अर्थशास्त्र

विश्व व्यापार संगठन तथा भारत | भारत को WTO की सदस्यता से सम्भावित लाभ | वर्तमान में WTO से भारत को लाभ | भारत को विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता से सम्भावित हानियाँ | WTO का पाँचवाँ कॉनकुन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन

विश्व व्यापार संगठन तथा भारत | भारत को WTO की सदस्यता से सम्भावित लाभ | वर्तमान में WTO से भारत को लाभ | भारत को विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता से सम्भावित हानियाँ | WTO का पाँचवाँ कॉनकुन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन | World Trade Organization and India in Hindi | Possible benefits for India from WTO membership in Hindi | Currently India benefits from WTO in Hindi | Possible disadvantages of India’s membership of the World Trade Organization in Hindi | WTO’s Fifth Concun Ministerial Conference in Hindi

विश्व व्यापार संगठन तथा भारत

भारत व्यापार तथा प्रशुल्क पर सामान्य करार तथा इसके उत्तराधिकारी संगठन WTO दोनों का संस्थापक सदस्य है, जो कि 1 जनवरी, 1995 ई. से प्रभाव में आया। इसकी WTO की सदस्यता के कारण भारत को अपने निर्यातकों के लिये स्वयं WTO के समस्त सदस्यों से अत्यन्त अनुकूल राष्ट्र तथा राष्ट्रीय बर्ताव मिला हुआ है तथा इस बढ़ती हुई नियम आधारित पद्धति में इसकी प्रतिभागिता का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के संचालन में अधिक स्थायित्व तथा भविष्य का ध्यान निश्चित करने के लिये हैं। भारत की वचनबद्धता WTO के सम्बन्ध में निम्नलिखित हैं।

  1. सीमा शुल्क मूल्यांकन पर भारत का विधान सीमा शुल्क मूल्यांकन नियमावली, 1998 को व्यापार एवं शुल्क का सामान्य करार के अनुच्छेद VII तथा सीमा शुल्क मूल्यांकन करार के क्रियान्वयन पर WTO के प्रावधानों के अनुरूप लाने के लिए संशोधित किया गया है।
  2. बौद्धिक सम्पदा अधिकारों से सम्बन्धित व्यापार समझौता बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की उपलब्धता, उपयोगिता प्रयोग तथा इन्हें करने सम्बन्धित न्यूनतम स्तरों को स्थापित करता है तथा इन क्षेत्रों में भेदभाव-भिन्न तथा पारदर्शिता के मूल सिद्धान्त को बढ़ाता है।
  3. आजकल आयातों पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध आठ अंक के स्तर पर लगभग 2,300 शुल्क श्रृंखलाओं के भुगतान सन्तुलन के आधार पर रखे जा रहे हैं।
  4. सेवा समझौते में हमारा लक्ष्य विदेशी सेवा उपलब्धकर्ताओं को प्रवेश की अनुमति देना है, जिसके अन्तर्गत रोजगार, प्रौद्योगिकी तथा प्रवेश पूँजी अन्तर्ग्रवाह के सम्बन्ध में हमारे लिये अत्यन्त लाभदायक माना गया था।

भारत को WTO की सदस्यता से सम्भावित लाभ

भारत को WTO के सदस्य बनने से प्राप्त होने वाले सम्भावित प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं।

  1. देश में विदेशी निवेश में वृद्धि होगी।
  2. देश में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी।
  3. देश में विदेशी मुद्रा भण्डारों में वृद्धि होगी।
  4. देश में विदेशी वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
  5. ‘स्वेई-जेनेरिस’ व्यवस्था में कृषि क्षेत्र में अनुसन्धान तथा विकास निवेश में वृद्धि होगी तथा अधिक उपज देने वाली उपयुक्त किस्में विकसित होंगी।
  6. यदि भारत WTO का सदस्य बना रहता है तो भारत के 124 देशों के साथ बहुपक्षीय समझौते सम्भव हो सकते हैं। इन देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते नहीं करने पड़ेंगे।

वर्तमान में WTO से भारत को लाभ

गैट (GATT) तथा उसका स्थान लेने वाले विश्व व्यापार संगठन WTO की सदस्यता ग्रहण करने से भारत को लाभ हुआ है। 1994-95 ई. में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना से पूर्व भारत का वार्षिक निर्यात 26.33 अरब डॉलर था, जो 2002-03 ई. में दोगुना बढ़कर 51.70 अरब डॉलर का हो गया। वस्तुओं तथा वाणिज्यिक सेवाओं के कुछ वैश्विक निर्यात में भारत का अंश 1995 ई. में 0.61 प्रतिशत था, जो 2011 ई. में बढ़कर 3.3 प्रतिशत हो गया। WTO के आंकड़ों के अनुसार वस्तुओं तथा सेवाओं के कुल वैश्विक निर्यातों में भारत का अंश विगत तीन वर्षों में (2013, 2014, 2015 में) 2.0 बना हुआ है जो निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट है-

वस्तुओं और सेवाओं के वैश्विक निर्यातों में भारत का अंश

वर्ष

वस्तुगत निर्यातों में भारत का अंश (प्रतिशत)

वाणिज्यिक सेवाओं के वैश्विक निर्यातों में भारत का अंश (प्रतिशत)

सम्पूर्ण विश्व के वस्तुगत एवं सेवा निर्यातों में भारत का अंश (प्रतिशत)

2011

1.7.

3.2

19

2012

1.6

3.2

1.9

2013

1.7

3.1

2.0

2014

1.7

3.1

20

2015

1.6

3.3

2.0

भारत को विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता से सम्भावित हानियाँ

WTO की सदस्यता से भारत को निम्नलिखित हानियाँ हैं-

  1. WTO के अनुसार भारत विदेशी विनियोग पर कोई नियन्त्रण नहीं लगा सकेगा। इसका परिणाम यह होगा कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत में अपने उद्योग स्थापित करने के लिये पूर्णरूप से स्वतन्त्र होंगी।
  2. विदेशी विनियोग की खुली छूट से देश से पूँजी का पलायन होगा और रुपये के मूल्य में गिरावट आने लगेगी।
  3. फेडरेशन ऑफ इण्डियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री (FICCI) के अनुसार विकसित देशों द्वारा बाल श्रम, पर्यावरण, मानवाधिकार और अन्य सामाजिक मुद्दों के आधार पर अनेक तरह की गैर-व्यापारिक रुकावटें उत्पन्न हो जायेंगी।
  4. अल्पविकसित देशों में पेटेण्ट किये हुए कच्चे माल का आयात करना पड़ेगा और निर्यात को नुकसान पहुंचेगा।
  5. भारत के किसानों को नये और उत्तम किस्म के पौधों को लेने के लिए अत्यधिक धन खर्च करना पड़ेगा तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर वे अधिक निर्भर हो जायेंगे।
  6. समझौते के पश्चात् कृषि को प्राप्त होने वाली सब्सिडी अथवा ऐसी सहायता का अभाव हो जायेगा, जिससे गरीब किसानों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

WTO का पाँचवाँ कॉनकुन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन

विकास को WTO के चौथे दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में मुख्य विषय बनाया गया था, परन्तु बाद की घटनाओं से, जिन्हें लेकर कॉनकुन की मंत्रिस्तरीय बैठक हुई, यह स्पष्ट हुआ कि वास्तव में ऐसा नहीं था। विकासशील देशों के लिए महत्त्वपूर्ण सभी विषयों, जैसे ट्रिप्स, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यान्वयन मुद्दे और विशेष एवं विशिष्ट व्यवहार की दोहा में निर्धारित अंतिम समय-सीमा बीत गई।

दोहा घोषणा पत्र के अनुच्छेद 6 में WTO के सदस्य देशों की फार्मास्यूटिकल सेक्टर में अपर्याप्त या नहीं के बराबर उत्पादन क्षमता और विपणन में ट्रिप्स के तहत् अनिवार्य लाइसेंस प्रणाली के प्रभावी प्रयोग से जुड़ी समस्याओं को स्वीकार किया गया है। इस सन्दर्भ में WTO की महापरिषद् ने अपने 30 अगस्त, 2003 के फैसले में ऐसे देशों के लिए अनिवार्य लाइसेंस व्यवस्था के तहत् फार्मास्यूटिक पदार्थों के उत्पादन और निर्यात की अनुमति दे दी है। कैनकुन से पहले अमरीका और यूरोपीय संघ ने कृषि पर वार्ता के तौर-तरीकों के बारे में एक संयुक्त आवेदन दिया जो उनके निजी स्वार्थ पर आधारित था और जिसमें विकासशील देशों की चिन्ताओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था।

इसमें व्यापार बिगाड़ने वाली निर्यात सब्सिडी और घरेलू सहायता की समाप्ति पर सहमत होने की अनिच्छा दिखाई गई थी और कहा गया था कि विकासशील देश शुल्क में काफी कटौती करें, ताकि विकसित देशों को बाजार सुलभ हो सके। इसके कारण विकासशील देशों का एक नया गठबंधन पैदा हुआ जिसे जी-20 कहा जाता है। इसने कैनकुन में कृषि पर बातचीत को दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कॉनकुन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा मंच बनाना था जहाँ दोहा के ‘सभादेश वाले वर्क प्रोग्राम के अन्तर्गत वार्ता की प्रगति की समीक्षा की जानी थी, आवश्यक दिशा- निर्देश दिए जाने थे और सिंगापुर मुद्दों की स्थिति पर विशिष्ट निर्णय किए जाने थे। इस सम्मेलन ने विकसित देशों को यह साबित करने के पर्याप्त अवसर दिए कि वे दोहा कार्ययोजना के विकास पक्ष पर गम्भीरता से काम कर रहे हैं, लेकिन दो अति विवादास्पद मुद्दों यानी कृषि और सिंगापुर मुद्दों पर WTO सदस्यों के महत्त्वाकांक्षा स्तर को लेकर गम्भीर मतभेदों के चलते कॉनकुन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन बहुत जटिल हो गया। सम्मेलन के अध्यक्ष ने 13 सितम्बर, 2003 को मसौदे का जो संशोधित मूल पाठ वितरित किया, वह असंतुलित था और विकासशील देशों के हितों के एकदम खिलाफ था। इसी कारण विकासशील देशों ने इसका जमकर विरोध किया और परिणामस्वरूप मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का घोषणा पत्र पारित नहीं हो सका।

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Pankaja Singh

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