व्यूहरचनात्मक प्रबंधन

एकीकरण से आशय | एकीकरण के गुण/उद्देश्य | एकीकरण के दोष | विलय के स्वभाव का एकीकरण | विलय के स्वभाव एवं क्रम के स्वभाव के एकीकरण में अन्तर

एकीकरण से आशय | एकीकरण के गुण/उद्देश्य | एकीकरण के दोष | विलय के स्वभाव का एकीकरण | विलय के स्वभाव एवं क्रम के स्वभाव के एकीकरण में अन्तर | Meaning of Integration in Hindi | Merits/Objectives of Integration in Hindi | Defects of Integration in Hindi | integration of the nature of the merger in Hindi | Difference between nature of merger and integration of nature of order in Hindi

विलय या एकीकरण (merger or Amalgamation) से आशय

कम्पनी अधिनियम, 2013 में ‘विलय’ (Merger) का शब्द का प्रयोग ‘संविलयन’ (Absorption) तथा एकीकरण (Amalgamation) दोनों के लिए किया गया है। धारा 232 में यह स्पष्ट किया गया है कि

(अ) सम्मिश्रण की एक योजना में, जहाँ योजना के अन्तर्गत एक या अधिक कम्पनियों के उपक्रम, सम्पत्ति और दायित्वों उस कम्पनी को शामिल करते हुए जिसके सम्बन्ध में समझौता या व्यवस्था प्रस्तावित है, जो अन्य विद्यमान को हस्तान्तरित किया जाता है, इसे ‘संविलयन द्वारा विलय’ (Merger by absorption) कहा जाता है।

(ब) जहां दो या अधिक कम्पनियों के उपक्रम, सम्पत्ति और दायित्व, उस कम्पनी को शामिल करते हुए जिसके सम्बन्ध में समझौता या व्यवस्था प्रस्तावित है, एक नई कम्पनी को, जो सार्वजनिक कम्पनी हो या न हो, हस्तान्तरित किये जाते हैं तो इसे ‘नवीन कम्पनी के निर्माण द्वारा विलय’ (merger by formation of a new company) अर्थात एकीकरण कहा जाता है।

समझौता और / या व्यवस्था में ‘विभाजन की योजना’ शामिल हो सकती है, जिसमें कम्पनी के उपक्रम, सम्पत्ति या दायित्वों को हो या अधिक कम्पनियों में विभाजन और हस्तान्तरण किया जा सकता है, जिनमें से प्रत्येक विद्यमान या नई कम्पनी हो सकती है। संक्षेप में कम्पनी अधिनियम, 2013 में शामिल नवीन शीर्षक, ‘समझौता’ व्यवस्थाएं और एकीकरण काफी विस्तृत अवधारणा है। जिसमें विलयन, अधिग्रहण, एकीकरण, गैर-विलयन, कम्पनी ऋण पुनर्संरचना और वित्तीय पुनसंगठन या पुनर्व्यवस्था शामिल है।

एकीकरण के गुण/उद्देश्य

Merits/Objectives of Amalgamation

एकीकरण के निम्न लाभ हैं:

(1) प्रतिस्पर्द्धा में कमी- एकीकरण के कारण कम्पनियों के मध्य होने वाली आपसी प्रतिस्पर्द्धा में कमी आ जाती है, और व्यवसाय में लाभ कमाने की क्षमता में वृद्धि हो जाती है।

(2) बड़े पैमाने पर उत्पादन- एकीकरण के कारण व्यवसाय में उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है क्योंकि इससे व्यवसाय का आकार बढ़ जाता है। उत्पत्ति के साधन का शोषण उपयोग होने के कारण उत्पादन लागत में कमी आती है।

(3) व्ययों में कमी- एकीकरण के कारण व्यवसाय से सम्बनिधत अनेक प्रकार के व्ययों में कमी आती है। एकीकरण के कारण प्रबन्ध एवं संचालन कार्यों में सुगमता एवं सरलता के कारण अपव्ययों में कमी आ जाती है।

(4) पूँजी में वृद्धि- एकीकरण के कारण कम्पनियों की पूँजी में पहले की अपेक्षा मात्रा बढ़ जाती है और उन्हें अधिक मात्रा में पूंजी प्राप्त करने में कठिनाई नहीं होती है।

(5) प्रबन्ध एवं नियन्त्रण – एकीकरण के कारण कम्पनियों को कई कुशल कर्मचारी भी प्राप्त होते हैं जो अपने अनुभव के द्वारा एकीकृत कम्पनी को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से चलाने में सहायक होते हैं। नीतियों का निर्माण एवं उनका क्रियान्वयन अधिक सरल हो जाता है।

(6) विशेषज्ञों की सुविधा- एकीकरण के द्वारा विशेषनों की सेवाएँ प्राप्त करना आसान हो जाता है क्योंकि वे कम्पनियाँ एकीकरण के पश्चात् पूंजी की उपलब्धता के कारण विशेषज्ञों को नियुक्त कर सकती है।

(7) वितरण में सुविधा- एकीकरण के पश्चात् उत्पाद का वितरण सुविधाजनक हो जाता है क्योंकि एकीकरण के पश्चात् कम्पानेयों को पृथक् वितरण केन्द्र की आवश्यकता नहीं होती है।

(8) बाजार पर नियन्त्रण- एकीकरण के कारण एकीकृत कम्पनियाँ बाजारी स्थिति पर अपना नियन्त्रण रखने में सफल होती हैं, क्योंकि वे उत्पाद की पूर्ति को बड़ी मात्रा में प्रभावित करने में सफल हो जाती हैं।

एकीकरण के दोष

एकीकरण के निम्न दोष हैं:

(1) प्रबन्धकीय समस्याएं- एकीकरण के कारण कम्पनियों का आकार बढ़ जाता है। इस कारण एक बड़ी औद्योगिक कम्पनी की सीमित प्रबन्धकीय क्षमता के कारण उसे सफलतापूर्वक चलाना सम्भव नहीं होता है।

(2) असहयोग- कम्पनियों का एकीकरण के कारण एक से अधिक कम्पनियों के प्रबन्धकों को मिलकर कार्य करना पड़ता है। अतः जब तक प्रबन्धकों में आपसी सहयोग की भावना नहीं होगी तब तक व्यवसाय को सफलतापूर्वक नहीं चलाया जा सकता। असहयोग के कारण व्यवसाय की प्रगति में भी बाधा होती है।

(3) मूल्य में वृद्धि- एकीकरण के कारण प्रतियोगिता में कमी तो आती है, परन्तु यह पद्धति एकाधिकार को भी प्रेरित करती है। इस प्रकार की व्यवस्था से यदि कोई संस्था एकाधिकार की दशा प्राप्त करती है तो वह संस्था ग्राहकों से अपने उत्पाद का बढ़ा हुआ मूल्य वसूल कर सकती है।

(4) पूर्ति पर नियन्त्रण- एकीकृत संस्थाएं वस्तु की पूर्ति में कमी दिखाकर ग्राहकों को उत्पीड़ित कर सकती हैं। इस प्रकार उत्पाद में कमी करके ग्राहकों को परेशान किया जा सकता है।

(5) अति-पूंजीकरण- एकीकरण के कारण व्यवसाय की कुल पूंजी में वृद्धि हो जाती है तथा कुछ व्ययों में कमी हो जाती है और इस कारण कुल कोष का प्रयोग सम्भव नहीं हो पाता है। इस कारण अति पूंजीकरण की समस्या उत्पन्न हो सकती है जिस पर नियन्त्रण करना सम्भव नहीं हो पाता।

(6) छोटे व्यवसायी को नुकसान- एकीकरण के कारण एकीकृत कम्पनियां अपने व्ययों पर बाजार पर नियन्त्रण स्थापित करने में सफल हो जाती है और इस कारण छोटे व्यवसायियों को इन बड़ी कम्पनियों से प्रतिस्पर्द्धा करने में कठिनाई का अनुभव होता है।

(7) बड़े पैमाने पर उत्पादन की कठिनाई- एकीकृत कम्पनियों को बड़े पैमाने पर भी उत्पादन करने में कठिनाई उत्पन्न होती है क्योंकि उन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन करने हेतु श्रम, वितरण, कर आदि की समस्या उत्पन्न होती है।

विलय के स्वभाव का एकीकरण (Amalgamation in the Nature of Merger)

निम्नलिखित पांच शर्तों के पूरा होने पर किसी भी कम्पनी के एकीकरण को विलय के स्वभाव का एकीकरण माना जाएगा।

(i) एकीकरण के बाद हस्तान्तरक कम्पनी की सभी सम्पत्तियां एवं दायित्व हस्तान्तरी कम्पनी के हो जायेंगे।

(ii) हस्तान्तरी कम्पनी एवं उसकी सहायक कम्पनियों द्वारा एकीकरण के पूर्व तक ग्रहण किये गये हस्तान्तरक कम्पनी के साधारण अंशों के अतिरिक्त अन्य साधारण अंशों के अंकित मूल्य के कम से कम 90% अंशधारी हस्तान्तरी कम्पनी के साधारणा अंशधारी एकीकरण के बाद बन जायेंगे।

(iii) हस्तान्तरक कम्पनी के वे सभी साधारण अंशधारी जो हस्तान्तरी कम्पनी के साधारण अंशधारी बनने के लिए स्वीकृति देते हैं, उन्हें हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा अपने साधारण अंशों का निर्गमन करते हुए एकीकरण के प्रतिफल का पूर्णयः भुगतान किया जाएगा, किन्तु आंशिक या खण्डित भुगतान नकदी में किया जाएगा।

(iv) हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा एकीकरण के बाद हस्तान्तरक कम्पनी के व्यवसाय को चालू रखा जाएगा।

(v) हस्तान्तरी कम्पनी के वित्तीय विवरणों में हस्तान्तरक कम्पनी की सम्पत्तियों एवं दायित्वों को उनके पुस्तकीय मूल्य पर प्रदर्शित किया जाएगा। यदि दोनों कम्पनियों की लेखांकन नीति में कोई अन्तर तो एकरूपता लाने के उद्देश्य से आवश्यक समायोजन किये जा सकते है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि विलय के स्वभाव के एकीकरण में हस्तान्तरक कम्पनी एवं एवं हस्तान्तरी कम्पनी दोनों का अस्तित्व बना रहता है और दोनों कम्पनियों का व्यवसाय भी बना रहता है। इसके अतिरिक्त दोनों कम्पनियों के अंशधारियों का स्वामित्व भी बहुत हद तक बना रहता है वार्षिक वित्तीय विवरण बनाते समय दोनों कम्पनियों की सम्पत्तियों, संचयों एवं दायित्वों का विवरण भी एक साथ दिया जाता है।

विलय के स्वभाव एवं क्रम के स्वभाव के एकीकरण में अन्तर

एकीकरण के दोनों प्रकार तुलना : Differences की तुलनात्मक स्थिति इस प्रकार है-

(1) एकीकरण के दोनों प्रकार में दो या दो से अधिक कार्यरत कम्पनियों का होना आवश्यक है।

(2) विलय की स्थिति में एक कम्पनी दूसरी कम्पनी के साथ मिल जाती है और दोनों कम्पनियों का अस्तित्व बना रहता है। जबकि क्रय की स्थिति में एक कम्पनी को दूसरी कम्पनी क्रय कर लेती है जिससे एक कम्पनी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

(3) विलय के एकीकरण की स्थिति में हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारियों को निर्धारित विनिमय मूल्य के आधार पर समता अंश दिये जाते हैं और इन अंशधारियों का स्वामित्व कम्पनी में बना रहता है, जबकि क्रय के एकीकरण की दशा में हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा क्रय प्रतिफल का भुगतान हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारियों को अंशी, ऋणपत्रों अथवा नकदी में करने के बाद उनका हस्तान्तरी कम्पनी में कोई स्वामित्व नहीं रहता है।

(4) विलय के स्वभाव के एकीकरण में दोनों कम्पनियों के अंशधारियों को कम्पनी के संचालन एवं प्रबन्ध में सम्मिलित रूप से भाग लेने का अधिकार होता है जबकि क्रय के स्वभाव के एकीकरण की दशा में कम्पनी के प्रबन्ध एवं संचालन में भाग लेने का अधिकार केवल हस्तान्तरी कम्पनी के अंशधारियों को होता है, हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारियों को नहीं होता।

(5) विलय के स्वभाव के एकीकरण में हस्तान्तरक कम्पनी की सभी संचितियों को हस्तान्तरी कम्पनी के वित्तीय में शामिल किया जाता है। जबकि क्रय के स्वभाव के एकीकरण की दशा में केवल वैधानिक संचितियों; जैसे, विकास भत्ता संचय, विनियोग भत्ता संचय, आदि को ही हस्तान्तरी कम्पनी के वित्तीय विवरणों में शामिल करना आवश्यक होता है और अन्य संचयों को प्रदर्शित नहीं किया जाता है।

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