हिंदी भाषा एवं लिपि

राजभाषा के रूप में हिंदी की संवैधानिक स्थिति | संविधान सभा और हिंदी | राजभाषा आयोग | राजभाषा संशोधन अधिनियम

राजभाषा के रूप में हिंदी की संवैधानिक स्थिति | संविधान सभा और हिंदी | राजभाषा आयोग | राजभाषा संशोधन अधिनियम

राजभाषा के रूप में हिंदी की संवैधानिक स्थिति

15 अगस्त सन् 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के बाद संविधान बनानेके लिए संविधान सभा का गठन किया गया। इस संविधान सभा के संयोजक डॉ० भीमराव अंबेडकर नियुक्त किये गये। संविधान सभा के समक्ष यह प्रश्न महत्वपूर्ण रूप से उपस्थित हुआ कि भारत की राजभाषा किस भाषा को बनाया जाये ? पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात 14 सितंबर सन् 1949 को संविधान सभा ने एकमत होकर यह निर्णय लिया कि हिंदी भाषा भारत संघ की राजभाषा रहेगी। संविधान के भाग 17 के अध्याय 1 की धारा 343 (1) के अनुसार, “संघ की राष्ट्रभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।”

इस धारा के अंतर्गत यह भी प्रावधान किया गया कि संविधान के प्रारंभ होने अर्थात लागू होने के 15 वर्ष बाद की कालावधि के लिए संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के हेतु अंग्रेजी का भी प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए वह पहले से ही प्रयोग में आती रही है।

भारत 26 जनवरी सन् 1950 को गणतंत्र घोषित हुआ था। उसी दिन भारतीय संविधान भी लागू हुआ। इस प्रकार 15 वर्षों तक अर्थात् 26 जनवरी, सन् 1965 तक की कालावधि तक अंग्रेजी को राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग करने की छूट प्रदान की गई। यह बात अलग है कि बाद में इस अवधि को बढ़ा दिया गया। परिणाम यह निकला कि राजभाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग वर्तमान तक हो रहा है।

सामान्य रूप से सरकारी काम-काज की भाषा को राजभाषा कहा जाता है। जिस भाषा में किसी राष्ट्र के शासन का कार्य होता है तथा जो शासनतंत्र की नीतियों के संयोजन का साधन होती है उसे राजभाषा कहते हैं। वस्तुतः राष्ट्रभाषा हिंदी देश की आत्मा होती है और राजभाषा उसका शरीर। जिस प्रकार आत्मा और शरीर में एकता होती है उसी प्रकार राष्ट्रभाषा और राजभाषा में भी एकता होना आवश्यक है।

15 अगस्त 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जब भारत का संविधान बना तो संविधान निर्माताओं के सामने राजभाषा का प्रश्न उपस्थित हुआ। इस प्रश्न पर मतभेद भी उभरा। एक ओर थे पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंददास जो देवनागरी लिपि में पूर्णतः हिंदी को राजभाषा बनाना चाहते थे, पर पं० जवाहरलाल नेहरू इसके खिलाफ थे, फिर भी भारतीय संविधान में हिंदी के लिए कुछ किया गया, उसका उल्लेख यहाँ किया जा रहा है।

संविधान सभा और हिंदी

राजभाषा के प्रश्न को लेकर 12 सितंबर, 1948 से 14 सितंबर तक संविधान सभा के समक्ष बहस चली। इस मध्य लगभग 400 संशोधन प्रस्तुत किये गये, लेकिन अंत में कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी-ऑनगर फार्मूला को स्वीकार कर हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। मुंशी-आयंगर फार्मूला ही संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक है। साथ ही संविधान के परिशिष्ठ की अष्टम अनुसूची भी इसी फार्मूले के तहत रखी गयी।

14 सितंबर, 1948 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा घोषित किया था, इसलिए 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। तब से राजभाषा से संबंधित संविधान में निम्न संशोधन हुए-

(1) प्रथम संशोधन के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 350 के साथ 350 (अ) तथा 350 (ब) जोड़े गये। इसके द्वारा भाषाई अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की व्यवस्था की गयी। संविधान का यह 7वाँ संशोधन सन् 1956 में पारित किया गया था।

(2) दूसरे संशोधन के द्वारा संविधान की अष्टम अनुसूची में सिंधी भाषा को जोड़ा गया। इस प्रकार मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 15 हो गयी। बाद में मणिपुरी, नेपाली तथा कोकणी भाषाएँ जोड़ी गयीं। वर्तमान में संविधान की अष्टम अनुसूची में मान्यता प्राप्त भारत की भाषाओं की कुल संख्या 18 हो गयी है।

संविधान सभा में राजभाषा के संबंध में तीन मुख्य व्यवस्थाएं की गयीं-

(1) हिंदी का राजभाषा के रूप में विकास किया जाए।

(2) संविधान के प्रारंभ से 15 वर्षों तक अंग्रेजी राजभाषा के रूप में चलती रहे तथा

(3) हिंदी के विकास के कारण अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा न हो।

संविधान अनुच्छेद 343 से 351 तक- संविधान अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित है, जिसका रूप इस प्रकार है-

(अ) अनुच्छेद 343- इसके भाग-5 में कहा गया है, “संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।

इस अनुच्छेद में यह भी व्यवस्था की गयी कि जब तक हिंदी कार्य के योग्य नहीं हो जाती तब तक अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा।

(आ) अनुच्छेद 344- इसके अनुसार हिंदी की प्रगति का लेखा-जोखा करने के लिए राष्ट्रपति संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद तथा उसके बाद हर 10 वर्ष में एक आयोग का गठन करेगा। यह आयोग राष्ट्रपति को हिंदी के प्रयोग के बारे में अपनी सिफारिश प्रस्तुत करेगा। आयोग यह देखेगा कि किस प्रकार राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ाया जा सकता है।

(इ) अनुच्छेद 345- यह अनुच्छेद राज्य की भाषाओं से संबंधित है। इसके अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि यदि कोई राज्य 15 वर्ष के अंदर अपनी कोई भाषा अंगीकार कर लेता है, तो वह लागू हो जायेगी। अन्यथा उसे हिंदी भाषा का प्रयोग करना होगा।

(ई) अनुच्छेद 346- यह इस बात से संबंधित है कि विभिन्न राज्य परस्पर किस भाषा का प्रयोग करेंगे। इस धारा के अनुसार राज्यों को परस्पर यह निर्णय करना है कि वे आपस में किस भाषा का प्रयोग करेंगे। निर्णय न होने की स्थिति में हिंदी का हमें व्यवहार करना होगा।

(उ) अनुच्छेद 347- इसके अनुसार यह व्यवस्था की गयी है कि यदि किसी राज्य की जनसंख्या के पर्याप्त लोग अपने द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यताएँ दिए जाने की माँग करते हैं। तब राष्ट्रपति ऐसी अनुमति दे सकता है।

(ऊ) अनुच्छेद 348- यह उच्चतम और उच्च न्यायालयों की भाषा से संबंधित है। इसमें व्यवस्था की गयी है कि उच्चतम न्यायालय की भाषा तब तक अंग्रेजी होगी, जब तक कि हिंदी उसका पूर्ण स्थान नहीं ले लेती, किंतु उच्च न्यायालय की माँग पर राज्यपाल उच्च न्यायालय में उस राज्य की भाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकता है।

(ए) अनुच्छेद 349- इसके अनुसार परिस्थितियों को देखते हुए समय-समय पर राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से संसद राजभाषा के संबंध में अधिनियम बना सकती है।

(ऐ) अनुच्छेद 350- इनके  अनुसार भारत का कोई भी नागरिक संघ के स्तर पर किसी भी भाग में अभ्यावेदन दे सकता है।

(ओ) अनुच्छेद 351- यह हिंदी भाषा के स्वरूप को स्पष्ट करने वाला अनुच्छेद है, इसमें संघ का यह कर्त्तव्य माना गया कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाये, ताकि भारत के सामाजिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का प्रयास जारी रहे।

संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 342 (2) द्वारा 3 सितंबर, 1955 को एक अध्यादेश जारी किया जिसमें कहा गया कि निम्न कार्यों में हिंदी का व्यवहार किया जाये-

(1) जनता के साथ पत्र व्यवहार में। (2) प्रशासकीय रिपोर्ट, सरकारी पत्रिकाओं तथा उन रिपोटों में, जो संसद को दी जानेवाली हों। (3) सरकारी प्रस्तावों तथा संसदीय विधियों में। (4) उन राज्यों के शासनों के साथ पत्र-व्यवहार में जिन्होंने राजभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दे दी है। (5) संधिपत्र तथा कारनामें । (6) विदेशी-राज्यों, उनके राजदूत तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के भारतीय प्रतिनिधियों के लिए जारी किए जाने वाले लेखों में।

राजभाषा आयोग-

राजभाषा अधिनियम सन् 1955 में राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 344 (1) के अंतर्गत राजभाषा आयोग की नियुक्ति की। आयोग की रिपोर्ट 1956 में आयी। जिस पर विचारार्थ 30 सांसदों की एक समिति बनाई गयी, जिसने 1957 में अपनी रिपोर्ट पेश की।

(1) सरकारी नौकरियों में हिंदी का स्तर यदि कम भी हो तो चल सकता है। (2) हिंदी का ज्ञान प्राप्त न करने वाले कर्मचारियों को दंडित किया जाये। (3) अंग्रेजी प्रयोग अनिश्चित काल तक जारी नहीं रहना चाहिए। (4) संघ सरकार को हिंदी के राजभाषा के रूप में प्रयोग और विकास पर ध्यान देना चाहिए। (5) रोमन अंकों के साथ देवनागरी अंकों के प्रयुक्त के बारे में भी नीति बनानी चाहिए। (6) राज्य की विधानसभाएँ अपने राज्य की राजभाषा में विधि निर्माण कर सकती हैं, किंतु अंग्रेजी पाठ प्रकाशित करना जरूरी है। (7) राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से उच्च न्यायालयों में राज्य की राजभाषा या हिंदी का प्रयोग किया जा सकता है। इस रिपोर्ट में पक्ष-विपक्ष में बवाल खड़ा हुआ अतः दूसरा अध्यादेश जारी हुआ।

राष्ट्रपति का अध्यादेश– 27 अप्रैल 1960

इसकी मुख्य बातें इस प्रकार थीं- (1) अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवाओं और केंद्रीय सेवाओं में भर्ती का माध्यम अंग्रेजी बना रहेगा। कुछ समय बाद हिंदी वैकल्पिक माध्यम के रूप में अपना ली जायेगी। (2) प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेशार्थ अंग्रेजी और हिंदी ही परीक्षाओं का माध्यम रहेगी। (3) वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के निर्माण हेतु हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए शिक्षा मंत्रालीय एक आयोग का गठन करे। (4) सभी प्रशासनिक साहित्य का अनुवाद किया जाये। (5) संसदीय अधिनियम और विधेयक अंग्रेजी में बनते रहें, किंतु उनका हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध कराया जाये। (6) उच्चतम न्यायालय की भाषा अंततः हिंदी होनी चाहिए। राज्य की भाषाओं का प्रयोग विकल्पतः किया जा सकेगा। (7) तृतीय श्रेणी से नीचे के कर्मचारियों के लिए हिंदी का सेवाकालीन प्रशिक्षण अनिवार्य बनाया गया। (8) एक मानक विधि शब्दकोष बनाने के लिए कानूनी विशेषज्ञों का एक स्थायी आयोग गठित किया जाये।

पर 1963 में अहिंदी भाषियों ने हिंदी के विरोध में एक आंदोलन शुरू कर दिया जिसके मूल में राजनीति ही थी, अतः पं० नेहरू ने यह आश्वसन दिया कि हिंदी उन पर थोपी नहीं जायेगी अंग्रेजी जारी रहेगी।

राजभाषा विधेयक- 13 अप्रैल, 1963 को राजभाषा विधेयक, लाल बहादुर शास्त्री द्वारा पेश हुआ, व्यापक बहस के बाद 25 अप्रैल, 1963 को यह विधेयक पारित हो सका।

इसका मकसद यही था कि संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद भी (जब अनुच्छेद 344,345 में यह प्रावधान था कि 15 वर्ष बाद हिंदी का प्रयोग होगा) जो 1965 में पूरा होता है, हिंदी को राजभाषा के रूप में अनिवार्य नहीं किया जायेगा, अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा।

राजभाषा संशोधन अधिनियम-

(1) यह अधिनियम 1967 में सामने आया जिसकी महत्वपूर्ण बात यह थी कि जब तक संघ का एक भी राज्य नहीं चाहेगा, तब तक अंग्रेजी को हटाया नहीं जा सकता। इसकी महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं- (2) जिन राज्यों ने सरकारी कामकाज के लिए हिंदी को नहीं अपनाया है उनसे केंद्र अंग्रेजी में ही पत्र व्यवहार करेगा। पर हिंदी अपनाने वाले राज्यों से पत्र व्यवहार हिंदी में हो सकता है। (3) अंग्रेजी के साथ हिंदी अनुवाद भी भेजा जायेगा। लेकिन वह राज्य, जिसने सरकारी कामकाज के लिए हिंदी को नहीं अपनाया है, अंग्रेजी पत्र के साथ हिंदी अनुवाद भेजने हेतु बाध्य नहीं हैं। (4) केंद्रीय सरकार के विभिन्न-मंत्रालय, विभाग, कंपनियों तथा निगम आदि के कार्यालयों के पारस्परिक पत्र-व्यवहार में हिंदी पत्र के साथ अंग्रेजी अनुवाद तथा अंग्रेजी पत्र के साथ हिंदी अनुवाद भेजे जायेंगे। (5) संविदा, करार तथा टेंडर फार्म आदि में भी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया जायेगा।

हिंदी की यथास्थिति- इन राजभाषा अधिनियमों धाराओं के आधार पर यह तो ज्ञात होता है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता तो मिली पर आज भी वह पूर्णतः व्यवहार की भाषा नहीं बन सकी है। हिंदी समर्थकों को यह आशंका उत्पन्न हुई कि अंग्रेजी सदा सर्वदा प्रयोग की भाषा बनी रहेगी। फिर भी हिंदी की समृद्धि के लिए प्रयास होते रहे।

सरकार द्वारा आदेश- सन् 1971 और 1972 में एक आदेश जारी किया गया, जिसमें यह आवश्यक किया गया है कि भाषा क्षेत्र में स्थित उपक्रम और निगम यहाँ हिंदी के टाइपराइटर और अनुवादकों की व्यवस्था करें और अहिंदी भाषी कर्मचारियों के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की जाये।

1973 में आदेश प्रसारित किया गया, हिंदी प्रगति और प्रयोग के विषय में तिमाही रिपोर्ट संबंधित मंत्रालय को भेजी जाये। अतः हिंदी के विषय में कुछ हलचल अवश्य हुई।

राजभाषा अधिनियम 1976- इस अधिनियम के कार्यान्वयन का भार गृह मंत्रालय के हाथ में आया और इसी मंत्रालय के अंतर्गत एक राजभाषा विभाग भी बनाया गया। यह नियम बनाया गया कि संविधान के अनुच्छेद 46 (1) के अंतर्गत राज्य परस्पर किस भाषा में व्यवहार करेंगे।

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