प्रेरणा नहीं मिल पायी थी।

गान्धार शैली की कृतियाँ फरमायशी चीजें थीं। कलाकार के पास आदेश पड़े थे और उसे उन्हें निबटाना था अतः वह बिना कोई अनुभूति जगाये, मशीन की भाँति मूर्तियाँ बनाता चला गया। यदि ऐसी प्रतिमाएँ रसानुभूति जागृत करने में समर्थ न हो सकें तो क्या आश्चर्य?

श्री रायकृष्ण दास जी ने इस स्थिति को समझ कर लिखा है- ‘बौद्ध विषयों की अभिव्यक्ति के लिए उन शिल्पियों को अपनी कल्पना से काम नहीं लेना पड़ा। कुछ उपादानों के नमूने भी गान्धार में पहुँचाए होंगे किन्तु अतः वहाँ के कारीगरों को धान की घान मूर्तियाँ तैयार करनी थीं अतः उन्हें इतना अवकाशन था कि वे इन नमूनों को आत्मसात् करते अथवा भारतीय अभिप्रायों को समझने बैठते। कुछ खास-खास बातें लेकर अपनी पारम्परिक शैली के अनुसार उन्हें काम पीटना था।”

सिद्धार्थ के पाठशाला में जाकर पढ़ने का दृश्य साँची या भरहुत के शिल्प में कहीं नहीं दिखाई देता। वे अपनी दोनों जाँघों पर पट्टी रखे हुए लिख रहे हैं। वे एक चौकी पर बैठे हैं। निकट ही अन्य विद्यार्थी खड़े हैं। इस फलक में कई दृश्य हैं। एक ही कथा के विभिन्न प्रसंगों को, एक ही फलक में, कई दृश्यों के रूप में आंकने की शैली पूर्णतया भारतीय हैं।

सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण का दृश्य साँची के तोरणों पर भी आंका गया है किन्तु वहाँ वे स्वयं नहीं दिखाई देते। छन्दक खाली घोड़े पर छतरी ताने हुए हैं। गान्धार कला के, कलकत्ता संग्रहालय, के एक मूर्ति-फलक में वे एक राजकुमार की भाँति घोड़े पर बैठे हुए जा रहे हैं। उनके सिर पर लटूदार पगड़ी है ‘मुख के पीछे प्रभा-मण्डल है। वे राजकीय परिधान और अलंकार धारण किये हैं’ नाटे कद के धुंघराले बालों वाले देव घोड़े के खुरों को अपने हाथ में लिए हैं। रुंदक छतरी ताने हैं। घोड़े के निकट ही इन्द्र खड़े हैं। वे राजपुरुषों जैसे ऑके गये हैं! उनके पीछे ब्रह्मा खड़े हैं। वे योगियों जैसे वस्त्र धारण किये हैं। सिर पर लम्बे बाल हैं, जिनका जूड़ा ऊपर बँधा है। उनके पीछे भी प्रभा मण्डल है। देवगण हाथ जोड़े हुए हैं। आकाश में एक ओर वज्र लिए हुए यक्ष वज्र पाणि दिखाई देता है, और दूसरी ओर अन्य देवता ।

महाभिनिष्क्रमण की भाँति ही, शक्र का भगवान बुद्ध के निकट आगमन भी बौद्ध कालीन शिल्पियों का प्रिय विषय रहा है। बोधगमया में भी शक्र का उनके निकट भेंट करने के लिए आना, आंका गया है। जिन दिनों भगवान मगध जा रहे थे वे राजगृह के निकट एक गुहा में ठहर गये। तब इन्द्र अपने एक गन्धर्व मित्र के साथ उनके निकट अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए आया। गांधार के इस फलक में बुद्ध आसन पर बैठे हैं और शक्र हाथ-जोड़े हुआ खड़ा है। सेवक उस पर छतरी ताने है। इन्द्र के साथी गन्धर्व के हाथ में हार्प बाजा है।

इन समस्त विषयों के अंकन से स्पष्ट हो जाता है कि गान्धार कला के शिल्पियों ने उन्हीं विषयों को स्पर्श किया जो पहले भरहुत या सांची में आंके जा चुके थे। गान्धार शैली में हमें प्रतीकों की उपासना भी दिखाई देती है। वे त्रिरत्न और चक्र आदि हैं। जातकों का वाङ्मय बहुत बड़ा है। उनमें से शिल्पियों ने केवल कुछ जातक ही चुन लिए हैं।वही हमें भरहुत, साँची, अजन्ता व गान्धार शिल्प में दिखाई देते हैं। इनमें हम छंदत जातक, श्याम जातक, वैसन्तर जातक, दीपंकर जातक, ऋषि श्रृंग जातक आदि देखते हैं।

बोधिसत्त्व एक बार हिमालय की घाटी मे किन्नर बनकर उत्पन्न हुए। उनकी पत्नी का नाम चन्द्रा था। एक बार वे दोनों एक वन में विहार कर रहे थे। किन्नर चन्द्र वेणु बजा रहा था और उसकी पत्नी नृत्य कर रही थी। वाराणसी का राजा शिकार करता हुआ उधर आ निकला। वह किन्नरी चन्द्रा का सौन्दर्य देखकर ठगा सा रह गया। उसने सीचा कि यदि वह किन्नर को मार डालेगा तो उसकी पत्नी को अपने साथ ले जा सकेगा। उसने तीर छोड़ दिया और चन्द्र किन्नर वहीं घायल होकर गिर पड़ा। फिर मर गया। चन्द्रा शोकातुर होकर उनके पुनर्जीवन के लिए शक्र से प्रार्थना करने लगी। उसकी कृपा से किन्नर में फिर प्राण लौट आये। कलकत्ता संग्रहालय के मूर्ति-फलक में चन्द्र वेणु बजा रहा है और चन्द्रा नृत्य कर रही है। उसी में एक अन्य दृश्य है जिसमें राजा कमान तानकर तीर छोड़ रहा है। दाहिनी ओर चन्द्रा अपने पति के पास बैठी हुई विलाप कर रही हैं। एक ओर एक पुरुष एक स्त्री को खींचे लिए जा रहा है।

गान्धार कला के मूर्तिकारों को दीपंकर जातक बहुत अधिक प्रिय था। उसे अनेकों बार आँका गया है।

गान्धार कला का विदेशी कला-समीक्षकों ने जिनमें इतिहासकार बी० ए० स्मिथ और सर जॉन मार्शल भी हैं, बहुत आदर किया है। उनकी मान्यता है कि बुद्ध प्रतिमाओं का श्रीगणेश इस शिल्प से ही हुआ, भारतीय मूर्तिकला से यह शैली बिलकुल अलग है।

गान्धार शैली में कुबेर और हारिति की प्रतिमाएँ प्राप्त होती हैं। कुबेर धन का स्वामी है और उत्तर दिशा का रक्षक भी कहा जाता है। वे यक्ष जाति के समझे जाते थे। कुबेर यक्षों का अधिपति समझा जाता था। हारिति उसकी पली थी। हारिति की माता के रूप में कल्पना की गयी है। वह अपनी गोद में शिशु लिए रहती है। कुछ नन्हें बालक उसे घेरे हुए रहते हैं। तख्तेवाही की खुदाई में कुबेर और हारिति की पास-पास एक ही आसन पर बैठी हुई मूर्ति प्राप्त हुई है। कुबेर का शरीर मांसल और पेट स्थूल है। यह दोनों उन स्त्रियों द्वारा पूजे जाते थे, जो पुत्रों की कामना रखती थी।

गान्धार कला का उद्गम भारतीय है, वह क्षेत्र जिसमें यह पनपी विभिन्न संस्कृतियों की मिलन भूमि रहा है। यही कारण है कि उस पर बाहर का, विशेष रूप से ग्रीक और ईरानी प्रभाव दिखाई देता है किन्तु इस प्रभाव ने उसका पथ कुंठित कर दिया। न तो उसमें यूनानी कला की यथार्थता आ सकी और न ही भारतीय कला की आदर्शशीलता। भारतीय मूर्तिकला की विभिन्न शैलियों पर उसका कोई स्थायी प्रभाव न पड़ सका। उसका महत्व यदि कुछ है तो मूर्ति विधान की दृष्टि से। किसी शिल्प शैली में इतने विषयों का बाहुल्य नहीं दिखाई देता किन्तु प्रतिमाओं में सजीवता और सौष्ठव न होने के कारण, वह मन में रसानुभूति जगाने में नितान्त असफल रह जाती है।

गान्धार शैली में भगवान बुद्ध एक योगी के रूप में आँके गये हैं। वे लम्बा वस्त्र कंधों से ओढ़े हुए दिखाई देते हैं। उस पर चुन्नटें दिखाई जाती हैं। कभी-कभी यह चुन्नटें इतनी अधिक दिखाई देती है कि उनका वस्त्र, शरीर से चिपटा, भीगा हुआ सा प्रतीत होता है।

इन प्रतिमाओं में भगवान के माथे पर साफा या मुकुट आदि नहीं रहता जो बोधिसत्त्वों के मस्तक पर दिखाई देता है। इनमें उनके सिर पर बालों का जूड़ा रहता है। केश दो प्रकार के दिखाई देते हैं। किसी में वे कुछ बड़े लहरियोंदार दिखाई देते हैं, किसी प्रतिमा में वे छोटे- छोटे किन्त घमावदार रहते हैं।

इतिहास – महत्वपूर्ण लिंक

Disclaimer: e-gyan-vigyan.com केवल शिक्षा के उद्देश्य और शिक्षा क्षेत्र के लिए बनाई गयी है। हम सिर्फ Internet पर पहले से उपलब्ध Link और Material provide करते है। यदि किसी भी तरह यह कानून का उल्लंघन करता है या कोई समस्या है तो Please हमे Mail करे- vigyanegyan@gmail.com

About the author

Pankaja Singh

Leave a Comment

error: Content is protected !!