शिक्षाशास्त्र

उत्तर वैदिककालीन शिक्षा | ब्राह्मणकालीन शिक्षा के उद्देश्य | उत्तर वैदिककालीन शिक्षा की विशेषताएं

उत्तर वैदिककालीन शिक्षा | ब्राह्मणकालीन शिक्षा के उद्देश्य | उत्तर वैदिककालीन शिक्षा की विशेषताएं

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उत्तर वैदिककालीन शिक्षा अथवा ब्राह्मणकालीन शिक्षा (Post-Vedic Education or Brahaman Period’s Education)

वैदिककाल के उत्तरार्द्ध में बाह्मण शिक्षा का विकास हुआ। इस शिक्षा पद्धति को उत्तरवैदिककालीन शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है। ब्राह्मणकालीन शिक्षा के उद्देश्य उस काल की भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। इस युग की शिक्षा शिक्षार्थियों को पूर्ण रूप से आध्यात्मिक, धार्मिक एवं नैतिक बनाने वाली थी। इस युग की शिक्षा के आवश्यक अंग, आत्म-नियंत्रण करना, इन्द्रियों को वश में करना, चरित्रवान होना और ज्ञान का अधिक से अधिक संकलन करना था। इन विशिष्टताओं को ध्यान में रखकर ही ब्राह्मणकालीन शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित किया गया था।

ब्राह्मणकालीन शिक्षा के उद्देश्य (Aims of Brahaman Period’s Education)

उत्तरवैदिक काल अथवा ब्राह्मणकालीन शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(1) चरित्र का निर्माण करना-

ब्राह्मण काल में शिक्षार्थियों के चरित्र निर्माण पर विशेष बल दिया जाता था। शिक्षार्थियों के चरित्र का निर्माण करने हेतु उनमें विभिन्न गुणों जैसे–परोपकार, कर्त्तव्यपरायणता, सेवाभाव इत्यादि का विकास किया जाता था। इस समय पूर्ण मानव बनने हेतु आदर्श चरित्र का पालन करना शिक्षार्थी के लिए नितान्त आवश्यक था। इसके अतिरिक्त गुरु भी अपनी योग्यता एवं व्यवहार द्वारा शिक्षार्थियों को प्रभावित करते थे तथा इस प्रकार का वातावरण बनाते थे जिसमें शिक्षार्थियों का चारित्रिक विकास हो सके।

(2) धर्मशास्त्रों एवं ब्राह्मण ग्रन्थों का अनुसरण करना-

ब्राह्मणकालीन शिक्षा के अन्तर्गत शिक्षार्थी वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों एवं धर्मशास्त्रों को कंठस्थ करते थे। प्रत्येक शिक्षार्थी के लिए इन ग्रन्थों में लिखित उपदेशों का अनुसरण करना व जीवन में अपनाना परम आवश्यक था। आज के समान उस समय शिक्षा का पाठ्यक्रम व्यापक न होने के कारण शिक्षार्थियों का ध्यान मात्र धर्मशास्त्रों की ओर आकर्षित होता था। अतः इस काल में शिक्षार्थियों को समाज का अधिकाधिक सदस्य बनाने हेतु तत्कालीन शिक्षा का उद्देश्य धर्मशास्त्रों एवं ब्राह्म ग्रन्थों का अनुसरण करना निर्धारित किया गया।

(3) ज्ञान एवं संस्कृति का संरक्षण करना-

देश की संस्कृति एवं ज्ञान को शिक्षा के माध्यम से ही सुरक्षित रखा जा सकता है। उत्तर वैदिक काल में शिक्षा मौखिक रूप में ही प्रदान की जाती थी। गुरु द्वारा दिये गये उपदेश को शिक्षार्थी कंठस्थ कर लिया करते थे। इसलिए ब्राह्मण काल में श्रुति एवं मनुस्मृति का विशेष महत्व था। इस काल में शिक्षार्थियों को इस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जाती थी, जिससे वे अपनी संस्कृति से परिचित होकर उसका संरक्षण एवं प्रसार कर सकें । इसलिये इस काल की शिक्षा का एक अन्य उद्देश्य ज्ञान एवं संस्कृति का संरक्षण करना स्वीकार किया गया।

(4) आध्यात्मिकता पर बल देना-

आध्यात्मिकता पर बल देना, ब्राह्मणकालीन शिक्षा का अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य था। यह युग यज्ञ, हवनादि धार्मिक कार्यों हेतु प्रख्यात था और इस समय लौकिकता की तुलना में आध्यात्मिकता पर विशेष बल दिया जाता था।

(5) नैतिकता एवं पवित्रता का प्रसार करना-

ब्राह्मण काल में लिखे गये धार्मिक ग्रन्थों में नैतिकता का उल्लेख हुआ था। आश्रमों में शिक्षार्थियों को तन एवं मन से पवित्र रहने का उपदेश गुरुओं द्वारा दिया जाता था। इसके अतिरिक्त अनेक उच्च आदर्शों जैसे-आत्मवत सर्वभूतेषू आदि की शिक्षा भी शिक्षार्थियों को प्रदान की जाती थी। गुरुजनों का यह विश्वास था कि शिक्षार्थी तभी श्रेष्ठ व्यक्ति बन सकते हैं, जब वे नैतिक एवं पवित्र हों। इसी कारण ब्राह्मण काल में नैतिकता एवं पवित्रता के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

(6) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना-

ब्राह्मणकालीन शिक्षा का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उद्देश्य था। इस काल में शिक्षार्थियों को वेद, उपनिषद् इत्यादि के अध्ययन के अलावा अन्य कार्य भी करना पड़ते थे, जैसे कृषि करना, गुरु की सेवा करना आदि शिक्षार्थियों का शारीरिक एवं मानसिक विकास करने हेतु पाठ्यक्रम में विभिन्न प्रकार के विषयों को समाविष्ट किया गया था। गुरु आश्रमों में ब्राह्मण एवं वैश्य वर्ण के शिक्षार्थियों को जंगल में पशुओं को चराने, लकड़ी काटने इत्यादि के लिए भेज दिया जाता था, जिससे वे व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकें। इस समय शिक्षार्थियों को ललित एवं उपयोगी कलाओं को भी सिखाया जाता था।

उत्तर वैदिककालीन शिक्षा की विशेषताएं (Characteristics of Post-Vedic Education)

पूर्व वैदिक एवं उत्तर वैदिककालीन शिक्षा में कोई विशेष अन्तर नहीं था, फिर भी इस काल की शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन निम्न प्रकार कर सकते हैं-

(1) उपनयन संस्कार एवं ब्रह्मचर्य आश्रम-

उपनयन संस्कार के पश्चात ही शिक्षार्थी ब्रह्मचर्य जीवन में प्रवेश करता था। उपनयन संस्कार द्वारा बालक गुरु के निकट जाकर उसका शिष्य बनता था। इस सम्बन्ध में मनुस्मृति में लिखा है कि इस संस्कार के न करने पर व्यक्ति समाज से पतित एवं बहिष्कृत समझा जाता था। उपनयन संस्कार 7 अथवा 8 वर्ष की आयु में सम्पन्न होता था। उपनयन संस्कार मनु के अनुसार ब्राह्मण के लिए 5वें वर्ष, क्षत्रिय के लिए 6 छठे तथा वैश्य के लिए 8वें वर्ष में किया जाना चाहिए। यही अवस्था विद्या आरम्भ करने की समझनी चाहिए। आर्यों ने मनुष्य के जीवन को चार भागों में विभाजित किया था-1 से 25 वर्ष 25 से 50 वर्ष,50 से 75 वर्ष और 75 से 100 वर्ष । मनुष्य के प्रथम 25 वर्ष के भाग को ब्रह्मचर्य आश्रम कहते थे। इस समय व्यक्ति गुरु से विद्या प्राप्त करता हुआ शारीरिक, आध्यात्मिक एवं मानसिक विकास करता था। उपनयन संस्कार के उपरान्त ब्रह्मचारी को, गुरुकुल में गुरु के पास विद्या अध्ययन करने हेतु भेज दिया जाता था, जहाँ वह कठोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए शिक्षा प्राप्त करता था। उसका जीवन संयम एवं सदाचार युक्त होता था। उसका भोजन सादा होता था। उत्तर वैदिककालीन शिक्षा में उपनयन संस्कार का सर्वाधिक महत्व था।

(2) शिक्षार्थियों की दिनचर्या-

ब्राह्मणयुगीन शिक्षा के अन्तर्गत शिक्षार्थियों की दिनचर्या से सम्बन्धित कर्तव्यों को निर्धारित कर दिया गया था, जैसे-

  • शिक्षा ग्रहण करना।
  • आश्रम के पशुओं एवं अन्य जीवों की सेवा करना।
  • यज्ञकुण्ड की अग्नि को प्रज्जवलित रखना।
  • आश्रम में कृषि कार्य करना।
  • बौद्धिक शिक्षा प्राप्त करना ।
  • नैतिक शिक्षा हेतु गुरु की आज्ञा का पालन करना।
  • अनुशासित एवं संयमित रहकर सदाचार का पालन करना, आदि ।

(3) गुरु-शिष्य सम्बन्ध-

उत्तर वैदिक काल में गुरु एवं शिष्य के सम्बन्ध अत्यन्त मधुर, पिता व पुत्र के समान आदर्शमय थे। गुरु एवं शिष्य परस्पर परिवार के सदस्य के समान ही रहते थे ।

(4) स्त्री शिक्षा-

उत्तर वैदिक काल में नारियों को शिक्षा से विमुख कर दिया गया। अब वे सामाजिक समारोहों में भी भाग नहीं ले सकती थीं। उनका सामाजिक स्तर दिन-प्रतिदिन गिरने लगा। यहाँ तक कि कन्यादान को अमंगलकारी एवं दुखमयी माना जाने लगा।

(5) शिक्षा पद्धति-

वैदिक युग में‌ श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन विधि का प्रयोग शिक्षण हेतु किया जाता था। वृहदारण्यक उपनिषद् में दर्शन,श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन-चार पदों का उल्लेख हुआ है। दर्शन का आशय किसी वस्तु के बाह्य स्वरूप को देखकर उसके वास्तविक स्वरूप का दर्शन करने की जिज्ञासा से है। आगम को सुनना श्रवण तथा सुने हुए पर बार-बार विचार करना मनन कहलाता है। निदिध्यासन का आशय है- मनन की हुई अथवा सुसंगत तर्क द्वारा प्रतिष्ठित तथ्यों को बार-बार ध्यान में लाना । इस प्रकार श्रवण एवं मनन द्वारा प्राप्त तथ्यों को ठीक प्रकार से मन में बैठा लेना ही निदिध्यासन का उद्देश्य है।

(6) अध्ययन के विषय (पाठ्यक्रम) –

ऋग्वैदिक काल की तुलना में उत्तर वैदिक युगीन शिक्षा के पाठ्यक्रम में विषयों की संख्या में वृद्धि हुई। इस काल की शिक्षा के पाठ्यक्रम में निम्नलिखित विषयों को समाविष्ट किया गया-चार वेद तथा उनके 6 अंग-ज्योतिष, व्याकरण, गणित, इतिहास, पुराण, दर्शन, अर्थशास्त्र, राजनीति, कृषि, न्यायशास्त्र, रस, छन्द, अलंकार, ब्रह्म विद्या, मूल विद्या, सर्प विद्या, देव विद्या, नक्षत्र एवं नृत्य विद्या, संगीत शास्त्र आदि ।

(7) शिक्षा की अवधि-

सामान्यतः शिक्षा की अवधि 12 वर्ष की होती थी। 12 वर्ष का बालक गुरुकुल भेज दिया जाता था और 12 वर्ष तक ही वह गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करता था। तदोपरान्त उसे स्नातक बना दिया जाता था। लेकिन स्नातकोत्तर अध्ययन हेतु सम्भवत: आयु का कोई बन्धन नहीं था।

(8) समावर्तन संस्कार-

24 वर्ष की आयु में, अर्थात् 12 वर्ष तक विद्याध्ययन समाप्त करने के बाद गुरु विद्यार्थी का समावर्तन संस्कार करते थे। समावर्तन संस्कार का आशय है ब्रह्मचारी द्वारा अध्ययन समाप्त कर आचार्यकुल से अपने घर की ओर लौटना। यहीं से उसका गृहस्थ अथवा सामाजिक जीवन आरम्भ होता था। यहाँ गुरु शिक्षार्थी से यह अपेक्षा करता था कि जो कुछ उसने आचार्यकुल में रहकर सीखा है उसे वह अपने  दैनिक जीवन में व्यवहार में लाये तथा समाज एवं देश का कल्याण करता हुआ स्वयं का भी कल्याण करे। इसीलिए यह आचार्य का अन्तिम उपदेश होता था।

(9) शिक्षा की सामाजिक व्यवस्था-

ऋग्वैदिक काल की तुलना में उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था के नियम अत्यधिक कठोर हो गये थे तथा चारों वर्गों के कार्यों को भी निर्धारित कर दिया गया था। ब्राह्मणों का शिक्षा पर एकाधिपत्य था। इसलिए इस युग में केवल ब्राह्मण ग्रन्थों को ही प्रमाणिक माना गया। वर्ण एवं जाति भेद के कारण समाज में संकीर्णता फैल गयी थी। समाज रूढ़िवादी हो गया था। वर्ण व्यवस्था में सबसे अधिक हानि चतुर्थ वर्ण (शूद्र) की हुई। उन्हें अछूत माना गया और शिक्षक संस्थाओं एवं धार्मिक समारोहों में उन्हें भाग लेने से वंचित कर दिया गया।

(10) धार्मिक विचारों का बाहुल्य-

उत्तरवैदिक काल में धार्मिक विचारों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, इसीलिए शिक्षार्थियों को भिन्न-भिन्न प्रकार की धार्मिक क्रियाओं का ज्ञान प्रदान किया जाता था। गुरु आश्रमों में भी विभिन्न प्रकार की धार्मिक क्रियायें आयोजित की जाती थीं। इनके द्वारा शिक्षार्थी धार्मिक कार्यों को करना सीखते थे। आश्रमों में रहकर ही शिक्षार्थी धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करने में दक्ष हो जाते थे। इस काल की शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में धार्मिक भावनाओं का बाहुल्य था।

(11) शारीरिक दण्ड का कम से कम उपयोग

छात्र स्वयं अनुशासित जीवन व्यतीत करें इसके लिए प्रयास किया जाता था। शारीरिक दण्ड का पूर्णतया निषेध तो नहीं था फिर भी कठोर दण्ड अच्छा नहीं माना जाता था।

(12) शिक्षा का जीवन से सम्बन्ध-

शिक्षा जीवन के लिए तैयार करती थी। विद्यार्थी को ऐसा ज्ञान दिया जाता था और उसमें ऐसी योग्यताएँ विकसित की जाती थीं जिससे कि वह अपना तथा अपने परिवार का भली प्रकार भरण-पोषण कर सके।

(13) शिक्षा संस्थानों की स्वतंत्रता

शिक्षा संस्था पर केवल आचार्य का ही आधिपत्य रहता था। किसी भी दल एवं राजा का किसी प्रकार से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में भी प्रभाव शिक्षण संस्थाओं पर नहीं रहता था।

(14) कक्षा में नायकीय पद्धति

कक्षा के सर्वोत्तम विद्यार्थी को कक्षा नायक बनाया जाता था। कक्षा नायक ही शेष छात्रों की कठिनाई दूर करते थे। इस पद्धति के कारण प्रायः सभी छात्रों को व्यक्तिगत ध्यान मिल जाता था। बाद में इस प्रणाली को अंग्रेजों ने मॉनीटर प्रणाली के रूप में इग्लैंड में अपनाया।

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Pankaja Singh

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