विक्रय प्रबंधन

विक्रय संगठन का अर्थ | विक्रय संगठन की परिभाषा | विक्रय संगठन के उद्देश्य या आवश्यकता | विक्रय संगठन के महत्व | विक्रय संगठन के सिद्धांत

विक्रय संगठन का अर्थ | विक्रय संगठन की परिभाषा | विक्रय संगठन के उद्देश्य या आवश्यकता | विक्रय संगठन के महत्व | विक्रय संगठन के सिद्धांत | Meaning of sales organization in Hindi | Definition of sales organization in Hindi | Purpose or need of sales organization in Hindi | Importance of Sales Organization in Hindi | principles of sales organization in Hindi

विक्रय संगठन का अर्थ एवं परिभाषा

संगठन शब्द के साथ विक्रय शब्द जोड़ने पर ‘विक्रय संगठन’ शब्द का निर्माण हुआ है। अतः संगठन शब्द का अर्थ समझना परम आवश्यक है।

व्यक्तियों के समूह को भीड़ भी कहते हैं तो संगठन भी। किन्तु इनमें अंतर होता है। भीड़ का कोई लक्ष्य या उद्देश्य नहीं होता। संगठन उन व्यक्तियों का समूह होता है जिनका एक क्षणनिश्चित लक्ष्य होता है। समूह के सभी सदस्य मिलकर सामूहिक रूप से उस लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयास करते हैं। ये सभी अपने नेता के नेतृत्व में कार्य करते हैं ताकि दिशा भ्रम न हो सके तथा समन्वित एवं संतुलित रूप से उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, ताकि न्यूनतम लागत पर अधिकतम कुशलता के साथ उद्देश्यों को पूरा किया जा सके। संगठन की परिभाषा अनेक विद्वानों ने की है, कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

डेविड के अनुसार, “संगठन मूलतः व्यक्तियों का समूह है जो एक नेता के निर्देशन में सामान्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु सहयोग प्रदान करता है।”

मूने के शब्दों में, “संगठन सामान्य हितों की पूर्ति के लिए बनाया गया मानवीय समुदाय है।”

मेक्फारलैण्ड के अनुसार, “संगठन विशिष्ट व्यक्तियों का एक समूह है, जो निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कार्य करता है।”

विक्रय संगठन के उद्देश्य या आवश्यकता

विक्रय संगठन का निर्माण कई उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है। कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नानुसार हैं-

  1. विक्रय विभाग के उद्देश्यों को प्राप्त करना।
  2. विक्रय विभाग के लोगों में पारस्परिक सम्बन्ध निर्धारित करना ।
  3. विभाग के कार्यों में समन्वय स्थापित करना।
  4. प्रबंधकीय समय एवं क्षमता का पूर्ण उपयोग करना।
  5. अधिकारों का बंटवारा करना।
  6. कार्यों के दोहराव को रोकना।
  7. आपसी मतभेद समाप्त करना।
  8. अधिकारियों का विकास करना।
  9. कर्मचारियों को अभिप्रेरणा देना।
  10. प्रत्येक विक्रयकर्ता के निरीक्षण की उचित व्यवस्था करना।

विक्रय संगठन के महत्व

विक्रय संगठन की आवश्यकता, महत्व तथा लाभ निम्नानुसार हैं-

  1. उद्देश्यों की प्राप्ति- कई विद्वानों ने ठीक ही लिखा है कि “संगठन व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो किन्हीं सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिलकर प्रयास करता है”। अतएव अच्छे विक्रय संगठन के द्वारा विक्रय विभाग के उद्देश्यों को न्यूनतम लागत पर अधिकतम कुशलता के साथ प्राप्त किया जा सकता है।
  2. विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन- व्यवसाय के विकास के साथ-साथ विक्रय विभाग का कार्य भी बढ़ जाता है। इन बढ़े हुए कार्यों को कोई अकेला नहीं कर सकता है। फलतः इन सभी कार्यों को विभिन्न व्यक्तियों को सौंपना होता है। विक्रय संगठन बनाने के कारण कार्य की प्रकृति का पूर्व निर्धारण किया जा सकता है। अतः प्रत्येक कार्य के लिए दक्ष व्यक्तियों की नियुक्ति करना सरल हो जाता है। फलतः विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन मिलता है।
  3. सम्बन्धों का निर्धारण- विक्रय संगठन के निर्माण से आपसी सम्बन्धों की स्पष्ट व्याख्या की जा सकती है। कौन व्यक्ति, किसके साथ तथा किसके नियंत्रण में कार्य करेगा, इस बात का भली प्रकार निर्धारण हो जाता है। इससे विक्रय संगठन में कार्य करने वाले उच्च अधिकारियों और अधीनस्थ अधिकारियों के बीच सम्बन्धों का तो निर्धारण हो ही जाता है, साथ ही सामान्य स्तर पर कार्य करने वाले अधिकारियों के बीच सम्बन्धों का भी निर्धारण हो जाता है। फलतः प्रत्येक अधिकारी एवं अधीनस्थ अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर कार्य कर पाता है।
  4. समन्वय में सुविधा- टोसडल ने ठीक ही लिखा है कि “संगठन का उद्देश्य इच्छित परिणामों की प्राप्ति के लिए समूह के सदस्यों के प्रयासों में समन्वय स्थापित करना है।” वास्तव में अच्छा विक्रय संगठन सम्पूर्ण विक्रय विभाग के कार्यों में समन्वय स्थापित करने में योगदान देता है। इससे विभिन्न विभागों, उप-विभागों, कर्मचारियों, अधिकारियों आदि सभी के कार्यों में प्रभावपूर्ण समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, इसके माध्यम से व्यक्तिगत एवं संस्थागत उद्देश्यों में भी समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इतना ही नहीं, विक्रय संगठन विक्रय कार्यों तथा अन्य संस्थाओं, बाजारों, ग्राहकों, सरकार आदि के बीच भी समन्वय स्थापित करने में भी सहायक होता है।
  5. कार्यों का पूर्व निर्धारण- विक्रय संगठन का निर्माण करके कार्यों का पूर्व निर्धारण किया जा सकता है। विक्रय विभाग के प्रत्येक कर्मचारी तथा अधिकारी कार्य पहले से ही निश्चित कर देने से यथासम्भव सुव्यवस्थित ढंग से कार्य किया जा सकता है। इससे तात्कालिक रूप से बिना सोचे-समझे निर्णय लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगती है। अतः निर्णय अधिक ठोस हो सकते हैं तथा कार्य दीर्घकालीन आवश्यकता के अनुसार पूरे किये जाते हैं।
  6. अधिकार प्रत्यायोजन में सुविधा- विक्रय संगठन का निर्माण कर लेने से प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारी एवं अधीनस्थ की जानकारी हो जाती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का आसानी से प्रत्यायोजन कर सकता है तथा अधीनस्थों को उनके कार्यों के लिए उत्तरदायी भी ठहरा सकता है।
  7. सभी कार्यों पर पर्याप्त ध्यान- किसी भी संस्था के विस्तार के साथ-साथ मेंविक्रय कार्य एवं उपकार्य भी बढ़ जाते हैं। उनको भी यथासमय पूरा करना होता है। विक्रय संगठन का निर्माण करके प्रत्येक छोटे से छोटे कार्य पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जा सकता है। उन सभी को यथासमय भी पूरा किया जा सकता है।
  8. ग्राहकों के साथ सम्पर्क में सुविधा- यह हम सभी जानते हैं कि ज्यों-ज्यों विक्रय कार्य बढ़ता है तथा कर्मचारी बढ़ते हैं, त्यों-त्यों व्यवसाय के स्वामी या बड़े अधिकारियों का ग्राहकों से प्रत्यक्ष सम्पर्क धीरे-धीरे कम हो जाता है। ऐसे में अच्छे विक्रय संगठन का निर्माण करके ग्राहकों के सम्बन्ध में सभी सूचनायें प्राप्त की जा सकती है। इससे ग्राहकों के साथ निरंतर सम्पर्क बनाए रखा जा सकता है।
  9. अधीनस्थों की क्षमता का उपयोग- अच्छा विक्रय संगठन अधीनस्थों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने की प्रेरणा देता है। एक तो अधिकारों की भावना जागृत की जा सकती है, उनमें अधिक दायित्व की भावना जागृत की जा सकती है, दूसरे इससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। जब उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है तो अधिकारी और अधिक अधिकारों का प्रत्यायोजन करते हैं। इससे अधीनस्थों की कार्यक्षमता का पूर्ण उपयोग किया जा सकता है।

विक्रय संगठन के सिद्धांत

सामान्यतः एक विक्रय संगठन के निर्माण में भी निम्न सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है।

  1. उद्देश्यों का सिद्धांत- संगठन का प्रथम सिद्धांत उद्देश्यों का सिद्धांत है। यह सिद्धांत यह कहता है कि संगठन के प्रत्येक विभाग एवं उपविभाग के उद्देश्य निश्चित होने चाहिए तथा वे उद्देश्य सम्पूर्ण संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति में योगदान देने वाले होने चाहिए। अतः विक्रय संगठन के प्रत्येक विभाग एवं उपविभाग के उद्देश्य भी निश्चित किये जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त विक्रय संगठन के उद्देश्य सम्पूर्ण संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति में भी योगदान देने वाले होने चाहिए।
  2. श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण का सिद्धांत- संगठन का दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत है श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण का सिद्धांत। यह सिद्धांत यह कहता है कि प्रत्येक कार्य को अनेक छोटे-छोटे भागों में बांट देना चाहिए। तत्पश्चात् कार्य के प्रत्येक छोटे भाग को उस व्यक्ति को सौंपना चाहिए, जो उस कार्य में दक्ष हो। इस सिद्धांत के पालन से कार्य अधिक शीघ्र एवं कुशलता के साथ पूरे किये जा सकते हैं।
  3. व्याख्या का सिद्धांत- वैज्ञानिक प्रबंध के जन्मदाता टेलर का कहना है कि “प्रत्येक संगठन में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति स्पष्टतः निर्धारित की जानी चाहिए। विक्रय संगठन में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति, अधिकार, दायित्व, कार्यक्षेत्र आदि को स्पष्ट किया जाना चाहिए”। ऐसा करके आपसी मतभेदों को दूर किया जा सकता है तथा सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
  4. समन्वय का सिद्धांत- मूने तथा रैले के अनुसार, “सभी संगठनों का अन्तिम उद्देश्य सरलता से सुन्दर समन्वय करना है”। अतः विक्रय संगठन के प्रत्येक विभाग तथा कर्मचारियों में समन्वय स्थापित होना आवश्यक है। विक्रय संगठन एवं अन्य विभागों में भी समन्वय होना चाहिए।
  5. आदेश की एकता का सिद्धांत- यह सिद्धांत इस सत्य पर आधारित है कि “एक व्यक्ति एक ही समय में दो अधिकारियों की सेवा नहीं कर सकता है। अतः विक्रय संगठन का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एक व्यक्ति को एक समय में एक अधिकारी से ही आदेश-निर्देश प्राप्त हों। यदि उसे दो अधिकारियों से आदेश प्राप्त होंगे तो एक भी आदेश को ठीक ढंग से पूरा नहीं कर पायेगा।
  6. निर्देश की एकता का सिद्धांत- यह सिद्धांत यह कहता है कि “एक व्यक्ति को एक कार्य के लिए एक ही योजना के अन्तर्गत ही आदेश मिलना चाहिए। विक्रय संगठन का निर्माण करते समय भी इस सिद्धांत का पालन करना चाहिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को एक कार्य के लिए एक ही योजना के अन्तर्गत आदेश निर्देश प्राप्त होने चाहिए।

आदेश की एकता तथा निर्देश की एकता में कई लोग अन्तर नहीं समझ पाते हैं। फेयोल ने इन दोनों का अन्तर स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “संगठन के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए निर्देश की एकता महत्त्वपूर्ण है जबकि कर्मचारियों से कुशलतापूर्वक कार्य करवाने के लिए आदेश की एकता आवश्यक है।”

  1. नियंत्रण के विस्तार का सिद्धांत- नियंत्रण के विस्तार से आशय कर्मचारियों की उस संख्या से है, जिनका प्रबंधक द्वारा सफलतापूर्वक नियंत्रण किया जा सके। इस सिद्धांत के प्रतिपादक ग्रेकुनाज हैं। उन्होंने कहा है कि “कोई भी अधिकारी प्रत्यक्ष रूप से पांच और अधिक से अधिक छः अधीनस्थों से अधिक का निरीक्षण नहीं कर सकता”। अतः विक्रय संगठन की संरचना करते समय भी नियंत्रण का विस्तार उचित ही रखना चाहिए।
  2. सौपानिकता का सिद्धांत- सौपानिकता या स्केलर सिद्धांत यह कहता है कि अधिकार एवं दायित्व उच्च अधिकारियों से अधीनस्थों की ओर सीधी रेखा में क्रमशः प्रवाहित करकिये जाने चाहिए। फेयोल के अनुसार, “स्केलर शृंखला अधिकारों की वह शृंखला है जो उच्चतम अधिकारी से निम्नतम स्तर के अधीनस्थ तक चलती है”।
  3. अधिकार एवं दायित्व का सिद्धांत- इस सिद्धांत के अनुसार, “अधिकार एवं दायित्व साथ-साथ दिये जाने चाहिए”। दूसरे शब्दों में, जब भी किसी को अधिकार दिये जायें तो उसके दायित्व भी स्वतः उत्पन्न होने चाहिए। यदि किसी अधिकारी को कार्य करने के लिए कुछ अधिकार दे दिए गए हैं तो उन अधिकारों का उपयोग करने के लिए उसे उत्तरदायी भी ठहराया जाना चाहिए।

यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि अधिकार दायित्वों के अनुपात में ही दिए जाने चाहिए।

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Pankaja Singh

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