अर्थशास्त्र

उत्पत्ति हास्य परिवर्तनशील अनुपात नियम | परिवर्तनशील अनुपात नियम की व्याख्या

उत्पत्ति हास्य परिवर्तनशील अनुपात नियम | परिवर्तनशील अनुपात नियम की व्याख्या

उत्पत्ति हास्य परिवर्तनशील अनुपात नियम से आशय

उत्पादन विभिन्न साधनों के द्वारा होता है किंतु न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन के लिए उन्हें एक अनुकूलतम या आदर्श अनुपात में संयोजित करना होता है। जब उत्पत्ति के साधनों में से एक या अधिक साधन को स्थिर रखकर एनी की मात्राएं बढ़ाई जाती है,तो उत्पादन के संबंध में देखा गया है कि एक बिंदु तथा वह अनुपात से अधिक बढ़ता है, तत्पश्चात अनुपातिक रूप से बढ़ता है और अंत में अनुपात से कम बढ़ता है। इन अवस्थाओं को क्रमशः उत्पत्ति वृद्धि नियम, उत्पत्ति स्थिरता नियम एवं उत्पत्ति हास नियम कहा गया है।

आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उत्पत्ति हास्य नियम ना केवल कृषि में वरन उद्योग व अन्य सभी क्षेत्रों में क्रियाशील होता है, क्योंकि स्थिरता भूमिका ही गुण नहीं है। इस व्यापक क्रियाशीलता को व्यक्त करने की दृष्टि से आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने उत्पत्ति हास्य नियम को परिवर्तनशील अनुपात का नियम’ कहां है। चुकी उत्पादन की मात्रा उत्पत्ति साधनों के परिवर्तनशील अनुपातों पर निर्भर करती है, इसलिए यह नाम सार्थक है। इसे ‘अनुपातों का नियम’ भी कहते हैं, क्योंकि उत्पादन की मात्रा उत्पत्ति के साधनों को संयोजित करने के अनुपात पर निर्भर रहती है। इसे ‘प्रतिफल का भी नियम’ कहा जाता है, क्योंकि उत्पत्ति-साधनों को मिलाने का अनुपात बदलने से उत्पादन या प्रतिफल भी परिवर्तित होता रहता है। इसका यह कौन है नाम है ‘असमान अनुपातीय प्रतिफल का नियम’ क्योंकि उत्पत्ति के साधनों कौनसा आयोजित करने के अनुपात में परिवर्तित करने से उत्पादन या प्रतिफल असमान अनुपात में परिवर्तित होता है। इसी को ‘सीमांत उत्पादकता हास्य नियम’ कहते हैं, क्योंकि एक बिंदु के बाद सीमांत उत्पादकता घटने लगती है। जबकि प्रो. सेम्युलसन और श्रीमती जान रॉबिंसन नियम को इस के पुराने नाम- उत्पत्ति हास्य नियम या ‘हास्य मान प्रतिफल  नियम’ से ही पुकारते हैं, तब प्रो. बोल्डिंग इसे ‘अंततः घटती हुई सीमांत भौतिक उत्पादकता का नियम’ कहना अधिक उचित समझते हैं, क्योंकि उनके मतानुसार, ‘घटता हुआ प्रतिफल’ एक स्पष्ट शब्द है जिसके अनेक अर्थ लिखे जा सकते हैं।

नियम की व्याख्या

पूर्व पृष्ठांकित परिभाषाओं में रॉबिंसन उत्पत्ति के एक साधन को स्थिर रखकर अन्य साधनों को परिवर्तनशील रखती है जबकि बेन्हम,आदि अर्थशास्त्री अन्य साधनों को इस तीर और केवल एक साधन को परिवर्तनशील रखते हुए सीमांत उत्पादन मालूम करते हैं। दोनों दृष्टिकोण में भेद नहीं है क्योंकि मुख्य बाद कुछ साधनों को स्थिर रखना और कुछ का परिवर्तनशील होना है। मान लीजिए कि श्रम परिवर्तनशील साधन है जबकि भूमि और पूजी स्थिर साधन है। श्रम की उत्तरोत्तर इकाइयां प्रयोग करने से प्राप्त उत्पादन सूचना निम्नांकित हैं-

श्रम इकाइयाँ

कुल उत्पादन

(मी. टन)

औसत उत्पादन

(मी. टन)

सीमांत उत्पादन

(मी. टन)

टिप्पणी

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34.0

35.0

35.0

34.0

2.00

2.50

4.00

4.75

5.00

4.83

4.57

4.25

3.89

3.50

3.10

2.0

3.0

7.0

7.0

6.0

4.0

3.0

2.0

1.0

-1.0

प्रथम अवस्था

 

द्वितीय अवस्था

 

तृतीय अवस्था

श्रमकी उत्तरोत्तर इकाइयों का प्रयोग करने से प्राप्त होने वाले उत्पादन के संबंध में निम्न तीन अवस्थाएं दिखाई देती हैं-

प्रथम अवस्था

इसमें श्रम की मात्रा बढ़ने से स्थित साधनों (भूमि व पूंजी) का अच्छा प्रयोग होने लगता है। इस अवस्था में उत्पादन तो बढ़ता ही है, कुल उत्पादन भी प्रगतिशील दर से बढ़ता है तथा औसत उत्पादन में भी वृद्धि होती है। चुकी इस अवस्था में औसत उत्पादन (AP) निरंतर बढ़ता है, इसलिए इसे बढ़ते हुए ‘औसत उत्पादन की अवस्था’ भी कहते हैं। इसी अवस्था में एक स्थान अर्थात श्रम की चौथी इकाई पर MP अधिकतम होकर घटने लगता है किंतु APबढ़ता हुआ श्रम की पांचवीं इकाई पर अधिकतम हो जाता है। सीमांत उत्पादन घटने पर भी औसत उत्पादन क्यों पड़ता है? स्पष्ट है कि जब तक अंतिम श्रमिक पिछले सभी श्रमिकों के औसत उत्पादन से अधिक उत्पादन बढ़ायेगा (अर्थात जब तक MP > AP) है तब तक औसत उत्पादन बड़े गए और यदि वह कम उत्पादन बढ़ायेगा (अर्थात जब MP < AP हो) तो औसत उत्पादन घटेगा। उल्लेखनीय है कि मार्शल के अनुसार, जहां तक MP बढ़ता है वहां तक ‘बढ़ते हुए उत्पादन की अवस्था’ और जहां से MP घटने लगता है वहां से ‘घटते हुए उत्पादन की अवस्था’ लागू होती है।

द्वितीय अवस्था

इसमें औसत उत्पादन घटने लगता है। अतः इसे ‘घटते हुए औसत उत्पादन की अवस्था’ कहते हैं। यहां से ‘घटते हुए औसत उत्पादन का नियम’ लागू हो जाता है। इस अवस्था में कुल उत्पादन बढ़ता है लेकिन घटती हुई दर से क्योंकि MP भी गिर रहा है।

तीसरी अवस्था

इसमें कुल उत्पादन गिरने लगता है, क्योंकि सीमांत उत्पादन ऋणात्मक हो जाता है। चूंकि यहां से कुल उत्पादन गिरना शुरू हो जाता है इसलिए इसको ‘घटते हुए कुल उत्पादन की अवस्था’ कहते हैं। अब घटते हुए कुल उत्पादन का नियम लागू होने लगता है।

चित्र द्वारा स्पष्टीकरण

उपर्युक्त व्यवस्थाओं को निम्न चित्र द्वारा भी समझाया जा सकता है-

 

परिवर्तनशील अनुपातों का नियम

नोट कीजिए कि F बिंदु के पहले तक TP तेज गति से बढ़ता है (क्योंकि सीमांत उत्पादन बढ़ता है) इसलिए O से F  तक TP रेखा OX के संदर्भ में उन्नतोदर है। किंतु इस बिंदु के बाद से TP घटती हुई दर से बढ़ता है (क्योंकि सीमांत उत्पादन घटने लगता है) इसलिए TP रेखा नतोदर हो जाती है। बिंदु F ठीक बिंदु A के ऊपर है जहां की सीमांत उत्पादन अधिकतम है। बिंदु F को ‘मांग बिंदु’ कहते हैं।

वास्तविक जीवन में उत्पादन देती अवस्था में ही पाया जाता है, पहली अवस्था में इसलिए नहीं है, क्योंकि TP और AP दोनों वृद्धि पर होते हैं और तीसरी अवस्था में इसलिए नहीं क्योंकि TP घटने लगता है और MP और AP भी हास्य की स्थिति पर होती है। वह OM से कम और ON से अधिक श्रमिक नहीं लगाएगा, क्योंकि OM से कम श्रमिक लगाने पर सीमांत उत्पादन अधिकतम नहीं हो पाता है और ON से अधिक श्रमिक लगाने पर सीमांत उत्पादन ऋणात्मक होने लगता है। अर्थात उत्पादन M और N इन दो सीमा-स्थितियों के बीच स्थिर रहेगा।

चित्र में A,B व C की विशेष स्थितियों को ध्यान पूर्वक देखिए। क्रमशः घटते हुए सीमांत उत्पादन का बिंदु,करते हुए औसत उत्पादन का बिंदु और घटते हुए कुल उत्पादन का बिंदु है, क्योंकि इनसे ही (क्रमशः) सीमांत उत्पादन,औसत उत्पादन एवं कुल उत्पादन में हाथ से प्रारंभ होता है।

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Pankaja Singh

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