शिक्षाशास्त्र

यथार्थवाद के अनुसार अनुशासन | यथार्थवाद के अनुसार शिक्षक, शिक्षार्थी और शिक्षालय

यथार्थवाद के अनुसार अनुशासन | यथार्थवाद के अनुसार शिक्षक, शिक्षार्थी और शिक्षालय

यथार्थवाद के अनुसार अनुशासन-

अनुशासन के प्रति यथार्थवादियों का दृष्टिकोण कुछ भिन्न है। यथार्थवादी मॉन्टेन विद्यालय के छात्रों में संयम, न्याय, स्वतन्त्रता और नियम-पालन के गुणों को विकसित करने पर जोर देता है। कमीनियस धर्म परायणता, ईश्वर भक्ति, परस्पर प्रेम का गुण छात्रों में विकसित करना चाहता था। मिल्टन भी ईश्वर के प्रति श्रद्धा तथा स्वतन्त्रता के लिए प्रेम, न्याय जैसे गुणों की अपेक्षा करता है। इस प्रकार का दृष्टिकोण न तो दमनवादी सिद्धान्त से मेल रखता है और न मुक्तिवादी सिद्धान्त से । प्रभाववादी सिद्धान्त भी स्पष्ट नहीं पाया जाता है। अतएव तीनों सिद्धान्तों के मेल से ही अनुशासन स्थापित करने का विचार यथार्थवाद में मिलता है। चूंकि भौतिक जगत के नियमों में यथार्थवादी विश्वास करते हैं अतएव समाज में पाये जाने वाले नियमों के प्रति, श्रद्धा, प्रेम, मान्यता प्रत्येक मनुष्य में अन्तःप्रेरित होवे ऐसा प्रयत्न होना चाहिए। विद्यालय में अध्यापक, घर में माता-पिता, समाज में अन्य लोग सहानुभूति और प्रेम के साथ विद्यार्थी से व्यवहार करें। यही उसमें अनुशासन की भावना जागृत कर सकता है। अतः जहाँ प्रकृतिवाद प्राकृतिक परिणामों से अनुशासन स्थापित करने के पक्ष में है वह यथार्थवाद सामाजिक वातावरण के साथ समायोजन के फलस्वरूप अनुशासन स्थापित करने को कहता है। इस प्रकार के समायोजन आधारित अनुशासन के लिए विद्यालय का वातावरण उत्तम रखा जावे ऐसा यथार्थवादी मत है। अतः समाज के वातावरण तथा नियमों के द्वारा अन्तःप्रेरित आत्मानुशासन यथार्थवाद में हमें मिलता है।

यथार्थवाद के पाश्चात्य प्रतिनिधि कमीनियस का विचार अनुशासन के सम्बन्ध में व्यावहारिक था। कमीनियस का कहना था कि “अनुशासन का उद्देश्य मनुष्य की गल्तियों को रोकना, उसके बुरे प्रभावों से बचाना है।” इसलिए उसने सुधारात्मक और उपचारात्मक ढंग से अनुशासन स्थापित करने को कहा। ऐसी दशा में उसने सदाचार के अभ्यास पर जोर दिया जिसकी प्रेरणा से बालक और मनुष्य आत्मानुशासित होता है। यदि प्रेम का प्रयोग किया जावे तो यह अन्तःप्रेरित आत्मानुशासन और भी तीव्र हो जाता है। शिक्षक-शिक्षार्थी के सम्पर्क से अनुशासन करना सम्भव है ऐसा कमीनियस का विचार है। यहाँ पर कमीनियस कुछ-कुछ प्रभाववादी सिद्धान्त के पक्ष में है। शिक्षक-शिक्षार्थी का सम्पर्क एक प्रकार का पारस्परिक प्रभाव डालता है तथा बालक को अपने सुधार के लिए उत्तेजित करता है। भारतीय प्रतिनिधि वैसे तो कोई नहीं हैं फिर भी टैगोर तथा गांधी अन्यों की अपेक्षा कुछ अधिक यथार्थवाद के समीप हैं और दोनों का विचार था कि प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण में उपयुक्त आचरण के द्वारा अनुशासन स्थापित हो। दोनों कमीनियस की भाँति दण्ड के तथा दमनवादी सिद्धान्त के विरोधी हैं। टैगोर ने स्वतन्त्रता के द्वारा उपचार की प्रणाली अपनाने पर जोर दिया था जो एक प्रकार से यथार्थवादियों को भी मान्य है। सम्पर्क के द्वारा अनुशासन स्थापित करने का सुझाव हमें मुदालियर शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में भी मिलता है। इसके साथ सदाचार के अभ्यास पर भी इस आयोग ने जोर दिया है। यहाँ हम भारतीय शिक्षा में यथार्थवादी अनुशासन की छाप पाते हैं।

यथार्थवाद के अनुसार शिक्षक, शिक्षार्थी और शिक्षालय-

यथार्थवाद ने शिक्षक को महत्वपूर्ण स्थान दिया है यद्यपि उसने सर्वोच्च स्थान नहीं प्रदान किया है जैसा कि आदर्शवाद करता है। शिक्षक वास्तव में ज्ञान प्रदान करने में एक सहायक व्यक्ति है। शिक्षक का कर्तव्य है कि वह भौतिक तत्वों तथा तथ्यों को यथावत प्रस्तुत करे और एक क्रम से उपस्थित करे जिससे कि शिक्षार्थी उन्हें सरलता से समझ जावे । तथ्यों को सरल बनाने के लिए शिक्षक स्थूल वस्तुओं की सहायता लेवे। प्रकृतिवाद के समान ही यथार्थवाद ने शिक्षक को पथप्रदर्शक एवं ज्ञान का प्रदर्शक कहा है। शिक्षक समाज के वातावरण में शिक्षार्थी के निर्माण का कार्य करता है इसीलिए वह समाज की संस्कृति तथा सभ्यता को शिक्षार्थी के समान वस्तुनिष्ठ ढंग से उपस्थित करता है जिसे शिक्षार्थी अपनी बुद्धि, योग्यता और आवश्यकता के अनुसार ग्रहण करता है और स्वयं शिक्षित और सभ्य बनता है। यथार्थवाद इस प्रकार शिक्षक को समाज की संस्कृति का संरक्षक एवं हस्तान्तरक भी मानता है और उस पर समाज तथा व्यक्ति की प्रगति का एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व होता है। ऐसा उत्तरदायित्व सभी लोग धारण नहीं कर सकते हैं और इसे धारण करने के लिए शिक्षक को स्वयं भी विभिन्न प्रकार के ज्ञान, विभिन्न प्रकार की क्रिया और विशेष ढंग का प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता पड़ती है। अस्तु शिक्षक को प्रशिक्षित होना अनिवार्य समझा जाता है।

कमीनियस ने अध्यापक को आदर्श व्यक्ति माना है जो ईश्वर का भक्त हो तथा समाज की संस्कृति का वाहक हो और मानवता का प्रसारक हो। वह अपने आप में ऐसी क्षमता रखें कि समाज की एक संस्था स्वयं बने जो अपने चरित्र, व्यवहार, कार्य तथा प्रयल से शिक्षार्थी को समाज का योग्य, सभ्य और आदर्श व्यक्ति बना देवे। उस ने शिक्षक को शिक्षार्थी के साथ पूर्ण सहानुभूति हो, वह सीखने में चूक होने पर भी दण्ड न देवे बल्कि सुधार एवं उपचार करे। भारतीय दृष्टि से भी शिक्षार्थी चाहे वे यथार्थवादी हों या आदर्शवादी सुधार-उपचार का ही प्रयल करते हैं। टैगोर, गांधी और विवेकानन्द ने अध्यापक को सुधारक ही कहा, पथप्रदर्शक ही बताया और शिक्षार्थी की भलाई करने वाला समाज का महान पुरुष माना।

लॉक ने शिक्षार्थी को यथार्थवादी कोरी स्लेट कहा जो अपने वातावरण के प्रभाव से अपना निर्माण करता है। इसलिए शिक्षार्थी अनुभव रहित प्राणी है। उसकी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के अनुकूल सहानुभूति, प्रेम तथा कुशलता के साथ उसे विकास करने में सहायता देवे। व्यक्ति और सामाजिक आवश्यकता के प्रति शिक्षार्थी स्वयं भी सजग रहे तथा प्रदान की गई सुविधाओं को ग्रहण करे और आगे बढ़े। अतः यथार्थवाद शिक्षार्थी को स्वयं प्रयत्न करने वाला, सचेष्ट रहने वाला प्राणी मानता है। शिक्षार्थी स्वयं अपने वातावरण के साथ समायोजन के लिए कोशिश करे। प्रकृतिवाद की भाँति यथार्थवाद भी शिक्षार्थी को शिक्षा का केन्द्र समझता है। अतः यथार्थवाद शिक्षा के लिए, विकास के लिए तथा प्रगति के लिए शिक्षार्थी को शिक्षक के समान ही उत्तरदायी मानता है।

कमीनियस ने शिक्षार्थी को श्रद्धा की दृष्टि से देखा है तथा ईश्वर की श्रेष्ठ रचना कहा है। शिक्षार्थी को उसने उत्साही, जिज्ञासु, स्वप्रयत्नशील, धर्मनिष्ठ होना आवश्यक माना है। वह स्वतन्त्र होकर विषय का ज्ञान अविभक्त शक्तियों के द्वारा प्राप्त करे और अपनी प्रकृतिगत क्षमता एवं योग्यता से काम करे। यहाँ कमीनियस प्रकृतिवादी दृष्टिकोण रखता है। भारत के यथार्थवादी प्रतिनिधि गांधी जी ने कहा है कि शिक्षार्थी को स्वावलम्बी बनाने का प्रयल हो और उसे अपने भीतर खोजना चाहिये और अपने व्यक्तिगत चरित्र की देखभाल करनी चाहिये। इसे जिज्ञासु, क्रियाशील, विनम्र, समाज सेवारत तथा अहिंसक होना चाहिये। इस प्रकार कमीनियस तथा गांधी जी भी शिक्षार्थी को समाज के वातावरण में अपनी शक्तियों एवं क्षमताओं को बढ़ाने में स्वयं उत्तरदायी समझते हैं। सामाजिक समायोजन शिक्षार्थी अपने आप करे ऐसा ये लोग संकेत करते हैं।

शिक्षालय के सम्बन्ध में यथार्थवाद ने संकेत दिया है कि वह समाज की एक संस्था है। वह समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संगठित किया गया है, वहाँ सभा वास्तविक एवं जीवनोपयोगी विषयों की शिक्षा के लिए व्यवस्था होती है, बालिका और बालक एक साथ शिक्षा लेते हैं। विद्यालय समाज का प्रतिनिधि एवं दर्पण और शिक्षार्थी यहीं समायोजन एवं अनुशासन सीखता है। कुछ यथार्थवादी विद्यालय में प्रत्येक बालक को अलग-अलग शिक्षा देने के पक्ष में हैं। दूसरे लोग सामूहिक शिक्षा के पक्षपाती हैं। समाज की आवश्यकताएँ बहुत सी हैं अतएव बहुत प्रकार के विद्यालय स्थापित करने के पक्ष में यथार्थवाद है। विज्ञान, व्यवसाय, साहित्य, भाषा, कला-कौशल, उद्योग आदि के लिये इस प्रकार अलग-अलग विद्यालय खोले जायें। कृत्रिम वातावरण की अपेक्षा वास्तविक वातावरण यथार्थवाद विद्यालय में रखना चाहता है तभी सही विकास होगा और सही ढंग से व्यक्ति का निर्माण होगा।

शिक्षालय के बारे में कमीनियस ने कहा है कि “विद्यालय मनुष्यों के वास्तविक निर्माण के स्थल हैं।” विद्यालय में पूर्ण स्वतन्त्रता, सहानुभूति, प्रेम और व्यवस्था के साथ शिक्षा दी जानी चाहिए। शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था के लिये कमीनियस ने क्रमशः मातृ विद्यालय, वर्नाक्यूलर विद्यालय, जिमनासियम या लैटिन विद्यालय तथा विश्वविद्यालय खोलने को कहा है। गांधी जी ने भी शिक्षालय के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण दिखाया है। वह उसे समाज का केन्द्र मानते हैं जो समाज को संस्कृति प्रदान करे और सामाजिक जीवन के लिये तैयार करे। विद्यालय समाज के पुनर्निर्माण में सहायता देने वाली संस्था है। विद्यालय व्यक्ति की वैयक्तिकता का विकास सामाजिक सम्पर्को एवं सेवा के अवसरों द्वारा करे ऐसा गांधी जी चाहते थे। विद्यालय इनके विचार में व्यक्तिगत विकास, आत्मानुभूति और आत्मानुशासन का साधन है। वास्तव में दोनों विचारकों में काफी मेल दिखाई देता है।

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Pankaja Singh

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