शिक्षाशास्त्र

वैदिक काल में शिक्षा की व्यवस्था | वैदिक काल में शिक्षण विधियां | वैदिक शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

वैदिक काल में शिक्षा की व्यवस्था | वैदिक काल में शिक्षण विधियां | वैदिक शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

वैदिक काल में शिक्षा की व्यवस्था

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा की ऐसी आदर्श व्यवस्था की गई थी जो व्यक्ति के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन को सफल बनाने में सहायक ती कौन विराम इस योग की शिक्षा व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण निम्नवत है-

  1. शिक्षण संस्थाएं-

प्राचीन काल में विभिन्न प्रकार की शिक्षण संस्थाएं थी, जहां पर विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती थी। विभिन्न प्रकार की शिक्षा संस्थाओं को निम्नलिखित नामों से संबोधित किया जाता था-

  • गुरुकुल इसमें यह कहीं अध्यापक शिक्षार्थियों को वेद, साहित्य एवं धर्म शास्त्र की शिक्षा प्रदान करता था।
  • चरण- इसमें मात्र एक ही अध्यापक होता था, जो शिक्षार्थियों को वेद के किसी एक अंग को ही शिक्षा प्रदान करता था।
  • टोल- ढोल में बीमा से कहीं अध्यापक होता था, जो शिक्षार्थियों को संस्कृत की ही शिक्षा प्रदान करता था।
  • घटिकाएक घटिया में अनेक अध्यापक होते थे। यह अध्यापक शिक्षार्थियों को धर्म एवं दर्शन की उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान करते थे।
  • परिषदपरिषद में अनेक विषयों की शिक्षा शिक्षार्थियों को प्रदान की जाती थी। एक परिषद में लगभग 10 अध्यापक शिक्षण कार्य करते थे।
  • विद्यापीठइसमें शिक्षार्थियों को तर्कशास्त्र एवं व्याकरण की शिक्षा प्रदान की जाती थी। एक विद्यापीठ में अनेक अध्यापक शिक्षण कार्य करते थे।
  • चतुष्पथी- इसे ब्राम्हणीय महाविद्यालय भी कहते थे। इसमें एक ही अध्यापक होता था, जो चारों शास्त्रों (दर्शन, पुराण, व्याकरण एवं कानून) की शिक्षार्थियों को शिक्षा प्रदान करता था।
  • विशिष्ट विद्यालयइस प्रकार के विद्यालय में एक ही शिक्षक द्वारा एक विशिष्ट शिक्षा प्रदान की जाती थी।
  • मंदिर महाविद्यालयये महाविद्यालय एक मंदिर में होते थे। इन महाविद्यालयों में शिक्षार्थियों को विभिन्न विषयों, जैसे- धर्म, वेद,व्याकरण इत्यादि की शिक्षा दी जाती थी। इसमें अनेक अध्यापक होते थे।
  • विश्वविद्यालयप्राचीन काल में उच्च शिक्षा प्रदान करने हेतु विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। इन विश्वविद्यालयों में मुख्यतः धार्मिक शिक्षा प्रदान की जाती थी। एक विश्वविद्यालय में अनेक अध्यापक कार्य करते थे। नालंदा, तक्षशिला, बनारस आदि उस समय के प्रख्यात विश्वविद्यालय थे।

उपरोक्त समस्त प्रकार की शिक्षण संस्थानों पर अध्यापकों का ही नियंत्रण होता था तथा कोई भी वाह्य व्यक्ति इनमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता था।

2. विद्यालयी प्रबंध एवं प्रशासन

  • सिक्षा सत्र- राजेंद्र काल में शिक्षा सत्र की अवधि चार अथवा 5 महीने की होती थी। अध्ययन कार्य श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन प्रारंभ होता था और पौष मास की पूर्णिमा को समाप्त हो जाता था।
  • समय सारणी- इस संबंध में डा. अल्तेकर ने लिखा है कि प्रातः काल के धार्मिक कार्यों के उपरांत प्रातः 8 बजे से शिक्षण कार्य आरंभ हो जाता था तथा 11:00 बजे तक यथावत चलता रहता था। तदोपरांत गुरु भोजन करने चले जाते थे। भोजन करने के कुछ समय बाद 2 बजे से पुनः शिक्षण कार्य आरंभ हो जाता था तथा सायंकाल 5 अथवा 6 बजे तकचलता था।
  • अर्थव्यवस्था एवं शुल्कप्राचीन काल में ज्ञान के प्रसार हेतु गुरुओं द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती थी। ज्ञान का प्रसार करना गुरुओं का प्रमुख धार्मिक कर्तव्य था। उस समय शिक्षण कार्य जीविकोपार्जन का साधन नहीं था। गुरु द्वारा शिक्षा शुल्क लिए जाने पर उसे पातकी माना जाता था और हेय दृष्टि से देखा जाता था।इसी कारण गुरु अपने पद एवं गरिमा को बनाए रखने हेतु शिक्षार्थियों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लेते थे।

अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जब शिक्षार्थियों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था तो विद्यालय का खर्च किस प्रकार चलता था और गुरु एवं शिक्षार्थियों के भोजन की व्यवस्था कैसे होती थी?इन दोनों प्रश्नों का उत्तर यह है कि प्राचीन समय में समाज पर शिक्षा का उत्तरदायित्व था।विद्यालय अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु अनेक साधनों से धन अर्जित किया जाता था, जैसे-गुरु दक्षिणा से, सामान्य जनता से, राज्य से।राज्य द्वारा गुरुकुलों के शिक्षा संचालन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाता था।

  • परीक्षाएंप्राचीनकाल में आज के समान शिक्षार्थी की परीक्षाएं नहीं होती थी। गुरु प्रतिदिन शिक्षार्थियों की मौखिक परीक्षा लेता था। यह परीक्षा दैनिक कार्यों के आधार पर ली जाती थी। परीक्षा पास करने पर शिक्षार्थी को किसी प्रकार का प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता था। योग गुरु प्रश्न उत्तरों के माध्यम से यह जान लेता था कि शिक्षार्थी अमुक विद्या में निपुण हो गया है तो उसे दीक्षा देकर घर भेज दिया जाता था। शिक्षार्थी को दीक्षा देते समय आधुनिक दीक्षांत समारोह के समान समावर्तन संस्कार संपन्न किया जाता था। समावर्तन संस्कार के समय अनेक विद्वान एकत्रित होकर अपने शिक्षार्थियों से भिन्न-भिन्न प्रश्न पूछते थे। समस्त विद्वानों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों का सही उत्तर देने पर शिक्षार्थी को उत्तरण घोषित कर दिया जाता था। समावर्तन संस्कार के पश्चात शिक्षार्थी स्नातक कहलाता था तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था।
  • उपलब्धियां- प्राचीन काल में शिक्षा का सर्व प्रमुख उद्देश्य था-ज्ञानार्जन करना।इसी कारण प्राचीन समय में शिक्षार्थियों को किसी प्रकार की कोई उपाधि प्रदान नहीं की जाती थी। शिक्षार्थी प्राप्त किए हुए ज्ञान को आजीवन याद रखते थे तथा अपने व्यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग करते थे। शिक्षार्थियों को समय-समय पर प्रकांड पंडितों से शास्त्रार्थ भी करना पड़ता था और उनकी चुनौतियों का भी सामना करना होता था।
  • अवकाश का समयप्राचीन काल की शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत अवकाश की व्यवस्था भी थी। संक्रांति,पूर्णिमा एवं प्रत्येक पखवारे की अष्टमी का अवकाश होता था। इनके अतिरिक्त कुछ विशिष्ट स्थितियों में भी अवकाश होता था, जैसे-
    • बाह्य आक्रमण होने पर।
    • गुरुकुल में किसी संभ्रांत अतिथि के आने पर।
    • मौसम ठीक ना होने पर, तथा
    • डाकुओं द्वारा विघ्न उत्पन्न करने पर, आदि।
  • विद्यालयी भवन तथा नियंत्रण- प्राचीन काल में शिक्षार्थी की वृक्षों की छाया में पढ़ते थे, लेकिन कुछ मंदिरों एवं विहारों में भी विद्यालय बना लिए जाते थे। डा. अल्तेकर ने इस संबंध में लिखा है कि- “अच्छे मौसम में कक्षाएं पेड़ों की छाया में होती होंगी, परंतु बरसात के मौसम में किसी प्रकार के साधारण आच्छादन की व्यवस्था अवश्य होगी। देवालयों शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थियों हेतु भव्य एवं विशाल भवन थे।”

प्राचीन काल में शिक्षा बाहरी नियंत्रण से पुर्णत: मुफ्त थी। डा. प्रभु के शब्दों में- “प्राचीन भारत में शिक्षा किसी भी बाहरी नियंत्रण राज्य सरकार अथवा राजनीतिक दल से स्वतंत्र थी।”

3. पाठ्यक्रम

प्राचीन समय में सर्वाधिक बल वेदाध्ययन पर दिया जाता था। पाठ्यक्रम में दो प्रकार की विद्ओं को समाविष्ट किया गया था-

  • पराविद्या (आध्यात्मिक विद्या)पराविद्या के अंतर्गत निम्नलिखित विषयों को समाविष्ट किया गया था-

चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) का अध्ययन, वेदांग, दर्शन, पुराण, उपनिषद, नीतिशास्त्र आदि।

  • अपराविद्या (लौकिक विद्या)इसके अंतर्गत निम्नलिखित विषयों का समावेश होता था-

ज्योतिष विद्या, अंकशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, औषधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, रसायनशास्त्र, शल्यविद्या, धनुर्विद्या, सर्वविद्या।

उपरोक्त विषयों के अतिरिक्त ललित-कलाओं, स्वास्थ्य शिक्षा, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, आयुर्वेद पशुपालन,बीजगणित इत्यादि विषयों को भी पाठ्यक्रम में समाविष्ट किया जाता था। प्राचीन काल में अलग-अलग वर्ण के शिक्षार्थी के लिए पृथक पृथक विषयों का अध्ययन करना आवश्यक था, उदाहरणार्थ-

  • ब्राम्हण वर्ण- धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन- अध्यापन धार्मिक कार्य एवं इन कार्यों से संबंधित ज्ञान।
  • क्षत्रिय वर्णराजनीति एवं सैनिक शिक्षा।
  • वैश्य वर्ण- कृषि, व्यापार एवं गो-पालन आदि की शिक्षा।

4. व्यावसायिक शिक्षा

व्यवसायिक शिक्षा के अंतर्गत निम्नलिखित विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती थी-

  • पुरोहित शिक्षापुरोहित शिक्षा ब्राम्हण वर्ल्ड के शिक्षार्थियों को ही प्रदान की जाती थी। इसके अंतर्गत शिक्षार्थियों को यज्ञ, हमारे इतिहास की शिक्षा प्रदान की जाती थी।
  • सैनिक शिक्षासैनिक शिक्षा क्षत्रिय वर्ण के बालकों को दी जाती थी। सैनिक शिक्षा के अंतर्गत शिक्षार्थियों को अस्त्र-शस्त्र चलाना एवं हाथ एवं घोड़ों का प्रयोग करना सिखाया जाता था।
  • कृषि व वाणिज्य की शिक्षा- वैश्य वर्ण के बालकों को कृषि एवं व्यापार की शिक्षा प्रदान की जाती थी।
  • चिकित्सा शास्त्र की शिक्षाचिकित्सा एवं औषधि शास्त्र के विशेषज्ञ वैयक्तिक रूप से शिक्षार्थियों को रोग- निदान, शल्यज्ञान, विषज्ञान, सर्पदंश, रक्त परीक्षा, अस्थि ज्ञान इत्यादि की शिक्षा प्रदान करते थे।

 5. स्त्री- शिक्षा-

प्राचीन काल में पुरुषों के समान ही स्त्रियों की शिक्षा ग्रहण करती थी। इस काल की अनेक विदुषी महिलाओं, जैसे- घोषा, अपाला, गार्गी, लोममुद्रा आदि का नाम इतिहास में प्रख्यात है। इस युग में पुरुषों के समान ही स्त्रियों का भी उपनयन संस्कार होता था और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कठोरता पूर्वक करना पड़ता था। स्त्रियों को वेदाध्ययन करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। वे वाद- विवाद मैं भाग लेती थी। स्त्रियों को धर्म एवं साहित्य के अतिरिक्त, नृत्य, संगीत, ललित-कलाओं इत्यादि की भी शिक्षा प्रदान की जाती थी।

वैदिक काल में शिक्षण विधियां

वैदिक काल की शिक्षण विधियों को निम्न प्रकार समझा जा सकता है-

  • कथन, प्रदर्शन एवं अभ्यास विधिवैदिक काल में कृषि, पशुपालन, कला-कौशल, सैनी शिक्षा और आयुर्विज्ञान आदित्य प्रधान विषयों की शिक्षा कथन,प्रदर्शन और अभ्यास विधि से दी जाती थी। गुरु सर्वप्रथम क्रिया के संपादन की विधि बताते थे और फिर उसे स्वयं करके दिखाते थे, शिष्य उनका अनुकरण कार्य था क्रिया का अभ्यास करते थे और धीरे-धीरे उसमें दक्षता प्राप्त करते थे।
  • अनुकरण, आवृत्ति एवं कंठस्थ विधिअनुकरण विधि सीखने की स्वाभाविक विधि है। वैदिक काल में प्रारंभिक स्तर पर भाषा और व्यवहार की शिक्षा प्रायः इसी विधि से दी जाती थी। उच्च स्तर पर भी इसका प्रयोग होता था-गुरु शिष्यों के सम्मुख वेद मंत्रों का उच्चारण करते थे, शीशे उनका अनुकरण करते थे, उन्हें बार-बार उच्चारित करते थे और इस प्रकार उन्हें कंठस्थ करते थे।
  • श्रवण, मनन, निदिध्यासन विधियह विधि भी उपनिषदकारों की देन है। उस काल में गुरु जो भी व्याख्यान देते थे, वेद मंत्रों आज की जो भी व्याख्या करते थे, धर्म, दर्शन एवं अन्य विषयों के संबंध में जो कुछ भी जानकारी देते थे, शिष्य उसको ध्यानपूर्वक सुनते थे, उसके बाद उस पर मनन करते थे,चिंतन करते थे और जो तथ्य एवं सत्य उनकी पकड़ में आता था उस पर नियमित रूप से अभ्यास करते थे।
  • कहानी विधि उत्तर वैदिक काल में आचार्य विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को नीति की शिक्षा देने के लिए कहानियों की रचना की। यह कहानियां पंचतंत्र और हितोपदेश के नाम से संग्रहित है। कहानी सुनाने के बाद आचार्य शिष्यों से प्रश्न पूछते थे। इन प्रश्नों में अंतिम प्रश्न या होता था कि इस कहानी से आपको क्या शिक्षा मिलती है। इस प्रकार या कहानी विधि आज की कहानी विधि से कुछ भिन्न थी।
  • व्याख्या एवं दृष्टांत विधि वैदिक काल में शिष्यों कोव्याकरण का कोई नियम अथवा वेदों का कोई मंत्र कंठस्थ कराने के बाद गुरू उसकी व्याख्या करते थे,उसका अर्थ एवं भाव स्पष्ट करते थे और उसके अर्थ एवं भाव को स्पष्ट करने के लिए उपमा, रूपक और दृष्टांतों का प्रयोग करते थे।
  • तर्क विधि उत्तर वैदिक काल में तर्कशास्त्र जैसे विषयों के शिक्षण हेतु तर्क विधि का विकास हुआ। उस समय इस विधि के 5 पद थे- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, अनुप्रयोग और निगमन।
  • प्रश्नोत्तर, वादविवाद और शास्त्रार्थ विधि उत्तर वैदिक काल में उपनिषदों की शैली के आधार पर प्रश्नोत्तर, वाद-विवाद और शास्त्रार्थ विधियों का विकास हुआ। प्रारंभिक वैदिक काल में गुरू उपदेश देते थे, व्याख्यान देते थे और शिष्य शांतिपूर्वक सुनते थे, उत्तर वैदिक काल में शिष्य अपनी शंका प्रस्तुत करते थे, गुरु उनका समाधान करते थे। उच्च शिक्षा में उच्च स्तर के शिष्यों और गुरुओं के बीच वाद-विवाद भी होता था। अति गुढ़ विषयों पर चर्चा हेतु अधिकारी विद्वानों के सम्मेलन भी बुलाए जाते थे, उनके बीच शास्त्रार्थ होता था, शिष्य इस सब को सुनते थे और अपने तत्संबंधी ज्ञान में वृद्धि करते थे।
  • शिक्षा का माध्यम संस्कृत वैदिक काल में सामान्य मनुष्य की संस्कृत भाषा है और शिक्षित मनुष्य की संस्कृत भाषा में अंतर था और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विशुद्ध संस्कृत भाषा का प्रयोग होता था, उस काल में विशुद्ध संस्कृत की शिक्षा का माध्यम थी।
  • नायकीय पद्धति- उत्तर वैदिक काल में जब गुरुकुलों में छात्रों की संख्या बढ़ी तो गुरु ब्राम्हण वर्ण के वरिष्ठ, प्रखर बुद्धि, योग्य और सक्षम छात्रों को नायक बनाने लगे। ये नायक कनिष्ठ छात्रों को भाषा, साहित्य, धर्म और नीतिशास्त्र आदि विषयों का ज्ञान कराते थे। इससे दो लाभ हुए। पहला यह कि गुरुओं का कार्यभार कम हुआ और दूसरा यह कि ब्राह्मण वर्ण के छात्रों को अपने अध्ययन काल में ही अध्यापन कार्य का प्रशिक्षण मिलने लगा।

वैदिक शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

वैदिक कालीन शिक्षा प्रणाली की शिक्षण विधियों के विषय में निम्नलिखित तथ्य उल्लेखनीय हैं-

  • अनुशासन प्रारंभिक वैदिक काल में अनुशासन से तात्पर्य शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संयम से लिया जाता था। उस काल में शारीरिक संयम से तात्पर्य था-ब्रह्मचर्य व्रत का पालन, श्रृंगार न करना, सुगंधित पदार्थों का प्रयोग न करना, नृत्य एवं संगीत में आनंद न लेना, मादक पदार्थों का प्रयोग न करना, जुआ न खेलना, गाय न मारना, झूठ न बोलना और चुगली न करना, मानसिक संयम से तात्पर्य था- इंद्रिय निग्रह, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रम्हचर्य का पालन और काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद से दूर रहना, और आत्मिक संयम से तात्पर्य था-आत्मा के स्वरूप को पहचानना, सबमें एकात्म भाव देखना और सब के कल्याण के लिए कार्य करना, परंतु उत्तर वैदिक काल में शिष्यों द्वारा गुरुओं के आदेशों और गुरुकुलों के नियमों के पालन को ही अनुशासनमाना जाने लगा है और जो चीज से इनका पालन नहीं करते थे उन्हें दंड दिया जाता था लेकिन शारीरिक दंड विशेष परिस्थितियों में ही दिया जाता था
  • शिक्षक (गुरु) वैदिक काल में अति विद्वान, स्वाध्यायी, धर्म परायण और सच्चरित्र व्यक्ति ही गुरु हो सकते थे। ये अति ज्ञानी के साथ-साथ अतिसंयमी भी होते थे। उस समय इन्हें समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। ये देव रूप में प्रतिष्ठित थे। इन्हें धियावसु (जिसकी बुद्धि ही धन है), सत्यजन्मा (सत्य को जानने वाला) और विश्ववेदा (सर्वज्ञ) आदि विश्लेषणों से संबोधित किया जाता था। ये अपने गुरुकुलों के पूर्ण स्वामी होते थे, पर पूर्ण स्वामित्व के साथ पूर्ण उत्तरादायित्व जुड़ा था। ये अपने गुरुकुलों की संपूर्ण व्यवस्था के लिए उत्तरदायी होते थे। यह अपने शिष्यों की आवास, भोजन एवं वस्त्रादि की व्यवस्था करते थे,उनके स्वास्थ्य की देखभाल करते थे और उनके सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्न करते थे।
  • शिक्षार्थी (शिष्य)वैदिक काल में उन्हीं बच्चों को गुरुकुलों में रेस मिलता था जो अविवाहित होते थे। उस काल में शिष्यों को ब्रह्मचारी कहा जाता था। यह ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करते थे, सात्विक भोजन करते थे, सादाबाद से पहनते थे और व्यसनों से दूर रहते थे। उस काल में शिष्य अध्ययन के साथ-साथ गुरुकुलों की व्यवस्था भी करते थे।गुरुकुल के नियमों का पालन और गुरु सेवा इन का परम कर्तव्य होता था। इनकी दिनचर्या बहुत नियमित होती थी पूर्णविराम सभी शिष्य गुरु के जगाने से पहले ब्रह्ममुहूर्त में उठते थे, मल विसर्जन और दातुन के बाद स्नान करते थे, व्यायाम करते थे, गुरुगृह की व्यवस्था करते थे, नित्य पूजा एवं हवन आदि करते थे और इसके बाद अध्ययन करते थे। सूर्य डूबने से पहले संध्या भोजन और रात्रि में गुरु सेवा और गुरु की सेवा के बाद रात्रि विश्राम करते थे।
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