इतिहास

Unification of germany in Hindi | जर्मनी का एकीकरण

Unification of germany in Hindi | जर्मनी का एकीकरण

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जर्मनी का एकीकरण

(Unification of Germany)

(1) जर्मनी की स्थिति- 18वीं शताब्दी के अन्त तक जर्मनी में 360 छोटे-छोटे राज्य थे। इनमें आस्ट्रिया तथा प्रशिया दो बड़े राज्य थे। जर्मनी के ये सभी राज्य पवित्र रोमन साम्राज्य के अंग बने हुए थे। आस्ट्रिया का राजा उन सबका प्रधान माना जाता था। जर्मनी के लोगों ने अनेक बार राष्ट्रीयता तथा एकता के लिए आन्दोलन किया, परन्तु आस्ट्रिया ने उसका सदैव विरोध किया क्योंकि आस्ट्रिया को यह भली-भाँति विदित था कि एकीकृत जर्मन कभी भी आस्ट्रिया के प्रभुत्व में नहीं रहना चाहेगा। परन्तु जर्मनी के एकीकरण के लिए नेपोलियन बोनापार्ट ने मूल प्रेरणा दी थी।

(2) नेपोलियन बोनापार्ट का अप्रत्यक्ष योगदान- नेपोलियन बोनापार्ट ने जब बड़ी तीव्रगति से यूरोप के राज्यों को पददलित करना आरम्भ किया तो उसने जर्मनी के राज्यों से आस्ट्रिया तथा प्रशिया को हटा दिया। तत्पश्चात् उसने जर्मनी के छोटे-छोटे राज्यों को एक बड़े राज्य में मिलाकर उनकी संख्या बहुत कम कर दी। उसने सन् 1806 राइन संघ (Confederation of the Rhine) का निर्माण किया। यह जमेनी के एकीकरण की आधारशिला थी। उसी समय जेना की पराजय से प्रशिया में राष्ट्रीय चेतना जागी जिसने कालान्तर में ‘एकीकृत जर्मनी’ का रूप धारण किया।

(3) वियना सम्मेलन में जर्मनी- 1814 में नेपोलियन की पराजय हुई तथा उसे देश निकाला दे दिया गया। उसके जाने के पश्चात, राइन संघ समाप्त कर दिया गया। सन 1815 की वियना व्यवस्था से भी जर्मनी के देश भक्तों को कोई लाभ नहीं हुआ। उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया। अब 39 जर्मन राज्यों का एक संघ बनाया गया, जिसका नाम ‘जर्मन परिसंघ’ (German Confederation) रखा। इसकी व्यवस्था के लिए एक संघीय संसद (Federal Diet) की रचना की गई। उसका अध्यक्ष आस्ट्रिया बना। इस संसद में जनता द्वारा प्रतिनिधि न आकर राज्यों के शासकों द्वारा नामांकित प्रतिनिधि आते थे। ये शासक प्रभुसत्ता सम्पन्न होते थे। अतः उनका ध्यान जर्मनी के एकीकरण की और कभी जाता ही नहीं था। वस्तुत: वे अपने हित को कभी नहीं खोना चाहते थे। मैटर्निख ने अपने प्रभाव के द्वारा जर्मनी के अधिकांश शासकों को प्रतिक्रियावादी बना दिया था। वे सभी प्रजा को लोकतन्त्रीय अधिकारों से वंचित रखना चाहते थे ताकि उनके शासन निरंकुशता की वेदी पर चढ़कर चलते रहें।

(4) सन् 1848 ई० की क्रान्ति-m सन् 1848 ई० में समस्त यूरोप में क्रान्तियाँ तथा विद्रोह हुए। आस्ट्रिया में मैटर्निख की सरकार का अन्त कर दिया गया। प्रशिया तथा जर्मनी के सभी राज्यों में सफल क्रान्ति हुई। प्रशिया के राजा फ्रेंडरिक विलियम चतुर्थ ने न केवल अपनी पूजा को संविधान देना स्वीकार किया, वरन् जर्मनी के एकीकरण के लिए किए जा रहे आन्दोलन का नेतृत्व भी स्वीकार कर लिया। अब समस्त जर्मनी को एक संघ के अन्तर्गत रखने का निश्चय किया गया। फ्रैंकफर्ट में एक संसद् (Parliament) का निर्माण किया गया। इस संघ में आस्ट्रिया को अलग रखा गया। फ्रैंकफर्ट की संसद ने प्रशिया के राजा से इस संयुक्त जर्मन राज्य का राजा बनने का अनुरोध किया, परन्तु इस समय तक मध्य यूरोप के अधिकांश राज्यों में क्रान्ति का दमन किया जा चुका था। प्रतिक्रियावाद की लहर बड़ी तेजी से दौड़ रही थी। प्रशिया के राजा ने इस आधार पर इस राज्य का राजा बनना अस्वीकार कर दिया कि यह प्रस्ताव जनता के प्रतिनिधियों की ओर से आया था, राज्यों के शासकों की ओर से नहीं। परन्तु वास्तविकता और थी, शिया का राजा आस्ट्रिया से संघर्ष मोल नहीं लेना चाहता था। अतः फ्रंकफर्ट की संसद को सफलता नहीं मिल सकी।

(5) जर्मन संघ के निर्माण का प्रयास- अब प्रश्यिा के राजा ने सन् 1849 में एक जर्मन संघ (German Union) बनाने की योजना को प्रयोगिक रूप देना चाहा। इसमें प्रशिया के झण्डे के नीचे 17 छोटे-छोटे राज्यों को सम्मिलित किया गया, परन्तु आस्ट्रिया इस संघ के विरोध पर उतर आया और उसने जर्मन परिसंघ (German Confederation) को पूर्व रूप में शुरू करवाया, जिस रूप में वह सन् 1815 से 1848 तक रहा था। प्रशिया को आस्ट्रिया की शक्ति के सामने चुप रह जाना पड़ा। अब आस्ट्रिया का प्रभाव जर्मनी पर पूर्व की भांति पुनः स्थापित हो गया।

प्रो० हेजन के शब्दों में ,”उस उपद्रवग्रस्त वर्ष में एक कल्याणकारी कार्य अवश्य हो गया। प्रशिया के राजा ने अपनी प्रजा को एक संविधान दे दिया था और एक संसद की रचना कर दी थी। पीडमौण्ट के समान उसने भी उस संविधान को रद्द करने से इन्कार कर दिया। परन्तु संविधान तथा संसद के रहने से भी शासन की स्वेच्छाचारिता में कमी नहीं

आई, क्योंकि मन्त्री लोग गुप्त रूप से संविधान को हर प्रकार से निष्फल बनाने का प्रयत्न करते रहे।

(6) विलियन प्रथम का शासन- सन् 1861 ई. में फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ की मृत्यु हो गई। उसके स्थान पर उसका भाई विलयम प्रथम (महारानी लुईसा का पुत्र) सन् 1861 ई० में प्रशिया का सम्राट बना । इस समय वह लगभग 64 वर्ष का वृद्ध हो चुका था, परन्तु उसमें कार्य करने तथा विचारने की शक्ति अपूर्व थी। उसने अपने जीवन का अधिकांश समय सेना में रहकर बिताया था, अतः वह सैनिक कार्य में रुचि रखता था। उसका विश्वास था कि प्रशा के भाग्य का निर्माण सेना के बल पर किया जा सकता है। अत: उसने प्रशा की सैन्य शक्ति को बढ़ाने की योजना बनाई। वह कहता था कि “सेना पर विजय बातों से नहीं होती है।

विलियम दैवी अधिकार तथा निरंकुशता में विश्वास रखता था, परन्तु वह राजा को ईमानदारी, कार्य-कुशलता तथा पूजा के प्रति शुभचिन्तक होने की कामना का कायल था। वह प्रशा को एक सुदृढ़ राज्य के रूप में देखना चाहता था। इसके लिए उसने अनिवार्य युद्ध-शिक्षा पर बल दिया। वह प्रशा की सैनिक शक्ति को दुगना करना चाहता था, परन्तु प्रशा की लोकसभा ने उसकी बातों का आदर नहीं किया।

ऐसी कठिनाई के समय उसे एक ईमानदार परन्तु कूटनीतिज्ञ व्यक्ति की सहायता प्राप्त हुई और उसने अपनी नीति द्वारा प्रतिष्ठा को बढ़ाया।

(7) बिस्मार्क की राजनीति- बिस्मार्क प्रशा की सैनिक-शक्ति के बल पर प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी को संगठित करना चाहता था। प्रधानमन्त्री बनने के पश्चात् उसका एकमात्र यही उद्देश्य रहा कि आस्ट्रिया से दो-दो हाथ किए जाएँ। जब तक युद्ध के मैदान में आस्ट्रिया को नहीं हराया जायेगा, तब तक जर्मनी के एकीकारण का मार्ग सुलभ नहीं होगा। इसी उद्देश्य से बिस्मार्क ने प्रशा की सैन्य-शक्ति के पुनसंगठन के कार्य को जारी रखा। उसने यह प्रतिज्ञा की कि वह संसद के सामने कभी नहीं झुकेगा। उसने स्पष्ट रूप से कहा, “जर्मनी प्रशा के उदारवाद की ओर नहीं देख रहा है वरन उसकी शक्ति की ओर देख रहा है। आज की समस्यायें भाषणों तथा प्रस्तावों से नहीं सुलझाई जा सकतीं वरन् उन्हें सुलझाने के लिए रक्त एवं लौह नीति’ की आवश्यकता है।”

(8) संसद की उपेक्षा- प्रारम्भ में बिस्मार्क ने संसद में बहुमत वाले प्रगतिशील दल को अगली नीति के अनुसार चलने के लिए समझाया, परन्तु द्ल ने उसकी नीति का समर्थन नहीं किया। उसने राजा से आग्रह किया कि वह बिस्मार्क को प्रधानमन्त्री पद से हटा दे। इस पर विस्मा ने राजा की सहमति से संसद की उपेक्षा ही कर दी। वह संसद द्वारा स्वीकृति बजट के बिना ही काम चलाने लगा। इस प्रकार उसने सन् 1850 के संविधान का सष्ट उल्लंघन किया था तथा प्रगतिशील दल में अपनी नीति को मान्ने के लिए दबाव डाला था, परन्तु उससे कोई लाभ नहीं हुआ। प्रो० हेज ने इस सम्बन्ध में लिखा है, “उसे पता था कि प्रशिया के उदारवादी बोलते अधिक हैं और करते कम। यह ठीक है कि उस समय की निर्वाचन पद्धति के अनुसार संसद में उसका बहुमत था, परन्तु इसका यह अर्थ होना आवश्यक नहीं था कि सारे देशा में उनका बहुमत हों।”

इसी सन्दर्भ में लिप्सन के शब्दों को भी नहीं भुलाया जा सकता, “संसदीय बहुमत के विरोध में शासन करना तथा जनता के प्रतिनिधियों के न चाहते हुए बड़ी-बड़ी योजनाओं को कार्यान्वित करना संविधान को फाड़कर फेंक देना जैसा था। परन्तु बिस्मार्क ने स्थिति को ठीक आँका, उसे ज्ञात था कि यदि सशस्त्र विद्रोह हो हो जाये तो सेना द्वारा उसे दबा सकेगा।”

(9) सैनिक तैयारियाँ- विस्मार्क ने दो वर्ष में प्रशा की सैनिक शक्ति काफी बढ़ा दी। वह जानता था कि इस सैनिक शक्ति का प्रयोग उसे एक दिन आस्ट्रिया के विरुद्ध करना पड़ेगा। यद्यपि उसकी इस नीति को सभी अप्रिय बताते थे, परन्तु एक राष्ट्रीय प्रशिया-जर्मनी के लिए वह हर प्रकार का बलिदान करने को तैयार था। जब तैयारियां पूरी हो गयी तो उसने अपनी शक्ति को ऑकने के लिए डेन्मार्क से युद्ध करने का निश्चय किया। इसके लिए उसने शैलस्विग-होस्टलीन के प्रश्न को उठाया।

(10) श्लेस्विग तथा होल्सटीन राज्यों के प्रयत्न- श्लेस्विग तथा होल्स्टीन दो छोटे-छोटे राज्य थे, जो डेन्मार्क के निकट थे। होल्सटीन में 6 लाख व्यक्ति थे, जो जर्मन जाति के थे। श्लेस्विग में 3 लाख व्यक्ति थे, जो डेन तथा जर्मन थे। ये दोनों राज्य अनेक शताब्दियों से डेन्मार्क के अधीन थे। सन् 1848 की क्रान्ति के दौर में इन दोनों राज्यों ने स्वतन्त्र होने की चेष्टा की थी, परन्तु प्रशिया ने उनका समर्थन नहीं किया था, परन्तु बड़ी शक्तियों ने बीच में पड़कर एक समझौता करवा दिया था, जो डेन्मार्क के अनुकूल था। होल्सटीन जर्मन परिसंघ (Gicrman Confederation) का सदस्य था और अब श्लेस्विग भी उसका सदस्य बनना चाहता था। सन् 1863 में डेन्मार्क ने श्लेस्विग को अपने राज्य में शामिल करने की घोषणा कर दी।

बिस्मार्क ने आस्ट्रिया को इस उद्देश्य से राजी किया कि वह प्रशिया के साथ श्लेस्विग तथा होल्सटीन को डेन्मार्क की अधीनता से मुक्त कराए। दोनों देशों ने मिलकर डेन्मार्क को 48 घण्टे का अल्टीमेटम दिया कि इस बीच में वह उनकी मांगें पूरी करे। माँगें पूरी नहीं हुई। दोनों देशों की शक्तिशाली सेनाएँ डेन्मार्क में प्रविष्ट हो गई। डेन्मार्क छोटा-सा देश था, जिसे आसानी से जीत लिया गया । डेन्मार्क ने ये दोनों राज्य आस्ट्रिया तथा प्रशिया को सौंप दिए।

(11) आस्ट्रिया तथा प्रशिया में युद्ध- उक्त दोनों छोटे राज्यों का प्रबन्ध क्या किया जाये । इस प्रश्न पर आस्ट्रिया और प्रशिया एकमत नहीं थे। आस्ट्रिया इन दोनों को मिलाकर एक राज्य बनाना चाहता था। प्रशिया का विचार था कि इन दोनों राज्यों को प्रशिया में मिला लिया जाये, क्योंकि जर्मनी में पहले से ही बहुत से राज्य है, अत: जर्मन-संघ में मिलाने का प्रश्न ही नहीं उठता। कुछ समय तक इन दोनों राज्यों का शासन आस्ट्रिया तथा प्रशिया ने सम्मिलित रूप से किया।

वास्तव में बिस्मार्क एक महत्वपूर्ण बहाना ढूँढ रहा था, जो उसे श्लेस्विग तथा होल्सटीन राज्यों के मामलों के रूप में मिल गया। इसके अतिरिक्त आस्ट्रिया से लड़कर ही प्रशिया अपने लाभ के लिए जर्मनी के एकीकरण के प्रश्न को हल कर सकता था। अतः वह हर दशा में युद्ध चाहता था। ऐसी दशा में युद्ध अवश्यम्भावी था। युद्ध सन् 1866 ई० को 16 जून को छिड़ गया। 1864 से 1866 तक की अवधि का उपयोग बिस्मार्क ने नेपोलियन तृतीय को तटस्थ रहने और इटली को प्रशिया का साथ देने के लिए मानने में किया।

हेजन के शब्दों में, “इस युद्ध का फल बड़े महत्व का था।”

बिस्मार्क यह भी जानता था कि प्रशिया के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण का विरोध रूस तथा फ्रांस दोनों करेंगे। अतः उसने रूस से मित्रता स्थापित करने की योजना बनाई। जब सन् 1863 ई० में पोल लोगों ने रूस के विरुद्ध विद्रोह किया, तब फ्रांस तथा ब्रिटेन में जनमत पोल लोगों के पक्ष में था। उस समय बिस्मार्क ने रूस को सहायता दी। यद्यपि रूस ने बिस्मार्क की सहायता को स्वीकार नहीं किया, परन्तु उससे रूस की सद्भावना प्राप्त हो गई। उसने आस्ट्रिया की सहायता नहीं की।

(12) सैडोवा का अभियान- यूरोप के सभी राज्यों को विश्वास था कि आस्ट्रिया की सेना अजेय है, परन्तु आशा के विपरीत प्रशिया की सेना शक्तिशाली: निकली। प्रशिया ने लालच देकर इटली को अपनी ओर मोड़ लिया था। अतः आस्ट्रिया को दो मोर्चों का सामना करना पड़ा। जर्मनी के कुछ छोटे राज्यों ने प्रशिय का साथ दिया। परन्तु बावेरिया, सैक्सनी हनोवर आदि ने आस्ट्रिया का पक्ष लिया। प्रशिया की सेना ने थोड़े ही समय में उत्तरी जर्मनी के सभी राज्यों को जीत लिया। 3 जुलाई 1866 को कोनिंग प्राट्स (Sadowa) का निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में आस्ट्रिया हार गया। सन् 1813 ई० में लीपजिंग के युद्ध के बाद यूरोप में इतना बड़ा और कोई युद्ध नहीं हुआ था। आस्ट्रिया ने कुस्तोजा के युद्ध में इटली की सेना को हरा दिया। परन्तु सैडोवा के युद्ध में आस्ट्रिया हार चुका या अतः उसकी इटली पर विजय व्यर्थ सिद्ध हुई।

इस प्रकार आस्ट्रिया-प्रशिया का यह युद्ध केवल सात सप्ताह में ही समाप्त हो गया। प्रशिया शीघ्र ही संधि करना चाहता था क्योंकि उसे भय था कि कहीं रूस और फ्रांस इस युद्ध में न कूद पड़े। अतः उसने आस्ट्रिया के सामने साधारण शर्ते रखीं। आस्ट्रिया ने उन्हें मान लिया।

(13) प्राग की सन्धि- इस सन्धि की शर्तों के अनुसार जर्मन परिसंघ को तोड़ दिया गया। प्रशिया को छूट दी गई कि वह मैन नदी के उत्तर के जर्मन राज्यों का एक संघ बना ले। अतः प्रशिया ने उत्तर-जर्मन परिसंघ (North German Confederation) की रचना की। इस परिसंघ में बाइस राज्य सम्मिलित हुए। प्रशिया का राजा इसका अध्यक्ष था।

हनोवर, श्लेस्विग और होल्सटीन, नासाड, फ्रांकफर्ट और हैम्से कैसेल के छोटे-छोटे राज्य प्रशिया के राज्य में मिला लिए गए। इससे प्रशिया के क्षेत्रफल तथा जनसंख्या में वृद्धि हो गयी।

(14) फ्रांस-प्रशिया युद्ध- सैडोवा में आस्ट्रिया की पराजय हुई थी, इस कारण यूरोप का शक्ति सन्तुलन डगमगा गया था। अतः नेपोलियन तृतीय प्रशिया से युद्ध करना चाहता था। प्रशिया दक्षिण-जर्मनी राज्यों के एकीकरण के लिए फ्रांस से दो-दो हाथ करने का इच्छुक था। स्पेन के राज्यसिंहासन के प्रश्न ने दोनों को यूद्ध के लिए विवश कर दिया। परन्तु विस्मार्क ने यहाँ भी कूटनीति से काम लिया। उसने नेपोलियन तृतीय द्वारा युद्ध की घोषणा करवाई। इससे नेपोलियन की आक्रमणकारी नीति ही सबके सामने प्रकट हुई, जबकि विस्मार्क ने ही युद्ध छेड़ दिया था। नेपोलियन तृतीय की सैनिक तैयारी प्रशिया की तुलना में कम थी।

15 जुलाई 1870 को नेपोलियन तृतीय ने प्रशिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। दक्षिणी जर्मनी के राज्य राष्ट्रीयता की भावना में डूबकर प्रशिया के साथ हो गए। जर्मनी सेना ने फ्रांस की सेना को कई स्थानों पर परास्त किया। एक बड़ी सेना मेत्स (Mets) के किले में घेर ली गई। अन्त में नेपोलियन तृतीय को भी बंदी बना लिया गया।

(15) गणतन्त्रवादियों के कार्य- इसके पश्चात कुछ महीनों तक गणतन्त्रवादियों ने युद्ध चलाया। अन्त में जर्मनी की विजय हुई। 10 मई 1871 ई० को फ्रांकफर्ट की सन्धि द्वारा युद्ध विराम हुआ। फ्रांस अब जर्मनी के एकीकरण के विषय में कुछ भी नहीं कह सकता था।

बिस्मार्क ने दक्षिणी जर्मनी के राज्यों से बातचीत करके उन्हें विशाल जर्मन सामाज्य में सम्मिलित करने के लिए गली कर लिया।

इस प्रकार 18 जनवरी 1871 को बर्साई के राजमहल (फ्रांस) में राजा विलयन प्रथम नये जर्मनी साम्राज्य का सम्राट बना।

यह जर्मनी के एकीकरण का कार्य था, जो बिस्मार्क के हाथों सम्पन्न हुआ था।

(16) एकीकरण पर तुलनात्मक दृष्टि- जर्मनी का एकीकरण इटली के एकीकरण से कई अर्थों में समान था। दोनों देश बिखरी हुई दशा में थे। वहाँ उनके आन्तरिक झगड़ों के कारण अनेक राजाओं का अधिकार था। दोनों देशों में राष्ट्रीय एकता की भावना नेपोलियन ने उत्पन्न की थी। एक ओर इटली में यदि पृथक्-पृथक राज्य थे तो दूसरी ओर जर्मनी में राइन राज्य संघ तथा प्रशिया लोकसभा की व्यवस्था मौजूद थी। इस दृष्टि से इटली की तुलना में जर्मनी के एकीकरण का कार्य अधिक सरल था।

जर्मनी के एकीकरण में बर्लिन की शक्ति में छोटी शक्तियों को सम्मिलित किया गया था, परन्तु इटली के एकीकरण में पीडमौण्ट जैसी छोटी शक्ति ने सम्पूर्ण कार्य का नेतृत्व कर अपने व्यक्तित्व को इटली के एकीकरण में विलीन कर दिया। इसमें पीडमौण्ट की प्रवृत्ति उच्चकोटि की सिद्ध होती है।

इसके अतिरिक्त बिस्मार्क तथा कावूर के विचारों में भी बड़ा अन्तर था। बिस्मार्क राजसत्ता, निरंकुश शासन-प्रणाली तथा राजतन्त्रीय व्यवस्था का कट्टर अनुयायी था, परन्तु कावूर वैध शासन, राजसत्ता और प्रजातन्त्रीय व्यवस्था का पूर्ण समर्थक था। कावूर ने वैदेशिक सहायता, सहयोग और सहानुभूति को इटली के एकीकरण का आधार बनाया परन्तु बिस्मार्क ने प्रशा के सैन्य-संगठन को प्रधानता दी तथा ठसी के बल पर सिद्धि प्राप्त की।

निष्कर्ष (Conclusion)

निष्कर्ष रूप में हमको यह मानना पड़ेगा कि बिस्मार्क एक ऐसा व्यक्तित्व था जिसने इस महान् कार्य में सफलता प्राप्त कर अपने नाम को जर्मनी के महान् पुत्र के रूप में अमर बनाया। इसी सम्बन्ध में यह उचित ही कहा गया है कि-“जर्मनी का एकीकरण बिस्मार्क की कुशल कूटनीति की विजय है।”

इतिहास – महत्वपूर्ण लिंक

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Pankaja Singh

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