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सूरदास के पद्यांशों की व्याख्या | सूरदास के निम्नलिखित पद्यांशों की संसदर्भ व्याख्या

सूरदास के पद्यांशों की व्याख्या | सूरदास के निम्नलिखित पद्यांशों की संसदर्भ व्याख्या

Table of Contents

सूरदास के पद्यांशों की व्याख्या

  1. कहति कहा ऊधौ सो बौरी।

जाको सुनत रहे हरि के ढिंग स्यामसखा यह सो री।

हमको जोग सिखावन आयो, यह तेरे मन आवत?

काह कहत री ! मैं पत्थात री नहीं सुनी कहनावत।

करनी भली भलेई जानैं, कपट कुटिल की खानि।

हरि को सखा नहीं रही माई ! यह मन निसचय जानि॥

कहाँ रास-रस काहं जोग जप? इतनो अंतर भाखत।

सूर सबै तुम-त भईं बौरी याकी पति जो राखत।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत काव्य अंश सूरदास द्वारा विरचित सूर संग्रह से अवतरित किया गया है।

प्रसंग- यह एक गोपी का अन्य गोपी के प्रति वचन है। गोपी उद्धव को धूर्त समझती हैं और उनके प्रति अविश्वास प्रकट करते हुए तीखे व्यंग्य करती हैं।

व्याख्या- एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे पगली ! तू उद्धव से क्या कह रही है ? यह तो कृष्ण का वही सखा है जो उनके पास रहता है। इसके बारे में तो हम बहुत कुछ सुना करती थीं। व्यंग्यार्थ यह है कि ये कृष्ण के मित्र नहीं है – यों ही अपने आपको कृष्ण का मित्र कह रहे हैं। वह गोपी फिर कहती है – अरी तू क्या कह रही है ? मैं तो अभी तक यही माने बैठी थी कि यह उन्हीं के कहने से हमको योग का संदेश सुनाने आए हैं। अरी यह बात नहीं है। क्या तूने यह कहावत नहीं सुनी है कि जो भले होते हैं वे सदा अच्छे ही काम करते हैं और कपटी लोग कुटिलता की खान होते हैं। इसलिए हे सखी ! तू मन में यह निश्चय जान ले कि यह कृष्ण का सखा नहीं है। यह तो कोई धूर्त है जो अपने-आपको कृष्ण का सखा कहता है और योग का सन्देश इसकी मन-गढन्त कल्पना है, वरना कहाँ तो रास-रंग के प्रति उन रसिक शिरोमणि का अनन्य अनुराग और कहां जोग-जप आदि से सम्बन्धित ये नीरस क्रियाएँ ? दोनों में आकाश-पाताल का अन्तर है। श्रीकृष्ण के स्वभाव और कृष्ण के नाम पर इसके द्वारा दिए जाने वाले संदेश में आकाश-पाताल का अन्तर है। सूरदास कहते हैं कि वह गोपी कहती है कि तुम सब क्यों पागल हो गई हों, जो इस पर विश्वास कर रही हो ?

विशेष- (i) वक्रोक्ति अलंकार – पंक्ति आठ।

(ii) अनुप्रास अलंकार- स्याम-सखा, कपट-कुटिल, रास-रस।

(iii) इस पद में ब्रजवनिताओं की बातचीत को बहुत ही स्वाभाविक शैली में चित्रित किया गया है। बावरी, पगली, माई आदि सम्बोधन बहुत ही स्वाभाविक है।

  1. निर्गुन कौन देस कों बासी?

मधुकर ! हैंसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न हाँसी।।

कों है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी ?

कैंसो बरन भेस है कैसो केहि रस में अभिलासी।।

पावैगों पुनि कियो आपनो जों रे । कहैगो गाँसी

सुनत मौन हैं रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी।।

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपियाँ उद्धव से निर्गुण ब्रह्म के सम्बन्ध में व्यंग्यात्मक शैली में बहुत ही मनोरंजक प्रश्न पूछती हैं।

व्याख्या- गोपियाँ निर्गुन के नाम का मजाक सा उड़ाती हुई पूछती हैं – मधुकर ! तुम्हारा निर्गुन ब्रह्म किस देश का रहने वाला है ? हम सौगन्ध खाकर कहती हैं कि तुमसे यह प्रश्न पूरी गम्भीरता के साथ कर रही हैं किसी प्रकार का मजाक नहीं कर रही हैं। अतः तुम हमारे इस सवाल पर नाराज मत होना और राजी मन से हमें यह सब समझा दो उसका कौन पिता है, कौन उसकी माता कहलाती है, उसकी कौन पत्नी है तथा उसकी दासी का नाम क्या है ? उसका रंग और वेश-भूषा कैसी है और वह किस रस का अभिलाषी है – अर्थात् उसको किस प्रकार के कार्यों में आनन्द आता है ?

फिर गोपियाँ उद्धव को सावधान करती हुई कहती हैं कि हे भ्रमर ! तुम हमको ठीक-ठीक उत्तर देना यदि तुम ने कोई कपट की बात कहीं, तो फिर तुम्हें अपनी करनी का फल भोगना पड़ेगा। सूरदास कहते हैं कि गोपियों की ये बाते सुनकर उद्धव ठगे से अवाक रह गए उनकी सारी अक्ल मारी गयी।

  1. बातन सब कोऊ समुझावै।

जेहि विधि मिलन वै माधव सो विधि कोउ न बतावै॥

जद्यएि जतन अनेक रचीं पचि और अनत बिरमावै।

तद्यापि हठी हमारे नयना और न देख भावै।।

बासर-निसा प्रानबल्लभ तजि रसना और न गावै।

सूरदास प्रभु प्रेमहिं लगि करि कहिए जो कहि आवै॥

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- उद्धव की बातों से खीझकर गोपियाँ कहती हैं कि सभी लोग बातों से ही समझाना चाहते हैं, वास्तविक उपचार कोई नहीं बताता है।

व्याख्या- गोपियाँ कहती हैं कि सब लोग हमें बातों से ही बहलाना चाहते हैं। हमें कोई भी वह तरकीब नहीं बताता है जिससे कृष्ण के साथ हमारा मिलन हो सके। यद्यपि हम अनेक यत्न करके थक गई हैं, तथापि वे अन्यत्र (मथुरा) ही विश्राम कर रहे हैं। यद्यपि उनके मिलने की सम्भावना बहुत कम है, तथापि हमारे हठी नेत्रों को उन के अतिरिक्त किसी अन्य को देखना अच्छा ही नहीं लगता है।

हमारी जिह्वा भी प्राण-प्यारे श्रीकृष्ण के गुन-गान के अतिरिक्त और कुछ बात नहीं करना चाहती है। सूरदास कहते हैं कि गोपियाँ कहती हैं कि हमारे इस प्रेम के नाते के लिए तुम जो चाहो, तुम्हारे मन में जो आवे, सो कहो – परन्तु हम तो सब प्रकार (मनसा, वाचा, कर्मणा) उन्हीं के प्रेम में डूबी हुई है।

विशेष- (1) विभावना की व्यंजना- प्रथम पंक्ति।

(2) वक्रोक्ति अलंकार- अंतिम पंक्ति।

(3) अमर्ष संचारी की व्यंजना है।

  1. संदेसो देवकी सों कहियो।

हौं तो धाय तिहारे सुत की कृपा करत ही रहियो।।

उबटन तेल और तातो जल देखत ही भजि जाते।

जोइ-तोइ माँगत सोइ-सोइ -देती करम-करम कर न्हाते॥

तुम तौ टेव जानतिहि है हौ तऊ मोहिं कहि आवै।

प्रातः उठत तेरे लाल लाड़ैतेहि माखन-रोटि भावै॥

अब यह सूर मोहिं निसिवासर बड़ो रहत जिय सोच।

अब मेरे अलक लड़ैते लालन हैं हैं करत संकोच॥

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- भाव विह्वला माँ यशोदा उद्धव के हाथों से देवकी के लिए यह संदेश भिजवाती हैं.

व्याख्या- यशोदा उद्धव के हाथ देवकी को यह संदेश भिजवाती हैं कि वे तो उनके पुत्र श्रीकृष्ण का पालन-पोषण करने वाली दाई थीं और उसी रूप में उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन भी किया। भले ही श्रीकृष्ण उनके पुत्र नहीं थे तथापि दाई की भी एक ममता होती है इसलिए देवकी यशोदा के प्रति दयाभाव तो बनाये ही रखें और कभी-कभी श्रीकृष्ण को उनके पास भेज दिया करें। इसी क्रम में यशोदा के सामने श्रीकृष्ण के शैशवकालीन दृश्य तैरने लगते हैं कि किस प्रकार जब (यशोदा) तेल, उबटन करने को तैयार होती और गर्म पानी से नहलाने के लिए तत्पर होती तो वे इन वस्तुओं को देखते ही इनसे बचने के लिए भाग जाया करते थे। तब जो-जो वस्तु माँगते जाते वही वस्तु वे (यशोदा) श्रीकृष्ण को देती जाती थीं। इस प्रकार धीरे-धीरे वह (श्रीकृष्ण) स्नान किया करते थे। यशोदा श्रीकृष्ण की जन्मदात्री माँ देवकी के प्रति यह निवेदन करती है कि भले ही वे माँ हैं तथापि धाय के नाते ही सही, उन्हें (यशोदा को) यह कहना है कि प्रातः काल उठते ही श्रीकृष्ण को ‘माखन-रोटी’ का कलेवा बहुत रुचिकर लगा करता था। जब यशोदा को रात-दिन यही चिन्ता रहती है कि उसका प्रिय श्रीकृष्ण संकोचवश यह स्पष्ट तो कह नहीं पाता होगा कि उसे ‘माखन-रोटी’ का नाश्ता रुचिकर लगता है। इसलिए उसे कलेवा में मक्खन रोटी नहीं मिलता होगा। यशोदा को सबसे बड़ी चिन्ता यही है।

विशेष- (i) ‘कृपा करत’, ‘तेल तातो’ में छेकानुप्रास अलंकार है। (ii) ‘जोइ-जोइ’, ‘सोइ-सोइ’, ‘करम-करम’ में पुनरुवित-प्रकाश अलंकार है। (iii) यशोदा के वात्सल्य-विशेग रस का मार्मिक चित्रण है।

  1. ऊधौ ! अँखियाँ अनुरागी।

इकटक मग जोवति अरु रोवति, भलेहू पलक न लागी।

विन पावस पावस ऋतु आई देखत हौ बिदमान॥

अब धों कहा कियो चाहत हौ? छाँड़हु नीरस ज्ञान।

सुनु प्रिय सखा स्यामसुन्दर के जानत सकल सुभाव।।

जैसे मिलै सूर प्रभु हमको सौ कछु करहु उपाव।।

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपियाँ अपनी भाव विह्वल स्थिति की ओर उद्धव का ध्यान आकृष्ट करके, उनके हृदय में करुणा, दया और सहानुभूति जगाने का प्रयास करती हैं।

व्याख्या- गोपियाँ अपनी आँखों के विषय में कुछ कहकर प्रकारान्तर से या आँखों के ब्याज से अपनी दारुण स्थिति का वर्णन करके उद्धव को अपने अनुकूल बनाना चाहती हैं। गोपियाँ अपने नेत्रों के अनुराग का वर्णन करती हैं कि वे निश्छल प्रेम करने वाली हैं। इसके प्रमाणस्वरूप वे गोपियाँ अपनी आँखों के क्रियाकलापों का परिचय देती हैं कि श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाली ये आँखें दिन-रात उसी मार्ग की ओर निमिष निहारती रहती हैं, जिससे श्रीकृष्ण आ सकते हैं, लौटने वाले हैं। इतना ही नहीं ये आँखें श्रीकृष्ण का स्मरण कर-करके रोती रहती हैं और कभी भी विश्राम करने का या चुप रहने का नाम लेतीं। उद्धव को प्रश्नवाचक मुद्रा में गोपियाँ यह प्रमाण देना चाहती हैं कि देखते नहीं हो ?’ बिना वर्षा ऋतु के ही निरन्तर झड़ी लगी रहती है – अश्रुओं की। इतने पर भी उद्धव का हृदय भहीं पसीजा? गोपियाँ प्रश्न करती हैं कि क्या अभी कुछ और कसर बाकी है ? और क्या चाहते हैं ? और अपनी प्रार्थना दुहराती हैं कि वह ज्ञान-योम की चर्चा छोड़े। उसे श्रीकृष्ण के प्रियसखा कहकर उसकी प्रशंसा करती हैं ताकि उसे अपने पक्ष में कर सकें, मोड़ सकें। इतनी भूमिका बाँधने के बाद गोपियाँ अपना मन्तव्य स्पष्ट करती हैं कि (उद्धव उनके स्वभाव से भली-भाति परिचित हो चुके हैं।

  1. ऊधौ ! मन नाहीं दस बीस।

एक हुतो सो गयो हरि के संग को अराध तुब ईस ?

भइं अति सिथिल सबै माधव बिनु जथा देह बिनु सीस।

स्वासा अटकि रहे आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥

तुम तो सखा स्यामसुंदर के सकल जोग के ईस।

सरजदास रसिक की बतियाँ परबौं मन जगदीस।।

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपयाँ मन की अनन्य स्थिति का बोध कराती हैं और श्रीकृष्ण के निमित्त जीवित रहने की इच्छा व्यक्त करती हैं –

व्याख्या- उदव द्वार प्रतिपादित निर्गुण-निराकर ब्रह्म की आराधना करने में अपने को असमर्थ बताती हुई गोपियाँ तर्क प्रस्तुत करनी हैं कि उनके पास दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक अतिरिक्त मन से निर्गुण की उपासना और कर इन्होंने बताया कि केवल एक मन था, वह भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही चला गया (श्रीकृष्ण ने चुरा लिया था) अब किस मन से या कैसे आराधना की जाय- उद्धव द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म की। श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में गोपियाँ अत्यन्त शिथिलगात होकर मुरझाई हुई-सी हो गयी हैं, जिस प्रकार बिना सिर के शरीर की दशा हो जाती है। गोपियों के शरीर बहुत अशक्त हो चले हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि प्राण केवल इसलिए अटके हुए हैं कि उन्हें एक अवधि विशेष तक श्रीकृष्ण के लौटने की आशा लगी रही है। जिस श्रीकृष्ण को आलम्बन मानकर वे जीवित हैं, उसके विषय में शुभकामनाएं करती हैं कि कोटि-कोटि वर्षों तक जिए। उद्धव को श्रीकृष्ण का सखा तथा योग का स्वामी (अधिष्ठाता) बताकर (उसकी प्रशंसा करके) यह प्रार्थना करती हैं कि वह जगत् के स्वामी, रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण की बातें सुनाकर मन की इच्छा को पूर्ण करें।

विशेष- (i) ‘तुम तो सखा स्यामसुन्दर के’ में व्याजोक्ति अलंकार है। (ii) जथा देह बिनु सीस में उदाहरण अलंकार है। (iii) गोपियों की अनन्यता का भाव व्यक्त हुआ है। (iv) गोपियों के कथन में वक्रता, भंगिमा एवं वाग्वैदग्ध्य दिखाई पड़ता है।

  1. ऊधौ ! दीनो प्रीति दिनाई।

बातनि सुहृद, करम कपटी के, चले चोर की हाई।

बिरह-बीज वधवार सलिलि मानी अधर मुरली प्याई।

सो है जाय खगी अंतर्गत, ओषधि बल न बसाई।

गरल-दान दीनो है नीकौ, याको नहीं उपाय।

के मारै, के काज सरै, यह दुख देख्यो नहिं जाय।

कहि मारै, सो सूर कहावै, मित्र द्रोह न भलाई।

सूरदास ऐसे, अलि जग में तिनकी गति नहीं काई।

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपियाँ श्रीकृष्ण पर विष देने का आरोप लगाती है।

व्याख्या- श्रीकृष्ण के प्रेम को गोपियाँ इतना अपराध मानती हैं कि जैसे किसी ने विष ही दे दिया हो। श्रीकृष्ण पर आरोप लगाती हैं कि बातें तो मैत्री जैसी करते थे किन्तु कर्म किये कपटपूर्ण। कारण कि पहले प्रेम बढ़ाया (गोपियों से) और बाद में चारों की भाँति गोकुल से खिसक गये चुपके से। एक और कलाना की है कि बुधवार (एक विषैला बीज विशेष) की भाँति विरह अब विकट परिस्थिति उत्पन्न कर रहा है। श्रीकृष्ण ने जो अधरामृत पान कराया था, वही मानो बुधवार का जल था। जो अब गोपियों के गले में अटक गया है, जिस पर अब कोई औषधि भी काम नहीं कर पा रही (विरह वेदना को कोई उपाय शमिल कर पा रहे)। श्रीकृष्ण के विषय में गोपियाँ स्पष्ट करती हैं कि विष देने के समान श्रीकृष्ण ने विरह-कथा दे दी हैं इस असहनीय वेदना से तो गोपियाँ यह अच्छा समझती हैं कि या तो मृत्यु ही आ जाए अथवा स्वप्न मन, आनन्दित हो जाएँ, अन्तमें एक नीतिपरक वाक्य कहती हैं कि जो पहले से चेतावनी देकर मारे, वह ही ‘शूर वीर’ कहा जा सकता है और इसके साथ ही अभिशाप के स्वर में गोपियाँ कह उठती हैं कि ऐसे चोर, लम्पट, धोखेबाज लोग (मोक्ष) प्राप्त नहीं हो सकती।

विशेष- (i) ‘प्रीति-दिनाई’ में रूपक अलंकार है। (ii) ‘मानो मधुर माधुरी प्याई’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है। (iii) ‘बिरह-बीज वधवार’ में पुनः रूपक अलंकार है।

  1. ऊधौ इतनी कहियो जाय।

असि कृसगात भई हैं तुम बिनु बहुत दुखारी गाय।

जल समूह बरसत अँखियन तें हूँकत लीने नाँव।

जहाँ जहाँ गोदोहन करते ढूंढ़त सोइ सोइ ठाँव।

परति पछार खाय तेहि तेहि थल अति व्याकुल है दीन।

मानहूँ सूर काढ़ि डारे हैं वारि मध्य तैं मीन।।

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपियाँ श्रीकृष्ण के लिए संदेश देती हैं।

व्याख्या- गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि वह केवल इतना-सा संदेश ले जाकर श्रीकृष्ण तक पहुंचा दे कि श्रीकृष्ण के बिना ब्रज की गायें बहुत दुर्बल हो गयी हैं और बहुत दुःखी रहने लगी हैं। जब कोई श्रीकृष्ण का नाम ले लेता है तो वे (गाय) हू-हू करके (धाड़-मारकर) रोने-माने लगती हैं और आँसुओं की धार उनकी आँखों से बरसने लगती हैं। जंगलों में जा-जाकर गायें उन-उन स्थानों को सूंघती फिरती हैं, जहाँ-जहाँ श्रीकृष्ण ने उनका दूध निकाल कर पिया था। पूर्व स्मृतियों के आधार पर खोजती हैं कि संभवतः उन स्थानों पर श्रीकृष्ण मिल जाएँ, किन्तु जब वहाँ श्रीकृष्ण नहीं मिलते तो अत्यन्त व्याकुल और दुःखी होकर उन्हीं स्थानों पर पछार खाती-खाती गिर जाती हैं। ऐसे क्षणों में इन गायों की इतनी दयनीय स्थिति हो जाती है, मानो पानी से बाहर निकालकर मछलियाँ डाल दी हों, तब जैसे वे छटपटाती हैं, मानों वैसे ही ये गायें श्रीकृष्ण के वियोग में बिलखती हैं।

विशेष– (i) ‘मानहु सूर काढ़ि डारे हैं – मीन’ उत्प्रेक्षा अलंकार है। (ii) पूरे पद में पर्यायोक्ति अलंकार है।

  1. ऊधौ मन माने की बात।

जरत पतंग दीप में जैसे औं, फिरि लपटात॥

रहत चकोर पुहुमि पर, मधुकर ! ससि अकास भरमात।

ऐसो ध्यान धरो हरिजू पै छन इत उत नहिं जाता।।

दादुर रहत सदा जल भीतर कमलहिं नहिं नियरात।

काठ फोरि घर कियो मधुप ते बँधे अंबुज के पात॥

बरषा बरसत निसदिन ऊधौ ! पुहुमी पूरि अघात।

स्वाति-बूढ़ि के काज पपीहा छन छन रटत रहात॥

सेहि न खात अमृतफल भोजन तोमरि को ललचात।

सूरज कृष्न कूबरी

रीझे’ गोपिन देखि लजात॥

सन्दर्भ- पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपियाँ श्रीकृष्ण के कुब्जा प्रेम पर व्यंग्य करती हैं। श्रीकृष्ण की पसन्द की खिल्ती उड़ाती हैं।

व्याख्या- गोपियां उद्धव से प्रेम के क्षेत्र के इस सत्य का उद्घाटन करती हैं कि मन की बात बड़ी विचित्र होती है, न जाने कब, कहाँ, किससे लग जाए, फंस जाए। उदाहरण के लिए जिस प्रकार पतंग है कि दीपक से प्रेम कर बैठता है, भले ही दीपक पर उछलकर उलट-पलटकर जलता रहता है। चकोर को देखिए पृथ्वी पर रहता है और चन्द्रमा को देखकर अमित हो जाता है जो इतनी दूर आकाश में रहता हैं। ठीक उसी प्रकार श्रीकृष्ण भले ही मथुरा चले गये हैं किन्तु गोपियों का ध्यान श्रीकृष्ण पर केन्द्रित है और क्षण भर के लिए इधर-उधर नहीं जाता, हटता। दादुर की विचित्र स्थिति होती है कि वह सदैव जलमें रहता है किन्तु फिर भी कमलके पास भी नहीं फटकता। भौंरा एक ओर तो काठ (बाँस को छेद देता है) में घर बना लेता है और दूसरी ओर वही कमल की पंखुडियो में बन्द हो जाता है, कोमल पंखुड़ियों को नहीं काट पाता। पपीहे की स्थिति देखिए कि रात-दिन वर्षा हो, पृथ्वी पूर्णरूपेण तृप्त हो जाती हो किन्तु पपीहा स्वाँति बूंद के लिए. पीऊ-पीऊ रटता-रटता अपने जीवन को काट देता है। ‘सेही’ नामक जानवर की भी ऐसी ही दशा होती है कि वह मीठे-मीठे फलों को छोड़कर कड़वी लौकी (तुम्बी) खाने को लालायित रहता है। यह मन की ही बात है कि श्रीकृष्ण का मन कुब्जा पर तो आसक्त हो गया और गोपियों की ओर देखकर श्रीकृष्ण अब लज्जा अनुभव करते हैं।

विशेष- (i) ‘जरत पतंग दीप में जैसे’ में उदाहरण अलंकार है। (ii) तृतीय एवं चतुर्थ चरण में भी ऐसो ध्यान धरो’ में उदाहरण अलंकार है। (iii) ‘दादुर रहत सदा जल भीतर’ से लेकर सेहि न खात अमृतफल भोजन’ में दृष्टान्त

  1. ऊधौ ! बिरहौं प्रेम करै।

जयों बिनु पुट पट गहै न रंगहि पुट गहै रसहि परै।

जो आवौ घट दहत अनल तनु, तौ पुनि अमिय भरै।

जौ धरि बीज देह अंकुर चिरि, तौ सत फरनि फरै।

जौ सर सहत सुभट संमुख रन, तौ रबिरथहि सरै।

सूर गोपाल प्रेम-पथ-जल तें कोउ न दुखहि डरै।

सन्दर्भ– पूवर्वत्।

प्रसंग- गोपियाँ उद्धव से विरह, कष्ठ, साधना, तपस्यादि का महत्व प्रतिपादित करती हुई करती हैं।

व्याख्या- गोपियाँ उद्धव से विरह के महत्व का प्रतिपादन करती हैं, विरह को भी प्रेम का वर्द्धन करने वाला तत्व मानकर उसकी महत्ता बताती हैं कि विरह भी प्रेम को अधिक श्रेष्ठ बनाता है। इस कथन की पुष्टि में प्रमाण स्वरूप वे कुछ उदाहरण देती हैं। पहला उदाहरण दिया है – किसी रंग भरे पात्र में कपड़े रंगने का, कि बिना डुबाए कपड़ा कैसे रंगा जा सकता है और ज्यों ही डोब लगा दी जाती है, कपड़ा रंग-रंग खिलने लगता है (यहाँ रंग में डूबने से कपड़े के दम घुटकर कष्ट सहने का बोध करता है)। दूसरा उदाहरण है – कुम्हार द्वारा अवाँ में घड़े पकाने का, कि जब घड़ा अवों में अपने शरीर को जलाता है, दाहता है तो अमृत भरने योग्य (पक्का) हो जाता है। नहीं तो कच्चे घड़े में अमृत भरने पर वह शीघ्र ही फूट जाएगा (इस उदाहरण में भी कष्ट के बाद शुभ अवसर आने के सिद्धान्त की पुष्टि की गयी है)। इसी प्रकार तीसरा उदाहरण दिया गया बीज का, कि जबतक वह बीच में से चिरता नहीं, तब तक पौधे के रूप में पल्लवित, पुष्पित होकर सैकड़ों फल कैसे दे सकता है। इस प्रकार फलवान होने के लिए बीज को बीच में से चिरना पड़ता है। यदि रण में योद्धा डटकर युद्ध करता है और अपने वक्ष पर शत्रुपक्ष के बाण झेलता है तो वीरभूमि में प्राण गंवाने पर स्वर्ग प्राप्त करता है। ठीक इसी प्रकार जब तक प्रेमी विरह की अग्नि में तपता नहीं, तब तक प्रेम में निखार नहीं आता। गोपियाँ अन्त में स्पष्ट करती हैं कि मार्ग में यदि श्रीकृष्ण का प्रेम रूपी जल भरा हासे तो दुःख से, कष्ट से कोई गोपी नहीं डरेगी। क्योंकि श्रीकृष्ण का प्रेम, तो कष्ट साधना से ही अधिक उभरेगा।

विशेष- ‘बिरहौं प्रेम करैं‘ में परिसंख्या अलंकार का सौन्दर्य परिलक्षित होता है।

  1. 11. मैया री मैं चंद लहौंगौं।

कहा करौं जलपुट भीतर कौ, बाहर व्यैंकि गहौंगौ॥

यह तौ झलमलात झकझोरत, कैसे कै जु लहौंगौ॥

वह तौ निपट निकटहीं देखत, बरज्यौ हौं न रहौंगौ॥

तुम्हरो प्रेम प्रकट मैं जान्यौ, बौराऐं न बहौंगौ।

‘सूर’ स्याम कहै कर गहि ल्याऊँ, ससि-तन दाप दहौंगौ॥

सप्रसंग व्याख्या- पहले जब श्री कृष्ण ने चन्द्रमा पाने के लिए हठ किया तो माँ यशोदा उन्हें बर्तन में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाकर बहला दिया करती थीं, लेकिन अब वह समझदार हो गये और माँ की चालाकी को उन्होंने समझ लिया अतएव आज उन्होंने बाल हठ पकड़ लिया। कृष्ण ने कहा माँ आज तो असली चन्दा मैं लूँगा। बर्तन में भरे जल में चन्द्रमा की प्रतिच्छाया को लेकर क्या करूंगा। मैं तो उसे उछल कर पकड़ लूंगा, यह जल के भीतर का चन्द्रमा मो झकझोरने से हिलने और कांपने लगता है। भला इसे मैं कैसे चाह सकता हूँ? यह मुझे अच्छा नहीं लगता। आकाश पर का चन्द्रमा मुझे तो कोई विशेष दूर नहीं दिखाई पड़ता। अब तुम कितना भी मना करोगी, नहीं मानूंगा, अवश्य लूंगा। तुम प्रेमवश मुझे फुसलाती हो लेकिन अब तुम्हारे बहलाने-फुसलाने में नहीं आऊँगा। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने कहा कि मैं उसे अपने हाथ से पकड़ कर ले आऊँगा। सशरीर चन्द्रमा को प्राप्त करके ही अपने असन्तोष को दूर करूंगा अर्थात् मनोकामना पूरी करूंगा।

विशेष- बालहठ का स्वाभाविक वर्णन है।

  1. देखौ साई दधि सुत मैं दधि जात।

एक अचंभो देखि सखी री, रिपु रिपु जु मैं समात॥

दधि पर कीर, कीर पर

पंकज के दै पात।

यह सोभा देखत पसु पालक, फूले अंग न समात॥

बारबार बिलोकि सोचि चित, नंद महर मुस्क्यात।

यहै ध्यान मनि आनि श्याम कौ, ‘सूरदास’ बलि जात।।

व्याख्या- दही खाते हुए बालक कृष्ण का वर्णन करते हुए एक सखी दूसरी से कृष्ण के सौन्दर्य को चमत्कार पूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि हे सखी ! आज मैंने दधि के पुत्र के मुख में दधि को जाते देखा अर्थात् पुत्र के मुख में पिता को प्रवेश करते देखा। यहाँ दधि सुत (चन्द्रमा) कृष्ण के मुख के लिए प्रयुक्त हुआ है। कृष्ण मुख में दही डाल रहे हैं। इसी बात को गोपिका घुमा-फिराकर चमत्कारपूर्ण ढंग से कहती हैं।

सखी कहती हैं कि मैंने एक आश्चर्यजनक बात देखी कि शत्रु समा रहा है। यहाँ मुख रूपी चन्द्रमा में हाथ (राहु) को प्रवेश करते देखकर यह कल्पना की गयी है। भाव यह है कि कृष्ण हाथ में दही खा रहे हैं।

दही पर तोता बैठा है अर्थात् दही लगे मुख के ऊपर नाक है। तोते पर कमल है अर्थात् नाक के ऊपरी भाग में नेत्र है और कमल (नेत्रों) के ऊपर दो पत्ते (पलके) हैं। कृष्ण के इस सौन्दर्य को देखकर ग्वाले प्रसन्नता से फूले नहीं समा रहे हैं। दही खाते हुए कृष्ण के इस परम मनोहर रूप को देखकर नन्द जी मुस्कुराते हैं और सूरदास कृष्ण के इस रूप का ध्यान करके बलिहारी जाते हैं।

विशेष- (i) यह सूर का दृष्टिकूट पद है, जिसमें चमत्कार उत्पन्न करना ही कवि को प्रिय है। (ii) कृष्ण के माखन खाने का वर्णन करने के साथ-साथ कवि ने उनमें अंगों के सौन्दर्य पर भी प्रकाश डाला है। (iii) वात्सल्य तथा अद्भुत रस का सम्मिश्रण है। (iv) प्रसाद गुण। (v) व्यंजना शब्दशक्ति।

  1. रूपकातिशयोक्ति अलंकार।
  2. जसुदा मदन गुपाल सोवावै।

देखि सयन-गति त्रिभुवन कंपे, ईस बिरंचि भ्रमावै।।

असित-अरुन-सित आलस लोचन उभय पलक परि आवै।

जनु रवि गत संकुचित कमल जुग, निसि अलि उड़न न पावै।

स्वास उदर उससित यौं, मानौ दुग्ध-सिंधु छबि पावै॥

नाभि-सरोज प्रगट पदमासन उतरि नाल पछितावै।।

कर सिर-तर करि स्याम मनोहर, अलक अधिक सौभावै।

‘सूरदास’ मानौ पत्रगपति, प्रभु ऊपर फन छावै॥

सन्दर्भ- कविवर सूरदास ने बालक कृष्ण की सुप्तावस्था को देखकर देवताओं के मानस में उठने वाले भावों का वर्णन किया है-

व्याख्या- माता यशोदा श्रीकृष्ण को सुला रही हैं और कृष्ण को सुप्तावस्था में देखकर तीनों लोक इस भय से व्याकुल हो गए कि अब तो महाप्रलय अत्यन्त निकट है और ब्रह्मा तथा शिव भी यह सोचकर कि अब सृष्टि का संचालन किस प्रकार होगा चिन्तातुर हो गये। कृष्ण के काले, लाल तथा सफेद रंग के नेत्रों की पुतलियों के आलस्यवश बन्द होने पर ऐसा आभास हुआ कि मानों दो कमल पुष्प संकुचित अवस्था को प्राप्त कर बन्द हो रहे हों जिनमें कि रस-पान करते दो और भी असावधानी के कारण बन्द हो गए हों। तात्पर्य यह है कि मानों कृष्ण के नेत्र रूपी सूर्य के मूंदने पर कमल रूपी नेत्रों में पुतलियाँ रूपी अमर बन्द हो गये हों।

कवि कह रहा है कि कृष्ण के चौंक-चौंक कर बाल-सुलभ-क्रीडाएँ करने से तो ऐसा ज्ञात होता है मानों साक्षात चन्द्रमा ही अमृत से पूर्ण होकर समस्त पृथ्वी को रस पूर्ण कर रहा हो उनके स्वास लेने से पेट के ऊपर नीचे होने की गति से ऐसा लगता है मानो दुग्ध सागर ही शोभित हो रहा हो और ब्रह्मा भी अपने सहज स्थान से नीचे चले आने के कारण झूला झूलने से प्राप्त आनन्द से वंचित हो गये हों।

यहाँ यह भी स्मरणीय है कि विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा का जन्म होने के कारण ही उसे ब्रह्मा का मुख्य स्थान माना गया है। कवि का कहना है कि जब बालक कृष्ण अपने सिर के नीचे हाथ को रखकर सोते हैं तो उनके बालों की शोभा ऐसी प्रतीत होती है कि मानो स्वयं शेषनाग अपने सहस्र फनों की छाया उनके ऊपर कर रहा हो।

अलंकार- इस पद में उत्प्रेक्षा तथा प्रांति अलंकारों का सौन्दर्य अत्यन्त उच्चकोटि का है।

  1. तजौ मन हरि बिमुखन के संग।

जिनकै संग कुमति उपजति है,

परत भजन मैं भंग।।

कहा होय पय पान कराएँ, विष नहिं तजत भुजंग।

कागहिं कहा कपूर चुगाएँ, स्वान न्हवाएँ गंग।।

खार कौं कहा अरगजा-लेपन, मरकट भून अंग।

गज कौं कहा सरित अन्हवाएँ, बहुरि धरै वह ढंग।।

पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतो करत निषंग।

‘सूरदास’ कारी कामरि पै, चढ़त न दूजौ रंग।।

प्रसंग- प्रस्तुत पद में कवि ने भगवान की भक्ति से रहित व्यक्ति का साथ छोड़ने की सलाह दी है।

व्याख्या- प्रस्तुत पद में महाकवि सूरदास जी कहते हैं कि हे मन जिसका ध्यान प्रभु की भक्ति की ओर आकर्षित नहीं होता ऐसे असन्तों का साथ छोड़ देना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्ति का साथ करने से कुबुद्धि ही पैदा होती है जिससे प्रभु के भजन में व्यवधान पड़ता है। यदि आप उन्हें ज्ञान द्वारा सुधारना चाहेंगे तो यह निरर्थक ही रहेगा क्योंकि विषैले साँप को दूध पिलाने से क्या लाभ है? क्योंकि इससे वह अपने विष को त्याग नहीं सकता। कौए को कपूर चुगाने से तथा कुत्ते को गंगा स्नान कराने से क्या लाभ होगा। क्योंकि वह अभक्ष्य का भक्षण निश्चित रूप से करेंगे। गधे के शरीर पर सुगन्धित द्रव्य का लेप करने तथा बन्दर को आभूषण पहनाने से क्या लाभ है? हाथी को नदी में स्नान कराने से क्या लाभ है, क्योंकि वह पुनः धूल को ही धारण कर लेगा। पतित रूपी पत्थर सदुपदेश रूपी बाणों से नहीं बिंधता उसे बिंधने की कोशिश में तरकश खाली करना व्यर्थ है। सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार काली कमरी को दूसरे रंग में नहीं रंगा जा सकता है ठीक उसी प्रकार दुष्टजनों के ऊपर सत्संग का प्रभाव नहीं पड़ेगा। अतः ऐसे असन्तों का साथ त्याग देना चाहिए।

विशेष- (i) प्रस्तुत पद में अनुप्रास अलंकार विद्यमान है। (ii) यहाँ उपमा अलंकार दर्शनीय है। (iii) प्रस्तुत पद में कुसंग का वर्णन बड़े स्पष्ट शब्दों में किया गया है।

  1. चलि सखि, तिहिं सरोवर जाहिं

जिहिं सरोवर कमल कमला, रवि बिना बिकसाहिं।।

हंस उज्जल पंख निर्मल, अंग मलि-मलि न्हाहिं।

मुक्ति-मुक्ता अनगिने फल, तहाँ चुनि-चुनि खाहिं।

अतिहिं मगन महा मधुर रस, रसन मध्य समाहिं।

पदुम-वास सुगंध-सीतल, लेत पाप नसाहिं

सदा प्रफुलित रहैं, जल बिनु निमिष नहिं कुम्हिलाहिं।

सघन गुंजत बैठि उन पर भौंरहू बिरमाहिं।।

देखि नीर जु छिलछिलौ जग, समुझि कछु मन मांहि।

‘सूर’ क्यौं नहिं चलै उड़ि तहँ, बहुरि उड़िबौ नाहिं॥

प्रसंग – प्रस्तुत पद में कवि सूरदास जी ने माया में लिप्त मन को ज्ञान रूपी बैकुण्ठ की प्राप्ति करने के लिए प्रेरित किया है।

व्याख्या – कवि सूरदास जी कहते हैं कि हे सखी! हमें उस भगवान के बैकुण्ठ रूपी सरोवर के पास चलना चाहिए जहाँ सूर्य उदय नहीं होता फिर भी कमल ऐश्वर्य एवं शोभा से युक्त सदैव खिला रहता है तथा उस सरोवर में हंस अपने शरीर को मल-मलकर धोकर स्वच्छ एवं निर्मल तथा कलुषता से रहित बनाता है और चुन-चुनकर अमनी रूचि के अनुसार मोती चुनता है। अर्थात् सूरदास जी कहते हैं कि हंस रूपी साधु वैकुण्ठ सभी प्रासेवर में अन्दर एवं वाह्य को मल-मल कर साफ करता है, जिससे कलुषता रूपी माया को पूर्णरूपेण साफ करके उज्जवल अर्थात् पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जिससे वह मोक्ष आनन्द का अनुभव करता है। इस आनन्द के अलौकिक रस में पूर्णरूपेण डूबकर छहों रसों (कटु, तिक्त, अम्ल, काषाय, मधुर और क्षार) का आनन्द लेता है। उस सरोवर में विकसित कमल सुगन्ध एवं शीतलता प्रदान करके सम्पूर्ण पाप का नाश कर देते हैं। ये कमल जलरहित होने पर भी सदैव विकसित रहते हैं, ये कभी मुरझाते नहीं है अर्थात् भगवान् के कमलवत चरण को प्राप्त कर लेने पर पाप स्वयं नष्ट हो जाते हैं। जैसे कमल पर भौंरा पराग से मोहित होकर गुनगुना कर विश्राम करते हैं, वैसे ही सन्तजन भगवान के चरण से मोहित होकर निरन्तर वन्दना करते हैं। इस संसार रूपी जल में तू स्नान करने में असमर्थ है तो इस छिछले जल से तेरा इतना क्यों लगाव है? ऐ मन कुछ तो विचार कर तुम बैकुण्ठ में उड़कर क्यों नहीं पहुंच जाता जहाँ पहुँचकर पुनः वापस नहीं आना होता है। वहाँ पहुंचने पर बार-बार उड़ना नहीं पड़ता। सूरदास जी अपने को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि ऐ मन तुम क्यों नहीं ऊर्ध्वावस्था में पहुंच जाते हो। हे प्रभु! आप मेरे मन को लौकिकता के धरातल से ऊपर उठाकर अलौकितता के धरातल पर पहुंचा दे, जिससे मेरा मन आवागमन से मुक्त हो जाये।

विशेष- (i) प्रस्तुत पद में रूपक अलंकार है। (ii) अनुप्रास अलंकार की अभिव्यंजना हुई है।

  1. कबीर के अद्वैत वेदान्त का प्रभाव परिलक्षित होता है।
  2. अपुनपौं आपुन ही बिसरयौ।

जैसैं स्वान कांच-मंदिर मैं, भ्रमि-भ्रमि भूंकि मरयौ।।

ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है, दुम-तृन सूंघि फिरयौ।

ज्यौं सपने मैं रंग भूप भयौ, तसकर अरि पकरयौ।।

ज्यौं केहरि प्रतिबिंब देखि कै, आपुन कूप परयौ।

जैसे गज लखि फटिकसिला मैं, दसननि जाइ अरयौ।।

मर्कट मूंठि छाँड़ि नहिं दीनी, घर-घर-द्वार फिरयौ।

‘सूरदास’ नलिनी को सुवटा, कहि कौनैं पकरयौ।।

प्रसंग- प्रस्तुत पद में मानव अपने स्वरूप को भूल गया उसी स्वरूप की याद कवि ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में अनेक उदाहरण देते हुए समझाया है।

व्याख्या- कवि सूरदास जी कहते हैं कि मानव अपने आत्म स्वरूप को उसी प्रकार भूल गया है, जिस प्रकार कोई कुत्ता शीशे के महल में यदि बन्द हो जाता है तो अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और शीशे में अपनी परिछायीं को देखकर प्रमवश दूसरा कुता समझकर भौंकता हुआ परेशान होता है या हिरन की नाभि में ही कस्तूरी रहती है, परन्तु हिरन प्रमवश कस्तूरी की सुगन्ध को पौधों, घास एवं तिनकों में खोजता फिरता है अथवा निर्धन जिस प्रकार स्वप्न में राजा बन जाये या डकैत अपने दुश्मन को बन्दी बना लेता है तो वह बहुत प्रसन्न होता है परन्तु जागने पर वास्तविकता को जानकर पुनः दुखी हो जाता है। जिस प्रकार सिंह कुएं में अपनी परछाई को देखने पर दूसरा सिंह समझकर कुएं में कूद पड़ता है या जैसे अहंकारी हाथी बिल्लौर पत्थर में अपना प्रतिबिम्ब देखकर उस पत्थर से अपना दांत भिड़ाकर अपना ही दाँत तोड़ लेता है। जिस प्रकार बन्दर सँकरे मुँह वाले बर्तन से मुट्ठी भरकर चना निकालना चाहता है परन्तु उसका हाथ संकरे बर्तन में फंस जाता है। लोभवश वह न तो मुट्ठी को खोलता है और न हाथ ही निकाल पाता है। फिर जीवन पर्यन्त मदारी के साथ द्वार-द्वारा घूमता-फिरता है। सूरदास जी कहते हैं कि नलिका पर बैठे हुए तोते को कोई भी शिकारी पकड़ सकता है, क्योंकि तोता अपने बैठने के भार से नलिका के झुक जाने से सिर नीचा और पैर ऊंचा हो जाने पर प्रमवश स्वयं को फंसा हुआ समझकर बहेलिये के आने पर उड़ नहीं जाता, फलतः पकड़ा जाता है। ऐसे ही अज्ञानी माया में जीव जकड़ा हुआ है।

विशेष- (i) प्रस्तुत पद्य में उपमा अलंकार दर्शनीय है। (ii) यहाँ अनुप्रास अलंकार की अभिव्यंजना हुई है। (iii) अज्ञानरूपी माया का चित्रण बड़े मनोहारी ढंग से किया गया है।

  1. सोभा-सिन्धु न अंत रही री।

नंद भवन भरि पूरि उमंगि चलि, ब्रज की बीथिनि फिरति बही री॥

देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेंचति फिरित दही री।

कहाँ लगि कहौं बनाइ बहुत विधि, कहत न मुख सहसहुँ निबही री॥

जसुमति-उदर-अगाध उदधि तैं, उपजी ऐसी सबनि कही री।

‘सूरस्याम’ प्रभु-इंद्र नीलमणि ब्रज बनिता उर लाइ गही री॥

व्याख्या- श्री कृष्ण के सौन्दर्य पर मुग्ध एक गोपी अपनी सखी से उनकी रूप माधुरी का वर्णन करती हुई कहती है कि मैंने आज सौन्दर्य का समुद्र देखा है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। यह सौन्दर्य का समुद्र नन्द के घर से उजड़ कर व्रज की गलियों में बह रहा है। (कृष्ण ब्रज की गलियों में घूम रहे है) मैंने उस सौन्दर्य के सागर (कृष्ण) को उस समय देखा जब गोकुल में दही बेचती हुई घूम रही थी। सखी कहती हैं कि मैं उस रूपनिधि का वर्णन किन शब्दों में करूं, क्योंकि हजार मुखों से भी उनके सौन्दर्य का वर्णन सम्भव नहीं जान पड़ता अथवा शेषनाग भी अपने हजारों मुखों से उसका वर्णन नहीं कर सकते, फिर मेरा तो सामर्थ्य ही क्या है? सब ऐसा कहते हैं कि यह सौन्दर्य का समुद्र यशोदा के उदर रूपी गहरे समुद्र से निकलता है। (कृष्ण यशोदा के पुत्र है) सूरदास जी कहते है कि श्याम (नील) वर्ण वाले कृष्ण को नीलमणि समझकर ब्रजबालायें उन्हें हृदय के भीतर स्थान दे रही हैं।

विशेष- (i) श्रीकृष्ण का रंग श्याम है और नीलममणि नीली है। अतः वर्ण-साम्य के आधार पर कृष्ण को नीलमणि कहा गया है। (ii) कृष्ण के अमाधारण सौन्दर्य के लिए शोभा-सिन्धु शब्दों का प्रयोग बहुत सार्थक है।

  1. कर पग गहि अंगुठा मुख मेलत।

प्रभु पौढ़ते पालनैं अकेले, हरषि-हरषि अपनैं रंग खेलत॥

सिव सोचत, विधि बुद्धि बिचारत, बट बाढयौ सागर जल झेलत।

बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग-दंतीनि सकेलत।।

मुनि मन भीत भए, भुव कंपित, सेष सकुचि सहसौं फन पेलत।

उन ब्रज-बासिनि बात न जानी, समुझे सूर सकट पग ठेलत।

प्रसंग- कृष्ण की बाल-लीला के माध्यम से सूरदास ने उनके परब्रह्मतत्व का संकेत करते हुए प्रलयकाल का वर्णन किया है।

व्याख्या- भगवान बाल कृष्ण हाथ से पैर को पकड़कर पैर का अंगूठा मुख में डालकर चूसने लगते हैं तथा पालने में अकेले लेटे हुए प्रसन्न होकर अपनी धुन में खेलते हैं। यह देखकर शिव सोच में पड़ जाते हैं तथा ब्रह्मा विचार करने लगते हैं। (दोनों को लगता है कि काल गणना में कहीं दोष तो नहीं रह गया, जिससे हम लोग जान भी न पायें और प्रलय काल आ जाये)

अनुपमेय सौन्दर्य के लिए उपमान जुटाने में उसे संकोच होता है। कवि को एक उपमान सूझा कि द्वितीया के चन्द्रमा के मध्य बृहस्पति और शुक्र की चमक परस्पर एक-दूसरे की द्युति से टकराकर और अधिक चमकदार बना रही है। (यहाँ मस्तिष्क के लिए द्वितीया का चन्द्रमा लटकन के लिए पीताभ वृहस्पति और उसमें जड़े मोतियों, नर्गों आदि के लिए शुक्र तारा क्रमशः आकृति एवं द्युति साम्य के आधार पर सटीक ठहरते हैं) सुन्दर नेत्र लालित्यपूर्ण कपोल और नासिका पर पहना मोती ओठों पर सुन्दर आभा विकीर्ण कर रहा है। अन्त में कवि अपने आराध्य (श्रीकृष्ण) बाल सुलभ लड़खड़ाहट पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है।

विशेष- अलंकार – (i) ‘मनु सीपज-बारिज पर’ एक अनूठी कल्पना पर आधारित उत्प्रेक्षा अलंकार की आयोजना की गई है। (ii) यही स्थिति ‘नवतन चन्द्र रेख-उदोत परस्पर’ में भी वाचक शब्द लुप्त उत्प्रेक्षा की आयोजना के साथ है। (iii) ‘लोचन-लोल कपोल ललित’ में छेकानुप्रास तथा अन्त्यानुप्रास का सौन्दर्य दृष्टव्य है। (iv) अनुपमेय सौन्दर्य के ठीक अनुरूप कोमल कान्त पदावली एवं मधुर्य गुण युक्त भाषा का प्रयोग प्रतिपाद्य को उभरने में सहायक सिद्ध हुआ है। (v) श्री कृष्ण की बाल छवि का समग्र बिम्ब प्रस्तुत किया गया है।

  1. मुरली तऊ गुपालहिं भावति।

सुन री सखी जदपि नंदलालहिं नाना भाँति नचावति॥

राखत एक पाई ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति।

कोमल तन आझा करवावति, कटि टेढ़ी है आवति॥

अति आधीन सुजान कनौडे, गिरिधर नार नवावति।

आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर-पल्लव पलुटावति।

भृकुटि कुटिल, नैन नासा पुट, हम पर कोप करावति।

‘सूर’ प्रसन्न जाति एकौ छिन, धर तैं सीस डलावति॥

प्रसंग- प्रस्तुत पद में गोपियाँ मुरली के प्रति अपनी ईर्ष्या प्रकट करती हुई कहती है कि –

व्याख्या- हे सखी ! यह मुरली श्री कृष्ण को नाना प्रकार से कष्ट देती है फिर भी उन्हें   अत्यधिक प्रिय है। वह उनके ऊपर अपना अधिकार प्रकट करती हुई उन्हें एक पैर के बल खड़ा रखती है। उनकी अवयवों के ऊपर वह अपनी आज्ञा का पालन कराती हैं जिसके भार से दबकर कृष्ण की कमर टेढ़ी हो जाती है। श्री कृष्ण जी अत्यंत चतुर होते हुए भी पूर्णतः मुरली के बस में हो गए हैं जो श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को धारण करने में विचलित नहीं हुए थे, वही श्री कृष्ण मुरली के सामने अपना सिर झुका लेते हैं। इनकी मुरली स्वयं तो उनके अधर पर लेट कर विश्राम करती है और उनके पल्लव सदृश्य कोमल करों से अपना पैर दबवाती है। भौहौं नेत्रों की कुटिलता नाक और ओंठ की फड़कन से वह कृष्ण के माध्यम से हम लोगों पर अपना क्रोध प्रकट करवाती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि यदि वही एक क्षण के लिए भी प्रसन्न हो जाती है तो भी श्री कृष्ण के अधरों पर अपना सिर रखकर हिलाने लगती हैं।

विशेष– (i) मुरली के प्रति गोपियों का ईर्ष्या भाव प्रकट हुआ है। (ii) आपुन उन पौड़ि अधर सज्जा कर तथा पल्लव में रूपक अलंकार है।

हिन्दी – महत्वपूर्ण लिंक

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Pankaja Singh

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