वित्तीय प्रबंधन

स्थायी सम्पत्तियों से आशय | स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग के उद्देश्य | स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग को प्रभावित करने वाले कारक

स्थायी सम्पत्तियों से आशय | स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग के उद्देश्य | स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग को प्रभावित करने वाले कारक | Meaning of fixed assets in Hindi | Objectives of investment in fixed assets in Hindi | Factors affecting investment in fixed assets in Hindi

स्थायी सम्पत्तियों से आशय

(Meaning of Fixed Assets)

प्रायः स्थायी सम्पत्तियाँ व्यवसाय के प्रयोग हेतु क्रय की जाती हैं। ये सम्पत्तियाँ बेचने हेतु नहीं होती। स्थायी सम्पत्तियों को अचल सम्पत्तियों के नाम से भी जाना जाता है परन्तु सभी स्थायी सम्पत्तियाँ अचल नही होती, कुछ चल सम्पत्तियाँ भी इसमें सम्मिलित हैं।

सरल शब्दों में, स्थायी सम्पत्तियाँ व्यवसाय के संचालन में प्रयुक्त अपेक्षाकृत स्थायी प्रकृति की सम्पत्तियाँ होती हैं, जो कि विक्रय के लिये नहीं होती हैं बल्कि स्थायी रूप से प्रयोग करके लाभ कमाने के लिए खरीदी जाती हैं। स्थायी सम्पत्तियाँ प्रायः स्वभाव की होती हैं। जिन्हें दीर्घकाल तक व्यावसायिक संसाधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। भूमि, भवन, प्लाट, मशीनरी, उपकरण, वाहन, फर्नीचर, फिक्सचर्स फिटिंग्स, ख्याति, ट्रेडमार्क, व्यापार नाम, पेटेण्ट्स, कॉपीराइट, पट्टा आदि की गणना स्थायी सम्पत्तियों में ही की जाती है। यह बात स्मरणीय है कि स्थायी सम्पत्तियों में केवल अचल (Immovable) सम्पत्तियों को ही सम्मिलित नहीं किया जाता बल्कि चलायमान (Movable) सम्पत्तियाँ भी शामिल की जाती हैं, जैसे- मोटर कार, ट्रक, बस आदि। प्रायः सम्पूर्ण स्थायी सम्पत्तियों को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

(1) दृश्य या मूर्त स्थायी सम्पत्तियाँ (Tangible Fixed Assets) – मूर्त स्थायी सम्पत्तियों में ऐसी सम्पत्तियों को सम्मिलित किया जाता है जिनका कोई भौतिक अस्तित्व होता है, जिन्हें देखा जा सकता है; जैसे- भूमि, भवन, प्लाण्ट, मशीनरी, फर्नीचर, मोटरकार, ट्रक, आदि। इस प्रकार की सम्पत्तियों की लागत को प्रायः उनके उपयोगी काल में ही अपलिखित किया जाता है।

(2) अदृश्य या मूर्त स्थायी सम्पत्तियाँ (Intangible Fixed Assets) – अमूर्त स्थायी सम्पत्तियों में ऐसी सम्पत्तियों या अधिकारों को सम्मिलित किया जाता है जिनका कोई दृश्य भौतिक अस्तित्व नहीं होता, किन्तु मूर्त स्थायी सम्पत्तियों की भाँति यह भी व्यवसाय के उपयोगी संसाधन होती हैं। ऐसी सम्पत्तियाँ जो न तो दिखई ही देती हैं और न जिन्हें स्पर्श ही किया जा सकता है, अदृश्य या अमूर्त स्थायी सम्पत्तियाँ कहलाती हैं। इनका मूल्य निर्धारण बहुत कठिन होता है। अमूर्त स्थायी सम्पत्तियों में ख्याति (Goodwill), ट्रेडमार्क, व्यापार नाम (Trade Name), पेटेण्ट्स (Patents), कॉपीराइट (Copyright), पट्टा (Lease) आदि को सम्मिलित किया जाता है।

स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग के उद्देश्य

(Objects of Investment in Fixed Assets)

स्थायी सम्पत्तियों में वित्त का भारी मात्रा में विनियोग किया जाता है, अतः इसमें विनियोग अत्यन्त ही विवेकपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिये। स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य होते हैं-

(i) उपक्रम की वर्तमान उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना।

(ii) उपक्रम के भावी विकास एवं विस्तार के लिये स्थायी सम्पत्तियों को क्रय करना।

(iii) अप्रचलित या अनुपयोगी स्थायी सम्पत्ति को प्रतिस्थापित करना।

(iv) नवीन स्थायी सम्पत्तियों के द्वारा उत्पादन की किस्म में सुधार लाना।

(v) नवीन तकनीकी खोजों का लाभ प्राप्त करना।

(vi) आकस्मिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग करना।

(vii) वस्तु के उत्पादन के लिये

स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Investment in Fixed Assets)-

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था में स्थायी एवं अस्थायी दोनों प्रकार की सम्पत्तियों में वित्त का नियोजन होता है, परन्तु सभी कम्पनियों में स्थायी सम्पत्तियों की संरचना एक समान नहीं होती। विभिन्न उद्योगों में कुल सम्पत्तियों की तुलना में स्थायी सम्पत्तियों का अनुपात कम या अधिक होता है। यद्यपि विनियोग की लाभप्रदता स्थान सम्पत्तियों में विनियोग का एक महत्वपूर्ण कारक होता है, किन्तु इसके अतिरिक्त अनेक अन्य कारक भी स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग को प्रभावित करते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

(1) व्यवसाय की वित्तीय क्षमता ( Financial Capacity of Business ) – स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग व्यवसाय की वित्तीय क्षमता के अनुसार ही किया जाना चाहिये अन्यथा इसका संस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अतः प्रत्येक कुशल प्रबन्धक संस्था के साधनों के अनुकूल ही सम्पत्तियों में विनियोग करता है। अधिका प्रत्याय देने वाली सम्पत्तियों में विनियोग को भी इसीलिये त्याग दिया जाता है कि आवश्यक धनराशि की व्यवस्था नहीं की जा सकती। ऐसी स्थिति में प्रबन्धक अधिक लागत वाली अधिक लाभप्रद स्थायी सम्पत्तियों के स्थान पर कम लागत वाली किन्तु समुचित लाभप्रद सम्पत्तियों को क्रय करता है। अतः यदि उपक्रम में कोषों का अभाव है, तो सम्पत्तियों में अधिक विनियोग नहीं किया जा सकता।

यदि किसी उपक्रम के पास पर्याप्त कोष है, तो ऐसी स्थिति में कम लागत किन्तु अधिकतम प्रत्याय देने वाली स्थानीय सम्पत्तियों को क्रय किया जायेगा। फालतू कोषों का स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग करने से उपक्रम को कुल लाभ अधिकतम हो सकते हैं। फालतू कोषों का स्थायी सम्पत्तियों मे विनियोग करने से पूर्व प्रबन्धक को यह विचार कर लेना चाहिये कि अन्य किसी मद में इसका अधिक लाभदायक विनियोजन सम्भव है या नहीं।

(2) व्यवसाय की प्रकृति (Nature of Business) – स्थायी सम्पत्तियों में पूंजी विनियोजित करने का यह एक महत्वपूर्ण घटक है। मुख्यतः व्यवसाय की प्रकृति द्वारा ही स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग की मात्रा निश्चित की जाती है। व्यवसाय की प्रकृति भी स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग को प्रभावित करती है। व्यापारिक एवं वित्तीय सम्पत्तियों में अपेक्षाकृत कम विनियोग होता है जबकि निर्माणक कम्पनियों में अधिक होता है। जनोपयोगी उद्योगों में भी स्थायी सम्पत्तियों में अधिक विनियोग होता है।

(3) स्वचालन एवं उत्पादन तकनीक (Automation and Production Technique) – जिन उपक्रमों में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है उनमें अत्यन्त मूल्यवान स्वचालित प्लाण्ट लगाये जाते हैं जो स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग के अनुपात को बढ़ा देते हैं। जिन उद्योगों में नवीनतम उत्पादन तकनीक का प्रयोग किया जाता है उनमें स्थायी सम्पत्तियों में अधिक पूँजी विनियोग किया जाना स्वाभाविक ही है।

इसके विपरीत लिन संस्थाओं में अच्छी व स्वचालित मशीनें नहीं लगाई जातीं. उनमें  स्थायी सम्पत्तियों के विनियोजन का अनुपात कम हो जाता है। इस प्रकार स्वचालन की सीमा का महत्वपूर्ण प्रभाव स्थायी सम्पत्तियों के विनियोग पर पड़ता है।

(4) स्थायी सम्पत्यिों की किराये पर उपलब्धि ( Availability of Fixed Assets on Rent or Hire ) – यदि व्यवसाय किराये के भवन में संचालित किया जाता है। अथवा कुछ स्थायी सम्पत्तियाँ किराये पर उपलब्ध कर ली जाती हैं तो अपेक्षाकृत स्थायी सम्पत्तियों में कम पूँजी का विनियोग करना पड़ता है। इसके वितरीत यदि भवन क्रय करके व्यवसाय चलाया जाता है तो स्थायी सम्पत्तियों में अधिक विनियोग करना होगा।

(5) सहायक उद्योगों का अस्तित्व (Existence of Auxiliary Industries) – यदि किसी उपक्रम के समीप सहायक उद्योग भी स्थापित होते है जोकि उसके काम आने वाले कल- पुर्जों एवं उपकरणों को उप-अनुबन्ध (Sub-contract) के आधार पर उपलब्ध करा देते हैं तो ऐसी स्थिति में उस उपक्रम को स्थायी सम्पत्तियों में अधिक विनियोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस प्रकार बड़े उद्योग के साथ सहयोग लाभदायक सिद्ध होता है।

(6) अर्जनों में वृद्धि की इच्छा ( Desire to Increase Earnings) – यदि कोई संस्था अपने अर्जनों में वृद्धि करना चाहती है तो वह अधिक पूंजी का विनियोग ऐसे संयन्त्र की स्थापना में करेगी, जिससे वर्तमान लागतों में कमी की जा सके एवं वर्तमान विक्रय में वृद्धि की जा सके।

(7) उत्पादन लागतों में वृद्धि (Inerease in Production Costs) – कभी-कभी बढ़ती हुई उत्पादन लागतें भी व्यावसायिक उपक्रमों को स्वचालित एवं आधुनिक मशीनें लगाने के लिए बाध्य कर देती हैं। अतः ऐसी स्थिति में स्थाई सम्पत्तियों में अधिक विनियोग किया जाना स्वाभाविक ही है।

(8) अमूर्त कारक (Intangible Factors) – संस्था की प्रतिष्ठा कर्मचारियों का मनोबल आदि कुछ ऐसे कारक है जो स्थायी सम्पत्तियों में विनियोग को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिये, व्यवसाय की प्रतिष्ठा के लिये उपक्रम के मुख्य कार्यालय के शानदार भवन का निर्माण, कर्मचारियों के मनोबल को ऊंचा करने के लिये कल्याण परियोजनायें, कानून द्वारा अपेक्षित धूल खींचने वाले संयन्त्र की प्रतिस्थापना आदि ऐसे कारक है जो स्थायी परिसम्पत्तियों में विनियोग को बढ़ावा देते हैं। इनमें कम्पनी को प्रत्यक्ष लाभ न पहुँच कर अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचता है।

(9) परियोजना की अपरिहार्यता (Urgency of the Project) – स्थायी सम्पत्तियों में बहुत से विनियोग अपरिहार्यता के आधार पर किये जाते हैं। उदाहरणार्थ, यदि किन्हीं कारणों से कम्पनी की कोई मशीन नष्ट हो जाती है तो ऐसी स्थिति में कार्य रुक जाने से होने वाली हानि को दूर करने के लिये तुरन्त मशीन क्रय करने के लिये पूंजी का विनियोग किया जायेगा।

(10) कोषों का पूर्ण उपयोग ( Full Utilisation of Funds ) – यदि संस्था के पास फालतू कोष उपलब्ध हैं तो उनका लाभप्रद उपयोग करने के लिये स्थायी सम्पत्तियों को क्रय किया जाता है। ऐसा करने से संस्था की स्थायी सम्पत्तियों की कुल मात्रा में वृद्धि होती है।

(11) व्यवसाय का आकार ( Size of business ) – व्यवसाय का आकार बहुत अधिक सीमा तक धन के विनियोजन को प्रभावित करता है, यदि व्यवसाय का आकार बड़ा होगा तो निश्चित रूप से ही धन का विनियोजन स्थायी सम्पत्तियों में अधिक होगा, इसके विपरीत यदि व्यवसाय का आकार छोटा है तो स्थायी सम्पत्तियों में कम विनियोग करने की आवश्यकता होगी।

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Pankaja Singh

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