शिक्षाशास्त्र

व्यक्तिगत भिन्नता मापने की विधियाँ | व्यक्तिगत भिन्नताओं के जानने से लाभ | व्यक्तिगत भिन्नता और शिक्षा

व्यक्तिगत भिन्नता मापने की विधियाँ | व्यक्तिगत भिन्नताओं के जानने से लाभ | व्यक्तिगत भिन्नता और शिक्षा

व्यक्तिगत भिन्नता मापने की विधियाँ

मनोविज्ञानियों ने इसको मापने के लिए कई विधियाँ बताई हैं-

  1. परीक्षण विधि- विभिन्न परीक्षण व्यक्ति के विभिन्न गुणों को मापते हैं जैसे (i)शारीरिक परीक्षण शारीरिक गुणों को मापते हैं, (ii) बुद्धि परीक्षण बुद्धि को मापते हैं, (iii) अभिक्षमता परीक्षण विशिष्ट योग्यताओं को मापते हैं, (iv) निष्पत्ति या उपलब्ध परीक्षण विषयों के ज्ञान को मापते हैं, (v) संवेग परीक्षण व्यक्ति के संवेगों को जाँचते हैं; (vi) निदानात्मक परीक्षण व्यक्ति की विषय की विषय सम्बन्धी कमजोरियों को परखते हैं, (vii) अभिवृत्ति परीक्षण विशेष प्रवृत्तियों की जाँच करते हैं, (viii) रुचि परीक्षण विभिन्न कामों में व्यक्ति की रुचि को बताते हैं, (ix) व्यक्तित्व परीक्षण व्यक्ति के शारीरिक, भावात्मक एवं मानसिक गुणों और लक्षणों को बताने में सहायता करते हैं।
  2. व्यक्ति का इतिहास विधि-इस विधि में व्यक्तियों के जीवन-वृत्त का ज्ञान प्राप्त करते हैं। घटनाओं एवं उनके प्रभावों का संकलन करके व्यक्ति की.पहचान की जाती है। प्रश्नोत्तर की सहायता से सूचनाओं का संग्रह किया जाता है।
  3. साक्षात्कार विधि- इसमें सीधे व्यक्ति के साथ बातचीत की जाती है और अभिवांछित बातें मालूम की जाती हैं।
  4. प्रश्नावली विधियां इसमें प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं जिनका सम्बन्ध व्यक्ति के अलग-अलग गुणों से होता है।
  5. अभिलेख विधि- इसमें व्यक्ति के जीवन एवं कार्यों के बारे में सारी सूचनाओं का रेकार्ड या अभिलेख रखा जाता है। जैसे ‘संचयी अभिलेख’ तथा ‘जीवन घटना अभिलेख है।

व्यक्तिगत भिन्नताओं के जानने से लाभ

व्यक्तिगत भिन्नता जान लेने से निम्न लाभ होता है-

(i) बालकों की ओर उचित ढंग से ध्यान दिया जा सकता है और उनके भविष्य को सुधारा जा सकता है।

(ii) बालकों के प्रति उचित अभिवृत्ति एवं दृष्टिकोण बनाना सरल होता है और उन्हें आगे बढ़ने में सहायता दी जा सकती है।

(iii) बालकों की जानकारी हो जाने से उन्हें उचित दिशा में प्रगतिशील बनाया जा सकता है और उचित मात्रा में उनकी प्रगति की जा सकती है।

(iv) अध्यापक को अपने शिक्षण के बारे में भी जानकारी होती है और व्यक्ति की भिन्नता के अनुसार वह सफल प्रयल भी कर सकता है।

(v) अध्यापक विद्यार्थियों की क्षमताएँ जान लेता है और उन्हें कुण्ठाओं एवं भावना- ग्रन्थियों से बचा लेता है। उनका मानसिक स्वास्थ्य भी सन्तुलित पाया जाता है।

(vi) असम्भावित आशा से बचना सहज हो जाता है। जितनी क्षमता व्यक्ति की होती है उसी के अनुकूल आशा होती है न कि आकाश तारिका पाने की असम्भावित आशा होती है। अतएव व्यर्थ का प्रयल अध्यापक एवं विद्यार्थी दोनों के द्वारा नहीं होता है।

(vii) वास्तविकता का बोध होने से यथार्थ रूप से काम करना सम्भव होता है। शेखचिल्ली के ढंग से काम नहीं होता जिससे व्यर्थ का समय, शक्ति, धन, श्रम सभी कुछ नष्ट होने से बच जाता है।

व्यक्तिगत भिन्नता और शिक्षा

इसका महत्त्व निम्न दृष्टियों से शिक्षा में पाया जाता है-

  1. कक्षा में विद्यार्थियों के वर्गीकरण की दृष्टि से- अध्यापक सभी बालकों का वर्ग उसकी विभिन्नताओं के आधार पर बना लेता है।
  2. व्यक्तिगत ध्यान देने की दृष्टि से- कमजोर छात्रों की ओर अधिक और अन्य की ओर सामान्य रूप से ध्यान देने की दृष्टि से व्यक्तिगत भिन्नता से ही सहायता मिलती है।
  3. पाठ्यक्रम निर्माण की दृष्टि से- किस छात्र के लिए पाठ्यक्रम की जरूरत होगी यह व्यक्तिगत भिन्नता बताती है।
  4. शिक्षण विधि के प्रयोग एवं उसमें सुधार की दृष्टि से- व्यक्तिगत भिन्नता की जानकारी होने से अध्यापक उपयुक्त शिक्षण विधि का प्रयोग कर सकता है। डाल्टन, प्रोजेक्ट, मॉन्टेसरी, किण्डर गार्टेन, विधियों का निर्माण इसी से हुआ है।
  5. विद्यालयों की स्थापना की दृष्टि से- विभिन्न प्रकार के विद्यार्थियों की स्थापना भी व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर हुई है। जैसे प्रतिभाशाली के लिए पब्लिक विद्यालय, शिल्पियों के लिए बहु-धन्धी विद्यालय, सैनिकों के लिए सैनिक विद्यालय, व्यवसायी के लिए व्यावसायिक विद्यालय।
  6. निर्देशन की दृष्टि से- व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर व्यक्तिगत समस्याओं की जानकारी भी होती है और तदनुसार उन्हें शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन भी देना सम्भव होता है।
  7. व्यवसाय-युनाव की दृष्टि से- आधुनिक समय में व्यक्तिगत रुचि, क्षमता के अनुकूल व्यवसाय चुनने में सहायता देता है।
  8. विद्यालय और समाज में मेल स्थपित करने की दृष्टि से- व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर विद्यालय समाजीकरण में योगदान करता है और इस प्रकार विद्यालय तथा समाज में मेल स्थापित होता है।
  9. गृहकार्य की दृष्टि से- अध्यापक को यदि विधार्थी की व्यक्तिगत भिन्नता का ज्ञान है तो उसी के अनुकूल वह गृह कार्य भी देता है। तेज विद्यार्थी को अधिक, कमजोर को कम और साधारण को सामान्य रूप से गृहकार्य देते हैं।
  10. विभिन्न लोगों के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा व्यवस्था की दृष्टि से- यौन भेद के आधार पर लड़कियों के लिए अलग, शिशु, बालक, किशोर, युवा एवं प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए अलग शिक्षा व्यवस्था की जाती है। खेलकूद में रुचि रखने वालों को उसी ढंग से पढ़ाया जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा होने पर कठिन काम दिए जाते हैं। घर गृहस्थी के काम में लड़कियों को ही लगाया जाता है। ये सब व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर होता है।
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Pankaja Singh

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