शिक्षाशास्त्र

वैदिक कालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध | Teacher-Student Relation in Vedic Period in Hindi

वैदिक कालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध | Teacher-Student Relation in Vedic Period in Hindi

वैदिक कालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध (Teacher-Student Relation in Vedic Period)

वैदिक शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य का सम्बन्ध आदर्श होने के कारण अनुकरणीय रहा है । प्रायः माता-पिता ही बालक के प्रथम शिक्षक माने जाते हैं, लेकिन वैदिक काल में भारत में पिता का स्थान शिक्षक को ही प्राप्त था। इस युग में ऋषियों को ही आदि-गुरु की संज्ञा प्रदान की गई है। वेदों में ऋषियों को अनादृश्य बताया है जिसका अभिप्राय उन लोगों से है जिन्होंने घोर तप द्वारा दिव्यता तथा स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर लिया है। ये मुनिगण वृक्ष की छाल से आवृत, तप की दिव्यता से दीपित देवत्व को प्राप्त करते व स्वच्छादि वायु के  समान सर्वत्र विचरण करते थे। ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में उन्हें समाधिस्थ, वायु के समान सूक्ष्म रूप धारण करने  वाले, वचन व कर्म से सत्य का पालन व सद्गुणों में देवताओं की समता करने वाला कहा गया है।

ऋग्वेद में गुरु को वाचस् अर्थात् उच्च ज्ञान से परिपूर्ण कहा गया है। अथर्व व अन्य वेदों में उसे गुरु  या आचार्य की संज्ञा दी गई है। आचार्य शब्द का अर्थ है अच्छे आचरण वाला, शुद्ध आचरण युक्त। इसी से पता चलता है कि गुरु के व्यक्तित्व में ज्ञान की अपेक्षा आचरण या व्यवहार पर अधिक जोर दिया गया है। इन वेदों में गुरु की तुलना यम से भी की गई है जिसका तात्पर्य है पापियों का नाश करने वाला। इस प्रकार वैदिक गुरु का अपना निजी व्यक्तित्व था। वे ज्ञानवान थे तथा अधिकाधिक ज्ञानार्जन में रत रहते थे। वे विचार एवं वाणी से सत्य का पालन करते थे। वे दोष व अज्ञान का नाश करने वाले और प्रकाश व आनन्द प्रदान करने वाले थे। उपनिषदों में विज्ञ, यज्ञादि में दक्ष, त्यागी, ज्ञानवान् आदि रूपों में अच्छे शिक्षक ब्राह्मण ही हुआ करते थे। अतएव, पुराणों में पंडित, साधुजन एवं ब्राह्मणों के अपेक्षित गुणों की सूची स्थान-स्थान पर मिलती है। यथा, कोमल हृदय,मोह रहित, शास्त्र, सात्विक आचारवान, सुशील,श्रद्धापूर्ण,कृतज्ञ, सत्यवादी,कर्त्तव्यपरायण, मिष्ठभाषी, आत्मनिग्रही आदि कहकर उनका वर्णन किया गया है। वैदिक काल में गुरु-शिष्य का सम्बन्ध पिता-पुत्र के समान था। गुरु बालक का मानसिक व आध्यात्मिक पिता समझा जाता था। शिष्य भी गुरु को पिता की भाँति सम्मान प्रदान करते थे। वे गुरु के गहन पांडित्य व निष्कलंक चरित्र में अटूट विश्वास तथा श्रद्धा रखते थे।

गुरु की योग्यताएँ

शिक्षक के लिए प्रगाढ़ पांडित्य ही यथेष्ट नहीं था, धारा प्रवाह वक्तृत्व, वाक्चातुर्य, मानसिक सजगता, रुचिकर दृष्टान्तों का अक्षय भण्डार व कठिनतम शब्दों के तुरन्त तथा सहज स्पष्टीकरण की क्षमता आदि गुणों का होना भी जरूरी था, संक्षेप में, उसे अपने विषय का पंडित होने के साथ ही साथ शिक्षण-प्रक्रिया में भी दक्ष होना अनिवार्य था। पढ़ाने के अलावा शिक्षक में शिष्य को प्रोत्साहित करने की भी क्षमता होनी चाहिए। अपनी पवित्रता, उच्च चरित्र, पांडित्य व सुसंस्कृत जीवन द्वारा चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने वाले शिष्यों को सूक्ष्म किन्तु स्थायी रूप से प्रभावित करना उनके लिए जरूरी था।

गुरु के कर्त्तव्य

छात्रों के प्रति गुरु के प्रमुख कर्त्तव्य निम्नलिखित थे-

(1) गुरु छात्रों का मानसिक व आध्यात्मिक पिता समझा जाता था, अत: वह छात्रों की न्यूनताओं के लिए उत्तदायी होता था।

(2) वह विद्यार्थियों के आचरण पर नियंत्रण रखता था, उन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान कराता था।

(3) वह छात्रों को भोजन, स्वास्थ्य व शयन के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश देता था।

(4) गरीब छात्रों के लिए भोजन, चिकित्सा व छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करता था।

(5) निःस्वार्थ भाव से शिक्षा देना व शिष्यों के यश की कामना करना।

(6) शिष्यों के बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास में सहायता करना।

(7) शिष्यों को जीवन के चरम सत्यों का ज्ञान प्रदान करना ।

(8) विद्यार्थी की क्षमताओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना व उनके अनुरूप शिक्षा सामग्री एवं शिक्षण-विधि का प्रयोग करना ।

छात्रों के कर्त्तव्य

छात्रों के कर्त्तव्य गुरुओं के प्रति प्रमुख रूप से निम्नलिखित थे-

(1) गुरुओं का पिता, राजा व ईश्वर के समान आदर करना ।

(2) छात्रों का बाह्य व्यवहार भी गुरुओं के प्रति उपयुक्त होना चाहिए। उन्हें गुरुओं को उचित ढंग से अभिवादन करना चाहिए। उन्हें गुरु के समक्ष उच्च आसन नहीं ग्रहण करना चाहिए। उन्हें आकर्षक वस्त्र भी गुरुओं के सामने नहीं धारण करना चाहिए।

(3) उनके लिए परनिंदा निषेध था।

(4) गुरु की आज्ञा का पालन, गुरु-गृह की अग्नि को प्रज्वलित रखना।

(5) गुरु की गायों को चराना, ईंधन इकट्ठा करना, बर्तन साफ करना व गुरु-गृह की सफाई करना।

(6) सादा जीवन व्यतीत करना, विद्याभ्यास करना, संयमित जीवन व्यतीत करना व साधारण तथा उत्तेजना रहित भोजन करना।

(7) ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना।

(8) भिक्षा माँगना सभी के लिए जरूरी था।

गुरु व शिष्य का यह सम्बन्ध विद्यार्थी जीवन के समाप्त होने के बाद भी पूर्ववत् बना रहता था। शिक्षा-समाप्ति के बाद जब विद्यार्थी अपने घर लौट जाता था, तो भी उसे कभी-कभी गुरु-दर्शन के लिए जाना पड़ता था व अपने साथ कोई उपहार भी ले जाना पड़ता था। शिक्षक भी कभी-कभी विद्यार्थियों को देखने के लिए जाते थे। वे इस बात का पता लगाते थे कि विद्यार्थी किस सीमा तक अपने अध्ययन को बनाये रखे हुए हैं। इस प्रकार से गुरु-शिष्य सम्बन्ध दोनों पक्षों के लिए लाभदायक था। वैदिक शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध घनिष्ठ होने का सबसे बड़ा कारण था कि दोनों के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना था। अतएव दोनों एक ही मार्ग के पथिक समझे जाते थे क्योंकि दोनों संयुक्त प्रयत्न व सहयोग द्वारा जीवन के चरम सत्यों को प्राप्त करना चाहते थे। इस प्रकार दोनों का सम्बन्ध स्नेह व सम्मिलन के उच्च स्तर पर आधारित था। शिक्षक और शिक्षार्थी का पारस्परिक सम्बन्ध, स्नेह, ममता व श्रद्धा के अतिरिक्त आध्यात्मिक एकता पर आधारित था। इसीलिए उनमें आपस में क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, आज्ञोल्लंघन, अनादर व अविश्वास के लिए आशंका नहीं थी तथा न ही शैक्षिक वातावरण की शान्ति भंग होने का कभी अवसर ही आता था। शिक्षक व शिक्षार्थी दोनों के चरित्र-बल पर काफी जोर दिया जाता था तथा वे भौतिकता व सांसारिकता से दूर रहते थे। महानतम् आध्यात्मिक  विभूति ईश्वर द्वारा निर्देशित कर्त्तव्यों की पूर्ति ही उनके जीवन व अध्यापन का एकमात्र उद्देश्य था। उन दोनों का लक्ष्य सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण करना था।

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Pankaja Singh

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