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औरंगजेब का उत्तरदायित्व | मुगल साम्राज्य के पतन में औरंगजेब के उत्तरदायित्व पर प्रकाश

औरंगजेब का उत्तरदायित्व | मुगल साम्राज्य के पतन में औरंगजेब के उत्तरदायित्व पर प्रकाश

औरंगजेब का उत्तरदायित्व

मुगल साम्राज्य के पतन में औरंगजेब के उत्तरदायित्व पर प्रकाश

औरंगजेब को मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी मानने के सम्बन्ध में इतिहासकारों में मतभेद है। जो इतिहासकार पतन का पूरा उत्तरदायित्व औरंगजेब पर घोपते हैं उनका मत है कि औरंगजेब का चरित्र, हिन्दू विरोधी नीति, मन्दिरों को नष्ट करना, राजपूत, सिक्ख, जाट तथा मराठों के विरुद्ध दमन नीति और दक्षिण में शिया राज्यों के विरुद्ध लम्बे संघर्ष की नीति अपनाने के फलस्वरूप मुगल साम्राज्य का पतन अवश्यम्भावी हो गया था। इन कारणों की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है-

(i) औरंगजेब का चरित्र- औरंगजेब के चरित्र में कुछ गम्भीर दोष थे। वह स्वभाव से शंकालु था। वह राज्य के कर्मचारियों तथा अपने पुत्रों को भी सन्देह की दृष्टि से देखता था। वह शाहजादों तथा शुभचिन्तक सरदारों को उचित सलाह की उपेक्षा कर देता था। उसने कर्मचारियों एवं राजकुमारों को कभी भी उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपा जिसके कारण वे राजनीतिक शिक्षा से वंचित रह गये। वह स्वयं सारी शक्ति का केन्द्र-बिन्दु बना हुआ था, पर विशाल साम्राज्य के सभी अंगों को संतुलित रखना एक व्यक्ति के लिए कभी सम्भव नहीं था। चूंकि औरंगजेब ने असंभव को संभव करने का प्रयास किया था, परिणाम यह हुआ कि मुगल साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।

(ii) औरंगजेब की धार्मिक संकीर्णता- औरंगजेब की अव्यावहारिक अदूरदर्शितापूर्ण धार्मिक नीति ने मुगल-साम्राज्य की रीढ़ तोड़ दी थी। मन्दिरों, को नष्टकर उसने अकबर की सहिष्णुता की नीति को खत्म कर दिया था। भारतवर्ष में हिन्दुओं की संख्या अधिक थी। मन्दिरों को नष्ट होते देखकर मुगलों के प्रति उनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ। हिन्दुओं पर जजिया कर लागू होने से बहुसंख्यक हिन्दू मुगलों के विरोधी हो गये थे। अकबर ने सहिष्णुता की नीति अपनाकर हिन्दुओं का हृदय जीत लिया था और राजपूतों तथा अन्य लड़ाकू जातियों को सेना में भर्ती कर अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया था। उसने हिन्दुओं को सरकारी नौकरियाँ देकर, उन्हें धार्मिक उपासना की स्वतन्त्रता देकर तथा उनके साथ मुसलमानों के समान व्यवहार करके अपने पक्ष में कर लिया था। उसकी इस नीति के कारण हिन्दुओं ने मुगल साम्राज्य की सेवा की तथा उसके सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेकिन औरंगजेब ने अपनी अनुदारता और असहिष्णुता के कारण हिन्दुओं को मुगलों का दुश्मन बना दिया था। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया, उन्हें सरकारी पदों से हटाया गया एवं उनके मन्दिर तोड़े गए। औरंगजेब की अनुदारता ने हिन्दुओं को मुगलों का कट्टर शत्रु बना दिया। मुगल-सत्ता के विरुद्ध विद्रोह हुए और इन विद्रोहों ने मुगल साम्राज्य की जड़ हिला दी।

(iii) औरंगजेब की राजपूत नीति- मुगला-साम्राज्य के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण में राजपूतों का महत्वपूर्ण सहयोग था। राजपूत योद्धाओं ने साम्राज्य के लिए अनेक विजय प्राप्त की थी तथा उसको शान एवं सम्मान को बढ़ाया था। औरंगजेब ने अकबर की नीति के विरुद्ध आचरण किया जो साम्राज्य के लिए आत्म-घातक सिद्ध हुआ। औरंगजेब ने राजपूतों के राज्यों को जीतने तथा छीनने की नीति अपनायी थी। इस नीति ने राजपूतों को मुगलों का कट्टर शत्रु बना दिया था। यदि औरंगजेब मारवाड़ के राज्य में हस्तक्षेप नहीं करता तो राजपूतों का विद्रोह उग्र रूप धारण नहीं करता । एक साधारण गलती के कारण उसने मेवाड़ और मारवाड़ की शत्रुता मोल ले ली थी और इन राज्यों के साथ उसे लम्बी अवधि तक संघर्ष करना पड़ा। राजपूतों की मित्रता मुगल-साम्राज्य के लिए बहुमूल्य सिद्ध हुई थी और भविष्य में भी हो सकती थी लेकिन औरंगजेब ने अपनी अदूरदर्शिता से इस समर्थन को समाप्त कर दिया था।

(iv) औरंगजेब की युद्ध नीति- औरंगजेब ने प्रारम्भ से ही युद्ध की नीति अपनायी थी। बीजापुर, गोलकुण्डा, राजपूत, मराठा, जाट, सिक्ख तथा उत्तरपूर्व एवं उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रदेशों से उसे युद्ध करना पड़ा था। लगातार युद्ध से राज्य की शान्ति भंग हो गई थी। साम्राज्य पर आर्थिक दबाव बढ़ा जिससे कर बढ़ाना पड़ा और लोगों को कष्ट हुआ। व्यापार व्यवसाय चौपट हो गया था। चूंकि औरंगजेब निरंतर युद्ध में व्यस्त रहा, इसलिए उसने जनहित के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता उसके प्रति सहानुभूति रखती और साम्राज्य के स्थायित्व को रखने में सहयोग देती।

सिक्ख, जाट या सतनामियों के विद्रोह को दबाकर औरंगजेब ने राजनीतिक सफलता प्राप्त कर ली थी। परन्तु इन जातियों में राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने की जो इच्छा जाग चुकी थी, वह औरंगजेब के उत्तराधिकारियों के लिए भविष्य में खतरनाक साबित हुई। आन्तरिक विद्रोह ने साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया।

(v) औरंगजेब की दक्षिण नीति- औरंगजेब ने अपनी साम्राज्यवादी नीति और धार्मिक संकीर्णता से प्रभावित होकर दक्षिण के शिया राज्यों और मराठों को कुचलने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। वह सोलह वर्षों तक दक्षिण के युद्ध में उलझा रहा। बीजापुर और गोलकुण्डा के साथ युद्धों में अपार धन-जन की क्षति हुई थी। वह बीजापुर और गोलकुण्डा को कुचलने में सफल रहा लेकिन मराठों की शक्ति को तोड़ नहीं सका। बीजापुर और गोलकुण्डा पर अधिकार करना औरंगजेब की एक बहुत बड़ी राजनैतिक भूल थी। ये दोनों राज्य दक्षिण भारत में एक तीसरी शक्ति के विकास के मार्ग में बाधक हो सकते थे। परन्तु औरंगजेब मराठों की शक्ति की सही पहचान नहीं कर पाया था। उसने बीजापुर और गोलकुण्डा को जीतकर मुगलों और मराठों में सीधी टक्कर लगवा दी थी। मराठों की छापामार युद्ध-नीति ने बड़े-बड़े मुगल सरदारों को अपमान की घुट पिला दी थी। मराठों को पराजित करने के बाद भी औरंगजेब उनकी शक्ति को पूर्णतः नष्ट नहीं कर सका। शिवाजी की मृत्यु के बाद भी शम्भूजी, शाहूजी, राजाराम और ताराबाई ने मुगलों के साथ संघर्ष किया और इस प्रकार दक्षिण भारत में मुगलों का अस्तित्व कभी सुरक्षित और स्थायी नहीं रह पाया।

दक्षिण भारत में लम्बे युद्ध में उलझे रहने के कारण औरंगजेब उत्तर भारत की ओर सचमुच ध्यान नहीं दे पाया। गोलकुण्डा, बीजापुर तथा कनार्टक का क्षेत्र मुगल-साम्राज्य में मिला लेने से मुगल प्रशसनिक सेवा टूटने लगी। आवागमन के साधन के अभाव में दूर के प्रान्तों पर प्रत्यक्ष रूप से शासन करना कठिन था। यदि औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा के साथ समझौता कर लेता तो मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा और सुरक्षा पर कोई आंच नहीं आता। औरंगजेब ने मराठों को समय-समय पर पराजित कर उनकी शक्ति को आगे बढ़ने से रोका था। परन्तु उसकी मृत्यु के बाद ही मराठे सक्रिय हो उठे और मुगल-साम्राज्य की जड़ खोदी थी।

इस प्रकार औरंगजेब ने अपनी अदूरदर्शिता से मुगल साम्राज्य को विनाश के कगार पर ला खड़ा कर दिया था। इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। परन्तु यह मत कि औरंगजेब के कारण ही मुगल-साम्राज्य का पतन हुआ था-ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर सर्वथा उचित नहीं जान पड़ता। निःसन्देह औरंगजेब का शंकालु स्वभाव, उसकी धार्मिक नीति, उसकी दक्षिण-नीति तथा निरन्तर युद्धों ने मुगल-साम्राज्य को शक्तिहीन बना दिया था। फिर भी इसका विघटन कई कारणों से हुआ था। इसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा संगठनात्मक कारणों का भी हाथ था। अशान्ति, विद्रोह, अव्यवस्था तथा आर्थिक संकट मुगल साम्राज्य को घेर चुके थे। महत्वाकांक्षी तथा स्वार्थी सरदारों, विदेशी आक्रमणों तथा उभरती हुई मराठा-शक्ति ने मुगल साम्राज्य को खण्ड-खण्ड कर दिया था। बाबर, अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ का गौरव नष्ट हो चुका था और उनके उत्तराधिकारी दूसरे के हाथों में कठपुतली बने हुए थे। अकबर जैसा योग्य, उदार और दूरदर्शी शासक ही विघटन की प्रक्रिया को रोक सकता था। औरंगजेब के शासनकाल में मुगल-विरोधी शक्तियाँ सबल हो चुकी थी। औरंगजेब ने आर्थिक असन्तोष और सामाजिक विषमता को न तो दूर करने का प्रयास किया था और न उनके भयंकर परिणामों का अनुमान लगा पाया था। उसकी मृत्यु के बाद ही विघटनकारी शक्तियाँ प्रबल हो उठीं और मुगल साम्राज्य की कब्र खोद डाली। यही कारण है कि इतिहासकार मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजेब को उत्तरदायी मानते हैं लेकिन ऐसी परिस्थिति ही पैदा हो गयी थी कि औरंगजेब परिस्थिति का स्वयं शिकार बन गया था।

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Pankaja Singh

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