शिक्षाशास्त्र

यथार्थवाद की अन्य वादों से तुलना | यथार्थवाद की तुलना आदर्शवाद से | यथार्थवाद की तुलना प्रकृतिवाद से | यथार्थवाद की तुलना प्रयोजनवाद से

यथार्थवाद की अन्य वादों से तुलना | यथार्थवाद की तुलना आदर्शवाद से | यथार्थवाद की तुलना प्रकृतिवाद से | यथार्थवाद की तुलना प्रयोजनवाद से

यथार्थवाद की अन्य वादों से तुलना

यहाँ तक हमने आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद तथा यथार्थवाद के बारे में अध्ययन किया परन्तु अलग-अलग ही। यहाँ पर हम चारों विचारधाराओं में शिक्षा सम्बन्धी विचारों को तुलनात्मक ढंग से एक साथ रखने का प्रयत्न करेंगे जिससे कि एक ही दृष्टि में चारों का अध्ययन करना सम्भव हो और इन्हें समझने में सुविधा भी हो।

दार्शनिक दृष्टि से

आदर्शवाद   प्रकृतिवाद    प्रयोजनवाद यथार्थवाद
1. एक तत्ववादी दर्शन एकतत्ववादी दर्शन।  बहुतत्ववादी दर्शन। बहुतत्ववादी दर्शन।
2. आध्यात्मिक तत्व, ईश्वर, पूर्व निर्धारित मूल्य, सद्गुण में विश्वास। प्रकृति में ही विश्वास। आध्यात्मिक तत्व, ईश्वर, पूर्व निर्धारित मूल्य, सद्गुण। भौतिक तत्व में विश्वास, आदर्श मूल्य में विश्वास नहीं।
3. आध्यात्मिक नियम सर्वोपरि। प्राकृतिक नियम सर्वोपरि। मनोभौतिक नियम सर्वोपरि। भौतिक, वैज्ञानिक और सामाजिक नियम सर्वोपरि।
4. मानवीय शीलता, अनुभव में विश्वास है। प्राकृतिक तथा माननीय शीलता में विश्वास। प्रयोगशीलता एवं अनुभव में विश्वास। वैज्ञानिक अनुभव में विश्वास।
5. अंतर्दृष्टि तथा बुद्धि से मूल तत्व को समझना। प्राकृतिक वस्तु और भावना से मूल तत्व को समझना। प्रयोग, पुनः परीक्षण, आदि से तत्व को समझना। इंद्रियों के द्वारा, स्थूल वस्तु की सहायता से मूल्य तत्व को समझना।
6. सत्यम, शिवम, सुंदरम, आत्मा, परमात्मा का जगत सास्वत। प्रकृति जगत शाश्वत। मानव जगत शाश्वत। वस्तु या पदार्थ जगत शाश्वत।
7. आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास। प्राकृतिक शक्तियों में विश्वास। मानवीय शक्तियों में विश्वास। भौतिक वातावरण को शक्तियों तथा मनुष्यों की शक्तियों में विश्वास।
8. पूर्णतया आध्यात्मिक दृष्टिकोण। पूर्णतया प्राकृतिक-यांत्रिक दृष्टिकोण। मानवीय तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण। पूर्णतया भौतिक विज्ञानी दृष्टिकोण।
9. विश्व एक विचार प्रक्रिया। विश्व प्रकृति विज्ञान पर निर्भर प्रक्रिया। विश्व विज्ञान की प्रक्रिया से संबंधित। विश्व वैज्ञानिक प्रक्रिया तथा सामाजिक प्रक्रिया।
10. विचारवादी, ज्ञानवादी व्याख्या। भावनावादी व्याख्या। प्रयोगवादी व्याख्या। विज्ञानवादी तथा उपयोग- वादी व्याख्या।

शैक्षिक दृष्टि से– 

आदर्शवाद प्रकृतिवाद प्रयोजनवाद यथार्थवाद
1. शिक्षा तथा तात्पर्य आत्मा की अनुभूति। शिक्षा का तात्पर्य प्राकृतिक इच्छाओं की संतुष्टि। शिक्षा का तात्पर्य सामाजिकता की प्राप्ति। शिक्षा का तात्पर्य माननीय सुख की प्राप्ति।
2. शिक्षा का उद्देश्य सर्वोत्तम आध्यात्मिक विकास व मुक्ति। शिक्षा का उद्देश्य प्राकृतिक शक्तियों का विकास। शिक्षा का उद्देश्य समाज का पुनर्निर्माण तथा विकास। शिक्षा का उद्देश्य भौतिक जीवन का विकास।
3. आध्यात्मिक क्रिया पर बल। प्राकृतिक-यांत्रिक क्रिया पर बल। प्रयोगात्मक, परीक्षणात्मक क्रिया पर बल। भौतिक और मानवीय क्रिया पर बल।
4. बुद्धि, तर्क, स्मृति, विचार व कल्पना महत्वपूर्ण साधन। मूलप्रकृति, भावना, तथा  तत्संबंधी व्यवहार महत्वपूर्ण साधन। बुद्धि युक्त प्रयोग व अभ्यास महत्वपूर्ण साधन। मानवीय व्यवहार तथा क्रिया महत्वपूर्ण साधन।
5. धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र जैसे विषय पाठ्यक्रम में। प्राकृतिक विज्ञान, जीवन की कला पाठ्यक्रम में। समाज संबंधी विषय, विज्ञान पाठ्यक्रम में। भौतिक विज्ञान मानवीय विषय, भाषा पाठ्यक्रम में।
6. व्यक्तित्क तथा सामाजिक दृष्टिकोण से अध्ययन। व्यक्तित्क दृष्टिकोण से समाज से अलग अध्ययन। सामाजिक दृष्टिकोण से अध्ययन। मानवीय दृष्टिकोण से अध्ययन।
7. शिक्षा का केंद्र अध्यापक। शिक्षा का केंद्र व्यक्तिगत बालक। शिक्षा का केंद्र समाज का बालक। शिक्षा का केंद्र बालक का वर्तमान जीवन।
8. शिक्षा का आधार अध्यात्मशास्त्रीय। शिक्षा का आधार मनोवैज्ञानिक। शिक्षा का आधार वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक। शिक्षा का आधार वैज्ञानिक।
9. शिक्षा मौखिक तथा शाब्दिक विधि से देने पर जोर, पाठ्य- पुस्तक व स्वाध्याय पर बल देना। शिक्षा स्वतंत्र क्रिया और खेल विधि से देने पर जोर, पुस्तक दूर रखना। शिक्षा प्रायोगिक क्रिया और अभ्यास की विधि से देने पर जोर। शिक्षा वस्तु विधि से देने पर जोर, पाठ्य- पुस्तक पर बल देना।
10. शिक्षा में व्यक्तिगत एवं निश्चित प्रयास पर बल देना। शिक्षा में निषेधात्मक और व्यक्तिगत प्रयास पर बल देना। शिक्षा में समाज के अनुभव के साथ प्रयास पर बल देना। शिक्षा में सामाजिक वातावरण में मनुष्य के प्रयास पर बल देना।
11. स्थिर विचारधारा वाली शिक्षा देने का मत। विकासशील विचारधारा वाली शिक्षा देने का मत। प्रगतिशील तथा परिवर्तनशील विचारधारा वाली शिक्षा देने का मत। समाज और उसके जीवन की प्रगति संबंधी विचारधारा वाली शिक्षा देने का मत।
12. शिक्षक को सर्वश्रेष्ठ स्थान देना। शिक्षक को गौण स्थान देना। शिक्षक को मित्र, सहायक पथ प्रदर्शक का स्थान देना। शिक्षक को समाज का उपयोगी व्यक्ति मानकर महत्वपूर्ण स्थान देना।
13. कठोर शारीरिक व मानसिक अनुशासन का समर्थन करना, प्रभाववादी तथा दमनवादी सिद्धांत मानना। स्वतंत्र अनुशासन का समर्थन करना, आत्मानुशासन, मुक्ति वादी सिद्धांत मानना। स्वतंत्र तथा सामाजिक अनुशासन का समर्थन करना, मुक्तिवादी, प्रभाववादी सिद्धांत मानना। प्रकृति तथा समाज के नियम पर आधारित अनुशासन का समर्थन करना, प्रभाववादी तथा दमनवादी सिद्धांत मानना।
14. तर्कयुक्त व्याख्या विधि अधिक मान्य। स्वतंत्र आत्म शिक्षा की विधि अधिक मान्य। जीवन की वास्तविक समस्या के हल की योजना विधि अधिक मान्य। विज्ञानों में प्रयुक्त होने वाली विधि अधिक मान्य।
15. विद्यालय शिक्षण का स्थान सुसंचालित पारिवारिक संबंधों के पर्यावरण से पूर्ण। विद्यालय प्रकृति का संपूर्ण प्रांगण, स्वतंत्र पर्यावरण से पूर्ण। विद्यालय समाज की प्रयोगशाला नियमित क्रिया का स्थान।  एक सामाजिक संस्था संस्कृति एवं भौतिक पर्यावरण से पूर्ण।
16. आदर्श का प्रभाव सभी देश की शिक्षा पर हमेशा से पड़ा। प्रकृतिवाद का प्रभाव शिक्षा के विकास पर बहुत पड़ा। प्रयोजन का प्रभाव आधुनिक शिक्षा पर बहुत पड़ा। यथार्थवाद का प्रभाव आधुनिक शिक्षा पर पड़ा यद्यपि प्रयोजनवाद में वह मिल गया।
17. भविष्य में स्थाई स्थिति कुछ ना कुछ हमेशा आदर्श देने वाली शिक्षा होना। भविष्य में प्रकृतिवादी शिक्षा मिलती रहेगी ऐसी आशा। प्रगतिशील संसार प्रयोजन वादी शिक्षा की अच्छे भविष्य की आशा। समाज के अनुकूल यथार्थवादी शिक्षा का भविष्य में उपयोगी होने की आशा।

 आदर्शवाद, प्रकृतिवाद प्रयोजनवाद तथा यथार्थवाद के शैक्षिक विचारों में बहुत सा अन्तर भी दिखाई पड़ता है जिस पर यहाँ कुछ विचार देना जरूरी है। आदर्शवाद की शिक्षा की प्राक्कल्पना, आध्यात्मिक है जबकि अन्य तीनों विचारधाराओं में शिक्षा की प्राक्कल्पना भौतिक है। आदर्शवाद में शिक्षा का लक्ष्य मानव को सद्गुणों से विभूषित करके ईश्वर के पास पहुँचाना है जबकि प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद तथा यथार्थवाद मानव को केवल मानव बनाने में मदद करते हैं, उसे ईश्वरत्व की ओर बढ़ने ही नहीं देते।

शिक्षा का पाठ्यक्रम भी इस उद्देश्य के अनुकूल आदर्शवाद में धर्म, नीतिशास्त्र आध्यात्मशास्त्र तथा अन्य उच्च ज्ञान देने वाले विषयों को ऊँचा स्थान देता है क्योंकि इनके माध्यम से आदर्श, मूल्य, सद्गुण प्राप्त करके मनुष्यत्व देवत्व में बदल जाता है। प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद तथा यथार्थवाद के अनुसार पाठ्यक्रम केवल प्राकृतिक विज्ञानों, भाषाओं-साहित्यों तथा मानविकी विषयों तक रह जाता है जो दैवत्व की ओर नहीं ले जाते बल्कि मानव को भावुकता और यान्त्रिकता तक ही पहुँचाते हैं। शिक्षा की विधियाँ आदर्शवाद के अनुसार मानवीय मनन-चिन्तन तथा तार्किकीकरण पर आधारित है जबकि अन्य तीनों विचारधाराओं में संस्तुत शिक्षा की विधियाँ वैज्ञानिक तथा वस्तुनिष्ठ हैं जिनमें आन्तरिक अनुभूति का कोई स्थान नहीं होता है।

आदर्शवादी शिक्षा शिक्षक द्वारा निर्देशित और निश्चित होती है। प्रकृतिवाद शिक्षक को महत्व ही नहीं देता है इसलिए शिक्षार्थी स्वयं जो ठीक समझता है पढ़ता-सीखता है। प्रयोजनवाद और यथार्थवाद सामाजिक परिवेश के साथ शिक्षक-शिक्षार्थी को महत्व देते हैं। आदर्शवादी अनुशासन दण्ड एवं कठोरता पर आधारित है। यह स्वानुभूति आत्मा और शरीर को नियन्त्रित करने का साधन है। इस विचार से प्रकृतिवाद काम नहीं लेता, वह मुक्त अनुशासन को अच्छा समझता है। यह प्रयोजनवादी और यथार्थवादी अनुशासन मध्यमार्गी है क्योंकि कठोरता से काम नहीं चलता, यह अमनोवैज्ञानिक और अरुचिकर है, फिर भी समाज की व्यवस्था मान्य है और इसी के अनुसार समस्त कार्य-व्यवहार सम्पादित करने पर प्रयोजनवाद और यथार्थवाद दोनों जोर देते हैं। शिक्षालय आदर्शवाद के अनुसार “गुरु-गृह” होता है, मेंउसका वातावरण गुरुतामण्डित  होता है।

प्रकृतिवाद विद्यालय को प्रकृति की आनन्दमयी गोद में रखता है अवश्य पर उसमें विशालता है गुरुता नहीं। प्रयोजनवाद एवं यथार्यवाद यद्यपि सुन्दर वातावरण से युक्त विद्यालय को देखना चाहते हैं परन्तु उसे कृत्रिम साधनों एवं यन्त्रों से भरपूर कर देते हैं, अतएव उसकी आदर्शवाद शिक्षक-शिक्षार्थी, विद्यालय तथा शिक्षा की सम्पूर्ण क्रिया को शान्त, स्थिर तथा आदर्श गति के साथ आगे बढ़ने वाला समझता है, और इनसे ऐसी आशा रखता है। प्रकृतिवाद प्राकृतिक चंचलता एवं गतिशीलता, तथा प्रयोजनवाद एवं यथार्थवाद यान्त्रिक गतिशीलता के साथ शिक्षक-शिक्षार्थी, विद्यालय को आगे बढ़ता देखते हैं। इस प्रकार एक ओर स्थायित्व है तो दूसरी ओर परिवर्तनशीलता है। परिणामस्वरूप आदर्शवादी शिक्षा रूदिगत पथगामिनी बन कर प्राचीन बन गई जबकि प्रगतिवादी, प्रयोजनवादी तथा यथार्थवादी शिक्षा नवीन कहलाई। आदर्शवादी शिक्षा दूसरे जगत की बन गई और अन्य शिक्षा इस जगत की ही रह गई जिसके कारण हम जगत के निवासियों ने नवीन शिक्षा का स्वागत किया।

समन्वय का दृष्टिकोण

शिक्षाशास्त्र के अध्ययन करने वालों एवं विचारकों के सामने क्या दृष्टिकोण होना चाहिये? ऐसी एक समस्या खड़ी होती है क्योंकि केवल आदर्शवाद, केवल प्रकृतिवाद, केवल प्रयोजनवाद या केवल यथार्थवाद ही शिक्षा की रूपरेखा पूरी तौर पर तैयार कर दे यह आज के युग में सम्भव नहीं है। आज की समस्या पर विचार देते हुए डॉ० आत्मानन्द मिश्र ने लिखा है, “इस प्रकार यह स्पष्ट होगा कि शिक्षा में कमियों को दूर करने का तथा उसे यथासम्भव उत्पादक और लाभदायक बनाने का प्रयत्ल हो रहा है।”

ऐसी स्थिति में जहाँ जगत आगे बढ़ रहा है स्थिर शिक्षा कैसे काम देगी? अतएव हम एक ही आदर्शवादी दृष्टिकोण से कैसे आगे बढ़ सकते हैं, जबकि शिक्षा को मानवीय समृद्धियों तथा शक्तियों के विकास का महान साधन मान लिया गया है? इस आधार पर हमें प्रकृतिवादी, प्रयोजनवादी एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण को भी यथावश्यकता अधिक या कम ग्रहण करना ही होगा। हमें आदर्श, मूल्य, चरित्र के विकास के साथ आर्थिक विकास, सामाजिक विकास, वैज्ञानिक विकास को मिलाना होगा। ऐसी दशा में हमें समन्वय का एक दृष्टिकोण रखना चाहिये और आदर्शवाद, प्रकृतिवाद प्रयोजनवाद तथा यथार्थवाद के सिद्धान्तों को अपनी आवश्यकता के अनुसार स्वीकार करके शिक्षा का संगठन करना होगा तभी देवत्व के समकक्ष “पूर्ण मनुष्यता” का लक्ष्य प्राप्त होगा।

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Pankaja Singh

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