इतिहास

स्पेग्लर की इतिहास मीमांसा की व्याख्या | संस्कृति एवं सभ्यता के विषय में स्पेंग्लर के विचार | स्पेंग्लर की इतिहास विषयक अवधारणा

स्पेग्लर की इतिहास मीमांसा की व्याख्या | संस्कृति एवं सभ्यता के विषय में स्पेंग्लर के विचार | स्पेंग्लर की इतिहास विषयक अवधारणा

स्पेग्लर : इतिहास-स्वरूप

स्पेग्लर के इतिहास मीमांसा की व्याख्या

स्पेंग्लर ने यूरोपीय इतिहासकारों की इतिहास-सम्बन्धी दृष्टि की कटु आलोचना की है। उसके अनुसार यूरोप को विश्व के इतिहास का केन्द्र मानना भ्रामक धारणा है। इसी प्रकार यूरोपीय इतिहासकारों द्वारा ऐतिहासिक युग को प्राचीन, मध्यकाल और आधुनिक काल में विभाजित करना नितान्त अर्थहीन है, क्योंकि प्रत्येक शताब्दी के बाद यह विभाजन असंगत प्रतीत होता है। वास्तव में यूरोपीय इतिहासकारों की यह योजना उनके गर्व का परिणाम है। इसलिए स्पेंग्लर ने उन इतिहासकारों की निन्दा की है जो मिस्र और बेबीलोनिया की सभ्यता को यूनानी सभ्यता के इतिहास की भूमिका मात्र मानते हैं, तथा भारत और चीन की गौरवपूर्ण सांस्कृतिक उपलब्धियों को नगण्य समझते हैं।

स्पेंग्लर के विचार में विश्व का इतिहास रेखीय आकार में कल्पनीय न होकर महान् संस्कृतियों का खेल है। प्रत्येक संस्कृति एक निश्चित क्षेत्र में जन्म लेती है। प्रत्येक संस्कृति के लोगों और सामग्री पर उसकी अपनी छाप होती है। प्रत्येक संस्कृति अपने कुछ विशिष्ट भाव, संकल्प, विचार और जीवन पद्धति से जुड़ी होती है, जिनका उत्थान भी होता है और पतन भी। यह निश्चित है कि संस्कृतियाँ, जातियाँ, भाषाएं सत्य, देवता, भू-प्रदेश ऐसे ही विकसित और परिपक्व होते हैं जैसे वृक्ष पर पत्तियाँ लगती हैं, फूल लिखते हैं या उपशाखाओं में उसका विकास होता है—परन्तु “मानवता” के साथ ऐसा नहीं होता। प्रत्येक संस्कृति की आत्माभिव्यक्ति की अपनी नयी सम्भावनाएँ होती हैं जिनका जन्म होता है, उनमें प्रौढ़ता आती है और वह विनाश को भी प्राप्त होती है, लेकिन कभी भी वह अपने पूर्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाती। कोई भी ऐसी भूर्ति या चित्र, गणित या भौतिक-शास्त्र का सिद्धान्त नहीं है जो एक जैसे हों। परन्तु प्रत्येक कहीं आधारभूत रूप में एक दूसरे से भिन्न है और प्रत्येक अपने में पूर्ण, निश्चित अवधि में आबद्ध है। जिस प्रकार प्रत्येक पौधा अपने निश्चित समय में जन्म लेता और समाप्त होता है, उस पर एक विशेष प्रकार का फूल और फल लगता है, ये संस्कृतियाँ उत्कृष्ट जीवन तत्त्व ग्रहण करती हैं और पुष्प के समान एक दिव्य निरुद्देश्यता में विकसित होती हैं। वस्तुतः ये न्यूटन की निर्जीव सृष्टि का तत्त्व न होकर पौधों और पशुओं के समान गेटे की सजीव सृष्टि का तत्त्व हैं। स्पेंग्लर की दृष्टि में “विश्व-इतिहास एक अन्तहीन निर्माण एवं परिवर्तन का क्रम है जिसमें सजीव रूप अद्भुत रूप में बनते बिगड़ते रहते हैं। इसके विपरीत सामान्य इतिहासकार इसे एक प्रकार के कीड़े के रूप में देखता है जो बहुत ही श्रमपूर्वक समय के साथ-साथ अपने आकार में वृद्धि करता चला जाता है।”

स्पेंग्लर की उपरोक्त मान्यता उसके मुख्य विचारों और उसकी इस अन्तर्ज्ञानपाक प्रवृत्ति की द्योतक है कि इतिहास के अध्ययन का केन्द्र राष्ट्र या जाति न होकर संस्कृति होनी चाहिए, प्रत्येक संस्कृति प्रारम्भ से ही लायब्नीजीय मोनड के समान है जो कि अपनी मत्यु-पर्यन्त सर्वथा पृथक् रहता है, इसलिए संस्कृति का प्रारम्भ और अन्त एक जीव के समान है। स्पेंग्लर के द्वारा इतिहास की प्रकृति के वर्णन में संस्कृतियों की जीवों से तुलना करना विचारोत्तेजक है। इसलिए उसके अनुसार इतिहास के निर्माण में अथवा ऐतिहासिक विचारों को समझने के लिए दृष्टान्त वरदान है। यही एक ऐसा सरल आधार है जिसके द्वारा इतिहास की समस्याओं का समाधान हो सकता है। वास्तव में विश्व इतिहास संस्कृतियों की जीवनी है, इसलिए भूतकालीन और भावी इतिहास सभी का मौलिक विषय संस्कृति है। जिस प्रकार एक तितली का कोई विचार, लक्ष्य या योजना नहीं होती है, उसी प्रकार मानवजाति तितली से बढ़ कर नहीं है क्योंकि उसकी भी कोई विचार, लक्ष्य अथवा योजना नहीं होती है। वास्तव में, मानव जाति एक जैविक अभिव्यक्ति है अथवा एक निस्सार शब्द।

विश्व इतिहास का अध्ययन करने के लिए स्पेंग्लर ने सजीव तर्क (Organic logic”) का प्रारम्भ किया। उसका विश्वास था कि इतिहास के मूल तत्त्व को आत्मसात करने का एकमात्र तरीका इतिहास और प्रकृति की विसंगति का समझना है। वास्तव में इतिहास की दुनिया एक विभिन्न रचना और स्वरूप वाली दूसरी सृष्टि है, जिसको दर्शनशास्त्रियों ने प्राकृतिक जगत् की तुलना में बिल्कुल महत्त्व नहीं दिया। जिस प्रकार प्राकृतिक जगत् है उसी प्रकार एक इतिहास- जगत् भी है। अर्थात् कार्य-कारण के आधार पर घटित ऐतिहासिक घटनाओं का संयोजन स्पेंग्लर के विचार में और कुछ न होकर दूसरे रूप में प्रकृति-विज्ञान का ही एक टुकड़ा है। यही नहीं प्रकृति को जहाँ वैज्ञानिक तरीके से समझा जा सकता है वहाँ इतिहास को भाव के द्वारा। इतिहास को सत्य-असत्य के द्वारा नहीं समझा जा सकता; इतिहास जीवनमय है। मुख्य बात यह नहीं है कि ऐतिहासिक तथ्य क्या हैं? स्पेंग्लर के अनुसार मुख्य बात उन तथ्यों में निहित आशय अथवा इसमें कि उनसे क्या सिद्ध होता है। उसके लिए ऐतिहासिक तथ्यों का मूल्य केवल सांकेतिक है। इस संदर्भ में स्पेंग्लर गेटे को अपना गुरु मानकर यहाँ तक कहता है कि वह प्रतीकमय है। वास्तव में प्रतीक ही ऐतिहासिक सृष्टि के केन्द्र-बिन्दु हैं।

इस प्रकार स्पॉलर ने ‘समकालीन’ शब्द को समरूपता (Homology) के आधार पर नया अर्थ दिया। उसके अनुसार समरूपता के सिद्धान्त का ऐतिहासिक संदर्भ में प्रयोग करने से ‘समकालीन’ का पूर्णतया एक नया अर्थ निकलता है। वह उन ऐतिहासिक तथ्यों को समकालीन मानता है जो विभिन्न संस्कृतियों में सापेक्षतः एक जैसे घटित हुए हों। इसलिए वह नितान्त एक- जैसा महत्त्व रखते हैं।

समरूपता के सिद्धान्त के आधार पर ही संस्कृतियों के विभिन्न युगों की व्याख्या की गई और इसी आधार पर इतिहास का स्वरूप निर्धारित हुआ। प्रत्येक संस्कृति बाल्यावस्था, यौवन, पौढ़ावस्था और बार्धक्य के दौर से गुजरती है अथवा उसके जीवन में बसन्त, ग्रीष्म, पतझड़ और शिशिर का प्रादुर्भाव होता है। जो भी हो संस्कृतियाँ, स्पेंग्लर के शब्दों में, अपने पूर्व-निर्धारित जीवन-क्रमों में जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त लगभग एक हजार वर्ष गुजरती हैं। एक संस्कृति कैसे जन्म लेती है अथवा संस्कृति का आरम्भ कैसे होता है, इसका स्पेंग्लर ने न कोई विश्लेषण किया है और न ही इस विषय में किन्हीं समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है।

स्पेंग्लर ने संस्कृति को मूलतः चार कालों के संदर्भ में देखा है। संस्कृति का सर्वप्रथम काल उसका ‘वसन्त’ काल है (इसे विको के “दैवी-युग’ के समकक्ष माना जा सकता है)। यह धर्म- निष्ठा का काल है। इस युग के मनुष्य धर्म-भीरु हैं जिसमें धार्मिक चेतना का विकास होता है। उदाहरण के लिए भारत में यह युग वैदिक संहिताओं का काल है और यूनान में ओलम्पिक देवताओं का। इसके बाद संस्कृति के जीवन का दूसरा काल ‘ग्रीष्म काल है, अर्थात् संशय का युग जबकि सांस्कृतिक आत्म बोध के साथ-साथ एक आलोचनात्मक मनोभाव का भी जन्म होता है। संस्कृति के इस काल में विशिष्ट दार्शनिक और आध्यात्मिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन होता है। यह भारतीय संस्कृति का वह काल है जब उपनिषद् लिखे गए और फाउस्टियन संस्कृति में यह लुटर और देकार्त का युग था। इसी समय, कला के क्षेत्र में यूनान में डौरिक शैली के पश्चात् क्लासिकल और पश्चिम में गौथिक शैली के पश्चात् बौरोक शैली का विकास होता है। संस्कृति का तीसरा काल ‘पतझड़’ का है जिसमें संस्कृति अपनी प्रौढ़ता को प्राप्त होती है। यह बौद्धिक पराकाष्ठा का युग है, जिसका मूलाधार तर्क था। यही कारण है कि इस समय धर्म को भी बौद्धिक दृष्टिकोण से देखा गया। इस समय जहाँ भारत में बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो यूनान में सुकरात और प्लेटो ने तत्कालीन दर्शन को अपने तार्किक संवादों से भर दिया। पश्चिम में यही युग बौद्धिक तर्क-चेतना का है; इसी युग में यहाँ पर अनेक विश्व-कोश लिखे गये जो विशुद्ध बौद्धिक दृष्टिकोण पर आधारित थे। संस्कृति का चौथा और अन्तिम काल ‘शित’ का या महानगरीय सभ्यताओं के उदय का काल है। इस युग में संस्कृति न केवल अश्मोभूत होकर निर्जीव हो गई, बल्कि वह अपने प्रतिरूप ‘सभ्यता’ में प्रत्यावर्तित हुई। इस युग में संशयवादी दर्शन और भौतिकवाद की प्रधानता रहती है, विद्वान के विभिन्न सम्प्रदायों का जन्म होता है और धार्मिकता का पतन होता है। इस युग में जनता के लोकप्रिय तन्त्र-प्रजातन्त्र की परिणति कैसरवाद में होती है। इस प्रकार पश्चिम का स्थिति भी ऐसी ही है जहाँ अध्यात्मिकता की भावना निःशेष हो चुकी है। इस प्रकार की निस्सार परिस्थिति में न तो कुछ उद्भूत हुआ न हो ही सकता है।

स्पेंग्लर के अनुसार सभ्यता के उत्तर-काल की राजनीतिक संस्थापना कैसरवाद की है। उसने घोषित किया कि कैसरवाद के साथ प्रत्येक संस्कृति में फिर से धर्म-परायणता का प्रादुर्भाव होना आनिवार्य है। लेकिन धर्म-परायणता के इस पुनर्जागृह रूप में संस्कृति के प्रारम्भ की वह सर्जनशील शक्ति नहीं है जिससे कुछ निर्माण हो सके। इस समय न तो किसी नये विचार का प्रारम्भ होता है और न ही कोई नया निर्माण होता है। केवल ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोहरा हटने पर भूमि के दर्शन होते हैं और पुराने आकार पहले धुंधले दिखाई देते हैं लेकिन तत्काल ही शीघ्रता से स्पष्ट हो जाते हैं। प्रकृत्या, द्वितीय धर्मपरायणता मूलतः पहले जैसी विशुद्ध, युवा धर्मपरायणता है। इसका प्रारम्भ उस समय होता है जबकि निराश्रयता की स्थिति में बौद्धिकवाद समाप्त होने लगता है। उसके बाद संस्कृति का वसन्तकालीन स्वरूप स्पष्ट हो जाता है और अन्त में, जैसे इस युग में प्रत्येक संस्कृति में देखा जाता है, शक्तिशाली आदिम धर्म की दुनियाँ, जो प्रारम्भिक निष्ठा के महान् स्वरूप के सामने पीछे हटती गई और पृष्ठभूमि में चली गई थी, लोकप्रिय संहतिवाद के रूप में सामने आती है। द्वितीय धार्मिकता को निश्चित संस्थाओं के रूप में ढालने का प्रयत्न किया जाता है जिन्हें धार्मिक सम्प्रदायों, संघों का नाम दिया जाता है, जो पूर्णतः वसन्तकालीन जीवित आकारों के पुनर्निर्मित निर्जीव रूप हैं। पश्चिमी जगत् पर इस धार्मिकता का प्रभाव अभी तक बहुत कम पड़ा है, परन्तु कैसरवाद का युग इस समय पश्चिम पर छाया हुआ है। स्पेंग्लर के शब्दों में हमारा वर्तमान युग महान् अन्तरद्वन्द्रों का युग है और इस अपरिवर्तनशील नियति से कोई छुटकारा नहीं है। स्पेंग्लर ने आगे कहा है कि इसका अब एक ही विकल्प है—या तो दृढ़ रहा जाय या पराजय स्वीकार कर ली जाय, इसके अतिरिक्त कोई मध्यम-मार्ग नहीं है। लेकिन जैसा उसकी पुस्तक में संकेत दिया गया है पराजय का ही एक मात्र मार्ग है।

स्पेंग्लर के अनुसार प्रत्येक संस्कृति का एक ‘विशिष्ट’ रूप होता है जिस पर उसका जीवन निर्भर करता है और उसी पर संस्कृति के अनेक उपरूप स्थित होते हैं। संस्कृति के विशिष्ट स्वरूप की योजना ‘परम प्रतीक’ पर निर्भर करती है और ‘परम प्रतीक’ का निर्णय संस्कृति के जागरण के समय होता है और जागृति के क्षण में दिग्बोध परम प्रतीक का निश्चय करता है, संस्कृति की जागृति और विद्यमानता की अन्तराल और समय के आकस्मिक अर्थग्रहण से एक गहरी एकात्मकता है। यह परम प्रतीक ही संस्कृति की विशिष्ट शैली और ऐतिहासिक आकार ग्रहण करने की सम्भावनाएँ प्रदान करता है। स्पेंग्लर विस्तार को संस्कृति का ‘परम प्रतीक’ मानता है और परम प्रतीकों में अनेकता है। अन्तर-विस्तार के अनुभव से ही विश्व आकार ग्रहण करता है और अनुभव के द्वारा ही विश्व को समझा जा सकता है। किसी विशिष्ट भूमि की संस्कृति के आत्म-बोध के जागरण के क्षणों में ही परम प्रतीक का निश्चयन होता है और यही  क्षण इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है, इन्हीं में संस्कृति का जीवन-क्रम निश्चित होता है। स्पेंग्लर के अनुसार ‘परम प्रतीक’ प्रत्येक मनुष्य, समुदाय, काल की मनःस्थिति से सक्रिय रूप से सम्बद्ध है और उसी से प्रत्येक जीवन की अभिव्यक्ति की शैली निश्चित होती है। यह राज्य के आकार, धार्मिक-मिथक, सम्प्रदाय, नैतिक आदर्शों, चित्र, संगीत, कविता के आकारों और मौलिक वैज्ञानिक विचारों में अन्तर्निहित होता है.–परन्तु इन सबके द्वारा व्यक्त नहीं होता। साथ ही साथ, इसे शब्दों में व्यक्त करना भी कठिन है क्योंकि भाषा और शब्द तो स्वयं व्युत्पन्न प्रतीक हैं।

स्पेंग्लर ने विभिन्न संस्कृतियों के मूल्यों को सर्वथा पृथक्-पृथक् माना है अर्थात् उसके विचार में किन्हीं दो संस्कृतियों के मिलन की कोई सम्भावना है ही नहीं। लेकिन स्पेंग्लर की संस्कृतियों के “कृत्रिम-परिवर्तन’ की अवधारणा से प्रायः ऐसा आभास मिलता है जैसे संस्कृतियों के मिलन के सम्बन्ध में उसके विचारों में कोमलता आ सकती है। इसलिए उसने “कृत्रिम परिवर्तन” को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “ऐतिहासिक कृत्रिम परिवर्तन’ से उनका तात्पर्य उस स्थिति से है जिसमें एक नई तत्काल जन्मी संस्कृति पर जब एक प्राचीन विदेशी संस्कृति अपनी सम्पूर्णता में इस प्रकार छा जाती है कि नई संस्कृति का दम घुटने लगता है और वह अपने को अभिव्यक्त करने में असमर्थ हो जाती हैं; तब इसके आत्मबोध का विकास रुक जाता है। नई संस्कृति के अन्तस्तल से उद्भूत विचार पुरानी संस्कृति द्वारा प्रदत्त साँचों में ढल जाते हैं। युवा भावनाएं जराग्रस्त और रूढ़िगत कृतियों का रूप लेती हैं और स्वयं की रचना-शक्ति के बल पर नवीन रूप में विकसित होने के स्थान पर यह इस दूसरी संस्कृति से घृणा करती है और यह घृणा प्रायः भयानक रूप ले लेती है।

उपरोक्त विवेचन से स्पेंग्लर का इतिहास का स्वरूप स्पष्ट होता है उसका इतिहास-दर्शन अत्यधिक अनशील है। संस्कृतियों का जन्म क्यों’ और ‘कैसे’ होता है, इस प्रश्न का उत्तर बहुत संतोषजनक नहीं है, क्योंकि उसके विचार में इसकी व्याख्या रहस्यमय है फिर भी स्पेंग्लर का विवेचन, संस्कृति के जन्म की व्याख्या उसके दार्शनिक विचारों के अनुरूप ही है। इस विषय में क्रोवर का मत उल्लेखनीय है। उसके अनुसार संस्कृतियों का उद्भव कैसे होता है, इस विषय में एक संतुलित विचार अपनाना ही वांछनीय है और सबसे सरल और सन्तुलित उत्तर स्पेंग्लर का है जो सम्पूर्णतः ‘परम प्रतीक’ के सिद्धान्त से उद्भूत है। लेकिन यह उत्तर एकपक्षीय है जिसमें ज्ञात को उससे बताया गया है जो अपेक्षया कम ज्ञात है। यह ‘परम प्रतीक’ कारण न होकर विषय के पश्चात् उद्भूत हुआ है; इस दृष्टि से कारण उद्देश्यवादी प्रतीक होता है। परन्तु कारण को भूलकर स्पेंग्लर नियति की बात करता है। लेकिन इससे उसके द्वारा स्वतन्त्र रूप से संस्कृतियों और उनके उद्भव होने के कारण का प्रश्न स्पष्ट नहीं होता।

स्पेंग्लर का मुख्य उद्देश्य प्राचीन क्लासिकल युग तथा आधुनिक पश्चिमी जगत् की समानान्तरता से पश्चिम का पतन दिखाना था। इसके लिए पश्चिमी इतिहासकारों के द्वारा इसकी कटु आलोचना की गई जिसमें टायनबी का नाम उल्लेखनीय है। लेकिन यहाँ पर यह कहना पर्याप्त होगा कि स्पेंग्लर की विचारधारा में नैतिक जिम्मेदारी के लिए कोई स्थान नहीं है। अर्थात् इतिहास-क्रम में व्यक्ति का कोई महत्त्व नहीं है, जबकि इतिहास व्यक्तियों के कार्य और उपलब्धियों का लेखा-जोखा है। इस दृष्टि से स्पेंग्लर का इतिहास-दर्शन संशयात्मक है।

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Pankaja Singh

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