शिक्षाशास्त्र

उच्च शिक्षा के शैक्षिक स्तर की समस्या | उच्च स्तर पर शिक्षा का स्तर गिरने के कारण | शैक्षिक मानकों को ऊँचा उठाने के उपाय

उच्च शिक्षा के शैक्षिक स्तर की समस्या | उच्च स्तर पर शिक्षा का स्तर गिरने के कारण | शैक्षिक मानकों को ऊँचा उठाने के उपाय

उच्च शिक्षा के शैक्षिक स्तर की समस्या

(Problem of Deterioration in Standard of Higher Education)

आजकल आम चर्चा का विषय है कि शिक्षा के स्तर में गिरावट आयी है परन्तु शिक्षा में गिरावट से क्या अभिप्राय है? इस सम्बन्ध में लोगों की धारणा अलग-अलग है। कोई पढ़ायी खराब होने या न होने को शिक्षा की गिरावट मानता है तो कोई छात्रों की खराब उपलब्धि को शिक्षा के स्तर की गिरावट मानता है। कुछ बालक में मनोवांछित, मानवोचित तथा सामाजिक गुणों की कमी को शिक्षा के स्तर में गिरावट मानते हैं। कुछ लोगों का स्तर से अर्थ यह होता है कि अमुक कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद छात्र को अपने विषय का उतना ज्ञान नहीं हो पाता है जितना पहले की छात्र पीढ़ी को हुआ करता था।

अतः शिक्षा के क्षेत्र में स्तर की संकल्पना स्पष्ट होनी चाहिए। स्तर से तात्पर्य पूर्व निश्चित आय से है जिसके द्वारा किसी वस्तु की मात्रा या गुण के बारे में पता लगता है, जैसे-तरल पदार्थ की मात्रा नापने क लीटर एक पूर्व निश्चित माप है। शिक्षा के क्षेत्र में जब इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तब इसका तात्पर्य एक निश्चित ज्ञान या शैक्षिक विकास से होता है जो एक विशेष कक्षा के छात्र के लिए आवश्यक है। प्रत्येक श्रेणी विशेष के लिए कुछ योग्यताओं और क्षमताओं को प्राप्त करना छात्रों के लिये आवश्यक माना जाता है। यदि वे योग्यताएं और क्षमताएं किसी छात्र विशेष में पायी जाती हैं तो वह उस कक्षा के लिए उपयुक्त माना जाता है।

अन्य शब्दों में, शैक्षिक मानक या स्तर से हमारा तात्पर्य वे गुण या योग्यताएँ हैं जो शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के व्यवहार से इंगित होती हैं । शैक्षिक मानकों के अन्तर्गत छात्रों का सामान्य तथा विशिष्ट ज्ञान, मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति, सामान्य और परिस्थितिजन्य उपलब्धि, ज्ञान को ग्रहण करने तथा प्रदान करने की योग्यता एवं सामाजिक व नैतिक व्यवहार को सम्मिलित किया जा सकता है।

कोठारी आयोग ने शिक्षा के स्तर की जाँच के लिये तीन आधार बताये हैं-

(1) पर्याप्तता- शैक्षिक स्तर का निर्धारण करने से पूर्व उसके उद्देश्य निश्चित किये जाते हैं। उन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु छात्र दक्षता करने के लिये शिक्षित किये हैं। यदि छात्र उसमें दक्षता प्राप्त करता है तो स्तर पर्याप्त है और दक्षता प्राप्त नहीं करता तो अपर्याप्त । उदाहरणार्थ, इंजीनियरिंग की शिक्षा समाप्त करने के बाद यदि छात्र कुशल इंजीनियर के रूप में कार्य नहीं कर पाता तो कहा जायेगा कि इंजीनियरिंग शिक्षा का स्तर गिर रहा है।

(2) गत्यात्मकता- आधुनिक समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षा के रूप में परिवर्तन होना चाहिए। बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा के पाठ्यक्रम में परिवर्तन होते रहना चाहिए ताकि नागरिकों में ज्ञानवान, चरित्रवान और कुशल बनने की क्षमता उत्पन्न हो सके।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तुलना- शैक्षिक स्तर अन्य प्रगतिशील देशों के शैक्षिक स्तर के समान हो।

उच्च स्तर पर शिक्षा का स्तर गिरने के कारण

(Causes of Deterioration of Educational Standard at Higher Level)

स्वतंत्रता के पश्चात् विश्वविद्यालय शिक्षा का विकास तीव्र गति से हुआ है। छात्रों की संख्या आदि में आशातीत वृद्धि हो रही है। तीव्र गति से शिक्षा के प्रसार के कारण उच्च शिक्षा का स्तर नीचे गिरता जा रहा है. शिक्षण के सत्र में भी गिरावट आयी है। इस क्षेत्र में अपव्यय और अवरोधन भी बढ़ गया है और अनुशासनहीनता की घटनाओं में वृद्धि हुई है। स्तर के गिरने के लिए डॉ० हुमायूँ कबीर ने तीन प्रमुख कारण बताएँ हैं-

(1) संख्या और योग्यता की दृष्टि से अध्यापक का अभाव ।

(2) विश्वविद्यालयों की संकटपूर्ण आर्थिक स्थिति ।

(3) उच्च शिक्षा के प्रति छात्रों का गलत दृष्टिकोण ।

इसके अतिरिक्त भी कई कारण गिनाये जा सकते हैं जिसके कारण शिक्षा का स्तर गिरा है और गिर रहा है। उनमें से प्रमुख निम्न प्रकार हो सकते हैं-

(1) शैक्षिक कारण (Educational Causes)- इसके अन्तर्गत कई बातें सम्मिलित हैं,जैसे-(i) शिक्षा की उद्देश्यहीनता, (ii) शिक्षकों की सामाजिक स्थिति, (iii) अनुपयुक्त शिक्षण विधियाँ, (iv) शिक्षा का माध्यम, (v) परीक्षा प्रणाली, तथा (vi) शैक्षिक मार्गदर्शन का अभाव आदि।

(2) जनसंख्या वृद्धि (Population Increase)- भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या ने भी शिक्षा जगत को प्रभावित किया है तथा स्तर की समस्या पैदा की है। जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में शिक्षा संस्थाएँ नहीं बढ़ी हैं। इस कारण जो उच्च शिक्षा की संस्थाएँ हैं उन्हीं में भीड़ बढ़ी है जिससे कारखानों की तरह पाली पद्धति से छात्रों को समायोजित करने का प्रयास हुआ है जिससे शिक्षा स्तर गिरा है।

(3) शिक्षा का मुक्त प्रसार (Free Expansion of Education)- स्वाधीनता के बाद शिक्षा का मुक्त प्रसार हुआ है। यहाँ जिसका प्रयास और प्रभाव चला है महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय खोल दिये गये हैं। मुक्त प्रसार में छात्रों, अध्यापकों तथा शिक्षण संस्थाओं के वांछित स्तर का ध्यान नहीं रखा गया है। आवश्यक सुविधाओं जैसे, भवन, पुस्तकालय, प्रयोगशाला आदि के अभाव में भी मान्यता दे दी गयी है।

(4) शैक्षिक चेतना का अभाव (Lack of Educational Consciousness)- अनेक प्रगतिशील देशों में शिक्षा को पूंजी विनियोग के रूप में स्वीकार किया गया है परन्तु भारत में शिक्षा को आवश्यक महत्व प्रदान नहीं किया गया। बजट का बहुत छोटा भाग ही शिक्षा के लिए रखा गया है। इस शैक्षिक चेतना के अभाव के कारण भी शिक्षा का स्तर गिरा है।

(5) समाज का दूषित वातावरण (Polluted Atmosphere of Society)- विद्यालय समाज का लघु रूप होता है। स्वाधीनता के बाद भारत भ्रष्टाचार, व्यभिचार, तस्करी, लूटमार, चोर बाजारी आदि अनेक बुराइयां से स्वाभाविक रूप से प्रभावित हुआ है। शिक्षक तथा कर्मचारी वर्ग पर भी इनका प्रभाव होता है। अत: स्वाभाविक रीति से शिक्षा स्तर पर इसका प्रभाव पड़ता है।

शैक्षिक मानकों को ऊँचा उठाने के उपाय

(Ways to Improve Educational Standard)

शैक्षिक मानकों को सुधारने के लिये सरकार तथा गैर सरकारी स्तर पर पर्याप्त चिन्तन हुआ है और हो रहा है। विभिन्न आयोगों ने इस सम्बन्ध में अपने सुझाव दिये हैं तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (U.G.C.) ने इस सम्बन्ध में अपने सुझाव लागू कराने का प्रयास किया है। इन उपायों को निम्न प्रकार गिनाया जा सकता हैं-

(1) शैक्षिक कारणों का निराकरण (Removal of Educational Causes)- शैक्षिक स्तर की गिरावट को दूर करने के लिए शिक्षा के उद्देश्यों को सही निर्धारण तथा उनकी प्राप्ति का ईमानदारी से प्रयास, शिक्षकों को सामाजिक मान्यता, शिक्षण विधियों में सुधार, मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार आदि के द्वारा शैक्षिक स्तर सुधारा जा सकता है ।

(2) जनसंख्या नियंत्रण (Population-Control)- यदि जनसंख्या अबाध गति से बढ़ती रही तो किसी भी स्तर पर गिरावट को रोका नहीं जा सकेगा। इसलिए आवश्यक है कि जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति पर नियंत्रण करना होगा। इसके लिए जनसंख्या नियंत्रण के वैज्ञानिक उपायों के साथ-साथ संकल्प शक्ति का भी विकास करना होगा जिससे आम नागरिक इस भीषण समस्या से निपटने में सक्षम हो सके।

(3) मुक्त प्रसार पर नियंत्रण (Control of Free Expansion)- उच्च स्तर पर शिक्षा का प्रसार करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शिक्षा का स्तर बनाये रखा जा सके। इसके लिए शिक्षित तथा प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति आवश्यक होगी। ऐसे अध्यापकों को भी समय-समय पर उचित मार्गदर्शन तथा प्रोत्साहन की आवश्यकता होगी।

(4) सामाजिक वातावरण में सुधार (Improvement in Social Atmosphere)- स्वाधीनता के बाद से समाज में जो गिरावट आई है उसमें सुधार किए बिना शिक्षा का स्तर ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है। इसके लिये समाज सुधार कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, व्यभिचार, भाई-भतीजावाद आदि बुराइयों को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाने पड़ेंगे। भारतीय न्यायपालिका का कार्य इस क्षेत्र में सराहनीय रहा है लेकिन केवल न्यायपालिका से यह कार्य सम्भव नहीं होगा जब तक समाज में जागरण नहीं होगा।

इसी प्रकार शिक्षा को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करके, योग्यता छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करके, शैक्षिक चेतना का जागरण करके तथा शिक्षकों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति में सुधार करके शैक्षिक मानकों में सुधार किया जा सकता है।

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Pankaja Singh

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