हिंदी भाषा एवं लिपि

हिंदी भाषा शिक्षण | हिंदी भाषा शिक्षण पर एक लेख

हिंदी भाषा शिक्षण | हिंदी भाषा शिक्षण पर एक लेख

हिंदी भाषा शिक्षण

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। भाषा के बिना मनुष्य समाज की दशा कितनी शोचनीय होती है इसकी जानकारी पशुओं, पक्षियों, कीड़ों, पतंगों आदि से प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक सभ्य राष्ट्र की अभिव्यक्ति का माध्यम उसकी अपनी भाषा होती है। भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है। स्वतंत्र भारत की आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति में पंचवर्षीय योजनाओं की विशेष भूमिका है। भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का संकल्प भी हमारी आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसमें संदेह नहीं कि 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान के लागू होते ही संवैधानिक दृष्टि से हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया गया परंतु तीन प्रमुख कारणों से अंग्रेजी का प्रयोग 15 वर्षों तक और जारी रखने का निर्णय किया गया और इस अवधि के भीतर हिंदी को राजभाषा पद के अनुरूप विकसित करने के लिये उन बाधाओं को दूर करने की दृष्टि से अनेक उपाय किये गये। वे महत्वपूर्ण हैं।

  1. शिक्षण-

आज के युग में शिक्षा को रुचिपूर्ण और वैज्ञानिक बनाने, शिक्षा का प्रसार किया जा सके। उपयुक्त और पर्याप्त शिक्षकों के अभाव में शिक्षा के स्तर को बेहतर और रुचिपूर्ण बनाना भी कठिन होता जा रहा है, इसलिये आवश्यक है कि शिक्षण विधियों को विशेषकर हिंदी भाषा के शिक्षण को आधुनिक और वैज्ञानिक बनाने के प्रयास किये होंगे। आज जब सारे विश्व के श्रव्य-दृश्यात्मक उपकरणों और भाषा प्रयोगशालाओं के स्थान पर कंप्यूटर शिक्षण प्रणाली का प्रचार होने लगा है, हम अभी तक विभिन्न प्रकार के विद्यार्थियों के लिये उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप कैसेट और वीडियो भी तैयार नहीं कर सके हैं। वस्तुतः आज के युग में उक्त सभी विधियों की समन्वित प्रणाली की आवश्यकता सर्वाधिक अनुभव की जाने लगी है किंतु श्रव्य-दृष्यात्मक विधियों के एनालॉग पद्धति पर आधारित होने के कारण कम्प्यूटर जैसे डिजिटल उपकरण पर उनके समुचित उपयोग में कठिनाई का अनुभव किया जा रहा है। अमेरिका में ऐनालाफग पद्धति को डिजिटल में परिवर्तित करने की विधि का सफलतापूर्वक विकास कर लिया गया है। इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि भारत में इस विधि का यथाशीघ्र विकास किया जाये ताकि हिंदी शिक्षण की विधियों को यथाशीघ्र अधुनातन बनाया जा सके। भारत सरकार के ही एक उपक्रम सी०एस०सी० और आई0आई0टी0 मद्रास में हिंदी शिक्षण के लिये संलेखनप्रणाली का विकास किया जा रहा है।

  1. कार्यालय स्वचालन-

आज दफ्तर में होने वाले दिन-प्रतिदिन के कार्यों को कम्प्यूटर की सहायता से सुगम बनाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में यदि कम्प्यूटर ने हिंदी या अन्य भाषाओं के माध्यम से संसाधन की सुविधा उपलब्ध न कराई गई तो अंग्रेजी का वर्चस्व कार्यालयों में चिरस्थायी हो जायेगा। इस प्रयोजन के लिये अनेक तकनीकों का विकास किया गया है। इलैक्ट्रानिक टाइपराइटर, टेलीप्रिंटर, टेलेक्स मशीनों के अलावा कंप्यूटर भी आज बाजार में द्विभाषिक रूप में उपलब्ध होने लगे हैं लेकिन बड़ी-बड़ी कम्प्यूटर प्रणालियों में आज भी अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है।

  1. प्रकाशन-

हिंदी की मुद्रण कला को आधुनिक बनाने के लिये डेस्कटॉप प्रकाशन प्रणाली को हिंदी में लाना अनिवार्य है। अंग्रेजी में इस प्रयोजन के लिये वेंचुरा, पेजमेकर आदि सॉफ्टवेयरों का प्रयोग किया जाता है। हिंदी में भी वेंचुरा पर आधारित प्रकाशक आदि साफ्टवेयरों का हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिये व्यापक रूप से उपयोग करने के लिये आवश्यक है कि जिस्ट प्रौद्योगिक का डी०टी०पी० इंटर फेस भी तैयार किये जाये। टेस्ट टाप प्रकाशन प्रणाली के विकास के लिये देवनागरी और अन्य भारतीय लिपियों के अक्षरों को मानकीकृत करने के लिये आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान की जाये ताकि जिस प्रौद्योगिकी का इंटर फेस तैयार हो सके, हिंदी में ओ०सी० आर० साफ्टवेयर को विकसित किया जा सके और लेजर प्रिंटर में हिंदी को स्थायी रूप में रखा जा सके।

  1. कम्प्यूटर साधित भाषा-शिक्षण-

इस प्रणाली का उपयोग अब अन्य विषयों के अलावा भाषा-शिक्षण के लिये भी प्रयोग किये जाने लगा। वस्तुतः शैक्षणिक क्रमादेशों का निर्माण ही संलेखन भाषायें और संलेखन क्रमादेश इन तीनों पक्षों का उपयोग करते हुए अध्यापक पाठ सामग्री, प्रश्नोत्तर और चित्र आदि का निर्माण करता है। इनमें पाठ के अनगिनत उदाहरण दिये जा सकते हैं और अभ्यास कराने के विभिन्न पाठ बनाये जा सकते हैं। इसके अलावा सभी श्रव्य-दृश्यात्मक उपकरणों का एक साथ उपयोग संलेखन प्रणाली के माध्यम से किया जा सकता है। योरोपीय भाषाओं के लिये करने का प्रयास सी.एस.सी. द्वारा कार्यक्रम के अंतर्गत किया गया है किंतु दोनों भाषाओं में अत्यधिक भिन्नता के कारण इसमें सीमित सफलता ही मिल सकी है लेकिन शुक्ला दंपत्ति के निर्देशन में आई, आई.टी. मद्रास के कुछ छात्रों द्वारा भारतीय भाषाओं के लिये स्वतंत्र प्रणाली का विकास कर लिया गया है और उसका आंशिक रूप में उपयोग दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के मद्रास केंद्र में सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

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