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सूर सागर | भारतेन्दु मण्डन | अमीर खुशरो | घनानंद की काव्य भाषा एवं महत्व

सूर सागर | भारतेन्दु मण्डन | अमीर खुशरो | घनानंद की काव्य भाषा एवं महत्व

सूर सागर

सूरदास हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि है। सूरदास की तीन रचनाएँ प्राप्त होती है-सूरसागर, सूरसारावली और साहित्यलहरी। ऐसा विश्वास किया जाता है कि ‘सूरसागर’ में सवा लाख पद थे, पर अभी तक ‘सूरसागर’ के केवल चालीस हजार पद ही प्राप्त हुए है। ‘सूरसागर’ में श्रीमद्भागवत के स्कन्धों का भी उल्लेख है। अन्य स्कंध-तो छोटे-छोटे हैं पर दशम स्कंध को सूरदास जी ने पर्याप्त विस्तार दिया है, क्योंकि इसमें भगवान् कृष्ण का चरित्र अथवा लीला है।

सूरदास की भक्ति सखा-भाव की है। उन्होंने श्रीकृष्ण के लीला पुरुषोत्तम रूप का वर्णन किया सूरसागर की रचना गाने योग्य पदों में हुई है। प्रत्येक पद के साथ उस राग का नाम भी दिया गया है, जिसमें उसे गाया जा सकता है। ‘सूरसागर’ की भाषा प्रायः जनसामान्य के प्रयोग की ब्रजभाषा है। इसी कारण उसमें माधुर्य की मात्रा अधिक है। ‘सूरसागर’ में श्रीकृष्ण की बाल और यौवन लीलाओं को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। सूरसागर की बाल-लीला में वात्सल्य रस का सागर उमड़ पड़ा है। कहा जाता है कि सूर अपनी अंधी आँखों से ही वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आये है। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर श्रृंगार का वियोग-पक्ष आरम्भ होता है। कृष्ण के ज्ञानी मित्र उद्धव के आने पर तो मानो गोपियों के सामने वियोग का सागर लहराने लगता है। उद्धव-गोपी संवाद का यह प्रसंग ‘भ्रमरगीत’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रसंग के माध्यम से सूरदास ने ज्ञान और योग की दुरूहता तथा सगुण और साकार भक्ति मार्ग की सरलता रेखांकित की है।

भारतेन्दु मण्डन

अथवा

”भारतेन्दु युग हिन्दी का नवजागरण काल है।”

भारतेन्दु युग के साहित्यकार वस्तुतः कवि होने के साथ-साथ समाज सुधारक एवं प्रचारक अधिक थे। यही कारण है कि इन्होंने अपने समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों, मिथ्याचारों पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण पर कुठाराघात किया और जनता पर शासक वर्ग के द्वारा होने वाले अत्याचारों, पुलिस की दमनकारी प्रवृत्तियों एवं जनता के आर्थिक शोषण की अपनी कविता का विषय बनाया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारतेन्दुयुगीन कविता में यद्यपि नवीन विषयों का समावेश हुआ, तथापि रीतिकालीन प्रवृत्तियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। अभी तक कवियों ने राधा-कृष्ण के मधुर प्रेम को आधार बनाकर श्रृंगारी कविताएँ लिखना न छोड़ा था और न ही उपदेशपरक सूक्तियों को काव्य निबद्ध करने की प्रवृत्ति को तिलांजलि दी थी। इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतेन्दु युग में एक ओर तो नवीन विषयों को लिया गया तो दूसरी ओर प्राचीन परम्परा का संरक्षण भी हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस तथ्य का उद्घाटन करते हुए लिखा है, “अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो वे पद्माकर और द्विजदेव की परम्परा में दिखायी पड़ते हैं, तो दूसरी ओर…

स्त्री, शिक्षा समाज-सुधार आदि पर व्याख्यान देते पाये जाते हैं।” राष्ट्रीयता की भावना का उदय भारतेन्दु युग की प्रमुख विशेषता कही जा सकती है जो इस काल की कविता को रीतिकाल से एकदम पृथक् कर देती है। सामाजिक कुरीतियों यथा- बाल विवाह निषेध, मद्य निषेध आदि के साथ-साथ मातृभूमि के प्रति प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का व्यवहार, ब्रह्म समाज, आर्य समाज की स्थापना, औद्योगिकीकरण, पाश्चात्य-शिक्षा प्रणाली का व्यापक प्रभाव जनजीवन पर पड़ रहा था, अतः यह स्वाभाविक था कि कविगण इन विषयों पर काव्य-रचना करते। भारतेन्दुयुगीन कविता का विषय इसी कारण से रीतिकालीन प्रवृत्तियों तक सीमित न रहकर नवीन दिशाओं की ओर उन्मुख हुआ।

अमीर खुशरो

अमीर खुसरो- अमीर खुसरो का असली नाम अबुल हसन था। इनका जन्म सन् 1253 ई0 में पटियाली जिला एटा में हुआ था इनकी मृत्यु सन् 1325 ई0 में हुई थी। इनका सम्बन्ध दिल्ली के राजदरबार से था तथा इन्होंने अपनी आँखों से गुलाम वंश का पतन, खिलजी वंश का उत्थान-पतन एवं तुगलक वंश का प्रारम्भ देखा था। इनके जीवन-काल में दिल्ली के तख्त पर ग्यारह सुलतान बैठे थे, जिनमें से इन्होंने सात की सेवा की थी। खुसरो खड़ीबोली के आदिकवि कहे जा सकते हैं और इनके द्वारा खड़ीबोली में रचित मुकरियाँ तथा पहेलियाँ, ढकोसले आदि खड़ीबोली की प्रारम्भिक रचनाएँ कहला सकती हैं ये अरबी तथा फारसी के भी उच्चकोटि के कवि माने जाते हैं। संस्कृत का भी इन्हें ज्ञान था। इन्होंने कविता की 99 पुस्तकें लिखीं, जिनमें कई लाख शेर हैं। खुसरो ने अपनी कविताओं में श्रृंगार, वीर, शान्त और भक्ति रस को अपनाया है तथा इन सबके वर्णन में बड़ा कौशल प्रदर्शित किया है।

खुसरो ने पहेलियों तथा मुकरियों के रूप में मनोरंजक साहित्य की रचना की। इनका ‘तुरकी, अरबी-फारसी और हिन्दी का पर्याय-काश’ नामक ग्रन्थ भी बड़ा प्रसिद्ध है। इन्होंने फारसी से कहीं अधिक हिन्दी भाषा में लिखा हैं इन्होंने खड़ीबोली और फारसी का सम्मिश्रण कर भाषा-सम्बन्धी हिन्दू-मुस्लिम एकता का सर्वप्रथम प्रयत्न किया। इनकी रचनाओं में दो प्रकार की भाषाओं का प्रयोग मिलता है। पहेलियों, मुकरियों तथा दो सखुनों में ब्रजभाषा से प्रभावित खड़ीबोली का प्रयोग मिलता है तथा गीतों और दोहों में शुद्ध ब्रजभाषा का। इनकी विनोदी प्रवृत्ति का परिचय इनकी रचनाओं में भली-भांति मिल जाता है।

घनानंद की काव्य भाषा एवं महत्व

घनानन्द दिल्ली के मुगल बादशाह मुहम्दशाह के मीर मुन्शी थे। वे मुगल दरबार की सुन्दरी वेश्या सुजान पर आसक्त थे। मुहम्मदशाह ने इसी बात पर उन्हें दिल्ली से निकल जाने को कहा। वे ‘सुजान’ को भी ले जाना चाहते थे, पर उसने बेवफाई की। घनानन्द विरक्त होकर मथुरा पहुंचे और निम्बार्क-सम्प्रदाय में दीक्षा ले ली। पर वे जीवन-पर्यन्त ‘सुजान’ को भुला न सके और अपने अति गहन ऐकान्तिक प्रेमभाव ‘सुजान’ को ही केन्द्र में रखकर व्यक्त करते रहे।

घनानन्द प्रेम के अमर गायक कवि है। रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवियों की परम्परा से अलग इनका प्रेम भौतिकता से परे अतीन्द्रिय है। उसमें भोग-लिप्सा और वासना की गन्ध भी नहीं मिलती। इन्होंने अपनी रचनाओं में एक सच्चे प्रेमी हृदय की मार्मिक भावानुभूतियों को अभिव्यक्त किया है। इनका प्रेममार्ग अत्यन्त सीधा-साधा और टेढ़ापन तथा चतुराई से कोसों दूर है। घनानन्द विरह के उन्मुक्त गायक कवि है। इनके विरह का उत्स ‘सुजान’ का प्रेम है। ‘सुजान’ शब्द क्लिष्ट है। यह एक ओर तो सुजान नाम की वेश्या का बोधक है, दूसरी ओर ‘सुजान’ चतुर कृष्ण का।

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Pankaja Singh

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