शिक्षाशास्त्र

व्यक्तिगत भिन्नता के प्रकार | व्यत्तिगत भिन्नता के कारण

व्यक्तिगत भिन्नता के प्रकार | व्यत्तिगत भिन्नता के कारण

व्यक्तिगत भिन्नता के प्रकार

व्यक्तिगत भिन्नता के सम्बन्ध में प्रो० टरमैन ने लिखा है कि “उच्च योग्यतावालों या प्रतिभाशील बच्चों में से कुछ हद तक अपनी अनेक योग्यताओं के मामले में अपने ही भीतर या अन्य व्यक्तियों के साथ भिन्नताएँ होती हैं।” निम्न प्रकार की भिन्नताएँ हैं-

(क) शारीरिक भिन्नता- शरीर की बनावट, रूप, रंग, आकृति, यौन में अन्तर को शारीरिक भित्रता कहते हैं। शरीर के स्वास्थ्य एवं अंगों की क्रियाशीलता में भेद होने से शारीरिक भिन्नता पाई जाती है। व्यक्तियों को निम्न वर्गों में बाँटा गया है-

(i) क्रेश्मर का वर्गीकरण- (1) एथलेटिक- मजबूत हड्डी, स्वस्थ मांसपेशियों, चौड़े सीने, लम्बे हाथ-पैर और लम्बे चेहरे वाले, क्रियाशील, चिन्तारहित, सुसमायोजन करने वाले, (2) ऐसथेनिक- लम्बे, पतले हाथ-पैर वाले, तिकोने चेहरे, चपटे सीने, और छोटी ठोड़ी वाले, अपनी निन्दा न सुनने वाले, दूसरों की निन्दा करने वाले। (3) पिकनिक- बड़े सिर और धड़ वाले, छोटे पैर, गोल सीने व कंधे, छोटे हाथ-पैर वाले। (4) डिसप्लास्टिक- असाधारण शरीर वाले, रोगग्रस्त ग्रन्यि रोग वाले, उपयुक्त तीन प्रकार के लोगों का मिश्रण।

(ii) शेल्डन का वर्गीकरण- (1) कोमल, गोल तथा मोटे शरीर वाले । (2) हृष्टपुष्ट, शक्तिशाली, भारी और मजबूत। (3) लम्बे आकार वाले, शक्तिहीन दुर्बल मांसपेशियों वाले, शीघ्र उत्तेजित होने वाले।

(iii) वार्नर का वर्गीकरण- (1) सामान्यतया स्वस्थ, सुडौल, गठीले व्यक्ति (2) अविकसित अंग वाले, छोटे-हाथ, पैर, गर्दन या सिर वाले। (3) असन्तुलित शरीर वाले, निर्बल अपरिपुष्ट । (4) स्लायुविक गड़बड़ी वाले, शीघ्र घबड़ाने वाले। (5) अंगहीन, हाथ पैर, आँख, कान ठीक न होने वाले। (6) आलसी, सुस्त, इच्छा विहीन, निर्जीव से व्यक्ति । (7) पिछड़े हुए, आयु के अनुकूल कार्य करने में असमर्थ । (8) प्रतिभाशाली, अपनी आयु से अधिक कार्य करने वाले 1 (9) मिरगी रोगग्रस्त । (10) स्नायु रोगग्रस्त ।

(iv) कैनन का वर्गीकरण- (1) यॉयरॉयड ग्रन्थिप्रधान, पर्याप्त शक्ति वाले, स्वस्थ, ओजस्वी व्यक्ति। (2) थांयरॉयड ग्रन्यि से न्यून स्राव वाले, कमजोर, अस्वस्थ, आलसी, क्रियाहीन । (3) एड्रीनल ग्रन्थि प्रधान, बहादुर, लड़ाकू, क्रोधी, साहसी, कर्मठ व्यक्ति । (4) पिट्यूटरी ग्रन्थि प्रधान, क्रियाशील, हंसी-मजाक में निपुण, प्रसन्नचित व्यक्ति । (5) गोनाड ग्रन्यि प्रधान, अधिक क्रियाशील, कामुक, नाटे, स्वस्थ ।

(ख) बौद्धिक भिन्नता- प्रो० टरमैन ने बुद्धिलब्धि निकालकर निम्नलिखित भिन्नताएँ बताई हैं-

प्रकार बुद्धि लब्धि
अतिप्रतिभाशाली 200 या इससे अधिक
प्रतिभाशाली 140 से 200 तक
अत्युत्कृष्ट 120 से 140 तक
उत्कृष्ट 110 से 120 तक
साधारण 90 से 110 तक
मंदबुद्धि 80 से 90 तक
निर्बल बुद्धि 70 से 80 तक
हीन बुद्धि 70 से नीचे
मूर्ख 50 से 70 तक
मूढ़ 20 से 50 तक
जड़ 20 से नीचे

(ग) मानसिक योग्यताओं की भिन्नता- व्यक्ति संवेदन, प्रत्यक्षण, निरीक्षण, स्मरण, कल्पना, चिंतन, तर्क, अधिगम आदि मानसिक योग्यता में भी न पाए जाते हैं। कुछ बड़े संवेदनशील होते हैं कुछ शीघ्र स्मरण करने वाले होते हैं, कुछ बड़े तार्किक होते हैं, कुछ की कल्पना बहुत तीव्र होती है, कुछ देर में सीखते हैं, इत्यादि । मनोविज्ञानियों ने निम्न वर्गीकरण किया है।

(i) बार्नडाइक का वर्गीकरण जो विचार शक्ति पर आधारित है (1) सूक्ष्म-विचारक जैसे गणितज्ञ, तर्कशास्त्री, विज्ञानी । (2) प्रत्यय विचारक जैसे सांख्यिकीकार, कवि, साहित्यकार । (3) स्थूल विचारक जैसे वस्तुओं के साथ काम करने वाले। (4) ज्ञानेन्द्रिय प्रधान विचारक जैसे आँख से देखकर समझने वाले।

(ii) वार्नडाइक का वर्गीकरण जो कल्पना शक्ति पर आधारित है (1) दर्शनालु अर्थात आँख का इन्द्रिय प्रधान व्यक्ति। (2) श्रवणालु अर्थात् कान की इन्द्रिय प्रधान व्यक्ति । (3) गननालु अर्थात् गति प्रधान व्यक्ति । (4) स्पर्शालु अर्थात् केई इन्द्रिय प्रधान व्यक्ति। (5) घृणाल अर्थात् नासिका इन्द्रिय प्रधान व्यक्ति । (6) मिश्रित अर्थात् कई इन्द्रियों को एक साथ मिलाकर कार्य करने वाले व्यक्ति।

(iii) स्टीफेन्सन का वर्गीकरण जो बाह्य उत्तेजकों द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों पर आधारित है (1) प्रसारक अर्थात् स्थायी प्रभाव वाले व्यक्ति। (2) अप्रसारक अर्थात् क्षणिक प्रभाव वाले व्यक्ति ।

(घ) स्वभावात्मक भिन्नता- व्यक्तियों के स्वभाव मे अन्तर पाया जाता है। मनोविज्ञानियों के वर्गीक निम्न हैं-

(i) गैलेन का वर्गीकरण जो शारीरिक क्रियाओं के आधार पर (1) अतिरुधिर युक्त जो अत्यन्त संवेदनशील, परिवर्तनशील, शीघ्र उत्तेजित होने वाले, उत्साही एवं कार्य करने वाले होते हैं। (2) पीत पित्त प्रधान जो क्रोधी, वीर, साहसी, जिद्दी, दृढ़प्रतिज्ञ, कटोर स्वभाव वाले होते हैं। (3) श्याम पित्त प्रधान जो दुःखी, चिन्तित, हतोत्साही, निराशावादी, कार्य में अरुचि रखने वाले होते हैं। (4) कफ प्रधान जो जालसी, सुस्त, कम संवेदनशील, काम से भागने वाले, परिश्रमहीन होते हैं।

(ii) शेल्डन का वर्गीकरण स्वाभाविक गुणों के अनुसार (1) आलसी जो आरामपसंद, निद्रा, प्रेम, पराश्रित, पराङ्मुखी, दाम न करने वाले होते हैं। (2) कर्मठ जो सक्रिय, मेहनती, साहसी, अधिकारप्रेमी, कार्यरत, शक्तिशाली होते हैं। (3) संयमी जो अपने पर नियन्त्रण रखने वाले, संकोची, कार्याभ्यस्त, एकान्तसेवी होते हैं।

(iii) मार्गन और गिलीलैण्ड का वर्गीकरण जो मनोभावों के आधारप: है (1) प्रफुल्ल जो हमेशा हँसने वाले, आशावादी, गम्भीरतारहित काम करने वाले, आपत्ति में फँसने वाले, जीवन को खेल समझने वाले होते हैं। (2) उदास जो सदैव दुखी रहते हैं, निराशावादी अभिवृत्ति रखते हैं। (3) थिथड़े जो छोटी-छोटी बातों में खीझ उठते हैं, जल्दी क्रुद्ध हो जाते हैं, बात बर्दाश्त नहीं कर सकते । (4) अस्थिर जो शीघ्र क्रुद्ध, शीघ्र प्रसन्न, शीघ्र दुख, अनियंत्रित भावना वाले होते हैं।

(ड.) सामाजिकता सम्बन्धी भिन्नता- लोगों में सामाजिकता अधिक पा कम होती है। कुछ अपने आप में कुछ दूसरों में और कुछ अपने दूसरों में बराबर-बराबर रुचि रखते है। प्रो० युंग ने तीन वर्गों में बाँटा है-

(i) अन्तर्मुखी- जो आत्म केन्द्रित, समाज के कामों में रुचि न लेनेवाले, एकांत प्रेमी, ‘भविष्य की चिन्ता अधिक करने वाले, अधिक सोच विचार करने वाले, देर से निर्णय लेने वाले, कुशल व्यवहार नहीं, और चिन्ता से घिरे होते हैं।

(ii) बहिर्मुखी- जो सामाजिक कार्यों में भाग लेने वाले, दूसरों की भलाई में लगे रहने वाले, अकेले ऊबने वाले, व्यवहार कुशल, सक्रिय, शीघ्र निर्णय लेने वाले दृढ़ निश्चय, मिलनसार, नेता, प्रशासक, वक्ता होते हैं।

(iii) उभयमुखी- जो उपयुक्त दोनों प्रकार का मेल होता है और दोनों के गुण इस प्रकार के व्यक्ति में मिलते हैं। अधिकतर व्यक्ति इस वर्ग में आते हैं।

(च) अधिगम क्षमता में भिन्नता- प्रो० एबिंधास ने सिद्ध किया है कि विभिन्न आयु के बच्चों एवं वयस्कों में भी अधिगमक्षमता भिन्न पाई जाती है। एक ही आयु के बालकों में भी अधिगम क्षमता की भिन्नता पाई जाती है। कोई बालक जल्दी सीखता है तो कोई देर में। कक्षा में एक बात को कुछ लड़के जल्दी समझते हैं और दूसरों को बहुत समय लगता है।

(छ) रुचि की भिन्नता- प्रत्येक व्यक्ति की रुचि दूसरे की रुचि से भिन्न होती है। कुछ बालक पढ़ने में रुचि रखते हैं तो कुछ गणित करने और कुछ शिल्प के कामों में।

(ज) अभिक्षमता की मित्रता- कुछ तो संगीत की अभिक्षमता रखते हैं तो दूसरे कौशल की या तकनीकी कामों की। वकील, डाक्टर, मास्टर इंजीनियर, कारीगर, में क्लर्क, प्रशासक अभिक्षमता की भिन्नता पायी जाती है।

(झ) चारित्रिक भिन्नता- आचरण, व्यवहार, अभिवृत्ति, आदत, स्थायीभाव ये सब मिलकर चरित्र का निर्माण करते हैं। चोर, लुटेरे, अपराधी, हत्यारे, उदार, दृढ़ प्रतिज्ञ, कृतसंकल्प, शीलवान, लज्जाशील चरित्र के व्यक्ति होते हैं।

(ञ) ज्ञानात्मक भिन्नता- व्यावहारिक एवं सैद्धान्तिक ज्ञान वाले व्यक्ति होते हैं। व्यावहारिक ज्ञान के कारण संसार के काम-काजों में, विषम-परिस्थितियों में, पारस्परिक सम्पर्क में व्यक्ति आगे बढ़ता है। सैद्धान्तिक ज्ञान भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, कृषि आदि का ज्ञान होता है। ज्ञान की भिन्नता आयु, बुद्धि, सामाजिक व आर्थिक स्थिति, अधिगम के अवसर व प्रेरणा आदि पर कम या अधिक होती है। व्यावहारिक ज्ञान वास्तविक परिस्थितियों में कार्य करने से मिलता है।

(ट) व्यक्तित्व की भिन्नता- व्यक्ति के विभिन्न गुणों के समूह का मनोवैज्ञानिक नाम व्यक्तित्व होता है। सभी व्यक्तियों में सभी गुण नहीं होते हैं इसलिए व्यक्तित्व होना अनिवार्य है। व्यक्तित्व की भिन्नता के निम्न वर्ग हैं।

(i) प्रो०ई० स्पैंजर का वर्गीकरण- इन्होंने छ: प्रकार के व्यक्तित्व बताए हैं।

(1) ऐन्द्रिय सुख चाहने वाला जो अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में लगा रहे जैसे लोभी, लालची, कामी, घूसखोर, काला बाजारी, तस्करी व्यापारी, बेईमान आदि ।

(2) धन से प्रेम रखने वाला जो व्यापार एवं वाणिज्य में दिन-रात लगा रहता है और धन कमाने के पीछे तन-मन सब कुछ खराब कर देता है।

(3) चिन्तन मनन करने वाला जो दार्शनिक-वैज्ञानिक, साहित्यिक अध्ययन में, शोधकार्य में अपना सारा समय लगाता है।

(4) राजनीति में लगा रहने वाला जो शासन के कार्यों में, दलबन्दी करने में, दौंव-पेंच घात-प्रतिघात में लगा हुआ पाया जाता है।

(5) समाज के कामों में लगा रहने वाला समाजसेवा, समाज-उत्थान, समाज कल्याण के लिए चिन्तित और प्रयलशील पाया जाता है।

(6) धर्मनिष्ठ जो ईश्वर के भजन, पूजा-पाठ, स्नान-ध्यान, रोजा-नमाज,चर्च की सेवा में लगा पाया जाता है।

(ii) सामान्य वर्गीकरण- ये तीन प्रकार के वर्ग बने हैं। (1) भाव प्रधान व्यक्ति, जो जल्दी ही संवेगशील हो उठते हैकोमल हृदय वाले होते है जैसे कवि, दयालु, सेवक, भक्त। (2) विचार प्रधान व्यक्ति, जो जीवन की समस्याओं के सम्बन्ध में खूब सोच- विचार-चिन्तन किया करते हैं जैसे दार्शनिक, लेखक, वैज्ञानिक आदि (3) क्रिया प्रधान व्यक्ति, जो अपने जीवन में किया ही करना पसन्द करते हैं जैसे खिलाड़ी, सैनिक, श्रमिक, कारीगर आदि।

व्यक्तिगत भिन्नता के बहुत से प्रकार पाए जा सकते हैं यदि सभी दृष्टिकोणों को मिला-मिलाकर देखें। लोगों के पास से देखने पर उनमें अन्तर्मुखता पाई जाती है तो दूसरी और विचारशीलता और तीसरी ओर राजनीति में प्रेम भी पाया जायेगा। ऐसे व्यक्ति को हम किस वर्ग में रखेंगे यह कहना कठिन है। उदाहरण के लिए श्रीमती इन्दिरा गांधी का व्यक्तित्व है जिनमें ऊपर के तीनों गुण हैं। ऐसी दशा में व्यक्तिगत भिन्नता के बहुत से प्रकार होना जरूरी है।

व्यत्तिगत भिन्नता के कारण

व्यक्तिगत भिन्नता के निम्न कारण हैं-

(i) आनुवंशिकता- अधिक अनुवंशिकता के कारण व्यक्तिगत भिन्नताएँ पायी गयी है। व्यक्ति को यदि एक इकाई (1) माने और उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी गुणों का हस्तान्तरण का योग रखे तो हमें ज्ञात होगा कि व्यक्तिगत भिन्नता एक प्राकृतिक घटना है-

1=1/2+1/4+1/8+1/16+132+1/64+1/128+1/276+1/512+1/1024

पीढ़ियों के योगदान में अन्तर होता है इसलिए व्यक्तिगत भिन्नता आ जाती है।

(ii) पर्यावरण- व्यक्तिगत भिन्नता पर्यावरण के कारण भी पायी जाती है। एक गरीब परिवार में खाने-पीने की कमी के कारण शारीरिक एवं मानसिक गुणों का विकास लोगों में नहीं हो पाता जब कि एक सम्पन्न परिवार में सभी सोग हष्ट-पुष्ट पाए जाते हैं। इसी प्रकार दूर गाँव में रहने वाला बालक किसी विद्यालय के पास में न होने के कारण मानसिक तौर पर पिछड़ा पाया जाता है। ये ही आगे अच्छे पर्यावरण में रख देने से आगे बढ़ जाते है।

(iii)  जाति एवं प्रजाति- अपने देश में अनुसूचित जाति के लोग उच्च जाति के लोगों से भिन्न होते हैं। भारत के लोग अग्रेजी से पीछे पाए जाते है।

(iv) यौन भेद- स्त्री-पुरुष को प्रकृति में शुरू से भिन्नता होती है। बुद्धि, कार्य क्षमता, सोचने-विचारने, व्यवहार में भेद होता है।

(v) आयु और स्वास्थ्य- 3 वर्ष का शिशु 10 वर्ष के बालक से भिन्न होता है। शारीरिक एवं मानसिक आयु, स्वास्थ्य व्यक्तिगत भिन्नता का कारण।

(vi) सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक स्थिति- लोगों की स्थिति के कारण भी व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है। समाज में उच्च पदों पर नियुक्त लोग साधारण एवं भिन्न श्रेणी के लोगों से आचार, रहन-सहन, बुद्धि, योग्यता सभी में उच्च पाये जाते है। इसी प्रकार व्यापारी का लड़का वकील के लड़के से भिन्न होता है। डाक्टर का लड़का मोची के लड़के से भिन्न होता है। राजनीतिक नेताओं के लड़के गरीब किसान के लड़कों से भिन्न होते हैं।

(vii) परिपक्वता और शिक्षा-‌ शिशु अपने आप बालक, बालक अपने आप किशोर और किशोर अपने आप युवा तथा प्रौढ़ हो जाता है। यह प्रक्रिया परिपक्वता कहलाती है। शिक्षा व्यक्ति के विकास का साधन है जो समाज द्वारा प्रदान किया जाता है। शिक्षा पाकर व्यक्ति में परिवर्तन व भेद होता है।

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Pankaja Singh

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