विक्रय प्रबंधन

विक्रय प्रबंध का अर्थ | विक्रय प्रबंध की परिभाषा | विक्रय प्रबंध का महत्त्व | विक्रय प्रबंध के कार्य

विक्रय प्रबंध का अर्थ | विक्रय प्रबंध की परिभाषा | विक्रय प्रबंध का महत्त्व | विक्रय प्रबंध के कार्य | Meaning of sales management in Hindi | Definition of Sales Management in Hindi | Importance of sales management sales management tasks in Hindi

विक्रय प्रबंध का अर्थ एवं परिभाषा

“विक्रय प्रबंध’ शब्द की परिभाषा समय एवं परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ बदल गई है। एक युग था जबकि विक्रय कार्य जटिल नहीं था, उत्पादक से उपभोक्ता तक माल पहुंचाने के लिये किये जाने वाले सभी कार्यों या सम्पूर्ण विपणन कार्यों को ही ‘विक्रय प्रबंध’ के क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता था। परन्तु जब विक्रय कार्य जटिल हो गया तो वस्तुओं के विक्रय के लिए अनेक कार्य करने आवश्यक हो गये। उन सभी विस्तृत कार्यों में “व्यक्तिगत विक्रय सम्बन्धी” कार्यों के प्रबंध को विक्रय प्रबंध के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाने लगा। अतः हम सरल शब्दों में कह सकते हैं कि ‘विक्रय प्रबंध’ संस्था के सम्पूर्ण प्रबंध का वह भाग है जो व्यक्तिगत विक्रय के प्रबंध से सम्बंधित है। विक्रय प्रबंध के विस्तृत स्वरूप को समझने के लिए कुछ परिभाषायें निम्नलिखित हैं-

अमरीकी विपणन परिषद् के अनुसार- विक्रय प्रबंध से तात्पर्य वैयक्तिक विक्रय के नियोजन, निर्देशन एवं नियंत्रण से है। जिसमें भर्ती करने, चुनाव करने, सुसज्जित करने, कार्य निर्धारित करने, अभिप्रेरित करने के कार्य भी सम्मिलित हैं क्योंकि ये सभी कार्य व्यक्तिगत विक्रयकर्ताओं पर लागू होते हैं।

हेम्पटन तथा जबीन के मतानुसार- विक्रय प्रबंध’ प्राथमिक रूप से व्यक्तियों का निर्देशन है जिसमें प्रबंध के सभी कार्य, संगठन, नियंत्रण, भर्ती, प्रशिक्षण, निरीक्षण तथा अभिप्रेरण सम्मिलित हैं।

इन परिभाषाओं के अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि विक्रय प्रबंध संस्थाओं के कुल प्रबंध का वह भाग है जो व्यक्तिगत विक्रय के नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण तथा नियंत्रण से सम्बन्धित है, जिसमें विक्रयकर्ताओं की भर्ती, चुनाव, प्रशिक्षण, कार्य निर्धारण, पारिश्रमिक भुगतान, निरीक्षण, नियंत्रण आदि क्रियाएँ भी सम्मिलित हैं।

विक्रय प्रबंध का महत्त्व

सम्पूर्ण संस्था की सफलता विक्रय पर निर्भर करती है। विक्रय व्यवसाय का जीव रक्त है। यही सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को भी गतिशील बनाये रखने में योगदान देता है। विक्रय प्रबंध व्यवसायी के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह तो ग्राहकों, समाज एवं राष्ट्र सभी के लिए लाभदायी है। संक्षेप में विक्रय प्रबंध का महत्त्व निम्नानुसार है-

  1. प्रभावकारी विक्रय नियोजन- प्रभावशाली विक्रय प्रबंध विक्रय विभाग के लिए अत्यन्त ही प्रभावकारी एवं व्यावहारिक नियोजन करता है। इससे विक्रय विभाग सदैव ही लक्ष्यों की प्राप्ति में क्रमशः आगे बढ़ता रहता है।

कुशल विक्रय प्रबंध नियोजन को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक बजट तैयार करता है तथा विक्रय नीतियाँ निर्धारित करता है। इन सब की सहायता से विक्रय विभाग के नियोजन को क्रियान्वित किया जा सकता है।

  1. विक्रय संगठन का निर्माण- विक्रय प्रबंध ही विक्रय विभाग के लिए प्रभावशाली संगठन संरचना का निर्माण कर सकता है। यह विक्रय विभाग के लोगों में उचित आधार पर कार्यो, दायित्वों एवं अधिकारों का बंटवारा करता है। यही विक्रय विभाग के लोगों मेंक्षऔपचारिक एवं अनौपचारिक सम्बन्धों की स्थापना करता है। इसी प्रकार सभी लोग मिलकर विक्रय विभाग लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास कर पाते हैं। कुशल संगठन के अभाव में लक्ष्यों को प्राप्त करना सम्भव नहीं होता है।
  2. समन्वय की स्थापना- प्रभावशाली विक्रय प्रबंध इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह विक्रय विभाग में आन्तरिक एवं बाह्य समन्वय स्थापित करता है। यह विभाग के अन्तर्गत कार्य करने वाले विभिन्न कर्मचारियों, अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इतना ही नहीं, विक्रय प्रबंध दूसरे विभागों, उच्च अधिकारियों से भी समन्वय स्थापित करता है।
  3. कुशल विक्रय दल का निर्माण- विक्रय प्रबंध का महत्व इसलिए भी है कि वह संस्था के लिए कुशल विक्रय दल का निर्माण भी करता है। यह विक्रयकर्ताओं की भर्ती करता है, उनका चुनाव करता है तथा उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करता है।
  4. विक्रयकर्त्ताओं की अभिप्रेरणा- कुशल विक्रय प्रबंध ही अपने विक्रयकर्त्ताओं की वास्तविक समस्याओं का अध्ययन करके उन्हें अधिकाधिक परिश्रम करने के लिए तैयार करता है। प्रभावशाली विक्रय प्रबंध अभिप्रेरण की विभिन्न विधियों का इस प्रकार उपयोग करता है ताकि विक्रयकर्ताओं को उचित ढंग से अभिप्रेरित किया जा सके।
  5. प्रभावकारी निरीक्षण एवं नियंत्रण- कुशल विक्रय प्रबंध अपने विभाग के कर्मचारियों तथा क्षेत्रीय विक्रयकर्ताओं का भी अच्छी तरह से निरीक्षण एवं नियंत्रण कर सकता है। कुशल विक्रय प्रबंध निरीक्षण एवं प्रबंध की ऐसी व्यावहारिक विधियों की खोज करता है जिससे उद्देश्यों के अनुसार भी कार्य पूरा करवा लिया जाता है तथा कर्मचारियों को कष्ट भी नहीं उठाना पड़ता है।
  6. प्रतिस्पर्द्धा में विजय – आधुनिक युग प्रतिस्पर्द्धात्मक हो गया है। इस युग में सफलतापूर्वक विक्रय करने के लिए अत्यन्त कुशल विक्रय प्रबंध की आवश्यकता पड़ती है। कुशल विक्रय प्रबंध ही प्रभावकारी विक्रय व्यूह रचना का निर्माण करके प्रतिस्पर्द्धा में विजय प्राप्त कर सकता है।
  7. ग्राहकों की संतुष्टि- प्रभावशाली विक्रय प्रबंध ग्राहकों की संतुष्टि को सर्वोपरि मानता है। फलतः ग्राहकों को अच्छे विक्रयकर्ताओं की सेवाएँ मिलती हैं। इससे वे अपनी आवश्यकताओं को भली प्रकार पूरी कर पाते हैं।
  8. अधिक विक्रय- प्रभावशाली विक्रय प्रबंध जब कुशल विक्रयकर्त्ताओं को तैयार करता है, ग्राहकों की संतुष्टि पर ध्यान देता है। सही प्रकार से विक्रय कार्य का नियोजन एवं नियंत्रण करता है तो विक्रय वृद्धि अवश्यम्भावी है।
  9. अधिक लाभ- अधिक विक्रय के परिणामस्वरूप ही प्रति इकाई खर्चों में कमी आती है। इससे अधिक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

विक्रय प्रबंध के कार्य

विक्रय प्रबंध के अनेक कार्य है। उन सभी कार्यों को हम दो वर्गों में बांटकर अकीजिए कर सकते हैं:

  1. प्रबंधकीय या प्राथमिक कार्य तथा
  2. परिचालन या संचालकीय कार्य

प्रबंधकीय या प्राथमिक कार्य

विक्रय प्रबंध को भी अन्य प्रबंधकों की ही तरह कुछ प्राथमिक कार्य करने होते हैं, जो निम्नानुसार हैं—

  1. नियोजन करना- प्रत्येक प्रबंधक को अपने कार्यों का प्रारम्भ नियोजन से ही करना होता है। विक्रय प्रबंधक का कार्य भी नियोजन से प्रारम्भ होता है। नियोजन वह कार्य है जिसके अन्तर्गत यह तय किया जाता है कि किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कौन सा कार्य कब, किस समय, किस स्थान तथा किसके द्वारा किया जाये।

विक्रय प्रबंधक भी अपने विभाग के कार्यों का नियोजन करता है। इसके साथ ही विक्रय प्रबंधक को विक्रय नियोजन के आधारभूत तत्व भी निर्धारित करने होते हैं, जिनकी सहायता से विक्रय नियोजन भली प्रकार पूरा किया जा सके। विक्रय प्रबंध चूंकि विपणन प्रबंधक के नीचे कार्य करता है। अतः विक्रय नियोजन उसके निर्देशन में ही तैयार करना चाहिए।

  1. संगठन करना- विक्रय प्रबंधक का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य विक्रय विभाग का संगठन करना है। संगठन का तात्पर्य कार्यों, कर्मचारियों तथा भौतिक साधनों के बीच आपसी सम्बन्धों का निर्धारण करना है।

इस कार्य के द्वारा प्रबंधक अपने विभाग के विभिन्न कार्यों को ज्ञात करता है तथा उन्हें उचित समूह में विभाजित करता है। तत्पश्चात् उन कार्यों को विभिन्न विक्रय कर्मचारियों तथा विक्रयकर्ताओं में उनकी योग्यताओं के अनुरूप बांट देता है। इसी के साथ उन्हें आवश्यक अधिकार व दायित्व भी देता है तथा आवश्यक साधन भी उपलब्ध कराता है। फलतः विक्रय विभाग के सभी नियोजित कार्य आसानी से पूरे किये जा सकते हैं।

  1. समन्वय स्थापित करना-विक्रय प्रबंध का एक महत्वपूर्ण कार्य समन्वय स्थापित करने का भी होता है। विक्रय प्रबंध को सर्वप्रथम अपने विभाग का संस्था के विपणन विभाग से समन्वय करना पड़ता है। तत्पश्चात् उसे अपनी संस्था के उद्देश्यों तथा अन्य विभागों से समन्वय स्थापित करना होता है।
  2. अभिप्रेरणा — विक्रय प्रबंध का एक प्रमुख कार्य अभिप्रेरणा देने का भी है। वह अपने विभाग के विक्रय कर्मचारियों तथा विक्रयकर्त्ताओं को अभिप्रेरित करने के लिए विभिन्न प्रयास करता है।

विक्रयकर्त्ता को अभिप्रेरित करना एक कठिन कार्य है। इसका कारण यह है कि विक्रय कार्य कोई सरल कार्य नहीं है। यह थकाने वाला कार्य तो है ही, साथ ही यह उबाऊ कार्य भी है। इस कार्य में सदैव सफलता मिलना सम्भव नहीं होता है। इसके अतिरिक्त विक्रयकर्त्ता अपने घर, बाल-बच्चों से जब दूर रहकर कार्य करते हैं तो उनको मानसिक कष्ट भी बहुत होता है। ऊपर से यदि असंतुष्ट ग्राहक से भेंट हो जाये तो उसे सैकड़ों बातें, उलाहने, यहाँ तक कि असम्मानजनक शब्द भी सुनने को मिल सकते हैं। ऐसी स्थिति में हम अनुमान लगा सकते हैं कि विक्रयकर्त्ताओं को अभिप्रेरित कितना कठिन कार्य है।

  1. नियंत्रण — विक्रय प्रबंध का एक प्रमुख कार्य विक्रय नियंत्रण स्थापित करना है। विक्रय नियंत्रण का तात्पर्य विक्रय कार्यों के नियंत्रण से है।

इस हेतु प्रत्येक विक्रयकर्त्ता का कार्य निर्धारित करना चाहिए, विक्रय का कोटा निर्धारित करना चाहिए तथा विक्रय विभाग के खर्चों का बजट बनाना चाहिए। तत्पश्चात् विक्रयकर्त्ताओं के कार्यों की रिपोर्ट प्राप्त करनी चाहिए, तथा खर्चों का बजट बनाना चाहिए। यदि कोटा तथा वास्तविक विक्रय या बजट में रखे गये खर्चों तथा वास्तविक खर्चों में कोई अन्तर है तो कारण ज्ञात करने चाहिए। अन्ततोगत्वा, यदि विक्रय कोटा से कम हुआ हो या खर्चे अधिक हो रहे हों तो उनको कोटा या बजट के अनुरूप लाने का प्रयास करना चाहिए।

परिचालन/संचालकीय कार्य

प्रत्येक विक्रय प्रबंधक को अपने विभाग का संचालन करने के लिए भी अनेक कार्य करने पड़ते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नानुसार हैं-

  1. कर्मचारियों को भर्ती करना- प्रत्येक विक्रय विभाग में कर्मचारियों कीक्षआवश्यकता पड़ती है। कभी विक्रय विभाग के लिपिकीय कार्यों को करने के लिए तो कभी विक्रय कार्य करने के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती ही रहती है। कभी-कभी पदोन्नति के कारण भी पुराने कर्मचारियों के स्थान पर नये व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ जाती है।

ऐसे में विक्रय प्रबंधक को कर्मचारियों की भर्ती करनी ही होती है, इस हेतु वह नये कर्मचारियों के लिए गुण, योग्यताओं आदि का निर्धारण करता है। वह भर्ती के स्रोत को भी निर्धारित करता है। भर्ती के अनेक स्रोत हैं, जैसे—विज्ञापन, संस्था, स्कूल, कॉलेज आदि।

  1. चुनाव- भर्ती के विभिन्न स्रोतों से जब विभिन्न व्यक्तियों के नाम, पते आदि ज्ञात हो जाते हैं तो विक्रय प्रबंध उनमें से अपनी संस्था के लिए योग्य व्यक्तियों का चुनाव करने का कार्य करता है। इसके लिए वह अपने उच्च अधिकारियों की सम्मत्ति एवं सलाह भी लेता है। कर्मचारियों के चुनाव का कार्य तो कोई भी कर सकता है लेकिन उपयुक्त एवं योग्य कर्मचारियों का चुनाव करना कठिन कार्य है। अतः उसे इसमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। चुनाव का सम्पूर्ण कार्य एक निश्चित विधि से करना चाहिए ताकि प्रत्येक स्तर पर अयोग्य व्यक्ति को अलग किया जा सके।
  2. प्रशिक्षण- विक्रय प्रबंधक का एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य विक्रयकर्त्ताओं/विक्रय कर्मचारियों के प्रशिक्षण करने की व्यवस्था का भी है।

प्रशिक्षण ‘कार्य पर’ भी दिया जा सकता है तो कार्य पर लगाने से पूर्व अलग भी दिया जा सकता है। इतना ही नहीं प्रशिक्षण 5-10 दिनों से लेकर 5-10 सप्ताह या अधिक लम्बी अवधि का भी हो सकता है। अतः विक्रय प्रबंधक सर्वप्रथम प्रशिक्षण की आवश्यकता एवं अवधि को निर्धारित करता है। तत्पश्चात् प्रशिक्षण की विषयवस्तु को निर्धारित करता है। प्रशिक्षण एक बार देने से ही कार्य नहीं चल जाता है। अतः समय-समय पर पुनः प्रवर्तन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी आयोजित करना चाहिए।

  1. सुसज्जित करना- प्रशिक्षण के बाद विक्रयकर्त्ताओं को विक्रय क्षेत्र में जाने के लिए सुसज्जित किया जाता है। इस हेतु अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों अर्थात् नमूने, केटलॉग, मूल्य सूची, वीडियो प्लेयर, डायग्राम आदि की आवश्यकता पड़ती है। विक्रय प्रबंधक अपने विक्रयकर्ता के लिए इनमें से आवश्यक उपकरण एवं सामग्री तय करता है तथा उसे उपलब्ध कराता है।
  2. विक्रय कार्य निर्धारित करना- विक्रयकर्ता जब विक्रय कार्य के लिए तैयार कर दिया जाता है तब उसका विक्रय कार्य भी निर्धारित करके बता दिया जाता है। विक्रय प्रबंधक उसे उसका विक्रय का कोटा बता देता है। वह उसे विक्रय की मात्रा के अतिरिक्त कुछ अन्य कार्य भी बताता है, जैसे-पुराने ग्राहकों से भेंट करना, भुगतान के लिए स्मरण करवाना, बाजार सूचनाएं एकत्र करना, डिटेलिंग करना आदि।
  3. कार्यक्षेत्र या मार्ग निर्धारित करना- विक्रयकर्ताओं का विक्रय कार्य निर्धारित करने के साथ ही विक्रय मार्ग भी विक्रय प्रबंधक निर्धारित करता है। इससे विक्रयकर्ताओं का कार्यक्षेत्र या विक्रय प्रदेश निश्चित हो जाता है। मार्ग निश्चित होने से विक्रय कार्य में दोहराव नहीं आता है तथा विक्रयकर्ता विक्रय क्षेत्र में यथासम्भव पहुँच जाते हैं।
  4. निरीक्षण करना- विक्रय प्रबंधक का एक कार्य विक्रयकर्त्ताओं का निरीक्षण करना भी है। यदि विक्रयकर्ताओं की संख्या अधिक हो जाती है तो वह निरीक्षकों के माध्यम से विक्रयकर्ताओं के कार्यों का निरीक्षण करता है।
  5. संचार व्यवस्था स्थापित करना- विक्रय प्रबंधक का कार्य कुशल संचार व्यवस्था स्थापित करना भी है। वह अपने विभाग के सभी उपविभागों, विक्रय निरीक्षकों, विक्रयकर्ताओं आदि के बीच द्विमार्गीय संदेशवाहन की व्यवस्था करता है। वह अन्य समकक्ष विभागों यथा विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन आदि विभागों के मध्य भी संचार व्यवस्था स्थापित करता है। वह अपने उच्च अधिकारियों यथा विपणन प्रबंधक से भी प्रभावशाली संचार व्यवस्था बनाये रखता है ताकि विक्रय विभाग की प्रगति एवं कार्यों की रिपोर्ट दे सके तथा समय-समय पर आवश्यक निर्देश प्राप्त कर सके।

इसके अतिरिक्त वह अपने ग्राहकों, मध्यस्थों, प्रतिस्पर्द्धियों आदि से भी निरंतर संचार व्यवस्था स्थापित करता है। इससे ग्राहकों की रुचि, समस्याओं, मध्यस्थों के विचारों तथा प्रतिस्पर्द्धियों की गतिविधियों की जानकारी निरंतर रूप से होती रहती है।

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Pankaja Singh

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