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सूक्ष्म शिक्षण की प्रकृति | सूक्ष्म शिक्षण के प्रमुख सिद्धान्त | शिक्षण कौशल | सूक्ष्म शिक्षण के उद्देश्य | सूक्ष्म शिक्षण की अवधारणा एवं महत्त्व

सूक्ष्म शिक्षण की प्रकृति | सूक्ष्म शिक्षण के प्रमुख सिद्धान्त | शिक्षण कौशल | सूक्ष्म शिक्षण के उद्देश्य | सूक्ष्म शिक्षण की अवधारणा एवं महत्त्व | Nature of Micro-teaching in Hindi | Main principles of micro learning in Hindi | Teaching Skills in Hindi | Objectives of Micro-education in Hindi | Concept and importance of micro learning in Hindi

सूक्ष्म शिक्षण की प्रकृति

सूक्ष्म शिक्षण की उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर इसकी प्रकृति के बारे में अग्रलिखित तथ्य उद्घाटित किये जा सकते हैं-

(i) सूक्ष्म शिक्षण, अध्यापन प्रक्रिया का लघु प्रारूप है।

(ii) सूक्ष्म शिक्षण, नियंत्रित वातावरण में निष्पादित किया जाता है।

(iii) सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षण कांशलों का विकास करती है।

(iv) सूक्ष्म शिक्षण द्वारा विशिष्ट कौशलों एवं कार्यों को किया जाता है।

(v) सूक्ष्म शिक्षण वैयक्तिक विकास की प्रक्रिया है।

(vi) सूक्ष्म शिक्षण द्वारा निदानात्मक कार्य किये जा सकते हैं।

(vii) सूक्ष्म शिक्षण से अध्यापकों को पृष्ठ-पोषण मिलता है।

(viii) सूक्ष्म शिक्षण द्वारा शिक्षण की जटिलताएँ कम हो जाती हैं।

(ix) सूक्ष्म शिक्षण द्वारा शिक्षकों को शिक्षण में सुधार करने का अवसर मिलता है।

(x) सूक्ष्म शिक्षण विश्लेषणात्मक प्रविधि पर आधारित होता है।

सूक्ष्म शिक्षण के प्रमुख सिद्धान्त

(Main principle of Micro-teaching)

सूक्ष्म शिक्षण के सिद्धान्त शिक्षाविदों ने निम्नवत् बताये हैं-

(1) अभ्यास का सिद्धान्त-सूक्ष्म शिक्षण वास्तव में शिक्षक बनने से पूर्व अभ्यासार्थ किया गया शिक्षण होता है। शिक्षक द्वारा यह अभ्यास लगातार किया जाता है क्योंकि यदि इसमें निरन्तरता नहीं होती तो शिक्षण कौशल का यथोचित विकास करने में कठिनाइयाँ उत्पन्न होने लगती हैं। इसी कारण सूक्ष्म शिक्षण में कक्षा का आकार, पाठ्यक्रम का आकार, छात्रों की कम संख्या (जिसमें मात्र 5 या 10 छात्र होते हैं) के आधार पर निरन्तर अभ्यास कराया जाता है, जिससे छात्राध्यापक शिक्षण- कौशलों में निपुणता अर्जित कर सके।

(2) प्रबलन का सिद्धान्त-सूक्ष्म शिक्षण के छात्राध्यापकों को अपने शिक्षण कौशल की प्रभावकारिता की जानकारी होती है, इससे उन्हें प्रबलन (Reinforcement) मिलता है, अतएव पुष्ठ पोषण प्राप्त करके वे अपने शिक्षण को व्यावहारिक, उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाने में समर्थ हो जाते हैं।

(3) सूक्ष्म शिक्षण सिद्धान्त-छात्राध्यापक जब सूक्ष्म शिक्षण दे रहा होता है तभी विशेषज्ञों द्वारा उनके हाव-भाव, भंगिमा, सम्प्रेषण, शैली, शिक्षण कौशल इत्यादि का सूक्ष्म निरीक्षण भी किया जाता है, जिसको विशेषज्ञ निर्धारण मापनी (Rating Scale) पर समायोजित करके मूल्यांकन करता है। विषय-विशेषज्ञों द्वारा सभी मूलभूत तथ्यों पर ध्यान रखा जाता है। तदुपरान्त छात्राध्यापकों को उनकी परिसीमाएं बतायी जाती हैं और सुधार हेतु आवश्यक परामर्श भी दिया जाता है।

(4) निरन्तरता का सिद्धान्त- सूक्ष्म शिक्षण की प्रक्रिया प्रशिक्षण अवधि तक लगातार चलती रहती है जिससे छात्राध्यापक को शिक्षण देने सम्बन्धी बहुत सी जानकारियों का बोध होता है और वे एक कुशल शिक्षक बनकर अपनी भूमिका का कुशलतम निर्वाह करने में सक्षम हो जाते हैं।

यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक छात्राध्यापक शिक्षण में पूर्ण स्वामित्व नहीं प्राप्त कर लेता है।

सूक्ष्म शिक्षण के इस सामान्य सिद्धान्त के अतिरिक्त अनेक शिक्षाविदों ने अपने सिद्धान्त दिये हैं। ऐसे शिक्षाविदों में ऐलेन्स एवं रायन्स (1968), मिअर (Meir) 1968, मैक डोनाल्ड (Mc Donald) 1973 इत्यादि प्रमुख हैं।

मैकडोनाल्ड की मान्यता है कि सूक्ष्म शिक्षण मुख्यतः स्किनर के अधिगम अनुबन्धन सिद्धान्त पर केन्द्रित है। स्किनर ने अपने अधिगम सिद्धान्त में जिस प्रकार बताया है कि यदि प्राणी के साथ किये जाने वाले वांछित प्रतिक्रिया के बाद प्रबलन (Reinforcement) दिया जाता है तो पहले जैसी प्रतिक्रिया में ओजस्विता आ जाती है और यदि प्रवलन नहीं मिलता है तो प्रतिक्रिया करने में न्यूनता आ जाती है अथवा समाप्त हो जाती है। ऐसे ही सूक्ष्म शिक्षण में छात्राध्यापकों को उनकी परिसीमाओं-शिक्षण कौशलों की जानकारी प्रदान करके प्रबलन दिया जाता है, जिससे उनके कार्य करने की शक्ति में वृद्धि हो जाती है और यह पहले से परिष्कृत एवं परिमार्जित होता है। सूक्ष्म शिक्षण से छात्राध्यापकों के शिक्षण कौशल में वृद्धि होती है जिसका स्थानान्तरण वे वास्तविक कक्षागत परिस्थितियों में करके एक कुशल शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।

शिक्षण कौशल (Teaching Skills)

शिक्षक द्वारा छात्रों को पढ़ाते समय जितनी भी क्रियाएँ, व्यवहार तथा हाव-भाव, भंगिमा का इस्तेमाल किया जाता है, वे सभी शिक्षण-कौशल (Teaching skills) के नाम से संज्ञापित किये जाते हैं। शिक्षण-कौशलों के विकास में सूक्ष्म शिक्षण विशेष सहायक होता है। इसके माध्यम से छात्राध्यापकों के शिक्षण सम्बन्धी कार्य एवं व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन परिलक्षित होता है।

शिक्षण-कौशलों का सारणीयन एक दुरुह कार्य है किन्तु अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने इसके सारणीयन में योगदान दिया है। ऐसे शिक्षाशास्त्रियों में एलेन, बोर्ग, बी.के. पासी, सिंह, श्रीवास्तव, दोसाज का नाम आदरणीय है। प्रमुख शिक्षाविदों द्वारा प्रदत्त शिक्षण-कौशल की सूची में निम्नलिखित कौशलों को समाहित किया गया है-

(i) पाठ प्रस्तावना कौशल (Lesson Introduction skill)

(ii) उद्दीपक बदलाव कौशल (Stimulation Varication skill)

(iii) प्रश्न करने सम्बन्धी कौशल (Questioning skill)

(iv) ब्लैकबोर्ड अनुप्रयोग कौशल (Black-Board using skill)

(v) उदाहरण एवं निर्देशन देने सम्बन्धी कौशल (Examples and Illustration skill)

(vi) तथ्य स्पष्टीकरण कौशल (Fact Explanation skill)

(vii) पुनर्बलन कौशल (Reinforcement skill)

(viii) पाठ समापन कौशल (Lesson clouded skill)

(ix) दृश्य-श्रव्य सामग्री प्रयोग कौशल (Audi-Visual using skill)

(x) कक्षा निरीक्षण कौशल (Class-control skill)

सूक्ष्म शिक्षण के उद्देश्य

सूक्ष्म शिक्षण के उपरोक्त विवेचन के आधार पर निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये जा सकते हैं-

  1. सूक्ष्म शिक्षण का उद्देश्य प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले शिक्षकों को शिक्षण-कौशलों से निपुण बनाना है।
  2. सूक्ष्म शिक्षण से छात्राध्यापकों में शिक्षक के सभी गुणों का समावेश करना है।
  3. छात्राध्यापकों को अपने शिक्षण सम्बन्धी परिसीमाओं का बोध कराना।
  4. कक्षागत समस्याओं के समाधान की योग्यता का विकास करना।
  5. छात्रों में ध्यान की एकाग्रता कायम रखने की कला का विकास करना।
  6. वास्तविक कक्षा लेने से पूर्व छात्राध्यापकों में साहस विकसित करना।
  7. छात्राध्यापकों को एक आदर्श शिक्षण-कुशल अध्यापक के रूप में प्रतिष्ठित करना।
  8. छात्राध्यापकों में स्व-मूल्यांकन की योग्यता का विकास करना।

सूक्ष्म शिक्षण की अवधारणा एवं महत्त्व

उत्तर वर्तमान समय में शिक्षक प्रशिक्षण की पूरी पृष्ठभूमि में सूक्ष्म शिक्षण को बहुत महत्व दिया जाता है। सूक्ष्म शिक्षण की अवधारणा इस पृष्ठभूमि पर आधृत है कि किसी कठिन एवं जटिल कौशलों को समग्रता के आधार पर अधिगम करने पर बहुत सी बातें एवं कौशल उपेक्षित रह जाते हैं अतएव ऐसे कौशलों का समग्रता के आधार पर अधिगम न करके उनको कई छोटे-छोटे भागों में वांटकर अधिगम करना चाहिए। इससे अधिगम प्रभावग्राही होता है। सूक्ष्म शिक्षण में अधिगम के लगभग सभी मूलभूत नियमों एवं सिद्धान्तों का अनुप्रयोग किया जाता है, इसी कारण सूक्ष्म शिक्षण, भावी शिक्षकों के लिए एक आधारभूत पृष्ठभूमि का निर्माण करता है। छात्राध्यापक सूक्ष्म शिक्षण के द्वारा अपनी परिसीमाओं से अवगत होते हैं, तदनुरूप उसमें परिमार्जन करके एवं अच्छे शिक्षक के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में सक्षम हो जाते हैं।

सूक्ष्म शिक्षण में शिक्षण का स्वरूप, कक्षा में छात्रों की संख्या इत्यादि बहुत न्यून रहती है। प्राय: सूक्ष्म शिक्षण प्रक्रिया में कुल समय 36 मिनट लगते हैं। वर्तमान समय में अभिक्रमित अधिगम (Programmed learning) तथा कम्प्यूटर सहयित अनुदेशन, सूक्ष्म शिक्षण के एक अभिन्न अंग माने जाते हैं क्योंकि इनके द्वारा सूक्ष्म शिक्षण में छात्राध्यापकों को अपनी शिक्षण शैली का बोध हो जाता है और वे स्व-मूल्यांकन कर अपनी शिक्षण की प्रभावकारिता में वृद्धि कर लेते हैं। अतएव सूक्ष्म शिक्षण अध्यापक प्रशिक्षण की वह नवीन प्रविधि है जिससे छात्राध्यापकों को शिक्षण कौशलों के सदुपयोग की जानकारी सुलभ होती है तथा वे अपनी परिसीमाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करके उनका समाधान करके एक योग्य शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।

सूक्ष्म शिक्षण के महत्त्व को निम्नवत् व्यक्त किया जा सकता है-

(i) वर्तमान समय में शिक्षण की गुणवत्ता में वृद्धि के लिए सूक्ष्म शिक्षण एक प्रभाववर्धक प्रविधि है।

(ii) अधिकांश शिक्षक सैद्धान्तिक ज्ञान में विद्वता अर्जित किये रहते हैं किन्तु कक्षा-कक्ष मअपनी विद्वता की कुशलता अभिव्यक्ति नहीं कर पाते। ऐसे शिक्षकों की समस्याओं के अन्त के लिए सूक्ष्म शिक्षण की महत्ता अवर्णनीय है।

(iii) शिक्षण-कौशलों के कुलशतम सदुपयोग के लिए सूक्ष्म शिक्षण एक आधारभूत पृष्ठभूमि तैयार करता है।

(iv) सूक्ष्म शिक्षण, परम्परागत शिक्षण में आने वाली बाधाओं, कठिनाइयों का समाधान करके एक सरलीकृत शिक्षण व्यवस्था का निर्माण करती है।

(v) शिक्षकों में किसी विशिष्ट कौशल के अभ्युदय में यह बहुत उपयोगी है।

(vi) सुनिश्चित व्यवहारिक उद्देश्यों की पूर्ति में यह बहुत उपयोगी है।

(vii) शिक्षकों में दृढ़ निश्चय की भावना विकसित करने में सहायक है।

(vii) सूक्ष्म शिक्षण, अध्यापन कार्य में निपुणता का विकास करता है।

(xi) सूक्ष्म शिक्षण से अध्यापन में निरन्तरता एवं क्रमबद्धता बनी रहती है।

(x) सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षकों को स्वयं अपने गुण-दोषों की जानकारी देने में मदद करती है।

(xi) सूक्ष्म शिक्षण अल्प संसाधनों में विस्तृत अनुभव प्रदान करती है।

(xii) सूक्ष्म शिक्षण यंत्रस्थ व्यवस्था पर आधारित नहीं होता है।

(xiii) सूक्ष्म शिक्षण से शिक्षक को अनुदेशानात्मक तकनीकी की जानकारी मिलती है।

(xiv) सूक्ष्म शिक्षण का पर्यवेक्षण पूरी तरह वस्तुगत होता है।

(xv) सूक्ष्म शिक्षण एक अल्प खर्चीली एवं प्रभावशाली प्रविधि है।

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Pankaja Singh

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