विज्ञापन प्रबंधन

विज्ञापन के विभिन्न माध्यम | विज्ञापन के विभिन्न प्रकार | डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन के आवश्यक तत्व

विज्ञापन के विभिन्न माध्यम | विज्ञापन के विभिन्न प्रकार | डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन के आवश्यक तत्व | Different mediums of advertisement in Hindi | Advertisement Different in Hindi | Content of direct advertising by mail in Hindi

विज्ञापन के विभिन्न माध्यम अथवा प्रकार

(Different forms or types of Advertising Media)

विज्ञापन करने के लिए विज्ञापन के साधनों अथवा माध्यमों की जानकारी होना आवश्यक है क्योंकि सही प्रकार के माध्यम के चुनाव से उसको अपने व्यापार की प्रसिद्धि में पूर्ण सफलता मिल सकती है। यदि विज्ञापन वस्तु के उद्देश्य के लिए उपयुक्त नहीं है तो चाहे देखने में वह कितना ठीक हो, लक्ष्य के प्रतिकूल रहेगा और इस प्रकार से जो कुछ भी उस पर व्यय किया जायेगा, वह महँगा तथा अनुपयुक्त ही सिद्ध होगा। आजकल विज्ञापन के विभिन्न साधन प्रचलित हैं जिनका वर्गीकरण निम्न श्रेणियों में किया जा सकता है:

विज्ञापन के माध्यम

(1) प्रेस अथवा समाचार- पत्रीय विज्ञापन

(अ) समाचार-पत्रीय विज्ञापन

(1) वर्गीकृत विज्ञापन।

(2) अवर्गीकृत विज्ञापन।

(ब) पत्रिका विज्ञापन।

(II) बाह्य विज्ञापन

(1) पोस्टर्स।

(2) विज्ञापन बोर्ड।

(3) सैण्डविच बोर्ड विज्ञापन।

(4) बिजली द्वारा सजावट।

(5) बस, ट्रेन, टाम विज्ञापन।

(III) डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन

(1) विक्रय पत्र ।

(2) सूची-पत्र।

(3) पुस्तिकाएँ।

(4) डायरियाँ ।

(5) फोल्डर्स।

(6) वस्तुओं के चित्र।

(IV) क्रय बिन्दु विज्ञापन।

(V) मनोरंजन एवं अन्य विज्ञापन।

(I) प्रेस अथवा समाचार पत्रीय विज्ञापन

(Press Advertising)

प्रेस अथवा समाचार पत्रीय विज्ञापन से आशय वस्तुओं और सेवाओं के बारे में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं अथवा जर्नल्स (Journals) में जानकारी प्रकाशित कराने से है जिसे सैकड़ों व्यक्तियों द्वारा पढ़ा जाता है। आधुनिक युग में प्रेस विज्ञापन, विज्ञापन का सबसे अधिक प्रचलित, लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण साधन है क्योंकि इसके द्वारा सर्वसाधारण (जनता) को ज्ञान हो जाता है। इस प्रकार का विज्ञापन इस धारणा पर आधारित है कि व्यक्तियों को समाचार पत्र पढ़ने की रुचि है तथा वे पढ़े-लिखे हैं। एक सभ्य देश में प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति किसी न किसी प्रकार का समाचार पत्र अवश्य पढ़ता है।

(II) वाह्य विज्ञापन अथवा दीवारों पर किये जाने वाले विज्ञापन

(Out Door or Mural Advertising)

दीवारों के विज्ञापन को बाह्य विज्ञापन भी कहते हैं। विज्ञापन का यह साधन बहुत ही प्राचीन है। जब मुद्रण कला नहीं थी और न विज्ञापन के अर्वाचीन साधन ही थे, रोम एवं इंग्लैण्ड में उत्पादक एवं व्यापारी अपने कार्यालय तथा दुकानों के दरवाजों पर व्यापार बोर्ड लगाते थे जिसमें वे कौन-सी वस्तु का व्यापार करते थे, उल्लेख रहता था। श्री हिंघम (Hingham) के अनुसार, “इस बोर्ड के लगाने की पद्धति से ही क्रमशः आधुनिक ‘दीवार पर लगाये जाने वाले विज्ञापनों तथा इश्तहारों के चिपकाने की कल्पना आई।” इस पद्धति को ‘बाह्य पद्धति’ अथवा ‘दीवारों का विज्ञापन’ कहते हैं। मूरल का अर्थ ‘दीवार सम्बन्धी’ है। बाह्य विज्ञापन के अन्तर्गत केवल दीवार पर लगाये जाने वाले विज्ञापन ही सम्मिलित नहीं किये जाते हैं बल्कि निम्नलिखित को भी इस श्रेणी में सम्मिलित करते हैं-इश्तहार चिपकाना, बिजली द्वारा सजावट, बस, ट्रेन तथा ट्राम के विज्ञापन, गलियों तथा सड़कों के विज्ञापन, बोर्ड, सैण्डविच बोर्ड विज्ञापन एवं विशिष्ट वेश-भूषा आदि।

बाह्य विज्ञापन सदैव तार्किक (Argumentative) नहीं होते हैं बल्कि वे सुझावात्मक (Suggestive) होते हैं। यह उन वस्तुओं की प्रसिद्धि के लिए उपयोग में लाये जाते हैं जो जन- साधारण के उपयोग की होती हैं, जैसे—दवाइयों, भोज्य वस्तुओं, साबुन, बीड़ी-सिगरेट, नाच- गान कार्यक्रम, सरकस, सिनेमा, जूते, कपड़े, खेल-कूद, लेखन-सामग्री तथा अन्य घरेलू सामान आदि का बड़े पैमाने पर प्रचार किया जाता है।

बाह्य विज्ञापन के विभिन्न प्रारूप

(Forms of out-door or Mural Advertising)

(1) पोस्टर्स (Posters)- पोस्टर्स से हमारा तात्पर्य विज्ञापन का संदेश रखने वाले ऐसे छपे हुए कागजों, कार्ड बोर्डों तथा धातु या लकड़ी की प्लेटों से होता है जो चौराहों, रेलवे स्टेशन, सड़क एवं गलियों के किनारे तथा दुकानों के बाहर एवं अन्दर लगे रहते हैं। पोस्टर काफी बड़े तथा चिताकर्षक होने चाहिए जिससे कि राहगीरों का ध्यान स्वभावतः ही उनकी ओर आकर्षित हो जाय। उनका निर्माण अच्छे, दक्ष एवं सुयोग्य बाल कलाकार से कराना  चाहिए। कलाकार को पोस्टर इस ढंग से बनाना चाहिए कि देखते ही सब बात समझ में आ जाय और उसको मौखिक रूप से समझाने की आवश्यकता न रहे। पोस्टर उत्तम किस्म के कागज पर अच्छी रंगीन स्याही से छपवाना चाहिए। पोस्टरों को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए अन्यथा उनमें आकर्षण शक्ति न रहेगी। पोस्टर लगाते समय सदैव ऐसा स्थान चुनना चाहिए जहाँ से अधिक राहगीर गुजरते हों।

(2) विज्ञापन बोर्ड (Advertisement Board) —बड़े-बड़े शहरों के चौराहों में एवं उद्योगों के पास विज्ञापन बोर्ड लगाये जाते हैं, जैसे-कानपुर में फूल बाग पर ‘प्लेयर्स प्लीज सिगरेट’ का बोर्ड, ग्वालियर में फूल बाग के निकट ‘ग्वालियर रेयन’, लखनऊ में चार बाग स्टेशन के बाहर ‘पार्ले जी’ के विज्ञापन बोर्ड लगे हुए हैं। ऐसे बोर्ड विशेष स्थान पर जहाँ आवागमन अधिक हो और अधिकाधिक व्यक्तियों की दृष्टि में आ सकें, लगाये जाते हैं। कभी- कभी ऐसे बोर्ड सड़कों के किनारे मकानों की छतों पर लगाये जाते हैं। ये बोर्ड जनता की स्मरण शक्ति विज्ञापित वस्तु के बारे में सदैव ताजा रखते हैं। इससे विज्ञापित वस्तु के प्रति ग्राहक का विश्वास जम जाता है और वस्तु के अच्छा होने पर वे उसके स्थायी ग्राहक बन जाते हैं।

(3) बिजली द्वारा सजावट (Electric Display) — रात्रि में विद्युत प्रकाश में चमकते हुए रंगीन अक्षरों द्वारा राहगीरों को आकर्षित करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। चमकते हुए रंगीन अक्षरों द्वारा मन अनायास ही आकर्षित हो जाता है। ऐसे विज्ञापन बहुधा उच्च अट्टालिकाओं या बहुत ऊंची दीवारों पर लगाये जाते हैं। इन विज्ञापनों में बहुत कम शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, संक्षिप्त रूप से वस्तु का नाम, निर्माता या संस्था का नाम लिखना पर्याप्त है। ऐसे विज्ञापनों में कई प्रकार के रंगों के प्रकाश का प्रयोग किया जाता है। लाल, नीला, हरा तथा आसमानी रंग मनोहर प्रतीत होते हैं।

(4) बस तथा ट्रेन में विज्ञापन (Bus and Train Advertising or Conveyance Advertising)– यातायात के इन साधनों पर विज्ञापन के बोर्ड लगाये जाते हैं। इसके अन्दर भी कुछ स्थान विज्ञापन के लिए निश्चित रहता है। इसका कारण यह है कि आजकल बस तथा ट्रेन यातायात के अत्यन्त गतिशील साधन हैं।

(5) सैण्डविच बोर्ड विज्ञापन (Sandwich Board Advertising) – इस पद्धति के अन्तर्गत किसी एक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के चारों ओर पट्ठे या बोर्डों के विज्ञापन लिखकर एक पंक्ति में परेड कराते हुए निकाला जाता है। इनकी वेश-भूषा भी चित्रित होती है। इस प्रकार के विज्ञापनों का उदाहरण ‘रेड एण्ड व्हाइट सिगरेट’ या ‘बन्दर छाप दन्त मंजन’ अथवा ‘लंगूर छाप बीड़ी’ वाले हैं। यह पद्धति या नाटक के विज्ञापन में अधिक सहायक होती है। तथा जनता का मनोरंजन करती है।

(6) स्टीकर विज्ञापन (Sticker Advertising)- भारत में इस प्रकार के विज्ञापन का शुभारम्भ अभी हाल ही में एयर इण्डिया ने किया है। एयर इण्डिया ने अन्तर्राष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी आनंद अमृतराज तथा विजय अमृतराज से एक अनुबंध किया है जिसके अन्तर्गत वे जहाँ भी खेलेंगे, एयर इण्डिया का प्रचार करेंगे। मैचों के दौरान उनकी टी शर्टों पर एयर इण्डिया अंकित रहेगा। इसी प्रकार उनके रैकेट, बैग, अटैची, जूते, तौलिये आदि पर भी एयर इण्डिया के स्टीकर लगे रहेंगे। इसके बदले में एयर इण्डिया उन्हें अपने विमानों से निःशुल्क यात्रा की सुविधाएँ प्रदान करती है। स्वीडन के बजोर्न बोर्ग को इसी प्रकार के विज्ञापनों से प्रति वर्ष 6 लाख पौण्ड की आय होती है।

(7) अप्रमापित चिन्ह (Non-standard Signs) — अप्रमापित चिह्न विज्ञापन से आशय ऐसे बाहरी विज्ञापनों से है जिनका उपयोग मध्यस्थों अथवा विक्रेताओं द्वारा विज्ञापित वस्तुओं पर किया जाता है। यह चिन्ह इनके निजी होते हैं जिनका उपयोग वस्तुओं के विज्ञापन करते हैं। परिमाणस्वरूप उनके क्षेत्र के लोग उन्हीं वस्तुओं का क्रय करते हैं जिन पर ये चिन्ह लगे रहते हैं।

(8) विविध बाह्य विज्ञापन (Miscellaneous Outdoor Advertising)- (i) गुब्बारों का विज्ञापन करना, (ii) आकाश लेखन• विज्ञापन, (iii) पेंसिल एवं डायरी पर विज्ञापन, (iv) दियासलाई की डिब्बी पर उसके दूसरी ओर रिक्त स्थान पर विज्ञापन आदि।

(III) डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन

(Direct Mail-order Advertising)

अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition)

डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन से हमारा आशय ऐसे विज्ञापन से है जिसके द्वारा विज्ञापनदाता कुछ उपयुक्त लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उनके पास स्थायी रूप से छपे हुए लिखित संदेश भेजता है। इस प्रकार इसमें सामूहिक रूप से आकर्षित करने की अपेक्षा कुछ लोगों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया जाता है।

रिचर्ड मैसनर के अनुसार, “प्रत्यक्ष डाक विज्ञापन प्रचार के संदेश को, जो स्थायी रूप में छपा हुआ, लिखित अथवा प्राविधिक हो, नियंत्रित वितरण द्वारा सीधे चुने हुए व्यक्तियों के पास पहुँचाने का साधन है।” जे. डब्ल्यू. कैसिल्स के अनुसार, “डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन के अन्तर्गत पत्र-पेटी (Letter-box) का प्रयोग करके सही व्यक्तियों को सही वस्तुओं के बारे में सही समय पर तथा सही तरीके से सूचित किया जाता है।” नाइस्ट्रोम (Nystrom) के अनुसार, “डाक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से सम्भावित ग्राहकों को विज्ञापन सामग्री भेजना डाक द्वारा प्रत्यक्ष करविज्ञापन कहलाता है।” मेसन एवं रथ (Mason and Rath) के अनुसार, “सभी प्रकार की डाक, जो एक विज्ञापक से सम्भावित क्रेताओं के पास भेजी जाती है, डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन कहलाती है।”

डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन के आवश्यक तत्व (Elements)

श्री कैसिल्स के कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन के निम्न आधारभूत तत्व हैं—(1) सही व्यक्ति (The Right People); (2) सही वस्तुएँ (The Right Goods); (3) सही समय (The Right Time); (4) सही तरीका (The Right Way)।

उद्देश्य तथा उपयुक्तता (Objectives and Suitability)

इसका उद्देश्य ग्राहकों के ऑर्डर डाक द्वारा माँगना है, प्रत्यक्ष ग्राहक को दुकान पर आने का आमंत्रण देना नहीं है। इस विज्ञापन द्वारा सूची-पत्र, छोटी-छोटी पुस्तिकाएं, गश्ती चिट्ठियाँ आदि डाक द्वारा ग्राहकों को भेजे जाते हैं। इसका प्रयोग एक स्थान पर तथा सुदूर देशों में ही किया जा सकता है। यह विज्ञापन सर्वसाधारण जनता के लिए नहीं वरन् कुछ चुने हुए व्यक्तियों के लिए ही उपयुक्त है। जिन व्यक्तियों से प्रत्यक्ष डाक द्वारा सम्पर्क बढ़ाना हो, उनकी एक सूची बना ली जाती है। फिर इन्हीं व्यक्तियों को सीधे वस्तुओं के विवरण-पत्र, कुछ समय बाद मूल्य पुस्तक और फिर गश्ती-पत्र आदि भेजते हैं। इस प्रकार ग्राहक को डाक द्वारा ही वस्तु का बोध कराया जाता है और विश्वास दिलाया जाता है कि वस्तु उनकी मन-पसंद की होनी अन्यथा निश्चित अवधि में वापस की जा सकती है। आज डाकघरों की संख्या में वृद्धि होने तथा अन्य सुविधाएँ प्राप्त होने के कारण यह पद्धति अधिक भावपूर्ण एवं महत्वशाली हो गई है। भारत में यह पद्धति काफी प्रचलन में है।

(IV) क्रय बिन्दु विपन

(Purchase Point Advertising)

क्रय बिन्दु विज्ञापन से आशय ऐसे विज्ञापन से है जो व्यापार गृह के क्रय-विक्रय स्थान पर ही ग्राहक को आकर्षित करने एवं उसे क्रय करने हेतु प्रेरित करने के उद्देश्य से किया जाता है। इस प्रकार का विज्ञापन सामान्यतः फुटकर व्यापारिक संस्थानों द्वारा किया जाता है। जब एक ग्राहक वस्तु खरीदने निकलता है तो उसे यह तो पता है कि वस्तु खरीदनी है किन्तु यह पता नहीं होता कि किस उत्पादक अथवा निर्माता की वस्तु खरीदनी है। उदाहरण के लिए, एक ग्राहक स्टोव खरीदने निकलता है तो उसे यह तो पता है कि स्टोव लेना है किन्तु किस ब्राण्ड एवं कम्पनी का स्टोव लेना है तो यह वह क्रय बिन्दु विज्ञापन को देखकर ही तय करता है। इस प्रकार के ग्राहकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से ही क्रय बिन्दु विज्ञापन किया जाता है। क्रय बिन्दु विज्ञापन निम्न दो प्रकार से किया जाता है:

(i) वातायन सजावट (Window Display)- इसमें वस्तुओं को वातायन अथवा अलमारियों में इस प्रकार से सजाया जाता है कि दुकान के निकट से निकलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अच्छी तरह से दिखाई दे तथा उसमें उनके प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो एवं दुकान पर रुकने के लिए प्रेरित हो।

(ii) काउण्टर सजावट (Counter Display)- इसके अन्तर्गत काउण्टर पर वस्तुओं को सजाकर रखा जाता है, ताकि ग्राहक बिना संकोच उन्हें उठा सकें और देख सकें। वातायन सजावट ग्राहकों को आकर्षित करके दुकान में प्रवेश कराती है तथा काउण्डर सजावट उसे क्रय करने के लिए प्रेरित करती है।

(V) मनोरंजन एवं अन्य विज्ञापन

(Entertainment and other Advertising)

(1) रेडियो एवं टेलीविजन (Radio and Television)- आधुनिक युग में रेडियो एवं टेलीविजन विज्ञापन में बहुत ही महत्वपूर्ण साधन हैं। लोगों में रेडियो सुनने एवं टेलीविजन देखने की आदत बढ़ रही है। एक साधारण ग्रामीण व्यक्ति भी रेडियो सुनना पसंद करता है। शहरों और कस्बों में टेलीविजन एक आवश्यकता बनती जा रही है। यह टेलीविजन शिक्षा का युग है। रेडियो एवं टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के बीच दिये गये विज्ञापन बहुत ही प्रभावशाली होते हैं।

(2) सिनेमा एवं सिनेमा स्लाइड (Cinema and Cinema Slide) – शहरों एवं कस्बों में सिनेमा मनोरंजन का महत्वपूर्ण साधन है। सभी श्रेणी के लोग सिनेमा देखते हैं। विज्ञापनकर्त्ता सिनेमा स्लाइड बनाकर या फिल्म बनाकर सिनेमा विज्ञापन कर सकते हैं। सिनेमा स्लाइड में विज्ञापन संदेश लिखी हुई स्लाइड फिल्म के प्रारम्भ एवं मध्यान्तर में दिखाई जाती है। इसी प्रकार वस्तु विशेष पर बनी फिल्म को भी दिखाया जाता है।

(3) मेले एवं प्रदर्शनियाँ (Fairs and Exhibitions) – विश्व के सभी देशों में मेले एवं प्रदर्शनियाँ आयोजित होते रहते हैं। इन मेलों एवं प्रदर्शनियों में संस्थाएं अपने-अपने मण्डप लगाकर वस्तुओं का विज्ञापन एवं विक्रय करती हैं। विज्ञापनकर्ताओं की सुविधा के लिए सरकार प्रदर्शन गाड़ियाँ (Exhibition Trains) भी चलाती है। जिसमें वस्तुएँ सजी हुई होती हैं। ये गाड़ियाँ जिन स्टेशनों पर रुकती है, वस्तुओं का व्यापक विज्ञापन होता है।

(4) ड्रामा एवं संगीत कार्यक्रम (Drama and Music Programme ) – निर्माता कम्पनियाँ ड्रामा एवं संगीत कार्यक्रमों से भी वस्तुओं का विज्ञापन करती हैं। ये कार्यक्रम गाँवों में अधिक लोकप्रिय होते हैं। इसके लिए ड्रामा एवं संगीत मण्डलियाँ बनाई जा सकती हैं। ये मण्डलियाँ जगह-जगह घूमकर संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैं। इन संगीत कार्यक्रमों के मध्य में विज्ञापन गाकर या विज्ञापन को गाने के रूप में परिवर्तित कर विज्ञापन किया जाता है।

(5) लाउडस्पीकर (Loudspeakers) – निर्माता या व्यापारी रिक्शा, ताँगा या मोटर में लाउडस्पीकर लगाकर स्थान-स्थान पर घूमते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं का विज्ञापन करते हैं। वे फिल्मी गानों के बीच में विज्ञापन गाते हैं। परीक्षा के दिनों में ये शांति भंग कर विद्यार्थियों को परेशान करते हैं अतः कभी-कभी विशेषतः छात्रों की परीक्षाओं के अवसर पर इन पर रोक भी लगा दी जाती है।

(6) प्रदर्शन (Demonstration)– दुकान पर या दुकान के बाहर वस्तु का क्रियात्मक प्रदर्शन कर ग्राहकों को आकर्षित किया जा सकता है। निकिताशा कम्पनी के उत्पादों का क्रियात्मक प्रदर्शन बहुत लोकप्रिय रहा है। ज्यूस निकालने, सब्जियाँ छीलने तथा काटने, हाथ से सिलाई करने एवं काढ़ने की मशीनों एवं औजारों का क्रियात्मक प्रदर्शन लोगों को वस्तु क्रय के लिए प्रेरित करता है।

(7) उपहार या भेंट (Gifts)-किसी वस्तु की एक निश्चित मात्रा क्रय करने पर कोई वस्तु उपहार या भेंट स्वरूप दी जाती है जिससे भी वस्तुओं का विज्ञापन होता है। बोर्नविटा के प्रत्येक डिब्बे के साथ प्लास्टिक का ग्लास, पालमोलिव दाड़ी बनाने के साबुन के साथ दो प्रिंस ब्लेड तथा क्रीम के साथ विल्टेज ब्लेड का पैकेट दिया जाता है।

(8) वस्तुओं का मुफ्त वितरण (Free Distribution of Produces)- निर्माता कम्पनियाँ एवं व्यापारी कलैण्डर, पैन, पर्स आदि मुफ्त वितरित करके भी वस्तुओं एवं सेवाओं का विज्ञापन करते हैं। इन वस्तुओं पर निर्माता कम्पनी या व्यापारी फर्म का पता लिखा होता है। जिससे संस्था का व्यापक विज्ञापन होता है। साथ ही नमूने के मुफ्त वितरण से ग्राहकों को अधिक क्रय के लिए आकर्षित किया जा सकता है।

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Pankaja Singh

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