शैक्षिक तकनीकी

विद्यालयी कम्प्यूटर साक्षरता | अध्ययन परियोजना | रेखीय एवं अरेखीय कम्प्यूटर | कम्प्यूटर के लाभ | कम्प्यूटर सहअनुदेशन की विशेषताएँ | कम्प्यूटर सहअनुदेशन की शैक्षणिक उपयोगिता | शिक्षा में कम्प्यूटर | कम्प्यूटर सह-अनुदेशन के रूप में | कम्प्यूटर सह-अनुदेशन में आवश्यक विशेषज्ञ | कम्प्यूटर द्वारा दी जाने वाली शिक्षण प्रक्रिया

विद्यालयी कम्प्यूटर साक्षरता | अध्ययन परियोजना | रेखीय एवं अरेखीय कम्प्यूटर | कम्प्यूटर के लाभ | कम्प्यूटर सहअनुदेशन की विशेषताएँ | कम्प्यूटर सहअनुदेशन की शैक्षणिक उपयोगिता | शिक्षा में कम्प्यूटर | कम्प्यूटर सह-अनुदेशन के रूप में | कम्प्यूटर सह-अनुदेशन में आवश्यक विशेषज्ञ | कम्प्यूटर द्वारा दी जाने वाली शिक्षण प्रक्रिया | School Computer Literacy in Hindi | Study Project in Hindi | Linear and non-linear computers in Hindi | Advantages of Computer in Hindi | Features of Computer Co-instruction in Hindi | Educational utility of computer co-instruction in Hindi | Computer in Education in Hindi | in the form of computer co-instruction in Hindi | Essential Specialist in Computer Co-instruction in Hindi | computer-led learning process in Hindi

विद्यालयी कम्प्यूटर साक्षरता

भारत सरकार मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के द्वारा सन् 1983-84 में इस परियोजना का प्रारम्भ किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य कम्प्यूटर के ज्ञान की प्रसारित करना तथा शिक्षक तथा छात्रों को अधिगम माध्यम के रूप में इसकी सम्भावनाओं एवं शक्तियों से अवगत करना। था।

प्रारम्भ में इस परियोजना को सभी प्रकार के भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले 248 चयनित माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में लागू किया गया। इन विद्यालयों का चयन करने में सीमित संसाधनों वाले सरकारी विद्यालयों तथा निम्न सामाजिक-आर्थिक स्तर के बहुसंख्यक विद्यार्थियों वाले विद्यालयों को प्राथमिकता प्रदान की गयी। इसके उपरान्त 501 अन्य विद्यालयों को इसमें सम्मिलित किया गया। सन् 1990 में इस क्लास कार्यक्रम को भारत के लगभग 14000 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों को इसमें सम्मिलित किया गया।

उपरोक्त के अतिरिक्त राजीव गाँधी कम्प्यूटर साक्षरता मिशन भी भारत में कम्प्यूटर को एक अन्य परियोजना लागू की गयी है। यह परियोजना वर्तमान समय में सम्पूर्ण राष्ट्र में कार्यरत हैं। इस परियोजना में सरकार निजी भागीदारी को भी सम्मिलित करती है।

वर्तमान समय में सम्पूर्ण भारत के विद्यालयों में प्राथमिक स्तर से कम्प्यूटर की सामान्य सूचनाएँ प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे भविष्य की पीढ़ी को इस तकनीकी का पूर्णरूप से लाभ प्राप्त हो सके।

रेखीय एवं अरेखीय कम्प्यूटर

कम्प्यूटर का प्रयोग दूरवर्ती या दूरस्थ अधिगम में दो प्रकार से हो सकता है— स्थानीय प्रयोग द्वारा तथा प्रसारण के प्रयोग द्वारा स्थानीय प्रयोग या अरखीय कम्प्यूटर एक स्वतन्त्र प्रारूप के रूप में अपने विद्यार्थियों को अपने ढंग के कार्य करने के लिये प्रेरित करता है। रेखीय कम्प्यूटर प्रणाली में एक कम्प्यूटर को अन्य कम्प्यूटर से तथा अन्य को तृतीय वर्ग के कम्प्यूटर से सम्बन्धित किया जाता है तथा फिर इन युक्तियों के मध्य क्रियाओं का संचालन किया जाता है। कम्प्यूटर के आन्तरिक सम्बन्ध से एक मिश्रित अधिगम कार्यक्रम निर्मित किया किया जाता है, जिसके द्वारा दूरस्थ-विद्यार्थी को सम्बन्धित किया जाता है तथा उसका सम्बन्ध केन्द्रीय संस्था एवं शिक्षक से होता है।

कम्प्यूटर के लाभ

कम्प्यूटर के निश्चिय ही अनेक लाभ है, तो संक्षेप में हम निम्नलिखित वर्णन के आधार पर भी समझ सकते हैं-

(1) कम्प्यूटर के माध्यम से किसी भी कार्य को करना सुविधाजनक तथा मनोरंजनात्मक हो जाता है।

(2) कम्प्यूटर के माध्यम से हम किसी भी कार्य को अत्यधिक निपुणता के साथ कर सकते हैं।

(3) कम्प्यूटर के कार्य करने में समय की अत्यधिक वचत हो सकती है।

(4) कम्प्यूटर विद्यार्थियों की स्मरणशक्ति उनके अतीत के ज्ञान को अभिलेखित करने के लिये परवर्ती पदों को प्रदान करती है।

(5) इसके माध्यम से उच्चकोटि के व्यक्तित्व की क्रियाएँ छात्रों की प्रतिक्रियाओं को उच्चकोटि का पुनर्बलन प्रदान करती है।

(6) विभिन्न आँकड़ों तथा डाटाओं को हम सुगमता के साथ कम्प्यूटर में संग्रहीत कर सकते हैं।

(7) यदि विद्यार्थी अथवा शिक्षक के पास लेपटाप हो तो वह शिक्षा में स्थान की समस्या  अत्यन्त सुगमता के साथ हल हो जाती है।

(8) कम्प्यूटर के माध्यम से किसी विद्यालय के सभी विभाग, कक्षाएँ, पाठ्यक्रम तथा योजनाओं को पूर्णतः व्यवस्थित किया जा सकता है।

(9) कम्प्यूटर सूचना सम्प्रेषण के कार्य में अत्यन्त सुगमता प्रदान करता है।

कम्प्यूटर सहअनुदेशन की विशेषताएँ (Characteristics)

  1. इस प्रक्रिया में कम्प्यूटर द्वारा अनुदेशन पर आधारित परिस्थितियों को अभिकल्पित किया जाता है,
  2. इससे स्वतः अनुदेशन में सहायता प्राप्त होती है,
  3. इसको लगभग सभी शैक्षिक स्तरों में प्रयोग किया जा सकता है,
  4. इसको सभी विषयों के अनुदेशनों में प्रयोग कर सकते हैं,
  5. इसके माध्यम से व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार पर अनुदेशन दिया जाता हैं,
  6. इस प्रक्रिया में सूचनाओं को वृहत् स्तर पर संचित और व्यवस्थित भी किया जा सकता हैं,
  7. इसके अन्तर्गत एक ही समय में 30 छात्रों को अनुदेशन प्रदान किया जा सकता है,
  8. यह प्रक्रिया व्यक्तिनिष्ठ प्रभावों से सर्वथा मुक्त हैं,
  9. यह ज्ञानात्मक स्तर के उद्देश्यों को प्राप्त करने में विशेष सहायक है,
  10. इसके द्वारा एक ही समय में विभिन्न प्रकार के अभिक्रमों को प्रस्तुत किया जा सकता है,

कम्प्यूटर सहअनुदेशन की शैक्षणिक उपयोगिता (Educational Utility)- कम्प्यूटर सहअनुदेशन की शैक्षणिक क्षेत्र में कई दृष्टियों से उपयोगिता है, यथा-

  1. इसका उपयोग अनेक प्रकार के अनुदेशनों के लिए होता हैं,
  2. छात्रों द्वारा दिये गये उत्तरों की पुष्टि तत्काल हो जाता है,
  3. कक्षाध्ययन में यह शिक्षक हेतु प्रभावपूर्ण ढंग से सहायता देता है,
  4. कम्प्यूटर की सहायता से छात्रों को व्यक्तिनिष पाठ सुलभ कराये जाते हैं।

शिक्षा में कम्प्यूटर (Computer in Education)-

आज शिक्षा में कम्प्यूटर एक नूतन नवाचार है। जब से शिक्षा में इसका पदार्पण हुआ है तब से शिक्षा कार्य में संलग्न सभी अंगों को बहुत संतुष्टि मिलती है। विविध शैक्षिक स्तरों में इसका प्रयोग करके मनोवांछित कार्य सम्पन्न कराये जा सकते है। यौगिक आंकिक एवं गणितीय क्रियाओं को सिखाने में तो कम्प्यूटर की अत्यधिक उपयोगिता होती है।

कम्प्यूटर के द्वारा छात्रों के वर्गीकरण में काफी सहायता मिलती है। कशाग्र एवं मंद तथा समस्यात्मक बालकों की बहुत सी समस्याओं के समाधान में भी कम्प्यूटर सहायता देता है। इसके अतिरिक्त कम्प्यूटर वैयक्तिक एवं सामूहिक दोनों प्रकार से प्रयुक्त किया जा सकता है। कम्प्यूटर की पूरी प्रक्रिया कठोर एवं मुलायम दोनों उपागामों पर आधारित होती है। जिससे शिक्षण एवं अनुदेशन में किसी भी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता। अतएव शिक्षा में कम्प्यूटर एक नूतन नवाचार अवश्य है फिर भी इसके प्रयोग की अत्यधिक संभावनाएँ है। वर्तमान समय में शिक्ष के क्षेत्र में कम्प्यूटर के प्रयोग एवं उपयोगिता को निम्नलिखित ढंग से प्रकट किया जा सकता हैं।

(i) शिक्षण एवं अनुदेशन में कम्प्यूटर का प्रयोग।

(ii) परीक्षा एवं मूल्यांकन में कम्प्यूटर का प्रयोग

(iii) शैक्षिक प्रबन्धन में कम्प्यूटर का प्रयोग।

(iv) अनुसंधान में आँकड़ों के संग्रह, गणना में प्रयोग।

(v) विविध सूचनाओं के भण्डारण में प्रयोग।

(vi) अधिगमित पाठों को वस्तुनिषता से ओत-प्रोत बनाने में प्रयोग।

(vii) स्व शिक्षण एवं अध्यापक नियंत्रित शिक्षण में प्रयोग

(viii) छात्रों को निर्देशन एवं परामर्श देने में प्रयोग।

(ix) विविध तथ्यों को क्रमबद्ध करने में प्रयोग।

कम्प्यूटर सह-अनुदेशन के रूप में (Computer as a Assisted Instructor) –

शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर सह-अनुदेशन के रूप में 1961 में इलिन्वायस विश्वविद्यालय में सबसे पहले प्रयोग में लाया गया। जो स्वतः शिक्षण अभिक्रम तर्क (Programme logic for automatic teaching operations) (PLAT) से सम्बन्धित थी। तदुपरान्त 1965 में लारेन्स स्टुलरों एवं डेनियल डेविस ने ऐसे कम्प्यूटर का सृजन किया जो अध्यापक के न रहने पर उसकी पूर्ति कर सकता था। 1966 में पैट्रिक सुपेस ने वाचन सम्बन्धी कम्प्यूटर बनाया। 1973 में गिलिंगन ने जब विज्ञान की शिक्षा कम्प्यूटर के माध्यम से प्रदान करने में सफलता प्राप्त की। 1979 ई0 में शर्मा एवं गर्ग ने कम्प्यूटर को सह-अनुदेशन के रूप में कुशलतापूर्वक उपयोग करते हुए परम्परागत गणित शिक्षण के स्थान पर अधिक शुद्धता एवं त्रुटिविहीन ढंग से विश्वविद्यालय के छात्रों को गणित का पाठ पढ़ाया। 1982 ई0 में शिक्षा के क्षेत्र में IMB 370, ICL, 1900, DEC-2050, APPLE-II इत्यादि कम्प्यूटर सह-अनुदेशन एवं वैयक्तिक अनुदेशन का कार्य बड़ी कुशलता के साथ आधुनिक समय में कर रहा है और हार्डवेयर उपागमों में अपना प्रथम स्थान बना लिया है। कम्प्यूटर सह अनुदेशन की बुनियादी मान्यताओं (Basic Assumptions of CAI) को निम्नलिखित ढंग से व्यक्त किया जा सकता हैं-

(क) कम्प्यूटर सह-अनुदेशन के द्वारा बहुत से विद्यार्थियों के गुणात्मक एवं मात्रात्मक समस्याओं का निदान एवं सुधार किया जा सकता है।

(ख) कम्प्यूटर के माध्यम से छात्र अपनी वैयक्ति, रुचि, अभिक्षमता, अभिवृत्ति एवं मनोवृत्ति के अनुसार पृष्ठपोषण (Feed Back) प्राप्त कर सकता है।

(ग) कम्प्यूटर सह-अनुदेशन की सबसे बड़ी विशेषता एवं मान्यता यह है कि यह विविध विषयों एवं पाठ्य-वस्तु को अनेक प्रकारों एवं विधियों से छात्रों के सामने प्रस्तुत कर सकता है।

(घ) कम्प्यूटर सह-अनुदेशन से सीखते समय छात्रों के व्यवहार को लेखा-जोखा रिकार्ड कर लिया जाता है जिससे शिक्षक को भविष्यवाणी करने में अपने शैक्षिक कार्यक्रमों के क्रियान्वय में बहुत मदद मिलती है।

कम्प्यूटर सह-अनुदेशन में आवश्यक विशेषज्ञ ( Experts needed in CAI) –

किसी भी संस्था या विद्यालय द्वारा कम्प्यूटर को सह-अनुदेशन के कार्य में प्रयुक्त करने के लिए अधोलिखित विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती है।

(1) अभिक्रमक लेखक (Programmer)- जिस प्रकार किसी भी कार्य को कुशलता पूर्वक सम्पादित करने के लिए उस विषय क्षेत्र से जुड़े हुए अनुभवी व्यक्ति को आवश्यकता पड़ती है, ऐसी ही अभिक्रमों को लिखने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो सीखने के सिद्धान्तों से निपुण हो और उसी के अनुरूप वह विभिन्न आयु वर्ग के बालकों के निमित अभिक्रमों का सृजन करें। इसके अतिरिक्त अभिक्रम लेखक को कम्प्यूटर की भाषा एवं व्याकरण का जानकर भी होना चाहिए।

(2) कम्प्यूटर इंजीनियर (Computer Engineer)- किसी भी संस्था में कम्प्यूटर का सह-अनुदेशन में ठीक प्रकार से कार्य का सम्पादन सुनिश्चित हो, इसके लिए एक कम्प्यूटर इंजीनियर की आवश्यकता होती है। यह कम्प्यूटर की तकनीकी भाषा, कार्यविधि, रचना एवं सिद्धान्तों से भली-भांति परिचित होता है। कम्प्यूटर यदि कहाँ त्रुटि करता है तो उसका समाधान आसानी से करने में भी कम्प्यूटर इंजीनियर रखने से सुविधा रहती है।

(3) प्रणाली संचालक (System Operator)- कम्प्यूटर की कार्य प्रणाली को सीखने वाले व्यक्ति को सरलता, रोचकता से प्रसारित करने के लिए प्रणाली संचालक की आवश्यकता पड़ती है। यह कम्प्यूटर एवं सीखने वाले के मध्यस्थ कार्य करता है। क्योंकि सिस्टम आपरेटर ही विविध गलतियों का पता लगाकर उसमें सुधार करता है और कम्प्यूटर की सारी प्रणाली को नियंत्रित एवं निर्देशित करते हुए विषयवस्तु का व्यावहारिक एवं सजीवता पूर्ण प्रस्तुतीकरण करता है।

कम्प्यूटर द्वारा दी जाने वाली शिक्षण प्रक्रिया (Computerised Teaching Process) –

कम्प्यूटर द्वारा दी जाने वाली शिक्षण प्रक्रिया को दो भागों में विभाजित किया-

(क) पूर्व अनुवर्ग शिक्षण (Pre- Tutorial Phase) – शिक्षण प्रक्रिया के इस भाग के अन्तर्गत विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होनहार, प्रतिभाशाली विशिष्ट बालकों का चुनाव करके उनके प्राथमिक व्यवहार, शान, रुज्ञान, आवश्यकता के अनुसार कम्प्यूटर द्वारा शिक्षा दी जाती है।

(ख) पूर्व अनुवर्ग शिक्षण (Tutorial Phase) – शिक्षण प्रक्रिया के इस भाग के अन्तर्गत शिक्षण देने के निमित किसी एक विद्यार्थी का चुनाव करके उसके द्वारा चुने गये अभिक्रम को कम्प्यूटर द्वारा परिदृश्य बोर्ड पर प्रस्तुत किया जाता है जिसे वह सीखकर विविध तथ्यों की जानकारी प्राप्त करता है बाद में कम्प्यूटर द्वारा ही उस विद्यार्थी का मूल्यांकन भी किया जाता है। शिक्षण प्रक्रिया के उपरोक्त दोनों भागों के प्रमुख कार्यों को कम्प्यूटर के द्वारा अधोलिखित दो चरणों द्वारा प्रकट किया जाता है।

(i) कम्प्यूटर सबसे पहले अधिगमकर्ता की शैक्षिक योग्यता, निमित तथा प्राथमिक व्यवहारों को एक पेपर पर अंकित कर लेता है तत्पश्चात् अधिगमकर्ता की परीक्षा लेता है जिससे उसके प्राथमिक व्यवहार, योग्यता इत्यादि की जाँच हो जाती है। परीक्षा में पास जो जाने पर ककम्प्यूटर अधिगमकर्ता क शैक्षिक स्तर, योग्यता का आकलन कर लेता है। इसके बाद वह फिर से एक परीक्षा लेता है और अधिगमकर्ता का विश्लेषण एवं मूल्यांकन करता है इससे ययह स्पष्ट होता जाता है कि विषयवस्तु के बार में अधिगमकर्ता पहले से कितना जनता है। ऐसी जानकारी प्राप्त करने के बाद कम्प्यूटर कार्यक्रम (अभिक्रम) का चुनाव करता है और यदि उस अधिगमकर्ता के स्तर का अभिक्रम कम्प्यूटर में संग्रहीत नहीं रहता है, तो वह अभिगमकर्ता को अनुतीर्ण एवं अयोग्य सिद्ध कर देता है।

(ii) अधिगमकर्ता को कम्प्यूटर द्वारा अयोग्य घोषित नहीं किया जाता है तो वह अधिगमकर्ता के प्राथमिक व्यवहार के अनुसार अभिक्रम प्रस्तुत करता है जिसे टाइपराइटर एवं टेप के माध्यम से सूचना भेजा जाता है। त्रुटि होने पर कम्प्यूटर अनुदेशन को बदल सकता है। इसके अलावा कम्प्यूटर अधिगमकर्ता के व्यवहार को नियंत्रित करते हुए शिक्षण की प्रक्रिया को व्यवस्थित भी करता हैं।

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Pankaja Singh

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