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विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप | विद्यापति की भाषा एवं उनका हिन्दी साहित्य में स्थान | मीरा की भक्ति का स्वरूप एवं साहित्य | मीरा की विद्रोही चेतना का वर्णन

विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप | विद्यापति की भाषा एवं उनका हिन्दी साहित्य में स्थान | मीरा की भक्ति का स्वरूप एवं साहित्य | मीरा की विद्रोही चेतना का वर्णन

(1) विद्यापति की भक्ति भावना का स्वरूप

कविवर विद्यापति ने भगवान् शिव की भी स्तुति की है। उन्होंने शिव जी के रूप का उसी प्रकार वर्णन किया है, जिस प्रकार का उनका रूप भारतीय जन मानस में व्याप्त है। वे भगवान् शिव से विनय करते हुए पूछते हैं कि हे भोलानाथ! तुम मेरे दुःख का हरण किस समय करोगे? तुम मेरा दुःख कब मिटाओगे? मेरा जन्म दुःख में ही हुआ और मैंने अपना जीवन दुःख में ही बिता दिया। मुझे सुख तो स्वप्न में भी प्राप्त नहीं हुआ है। हे भोलानाथ! मैं अपनी पूजा की सामग्री अर्थात् चावल, चन्दन, गंगा जल और बेलपत्र तुम्हें समर्पित करूंगा। इस भवसागर की गहराई का कोई पता नहीं चलता। हे भैरव! आप आकर मेरी बाँह पकड़ लें। विद्यापति कहते हैं कि भोलानाथ शिव ही मेरी गति हैं। आप मुझे अभय का वरदान दें। हे त्रिपुर के नाशक शंकर  तुम्हारी जय हो। हे अर्द्ध नारीश्वर! तुम्हारी जय हो। आप का आधा शरीर भस्म लगाने के कारण धवल है और आधा गोरा है। आपके आधे शरीर पर हड्डियों की माला है और आधे पर मोती शोभा देते हैं आपके वक्ष के आधे भाग पर पुरुष के समान सामान्य उभार है तथा आधे सीने पर कटोरे के समान कुच है। आपके आधे शरीर पर रेशमी वस्त्र है और आधे में मूंज की रस्सी हैं

(2) विद्यापति की भाषा एवं उनका हिन्दी साहित्य में स्थान

विद्यापति की पदावली की भाषा परवर्ती अवहट्ट का क्षेत्रीय रूप मैथिली हैं मैथिली और बंगला दोनों ही भाषाएँ मागधी अपभ्रंश से जन्मी हैं मगध प्रान्त की भाषा आरम्भ से ही अद्र्धमागधी से प्रभावित रही है। यही कारण है कि आरम्भिक मैथिली शौरसेनी से भी प्रभावित है। इस आधार परहिन्दीभाषी यदि पदावली पर अपना अधिकार जताते हैं तो यह निराधार नहीं है। पदावली में संज्ञा शब्दों के अकारात्मक, आकारात्मक, ईकारात्मक तथा ओकारात्मक रूप प्राप्त होते हैं। ऐसे दीर्घतर रूप भी मिलते हैं, जिनमें अन्त में ‘वा’ है। जैसे- गरवा, घरवा, भिनसरवा। इनके अतिरिक्त अकारान्त स्त्रीलिंग रूप-बहन, बात, रात, लाज भी मिलते हैं।

(3) मीरा की भक्ति का स्वरूप एवं साहित्य

भक्ति-विषयक साहित्य- नाभादास के ‘भक्तमाल’ हरिराम व्यास रचित ‘वाणी वार्त साहित्य’, ध्रुवदास रचित ‘भक्त-नामावली’ और प्रियादास रचित ‘भक्तमाल की टीका’ में मीराँ का उल्लेख आया है। इसमें ‘चौरासी वैष्णवी की वार्ता’ महत्वपूर्ण हैं इसके अनुसार मीराँ आचार्य बल्लभाचार्य के समकालीन सिद्ध होती है। बल्लभाचार्य की मृत्यु सं0 1857 में निश्चित है। मीरां की प्रसिद्धि बल्लभाचार्य तक पहुंच चुकी थी। प्रसिद्धि और प्रौढ़ता के लिए 29, 30 वर्ष की आयु अपेक्षित है। इसमें मीरों की जन्म तिथि सं0 1555 से 60 के मध्य निश्चित होती है। वार्ता में एक प्रंसग आया हैं

“सो वे कृष्णादास शुद्र एक बार द्वारका गये हते। तो श्री रणछोड़ जी के दर्शन करके तहाँ से चले सो आपन मीराँबाई के गाँव आये, सो वे कृष्णदास, मीरों के घर उतर गये हैं, अटवे हैं। तब श्री गुसाई ने एक श्लोक लिखि पढ़ायो।”

उक्त प्रसंग के अनुसार मीरां कृष्णदास, हित हरिवंश और हरिदास व्यास के समकालीन ठहरती हैं कृष्णदास का समय सं. 1554 से 1630 और हित हरिवंश का समय 1559 से 1659 तक माना गया हैं हरिराम व्यास स. 1622 के आस-पास वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित हुए। अतः स्पष्ट है कि मीरों सं0 1622 तक जीवित थी। उपर्युक्त विवेचन से परिणाम निकालकर हम कह सकते हैं कि मीरा का जन्म सं0 1560 के लगभग कुड़की नामक स्थान में हुआ था। मीरां जोधपुर के संस्थापक राजा जोधाजी के पुत्र राव दूदा जी पौत्री और रतनसिंह की एकलौती पुत्री थी। राव दूदा ने सं0 5529 में मेड़ता नगर की स्थापना की थी। इसलिए आगे चलकर दूदा जी के वंशज मेडतिया के राठौरा के नाम से प्रसिद्ध हुए।

मीरों का नाम- डॉ0 बड़थ्वाल के अनुसार मीरों का यह उपनाम था। उन्होंने ‘मीरों का अर्थ ‘ईश्वर’ और ‘बाई’ का अर्थ ‘पत्नी’ लगाया। इस प्रकार उन्होंने स्थिर किया कि मीरों को यह नाम सन्त कवियों ने इनको माधुर्य भाव की भक्ति के कारण दिया। परन्तु यह मत प्रामक है, क्योंकि राजस्थान में ‘बाई का अर्थ पत्नी न होकर ‘माता’ होता हैं विश्वेश्वर नाथ के मत के अनुसार मीरां शब्द फारसी का हैं फारसी में मीर का अर्थ ‘शहजादा’ होता है जिसका बहुवचन ‘मीरा बनता है।

(4) मीरा की विद्रोही चेतना का वर्णन

विरह-वर्णन- मीरों के काव्य में वियोग-शृंगार की वेगवती धारा प्रवाहित हुई है। विप्रलम्भ के पूर्वरोग, मान, प्रवास और करुण चार उपभेद हैं मीरां के काव्य में पूर्वराग और प्रवास विरह का ही व्यापक रूप मिलता हैं मीरों के पूर्वराग विरह में अभिलाषा, चिन्ता, स्मृति, गुच-कथन, उद्वेग, प्रताप, उन्माद, व्याधि, जड़ता आदि सभी विरह-दशाएँ आ गई हैं।

अभिलाषा- मीरां के हृदय में यह तीव्र अभिलाषा है कि उनका प्रियतम उनके पास रहे-

पिया म्हारे तैणा आँगा रहज्यो जी।

नैणां आगां रहज्यो म्हान भूल न जाज्यो जी।

चिन्ता- मीरां अपने प्रियतम से मिलने के चिन्तित हो उठती हैं वे चाहती है कि किसी दिन उनके प्रियतम राम उन्हें याद करें-

कोई दिन याद करो रमता राम अतीत।

स्मृति- मीरों अपने स्नेह की दुहाई देती हुई रात-दिन प्रियतम का स्मरण करती है-

रमईया मेरे तोही सों लागी नेह।

लागी प्रीत जिन तोड़े रे नाला अधि की कीजै नेह।।

गुण-कथन- मीरों के अधिकांश पद अपने प्रियतम कृष्ण के गुण-कथन से भरे हुए हैं निम्न उदाहरण में देखिए-

मोर मुकुट माथ्याँ तिलक विराज्याँ कुण्डल अलकाँ कारी हों।

अधर सुधारस वंशी बजावाँ रींझ रिझावाँ ब्रजनारी हो।

उद्वेग- मीराँ प्रियतम के विरह में उद्वेग की अवस्था में पहुंच जाती हैं उसमें सुखद बाते भी प्रतिकूल लगने लगती हैं उसे प्रियतम के बिबान तो भवन अच्छा लगता है और न फूलों की सेज ही-

प्रीतम बिन दिन जाइ न सजनी दीपक भवन ने भावैं हो।

फूलण सेज सूल हुई लागी जागत रैनि बिहावै हो॥

प्रलाप–  

हर विण क्यूँ जिवा री माय।

स्याम बिना मो भया मण काठ ज्यूँ घुणा खाय॥

उन्माद-

हेरी म्हाँ दरदे दिवाणी म्हारा दरद न जाण्याँ कोय।

व्याधि-

दुखिया राम सुखिया करो म्हाँणे दरसण दीज्यो जी।

जड़ता-

खाण-पाण म्हारे नेक न

भावाँ नैणा सूना कपाल।

मरण-

मूल ओखद णा लग्या म्हाणै प्रेम पीड़ा खाय।

मीणा जल बिछुड़ या जा जीवा तरफ मर-मर जाय॥

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Pankaja Singh

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