इतिहास

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति | वर्ण के आधार पर उत्पत्ति का सिद्धान्त | वर्ण व्यवस्था का विकास | विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति एवं उनके कार्य | वर्ण-व्यवस्था के लाभ | वर्ण-व्यवस्था के दोष | जाति तथा वर्ण में अन्तर | वर्णाश्रम व्यवस्था की महत्ता

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति | वर्ण के आधार पर उत्पत्ति का सिद्धान्त | वर्ण व्यवस्था का विकास | विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति एवं उनके कार्य | वर्ण-व्यवस्था के लाभ | वर्ण-व्यवस्था के दोष | जाति तथा वर्ण में अन्तर | वर्णाश्रम व्यवस्था की महत्ता

प्राचीन भारतीय सामाजिक वेत्ताओं ने इस देश के प्रारम्भ काल में ही समाज की दिशा निर्धारित कर दी थी। इस सामाजिक निर्धारण का सर्वप्रथम अध्याय वर्ण व्यवस्था थी। मूल रूप से आर्यों की एक जाति थी, परन्तु भारत में आकर उन्होंने जातिगत व्यवस्था का वैज्ञानिक निर्धारण किया। वर्ण व्यवस्था इसी का परिणाम थी।

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति

दैविक उत्पत्ति का सिद्धान्त- ऋग्वेद, जो आर्य जाति की प्रथम रचना है, वर्ण-व्यवस्था को ईश्वर द्वारा निर्मित बताता है। इसके अनुसार ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा चरणों से शूद्र उत्पन्न हुये। वेद अपौरुषेय तथा अलौलिक माने गये हैं अतः उनके वर्णनों को असत्य नहीं माना जा सकता यथा उनमें वर्णित वर्ण व्यवस्था देवता की आज्ञा स्वरूप मानी गयी। यह शुद्धतः वेदों का वर्णन है तथा इतिहास के विद्यार्थी इस वर्णन को ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मान सकते। खोज इस बात की करनी है कि वर्ण व्यवस्था को अलौकिक रूप प्रदान करने में आर्यों का  क्या प्रयोजन था ? इस प्रश्न का उत्तर पाना कठिन नहीं है। जब आर्यों के मन में यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि वे अपनी जाति के मूलरूप को कैसे बचायें तो उन्होंने वर्ण के आधार पर अनार्यों या ‘दस्यु’ अथवा ‘दासों’ को शूद्र की श्रेणी में ला पटका और ऋग्वेद के अंतिम मण्डल-जो बाद में रचित माना गया है-के “पुरुष-सूक्त’ में उसे ईश्वरीय या अलौकिक रूप प्रदान कर दिया।

वर्ण के आधार पर उत्पत्ति का सिद्धान्त-

यदि सच कहा जाये, तो रंग के आधार पर वर्ण व्यवस्था निर्धारित करने का सुनिश्चित प्रमाण महाभारत के शान्ति पर्व में मिलता है। उसमें कहा गया है कि- “जब ब्रह्मा ने देव, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, पिशाच, राक्षस, नाग आदि के साथ-साथ मनुष्य बनाये तो चारों वर्ण अलग-अलग रंग के थे-सफेद, लाल, पीले और काले।

कर्म के आधार पर उत्पत्ति-

भारद्वाज ने जब प्रश्न किया कि यदि रंग के आधार पर ही भेद था तो अवश्य ही जातियाँ आपस में मिल गई होंगी क्योंकि शरीर तो एक से हैं, तब भृगु ने उत्तर दिया कि “वास्तव में कोई भेद नहीं है। पहिले संसार में केवल ब्राह्मण ही थे परन्तु कर्मों के आधार पर उनके भिन्न-भिन्न वर्ण हो गये।’ भगवत् गीता में भगवान कृष्ण ने चारों वर्गों के धर्म (कर्तव्य) गिनाकर कहा है कि-“हर आदमी को अपना ही धर्म (कर्त्तव्य) पालन करना चाहिये तथा अपने ही धर्म (कर्त्तव्य) में मरना चाहिये, दूसरों का धर्म भयावह है’ और फिर कहा कि-“गुण कर्म के विभाग से मैंने चातुर्वर्ण्य की सृष्टि की है।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वेद में वर्ण व्यवस्था के जिस अलौकिक तथा ईश्वरीय तत्व का प्रतिपादन किया गया, वह पश्चात्कालीन आर्य साहित्य में परिस्थितियों, कर्म एवं धर्म (कर्त्तव्य) पर आधारित मान ली गयीं।

विवेचना- कुछ विद्वानों के उल्लेखानुसार वंश की शुद्धता एवं पवित्रता कायम रखने के लिये जाति को स्थापना की जाती है। श्री नेसफील्ड नामक विद्वान का खथन है-

“The decisive factor in the growth of the caste system was professional specialization.”

एक अन्य विद्वान श्री सेनार्ट के अनुसार प्राचीन आर्यों ने जाति का नहीं अपितु वर्ग का निर्माण किया था। जाति एवं वर्ग में बड़ा अन्तर है। जाति का निर्माण परम्परागत रूढ़ियों का अनुशासनबद्ध पालन एवं स्थानीय प्रभाव के कारण हुआ। इसके विपरीत वर्ग का निर्माण राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये हुआ। कालान्तर में इन दोनों के उद्देश्य आपस में मिश्रित हो गये और परिणाम- स्वरूप जाति एवं वर्ग का भेद समाप्त हो गया। वास्तविक रूप में ये दोनों एक-दूसरे से स्वतन्त्र थे।

उपर्युक्त मतों से वर्ण व्यवस्था के सम्बन्ध में प्रचलित सत्य का केवल मात्र दर्शन होता है,परन्तु वास्तविकता का पता नहीं चलता। यदि निष्पक्ष रूप से जाति के इतिहास का निरूपण किया जाये तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि केवल भारत में ही नहीं अपितु सारे संसार में जाति व्यवस्था विद्यमान रही है, और आज भी विद्यमान है। रोम तथा यूनान में स्वामी एवं दास, योरोप की ऐंग्लो शाखा में अर्ल, सिरोल तथा थियोज एवं आधुनिक इंग्लैंड में काउन्ट, ड्यूक एवं आर्कड्यूक आदि जाति अथवा वर्ण व्यवस्था के उदाहरण नहीं तो और क्या है ? उपरोक्त उदाहरण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि प्राचीन काल के सामाजिक जीवन में कोई ऐसी आवश्यकता रही होगी जिसके कारण वर्ण-व्यवस्था का जन्म हुआ।

वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति का दार्शनिक कारण यह था कि जिस प्रकार राष्ट्र के चार प्रमुख अंग होते हैं यथा शासन, धर्म, अर्थ एवं सेवक, उसी प्रकार समाज के लिये भी चार अंगों का होना अनिवार्य है। परिणामस्वरूप राज्य एवं समाज के रूप में समन्वय लाने के लिये, कार्यगत प्रवीणता एवं कुशलता हेतु वर्ण-व्यवस्था का जन्म हुआ। इसके विपरीत कुछ अन्य विदेशी एवं भारतीय विद्वानों का मत है कि वर्ण-व्यवस्था का आधार पारस्परिक द्वेष, घृणा तथा वैमनस्य है। परन्तु उपरोक्त वस्तुस्थिति को ध्यान में रखते हुये यह विचार मूर्खतापूर्ण ही प्रतीत होता है। समाज, राज्य एवं व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिये पृष्ठभूमि तैयार करना ही वर्ण-व्यवस्था का उद्देश्य था। कर्मानुसार ही वर्ण की सदस्यता प्राप्त होती थी। इसके अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं-परशुराम जन्म से ब्राह्मण परन्तु कर्म से क्षत्रिय थे। विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय परन्तु कर्म से ब्राह्मण (ऋषि) थे। वशिष्ठ नामक प्रसिद्ध ऋषि वेश्या पुत्र थे। महाभारत महाकाव्य के रचयिता वेद व्यास मछुआरिन के पुत्र थे। विधि निर्माता पाराशर तो शूद्रों में निम्नतर चाण्डाल के पुत्र थे। ऐसे अन्यान्य उदाहरण हमें प्राप्त है। जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि कर्म के अनुसार ही वर्ण की श्रेणी प्राप्त होती थी।

वर्ण-व्यवस्था का विकास

वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति वैज्ञानिक, धार्मिक, सामाजिक एवं दार्शनिक सिद्धान्तों के आधार पर हुई थी। अपने आरम्भिक काल में वर्ण-व्यवस्था कर्म प्रधान थी तथा कर्म की श्रेष्ठता प्राप्त करना ही इसका उद्देश्य था। भगवान कृष्ण ने गीता में एक स्थल पर कहा है-

“चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं मुणामकर्म विभागशः” मनु ने लिखा है- “जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विजः उच्यते।”

शनैः शनैः कालान्तर में यह वर्ण व्यवस्था कठोर होती गयी और इन चारों वर्गों का कर्म संकुचित सीमा द्वारा बद्ध कर दिया गया। अब बालक की जाति वही होने लगी जो उसके पिता की थी। अतः अब कर्म के अनुसार वर्ण परिवर्तन करना सम्भव न रहा।

उपरोक्त विवेचन से इस बात की पुष्टि होती है कि समय के साथ-साथ विकास होते रहने पर वर्ण व्यवस्था में कर्म के स्थान पर जन्म प्रधान हो गया।

विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति एवं उनके कार्य

प्राचीन भारत में, आर्यों के आगमनोपरान्त दो वर्ग प्रमुख थे-आर्य एवं अनार्य। आर्यों में परस्पर कोई भेद-भाव न था, वे एक सुगठित जाति के थे। प्रारम्भ में उनका निवास सप्तसिन्धु तक ही सीमित था, किन्तु आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण उनका विस्तार होने लगा। अब वे दूर-दूर स्थानों पर जाकर अपने ग्राम बसाने लगे। परिवार के मुखिया के नाम पर गोत्र का निर्धारण होता थाः धीरे-धीरे समयोपरान्त एक ही स्थान पर एक ही गोत्र के कई परिवार उसी गोत्र में सम्मिलित हो गये। अनेक गोत्रों के समूहों ने गोष्ठियों, ग्रामों एवं जनपदों का निर्माण किया। आर्यों की ही तरह अनार्यों ने भी इस प्रथा का अनुसरण किया। अनार्यों के सम्पर्क के कारण आर्यों में भी अन्तर उत्पन्न होने लगा। अतः रक्त की शुद्धता कायम रखने के लिये आर्यों ने अपने मध्य तीन वर्ग बनाकर उनके कर्म निर्धारित कर दिये। ऐसा करने में उनका प्रमुख उद्देश्य आर्य-पन की रक्षा करना ही था। प्रथम वर्ग धार्मिक कृत्यों का अधिकारी बना-ये वर्ग ब्राह्मण कहलाया। दूसरा वर्ग रक्षा एवं शासन का अधिकारी बना-जो क्षत्रिय कहलाये। तीसरा वर्ग कृषि, पशुपालन एवं अन्य व्यवसायों का अधिकारी था, ये वैश्य कहलाये तथा आर्यों एवं अनार्यों के रक्त-सम्बन्ध एवं सम्पर्क द्वारा जो सन्तानें हुई वे शूद्र कहलायीं। इस प्रकार चार वर्णों की उत्पति हुई। इनके कर्म क्षेत्र का विवेचन इस प्रकार है।

(1) ब्राहाण- वर्ण-व्यवस्थानुसार ब्राह्मण वर्गों के शीर्ष स्थान पर पदासीन था । यदि समाज पुरुष था तो ब्राह्मण उसका हृदय एवं मस्तिष्क था। जिस प्रकार मानव-मस्तिष्क शरीर की सम्पूर्ण क्रियाओं का संचालन करता है उसी प्रकार ब्राह्मण समाज के विचारों एवं भावनाओं का मार्ग-दर्शन करता था। समाज के मन, कर्म एवं वचन में वही बोलता था। ब्राह्मण ज्ञानोपार्जन कर, समाज को  ज्ञान प्रदान करता था। शासन कार्य में उसकी मन्त्रणा को देववाणी तुल्य माना जाता था। वह देवताओं का आवाहन कर समाज के लिये उनका आशीर्वाद प्राप्त करता था। जन्म से लेकर मृत्योपरान्त विषयों तक ब्राह्मण की ही प्रधानता थी। वेद, उपनिषद्, रामायण एवं महाभारत में ब्राह्मण के कर्मों का विशद् वर्णन है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि वेदों का अध्ययन एवं अध्यापन, कर्मकाण्ड एवं यज्ञों का सम्पादन, ब्रहा की प्राप्ति एवं सत्य की खोज तथा समाज के लिये आदर्श निर्माण करना ही ब्राह्मण का परम कर्त्तव्य था।

(2) क्षत्रिय- उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि समाज में ब्राह्मण को बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इसके विपरीत यदि ब्राह्मण समाजरूपी पुरुष का मस्तिष्क था तो क्षत्रिय उसकी भुजा था। शक्ति एवं बल द्वारा धर्म की स्थापना एवं रक्षा तथा जनता को आक्रमण एवं आन्तरिक अशान्ति से बचाना उनका प्रमुख वर्त्तव्य था। राज्य के विभिन्न कार्य एवं उसका संचालन का भार वे ही वहन करते थे। समाज की भौतिक आवश्यकताओं की प्राप्ति हेतु वे राज्य करते थे। धार्मिक कृत्यों के अन्तर्गत राज्य के जन-कल्याण हेतु वे कर्म-काण्डी यज्ञों का अनुष्ठान भी करते थे। न्याय की स्थापना तथा अधर्मियों को दण्ड देना भी उनके कर्त्तव्य क्षेत्र में सम्मिलित था।

(3) वैश्य- ब्रह्मा के उदर से उत्पन्न वैश्य वर्ण अपने उदर की पूर्ति के साथ-साथ समाज की अर्थ-व्यवस्था एवं भरण-पोषण का भार वहन करते थे। वे अपने सतत प्रयलों द्वारा समाज एवं राज्य को आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान करते थे। उनके प्रमुख कर्त्तव्यों में कृषि कर्म, पशुपालन, व्यापार, उद्योग-धन्धे तथा दान आदि थे। इसके अतिरिक्त उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार भी प्राप्त था। वे जो कुछ भी उत्पन्न करते थे, समाज एवं राज्य का उस पर पूर्ण नियन्त्रण होता था। अपनी आय का कुछ अंश उन्हें राज्य को आय कर के रूप में देना पड़ता था। आर्थिक समृद्धि एवं विकास के लिए वे यज्ञों का आयोजन भी करते थे।

(4) शूद्र- दैविक उत्पत्ति के आधार पर शूद्र समाज के चरण थे। जिस प्रकार शरीर का सम्पूर्ण भार पैरों पर होता है, उसी प्रकार शूद्र वर्ण पर समाज का पूरा-पूरा भार था । मनु ने लिखा है-“तीनों वर्गों की सेवा करना, यही एक कर्म, ईश्वर ने शूद्रों के निमित्त बनाया है।’ यह वर्ण समाज के हीन कर्म करता था।

वर्ण-व्यवस्था के लाभ

(1) संस्कृति एवं धर्म की रक्षा- वर्ण-व्यवस्था की लगभग तीन हजार वर्षों से चली आ रही निरन्तरता इस बात का प्रमाण है कि इस वर्ण-व्यवस्था में अनेक गुण रहे होंगे। भारतीय हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा का श्रेय वर्ण व्यवस्था को ही है। अपनी संकीर्णता एवं संकुचित व्यवस्था के कारण वर्णों ने, दूसरी जातियों के साथ सम्मिश्रण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। भारतीय वर्ण-व्यवस्था के कारण ही हमारी संस्कृति एवं धर्म को यूनानी, हूणं तथा मुसलमान आक्रमणकारी प्रभावित न कर. सके, वरन् स्वयं ही विलीन हो गये।

(2) आध्यात्मिक उन्नति- ब्राह्मणों को आध्यात्मिक क्षेत्र का अधिकारी-वर्ण-व्यवस्था के ही कारण माना गया था। उन्हें धनोपार्जन तथा सुरक्षा की चिन्ता नहीं थी। अतः वे सारी शक्ति आध्यात्मिक उन्नति में लगा देते थे। इस कारण आध्यात्मिक जगत में विशेष उन्नति हुई। मोक्ष पाने का साधन ब्राह्मण बताते थे तथा उसकी प्राप्ति सभी के लिये उपलब्ध थी।

(3) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा- अपने-अपने कर्म क्षेत्र में सभी वर्गों को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी। अतः उन्हें विकास करने का समान अवसर प्राप्त था। ब्राह्मण क्षत्रियों के कार्य-क्षेत्र में बाधक नहीं थे और न ही क्षत्रिय वैश्य के कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करता था। इस प्रकार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के मूल सिद्धान्तों की रक्षा होती थी।

(4) एकता की भावना- वर्ण-व्यवस्था के ही कारण एकता की स्थापना हुई। एक ही कर्म करने वाले अपने हितों की रक्षा करने के लिये संघ बना लेते थे। उनमें परस्पर प्रेम एवं सहयोग की भावना रहती थी। धीरे-धीरे इस भावना का प्रसार सारे समाज में हो गया। विदेशी आक्रमण के समय केवल क्षत्रिय ही नहीं वरन् सारा समाज अस्त्र-शस्त्र धारण कर लेता था और पूर्ण सहयोग देता था।

(5) कार्यगत कुशलता- प्रत्येक वर्ण का कर्म-क्षेत्र भित्र था तथा सभी कर्म आवश्यक एवं एक-दूसरे से सम्बन्धित थे। अतः समाज के चारों वर्ण अपने कार्य-क्षेत्र में पूर्ण कुशलता प्राप्त करने में लगे रहते थे।

वर्ण-व्यवस्था के दोष

सर हेनरी मेन ने वर्ण-व्यवस्था को “As the most disasterous human institution.” कहा है। वास्तव में जन्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था अनैतिक है। भेद का आधार गीता में वर्णित ‘गुण’ तथा ‘कर्म’ होना चाहिये था जन्म से ही शूद्र होने के कारण समाज का बहुसंख्यक शूद्र वर्ण सदैव के लिए हीन एवं पददलित बन गया। वर्गों के मध्य संकीर्णता तथा संकुचित भावनाओं के कारण अनेकता उत्पन्न हो गई। युद्ध में यदि क्षत्रिय पराजित होते थे तो समाज की पराजय हो जाती थी। श्री विन्सेन्ट स्मिथ के अनुसार वर्ण-व्यवस्था के दूषित होने का कारण था। “IL shuts of Indians from free association with foreigners.”

परिणामस्वरूप भारतीयों तथा विदेशियों में सहकारिता एवं आपसी संबंधों का अभाव बना रहा। वर्ण-व्यवस्था का एक अन्य दोष यह भी था कि इससे प्रत्येक वर्ण का दृष्टिकोण संकुचित हो गया तथा राष्ट्रीय भावना के उदय होने में अवरोध उत्पन्न हुआ।

प्राकृतिक दृष्टि से मनुष्य समान है, फिर यह अप्राकृतिक बन्धन क्यों ? सभी को समान अवसर प्राप्त क्यों नहीं होता? इस प्रकार के अनेक प्रश्नों के उत्तर देने में वर्ण-व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ जाती हैं। भारतीय समाज की अनेक दुःखद घटनाओं का कारण हमें वर्ण-व्यवस्था में ही प्राप्त होता है। तेलगू के कवि श्री यमन के शब्दों में-जाति-प्रथा के दुःख एवं कष्ट असीमित हैं।

उपरोक्त वर्णन एवं विवेचनों से वर्ण-व्यवस्था के दोषों पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। अतः इससे स्पष्ट है कि इस वर्ण-व्यवस्था से हमारे देश को लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक हुई है। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि जिस काल में इस व्यवस्था की स्थापना हुई थी उस काल में यह व्यवस्था अपने महान गौरवपूर्ण रूप में विद्यमान थी। आज वर्ण-व्यवस्था का घोर विरोध हो रहा है-यह ठीक भी है क्योंकि आधुनिक युग में इसकी कोई आवश्यकता नहीं। दोष उन आदिकालीन वर्ण- व्यवस्थापकों नहीं अपितु स्वयं हमारा ही है कि मृत एवं महत्वहीन व्यवस्था को आज भी हम अपने  हृदय से लगाये हुये हैं और उसे अपनाये हुये हैं। भारतीय आत्मा ने सदैव ही मानव को उसके सत्य रूप में देखा है, मूल एवं प्राकृतिक अधिकारों में हमारा दृढ़ विश्वास है। अतः समय-समय पर इस वर्ण-व्यवस्था को मिटाने की बात भी हमने स्वयं ही कही है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने “हिन्दुस्तान की खोज” में वर्ण व्यवस्था का वर्णन करते हुये लिखा है-

“ऐसे काल में जब कि यह नियम था कि हारे हुये लोगों को या तो दास बना लेते या उन्हें विलकुल मिटा देते थे। वर्ण-व्यवस्था ने एक शान्तिपूर्ण हल पेश किया और बढ़ते हुये धन्धों की आवश्यकता ने इसमें मदद पहँचाई। समाज में दर्ने स्थापित हो गये, किसान जनता में से वैश्य बने, जिनमें किसान, कारीगर और व्यापारी लोग थे, क्षत्रिय हुये, जो कि शासन करते थे या युद्ध करते थे ब्राह्मण बने, जो कि पुरोहिती करते थे, विचारक थे, जिनके हाथ में नीति की बागडोर थी और जिनसे यह आशा की जाती थी कि वे जाति के आदर्शों की रक्षा करेंगे। इन तीन वर्षों से नीचे शूद्र थे जो कि मजदूरी करते थे और ऐसे धन्धे करते थे जिनमें विशेष जानकारी की आवश्यकता नहीं होती थी। इस वर्ण विभाजन में अदला-बदली होती रही और सख्ती के साथ तो भेद बाद में स्थापित हुये।”

जाति तथा वर्ण का अन्तर

डा० रॉलिसन के अनुसार ‘जाति’ एक पुर्तगाली शब्द है तथा इसका अर्थ किसी वर्ग की पवित्रता तथा शुद्धता है। डा० गोखले ने जाति तथा वर्ग का अन्तर स्पष्ट करते हुये लिखा है कि ‘जाति’ का निर्धारण जन्म के आधार पर किया जाता है तथा ‘वर्ग’ का निर्धारण शरीर के रंग के अनुसार किया जाता है। प्रमाणस्वरूप यह कहा जा सकता है कि आर्य एक जाति थी और उसी प्रकार अनार्य भी एक जाति ही थी। परन्तु ‘वर्ण’ शब्द का प्रयोग जाति के लिये नहीं वरन् रंग के लिये किया जाता था। जब गौर वर्ण आर्यों ने अनार्यों का समाजीकरण किया तो उन्हें अनार्य जाति के रूप में नहीं वरन् उनके काले वर्ण के रूप में किया। जाति और वर्ण में यही अन्तर है।

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Pankaja Singh

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