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व्याख्यान विधि | व्याख्यान विधि के गुण | व्याख्यान विधि के दोष | व्याख्यान विधि का प्रयोग कब किया जाये

व्याख्यान विधि | व्याख्यान विधि के गुण | व्याख्यान विधि के दोष | व्याख्यान विधि का प्रयोग कब किया जाये | Lecture Method in Hindi | Properties of Lecture Method in Hindi | Defects of lecture method in Hindi | When to use the lecture method in Hindi

व्याख्यान विधि (Lecture method)-

शिक्षण की सबसे पुरानी एवं सबसे लोकप्रिय विधि व्याख्यान विधि ही है। छापे खाने के आविष्कार से पूर्व इस विधि का प्रयोग किया जाता था। इसका सामान्य अर्थ है जब शिक्षक किसी बात को स्पष्ट करने के लिए भाषण के रूप में स्पष्टीकरण देता है तो उसे व्याख्यान कहते हैं। यदि इसे शिक्षक द्वारा किसी विषय की, तथ्य की अथवा घटना की बाल की खाल निकालने की कला कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि शिक्षक व्याख्यान के द्वारा किसी विषय वस्तु की गहनता के साथ व्याख्या देता है जिससे विषय वस्तु का प्रत्येक अंश छात्र आसानी से समझ सकता है।

यह विधि एक मार्गी विधि है इसमें प्रस्तुतीकरण पर अधिक बल दिया जाता है जिसके परिणामस्वरूप शिक्षक ही सक्रिय रहता है। छात्र निष्क्रिय स्रोता के रूप में बैठा रहता है। उन्हें अनुक्रिया हेतु अवसर बहुत कम प्राप्त होते हैं। किसी भी विषय वस्तु, प्रकरण अथवा घटना की व्याख्या तीन बातें पर निर्भर करती है-

(क) विषय वस्तु का चयन (ख) विषय वस्तु का शिक्षक का अधिकार

(ग) चयनित विषयवस्तु अथवा घटना को प्रस्तुत करने का ढंग।

‘थॉमस एम. रिस्क’ (Thomas M. Risk) कहते हैं कि “व्याख्यान उन तथ्यों, सिद्धान्तों अथवा अन्य सम्बन्धों का स्पष्टीकरण है जिनको शिक्षक चाहता है कि उसके सुनने वाले समझें।” (Lecture is an exposition of facts, Principles or other relation ship that the teacher wishes his hearers to understand.)

विषयवस्तु का प्रस्तुतीकरण शिक्षक के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। उचित आवाज, आत्मविश्वास एवं विषय का ज्ञान आदि का होना आवश्यक है, यह ठीक भी है लेकिन कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यह विधि शिक्षक केन्द्रित होने के कारण अनुपयुक्त है। यह इसका एक पक्ष है, दूसरे पक्ष पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि शिक्षण की विधियों में यह विधि सम्पूर्ण भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय है।

अतः इस विधि के द्वारा विषय सामग्री के सम्पूर्ण तथ्यों को क्रमबद्ध एवं व्यस्थित करके शिक्षक छात्रों के सम्मुख शाब्दिक चित्र खींचता है। यह विधि सभी स्तरों का काम में ली जा रही है। प्रत्येक विषय में इसका प्रयोग सम्भव है। केवल छोटी कक्षा अथवा प्राथमिक स्तर की कक्षाओं हेतु यह विधि अधिक उपयुक्त नहीं है।

व्याख्यान के अर्थ को स्पष्ट करते हुए डॉ. जोशी (Dr. Joshi) लिखती है कि “किसी घटना, सम्प्रत्यय, सिद्धान्त अथवा तथ्य को किसी व्यक्ति को समझाने की दृष्टि से परस्पर सम्बन्धित कथनों का प्रयोग करना पड़ता है, यही व्याख्या है।”

रिस्क (Risk) महोदय ने लिखा है कि “व्याख्या उन तथ्यों सिद्धान्तों अथवा अन्य सम्बन्धों का स्पष्टीकरण है, जिनको शिक्षक चाहता है कि उसके सुनने वाले समझें।” व्याख्यान को स्पष्ट करते हुए रेन (Wren) महोदय लिखते हैं कि “व्याख्यान देना कभी-कभी शिक्षण की प्रणाली भी कहा जाता है व्याख्यान देना व्याख्यान प्रणाली है और जब शिक्षक व्याख्यान देता है तो यह शिक्षण नहीं करता है।”

व्याख्यान को स्पष्ट करते हुए लैण्डन (Landen) महोदय लिखते हैं “कुछ सीमा तक प्रत्येक पाठ में इसकी आवश्यकता होती है और पाठ मुख्य रूप से इसको निर्मित करते हैं।”

जेम्स एम.ली. (James M. Len)- ने भी व्याख्यान को इस प्रकार स्पष्ट किया है। “व्याख्यान एक शिक्षाशास्त्री विधि है, जिसमें शिक्षक औपचारिक एवं नियोजित रूप में किसी प्रकरण अथवा समस्या पर भाषण देता है।”

व्याख्यान दो प्रकार का होता है-

(i) औपचारिक व्याख्यान (Formal lecture एवं (ii) अनौपचारिक व्याख्यान (Informal lecture) । औपचारिक व्याख्यान कक्षा-कक्ष में पाठ्यक्रम की विषयवस्तु से सम्बन्धित होता है जबकि अनौपचारिक व्याख्यान कक्षा कक्ष की सीमाओं से बाहर कराया गया शिक्षण होता है।

इस प्रकार व्याख्यान किसी विषय वस्तु की स्पष्ट व्याख्या को कहते हैं जिससे सीखने वाले को सम्बन्धित तथ्यों अथवा घटनाओं के सम्बन्ध में किसी प्रकार का भ्रम अथवा शंका न रहे।

डॉ. एस. एन. दुबे ‘शरतेन्दु’ (S. N. Dubey ‘Shertendu’) ने व्याख्यान के सम्बन्ध में ‘एच.क्लार्क एवं इरविंग एस. स्टार्स’ (H. Clark and Erving S. Stars) के विचारों को इस प्रकार लिखा है “व्याख्यान विधि में औपचारिक से अनौपचारिक व्याख्यान तक पहुंच जाती है। इसमें कुछ अन्य तथ्यों का भी प्रयोग होता है” (It is desirable to think of lectures on a continuum, extending from the highly formal to highly informal

व्याख्यान

  • दृष्टान्त युक्त
  • प्रदर्शन युक्त
  • पाठ्य सामग्री या उद्धरणों को पढ़ना
  • औपचारिक व्याख्यान
  • व्याख्यान
  • संशोधित व्याख्यान
  • अनौपचारिक संक्षिप्त व्याख्यान
  • अनौपचारिक चर्चा

व्याख्यान, उदाहरण व दृष्टान्तों के प्रयोग से तथा शिक्षण सहायक सामग्री के प्रयोग से रोचक बन जाता है। शिक्षक बीच-बीच में छात्रों से प्रश्न पूछकर छात्रों को सक्रिय करता है। कभी हाव-भाव के द्वारा कक्षा को नियंत्रित करता है। इस प्रकार विभिन्न तरीकों से शिक्षक कक्षा-शिक्षण को प्रभावी बनाता है।

व्याख्यान विधि के गुण (Merits of Lecture Method):

व्याख्यान विधि के प्रमुख गुण निम्न प्रकार हैं-

(1) तर्कशाक्ति का विकास व्याख्यान द्वारा सम्भव है।

(2) समय, श्रम व शक्ति की बचत होती है।

(3) विषयवस्तु को भली प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।

(4) वर्तमान समय में आधुनिक शिक्षाविधियों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। जिनमें समस्या समाधान विधि, योजना विधि, दत्त कार्य विधि, पर्यवेक्षित अध्ययन विधि, प्रयोगशाला विधि आदि प्रमुख हैं लेकिन इन विधियों का क्रियान्वयन व्याख्यान विधि के अभाव में असम्भव है।

(5) पाठ्य वस्तु के जटिल एवं गूढ़ विषयों को इसके द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

(6) एक ही समय में छात्रों के बड़े समूह को विषय वस्तु समझायी जा सकती है।

(7) उच्च कक्षाओं हेतु यह बहुत ही प्रभावी विधि है।

(8) यह विधि शिक्षक के लिए सरल, संक्षिप्त एवं आकर्षक है।

(9) शिक्षक विचारधारा के प्रवाह में बहुत सी नई बातें बता देते हैं जो जीवन में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

(10) विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण में तार्किक क्रम सदैव बना रहता है।

व्याख्यान विधि के दोष (Demerits of Lecture Method):

व्याख्यान विधि बहुत ही उपयोगी विधि सिद्ध हुई है फिर भी इसमें कुछ दोष व्याप्त है। जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

(1) यह प्राकृतिक विधि नहीं है प्रायः अपरिपक्व भाषणकर्ता भाषण करते समय छात्रों को का में मात्र स्रोता बना देता है। ऐसा भाषणकर्त्ता भाषण देता रहता है और छात्र निष्क्रिय स्रोता बना रहता है।

(2) इस विधि का ज्ञान स्थाई नहीं होता। छात्र एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है।

(3) यह विधि छोटी कक्षाओं हेतु अनुपयुक्त है।

(4) इसमें छात्रों को मौलिक चिन्तन हेतु कोई अवसर नहीं मिलते।

(5) अकुशल शिक्षक का कक्षा में अनुशासनहीनता की स्थिति पैदा हो सकती है।

(6) व्याख्यान की समस्त बातों को शीघ्रतापूर्वक लिखना छात्रों के लिए कठिन कार्य होता है।

(7) गुरु-शिष्य शिक्षण सिद्धान्त की यह विधि अवहेलना करती है।

(8) यह विधि मनोवैज्ञानिक नहीं है।

व्याख्यान विधि का प्रयोग कब किया जाये (When to use Lecture Method) :

व्याख्यान विधि का प्रयोग निम्न कार्यों हेतु किया जा सकता है-

(1) प्रेरणा प्रदान करने हेतु (To Motivate)

(2) विषय वस्तु के संक्षिप्तीकरण हेतु (To Summarize the context)

(3) व्याख्या अथवा स्पष्ट करने हेतु (To Clarify)

(4) समय की बचत हेतु (To save time)

(5) अतिरिक्त विषयवस्तु प्रस्तुत करने हेतु (To present additional material)

(6) गृहकार्य अथवा दत्त कार्य देने हेतु (To give assignment) ।

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Pankaja Singh

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