शैक्षिक तकनीकी

शिक्षण प्रतिमान | व्यवहारवाद और ज्ञानात्मक अधिगम के उपगमन का संश्लेषण | व्यवहारवादी और ज्ञानात्मक अधिगम के सिद्धान्तों में अन्तर

शिक्षण प्रतिमान | व्यवहारवाद और ज्ञानात्मक अधिगम के उपगमन का संश्लेषण | व्यवहारवादी और ज्ञानात्मक अधिगम के सिद्धान्तों में अन्तर | Teaching Model in Hindi | Synthesis of Behaviorism and Approach to Cognitive Learning in Hindi | The difference between the theories of behaviorist and cognitive learning in Hindi

शिक्षण प्रतिमान

(Model of Teaching)

प्रतिमान का आशय किसी उद्देश्य के अनुसार व्यवहार में लाने की प्रक्रिया से है।

एच.सी. वील्ड- किसी रूपरेखा अथवा उद्देश्य व्यवहार को ढालने की प्रक्रिया ही प्रतिमान कहलाती है।

प्रतिमान शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है- यथा-किसी आदर्श के सन्दर्भ में और किसी बड़ी वस्तु के छोटे आकार के रूप में। किसी आदर्श को प्रस्तुत करने के लिए प्रतिमान का प्रयोग किया जा सकता है ताकि छात्र इन्हें अपनाने का प्रयास कर सकें। शिक्षण क्षेत्र में जिन शिक्षण-प्रारूपों का हम प्रयोग करते हैं उन्हीं को शिक्षण प्रतिमान कहते हैं इनका विकास सीखने के सिद्धान्तों पर किया जाता है।

पाल.डी. ईगन – विशिष्ट अनुदेशनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बनायी जाती है। उपचारात्मक शिक्षण व्यूह रचनायें ही शिक्षण प्रतिमान हैं।

बी.आर. जायस- “शिक्षण प्रतिमान अनुदेशात्मक प्रारूप होते हैं। ये उन विशिष्ट परिस्थितियों का उल्लेख करते हैं जिनमें छात्रों की अन्तःक्रिया इस प्रकार की हो ताकि उनके व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सकें।”

संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिक्षण-प्रतिमान शिक्षण के बारे में सोचने-विचारने की एक रीति या ढंग है। (Teaching model is way of thinking about teaching) वर्तमान समय में सीखने के सम्बन्ध में ज्ञान का अत्यन्त विस्तार हुआ। इस ज्ञान का उपयोग विद्यालय, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण पद्धति में सुधार लाने के लिये किया जाने लगा। अब सम्पूर्ण पाठ्यक्रम सम्बन्धी ऐसे संवेष्ट (Packages) उपलब्ध हैं जो सीखने की विशेष प्रकृतियों पर आधारित हैं। शिक्षण-प्रतिमान में अनेक तत्व पाये जाते हैं- लक्ष्य, संरचना, सामाजिक प्रणाली और मूल्यांकन प्रणाली आदि। प्रचलित प्रतिकृतियों में दो तरह की प्रतिकृतियाँ सामने आती हैं- व्यवहारवादी सीखने की प्रतिकृति और ज्ञानात्मक सीखने की प्रतिकृति ।

  1. व्यवहारवादी सीखने की प्रतिकृति (Behaviouristic Learning Model)-

सबसे मान्य व्यवहारवादी सिद्धान्तों पर आधारित सीखने की प्रतिकूल प्रयोजनमूलक शिक्षण (Programmed Instructions) की है। प्रयोजनमूलक शिक्षण एक अविशिष्ट शब्द है जिसका प्रयोग विभिन्न सीखने के संस्थानों में विभिन्न स्तरों पर किया जाता है किन्तु सब में कुछ विशेषतायें समान है। प्रयोजनमूलक शिक्षण विशेष रूप से सक्रिय प्रत्युत्तर देने पर बल देता है। ये कार्यक्रम दो प्रकार से बनाये जाते हैं- एकरेखीय कार्यक्रम और शाखाबद्ध कार्यक्रम। इन कार्यक्रमों का विकास इस इरादे से हुआ कि सीखने वाला इन पर कार्य अपने निजी ढंग से करे।

(क) व्यक्ति केन्द्रित निर्धारित शिक्षण (Individual Prescribed Instruction) – आज अनेक अधिगम प्रणालियों का प्रयोग विद्यालयों में किया जाता है जो शिक्षा मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर ही केन्द्रित हैं। यद्यपि वह बहुधा ज्ञानात्मक सिद्धान्तों से भी बहुत कुछ अपना लेती है। ऐसी ही एक प्रणाली व्यक्ति केन्द्रित निर्धारित शिक्षण प्रणाली है। इस प्रणाली में शिक्षक छात्र को व्यक्तिगत ढंग से शिक्षण प्रदान करता है।

(ख) ग्लेसर तथा अन्य साथियों का शिक्षण प्रतिमान (Glasosser’s & his associations Model of teaching)- ग्लेसर और उनके अन्य साथियों ने व्यक्ति केन्द्रित निर्धारित शिक्षण को प्रस्तावित किया। यह एक मनोवैज्ञानिक प्रतिमान है। इसे बुनियादी सिद्धान्त भी कहा जाता है क्योंकि इसमें मनोविज्ञान के बुनियादी सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है। बी.आर. जायस ने इसे ‘कक्षा- कक्ष मीटिंग प्रतिमान’ (Class-room Meeting Model) के नाम से सम्बोधित किया। ग्लेसर के मूल शिक्षण प्रतिमान को निम्न प्रकार के चित्र द्वारा समझा जा सकता है।

पृष्ठपोषण लूप (Feedback Loops)

  • शैक्षिक उद्देश्य (Instructional objective)
  • प्रवेश व्यवहार (Entering Behaviour)
  • शिक्षण प्रवेश व्यवहा या अनुदेशानात्मक प्रक्रिया (Instructional Procedure)
  • कार्य निष्पादन मूल्यांकन (Performance Assessment)

शिक्षण प्रक्रिया के उपरोक्त चारों तत्व एक दूसरे से पूरी तरह से जुड़े होते हैं तथा वे एक दूसरे‌को प्रभावित भी करते हैं। अतः इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही शिक्षक को अपनी शिक्षण प्रक्रिया निश्चित करनी चाहिए।

(ग) स्टोलुरो एवं डेनियल डेविस का संगणक आधारित शिक्षण प्रतिमान (Stolarow and Danicl Davis- Computer Based Teaching Model)- स्टोलुरो और डेविस महोदय शिक्षा प्रक्रिया को दो सोपानों में विभक्त करते हैं। प्रथम पूर्व शिक्षकीय सोपान, द्वितीय शिक्षकीय सोपान। प्रथम सोपान का एक ही प्रयोजन होता है-एक, विशिष्ट शैक्षिक उद्देश्य का चयन करना और द्वितीय सोपान के दो प्रयोजन होते हैं यथा-उस कार्यक्रम को क्रियान्वित करना जिसका चयन किया गया है और छात्र की उन्नति का मूल्यांकन करना कि क्या नवीन कार्यक्रम मूल कार्यक्रम से अधिक उपयुक्त है। इस प्रकार यह दोनों सोपान पर आधारित है।

(घ) व्यक्तिगत शिक्षण व्यवस्था (Personalized system of Instruction)- व्यक्तिगत या निजीकरण शिक्षण व्यवस्था का विकास फ्रेड ए. कैलर ने किया। इसलिए कैलर योजना के नाम से भी जाना जाता है। इसमें इन्होंने मनोविज्ञान के एक पाठ्यक्रम को तीन इकाइयों की एक श्रृंखला में विभाजित किया। जिसमें जो पाठ पढ़ाना था उसके भाग थे तथा इसका पूरक उसी पाठ्यवस्तु का कार्यक्रम बना हुआ था। छात्रों को प्रथम इकाई अध्ययन करने के लिए दी गयी और उन्हें निर्देश दिया गया कि वे कुछ समय तक अध्ययन करते रहें जब तक उन्हें अच्छी तरह से समझ न आ जाये। इसके पश्चात् उन्हें 10 प्रश्न रिक्त स्थानों की पूर्ति वाले और एक निबन्धात्मक प्रश्न दिया गया। उतर लिखने के बाद उसे प्रोक्टर (Proctor) के पास ले जाने को कहा गया। यह प्रोक्टर एक ऐसा छात्र था जिसने पहले सेमिस्टर में पाठ्यक्रम में ‘ए’ ग्रेड प्राप्त किया था। उसने उन उत्तरों की जाँच की और अस्पष्टता नजर आने पर छात्र से स्पष्टीकरण माँगा। सफलता के प्रदर्शन के बाद उसे दूसरी और फिर तीसरी इकाई अध्ययन के लिए प्रदत्त की गई। यही प्रक्रिया सभी इकाइयों के साथ निभाई गई और व्यक्तिगत शिक्षण व्यवस्था में क्रिया प्रसूत अनुबन्धनों का प्रत्यक्ष प्रयोग है।

i. संगणक सहायक शिक्षण (Computer assisted Instruction)- इसका विकास प्रयोजन मूलक कार्यक्रम शिक्षण के साथ हुआ। इसमें शिक्षक का परीक्षण करने, पृष्ठपोषण और कभी-कभी पाठ्यवस्तु चयन का कार्य कम्प्यूटर द्वारा ही सम्पन्न होता है। इसके मूल सिद्धान्त वैसे ही हैं जैसे साधारण कार्यक्रम शिक्षण के, परन्तु संगणक सहायक शिक्षण में छात्र कम्प्यूटर के बटनों से कार्य करते हैं। इसमें छात्र सक्रिय रूप से अपना ध्यान केन्द्रित करता है और इसमें नकल की सम्भावना कम रहती है। यह अत्यन्त मंहगी विधि है।

2. ज्ञानात्मक सीखने की प्रतिकृतियाँ (Cognitive learning Models)-

ज्ञानात्मक सिद्धान्तवादी सक्रिय रूप से ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्तेजना प्रदान करने, संकेतबद्ध करने और संगठन प्राप्त करने पर बल देते हैं। इसमें निम्न सिद्धान्तों का अध्ययन किया जा सकता है।

(क) अन्वेषण या खोज द्वारा अधिगम (Discovery Learning)- अन्वेषण या खोज द्वारा अधिगम ज्ञानात्मक अधिगम की प्रणालियों में सर्वाधिक प्रचलित प्रणाली है। इसके समर्थकों का मानना है कि अधिगम जो प्रकृतिक ढंग से होता है वह आत्म प्रेरणा बल एवं निर्देशित खोज द्वारा ही होता है। इसका मूल कारण यह है कि अधिगमकर्ता सक्रिय रूप से व्यक्तिगत रुचि के एक क्षेत्र की खोजबीन कर रहा होता है। इससे छात्र अनुप्रेरित रहता है और सीखने में आनन्द लेता है। अन्वेषण द्वारा अधिगम को संक्षेप में इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है- “अन्वेषण द्वारा अधिगम एक शिक्षण उपगमन है जो कि छात्रों को प्रदत्त सामग्री प्रदान करता है और फिर यह माँग करता है कि इस सूचना को अर्थपूर्ण संक्षेपणों में संशोधित किया जायें।”

(ख) पूछताछ या जाँच पड़ताल प्रशिक्षण (Inquiry Training) – अन्वेषण या खोज अधिगम ज्ञानात्मक अधिगम में मुख्य माना जाता है परन्तु कुछ ऐसे विद्यालय हैं जो कि विशिष्ट रूप से इस ओर ध्यान देते हैं कि छात्रों में सक्रिय रूप से सूचना को प्रक्रियाबद्ध करने की आदतें विकसित हो जायें और वे सविस्तार उत्तेजकों का विशलेषण कर सकें। प्रश्न पूछ सकें, पूछताछ या प्रश्न कर सके ताकि उनकी सक्रियता से अन्वेषण द्वारा सीखा जा सके। यह प्रणाली छात्र को अधिक प्रश्न पूछने का शिक्षण देने में सफल होती है किन्तु इस बात की पुष्टि करना मुश्किल है कि ऐसे अधिगम का कोई विशेष महत्व इस कार्य में है या सामान्य रूप से अधिगम में।

(ग) शिक्षण योजना बनाना (Planning Instruction)- जिस तरह किसी भी कार्य को करने से पूर्व उसकी योजना बनाना आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार शिक्षण प्रदान करने के पूर्व योजना निर्माण अत्यन्त आवश्यक है। यदि शिक्षक योजना बनाकर शिक्षण कार्य शुरू करेगा तो वह सफल होगा क्योंकि पाठ्यक्रम तो औसत बालक को ध्यान में रखकर निर्मित किया जाता है। शिक्षण योजना निर्माण में अनेक बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे- पाठ रोचक, उद्देश्यपूर्ण, तर्कसंगत हो, उसका प्रस्तुतीकरण अच्छा और विवेकपूर्ण रूप से हो, आदि।

(घ) सुधारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching)-  छात्रों की समस्याओं आदि को जान कर शिक्षक ऐसी सुधारात्मक विधियों का प्रयोग करे जिससे इन समस्याओं का सुधार किया जा सके। छात्रों की बुद्धिलब्धि को ध्यान में रखकर पाठ्य योजना तैयार की जाय।

व्यवहारवाद और ज्ञानात्मक अधिगम के उपगमन का संश्लेषण (Synthesis of Behaviourism & Cognitive Approach)-

जहाँ व्यवहारवाद बाह्य उत्तेजक एवं वातावरण की दशाओं पर सीखने के लिए या व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए अपना ध्यान केन्द्रित करता है वहीं ज्ञानात्मक सिद्धान्त अधिगम में आन्तरिक दशाओं पर बल देता है। किन्तु वास्तव में अधिगम बाह्य और आन्तरिक दोनों ही दशाओं पर निर्भर करता है। इस सन्दर्भ में गेने का सिद्धान्त अत्यन्त प्रचलित है।

  1. कार्य विश्लेषण गेने का शिक्षण सिद्धान्त (Task anslysis- Ganes Instuctional Theory) – गेने ने मूल व्यवहारवाद पक्ष को ज्ञानात्मक विज्ञान के तत्वों से संयुक्त करने का प्रयास किया और विभिन्न प्रकार के सीखने का एक श्रेणीबद्ध वर्गीकरण प्रस्तुत किया। उन्होंने विभिन्न अधिगम के सिद्धान्तों का संश्लेषण किया और सब प्रकार के अधिगम की व्याख्या की। जिसमें आठ श्रेणियाँ निम्न प्रकार हैं-
  2. समस्या हल
  3. नियम अधिगम
  4. अधिगम की अवधारणा
  5. विभेद अधिगम
  6. शाब्दिक सम्बन्ध अधिगम
  7. जंजीरीकरण
  8. उत्तेजक प्रतिक्रिया अधिगम
  9. संकेतक अधिगम

उपरोक्त श्रेणी में गेने ने आठ प्रकार का सीखना सरल से कठिन तक श्रेणीबद्ध किया है। गेने कार्य विश्लेषण शब्दों का प्रयोग सीखने के कार्यों को व्यवस्थिति ढंग से विश्लेषण करने की प्रक्रिया के लिए करते हैं। साथ ही वे अधिगम को संगठित तथा श्रेणीबद्ध करने के सम्बन्ध में भी निर्देश देते है कि किस प्रकार सुधारात्मक शिक्षण दिया जाय जो कि इस बात पर निर्भर हो कि कहाँ और कौन से छात्र कुशलताओं की श्रेणी में असफल हुए। उन्हें उद्देश्य की प्राप्ति किस प्रकार करायी जाय। इस प्रणाली में अधिगम के उद्देश्यों को उनके छोटे अंशभूतों में बाँटकर पुन: और अधिक छोटे अंशभूत भागों में विषक्त कर उन्हें पहचाना या अधिगम किया जाता है। ये कार्य शिक्षक द्वारा सम्पन्न होता है। गेने के सीखने सम्बन्धी विचारधारा का शिक्षण में बहुत महत्व है क्योंकि शिक्षण देते समय इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि छात्र को अधिगम में सफलता हासिल हो। इसके लिए आवश्यक है कि “सरल से कठिन की ओर” वाले सिद्धान्त को ध्यान में रखकर शिक्षण दिया जाये। इसके लिए छात्र की व्यक्तिगत भिन्नता, तत्परता, अभिप्रेरणा आदि का पूर्व ज्ञान कर लिया जाना चाहिए।

  1. रोजेरियन मॉडल- इस मॉडल के प्रवर्तक रोजर महोदय है। उनके प्रतिकृति मनुष्य की सकारात्मक प्रकृति की अवधारणा पर आधारित है। ये इस बात पर विश्वास करते हैं कि मनुष्य मूल रूप से विवेकशील, प्रकृति की अवधारणा पर आधारित है। ये इस बात पर विश्वास करते हैं कि मनुष्य मूल रूप से विवेकशील सामाजिक अग्रणी, गतिशील तथा मानववादी प्राणी है। उनका यह भी मानना है कि सकारात्मक प्रवृत्तियाँ, आत्म-वास्तविकीकरण (Self-actualisation) की मूल अनुप्रेरणाओं द्वारा समझी जा सकती हैं। रोजर महोदय दृढ़ता से शिक्षकों की मानवीय विशेषताओं पर बल देते हैं। वह शिक्षण को एक सहायक सम्बन्ध मानते हैं तथा शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण कृत्यशील व्यक्ति मानते हैं क्योंकि कृत्यशील व्यक्ति ही सार्थक रूप से सीख सकता है।

व्यवहारवादी और ज्ञानात्मक अधिगम के सिद्धान्तों में अन्तर

(Differnece between Behaviourism & cognitive learning Theory)

व्यवहारवादी अधिगम सिद्धान्त

ज्ञानात्मक अधिगम सिद्धान्त

1. इनका केन्द्र बिन्दु निरीक्षित व्यवहार है।

1. जबकि ज्ञानात्मक सिद्धान्तवाद मानसिक प्रक्रियाओं को अपना केन्द्र बिन्दु मानते हैं।

2. व्यवहारवादी निरीक्षित व्यवहार में परिवर्तन पर मुख्य ध्यान देते हैं।

2. ज्ञानात्मक सिद्धान्तवादी अधिगम वाले की आन्तरिक प्रक्रियाओं को समझने पर बल देते हैं।

3. व्यवहारवादी सीखने की परिभाषा अनुभवों के कारण निरीक्षित व्यवहार में परिवर्तन के सम्बन्ध में देते हैं।

3. ज्ञानात्मक सिद्धान्तवादी सीखने की परिभाषा मानसिक संरचनाओं में परिवर्तन के रूप में देते हैं जो कि व्यवहार का प्रदर्शन करने की क्षमता प्रदान करते हैं।

4. व्यवहारवादी शिक्षकों को सूचना संगठन करने, पुष्टि कारकों एवं दण्डकारकों से प्रशासित करने की भूमिका प्रदान करते हैं।

4. ज्ञानवादी सैद्धान्तिक सूचना के संठगन को स्वीकार करते हैं किन्तु इसे बोध का विकास और निर्देशन के लिए मानते हैं।

व्यवहारवादी और ज्ञानवादी में अन्तर स्पष्ट करने के पश्चात् जो तथ्य सामने आते हैं वह यह कि दोनों ही निम्न तथ्यों को मानते हैं-

  1. निरीक्षित व्यवहार को मान्यता प्रदान करते हैं।
  2. सीखना अनुभवों पर निर्भर है।
  3. सीखना पुष्टिकरण और दृढ़ता से प्रभावित होता है।

किन्तु यह इस बात पर मतभेद रखते हैं कि अनुभव किस प्रकार सीखने को प्रभावित करता है। पुष्टिकरण को भी यद्यपि दोनों अधिगम के लिए अनिवार्य समझते हैं किन्तु जबकि व्यवहारवादी पुष्टिकरण का अर्थ पुष्टि कारकों और दण्डकारी के सम्बन्ध में देते हैं ज्ञानवादियों का मानना है कि यह सूचना है जो कि सीखने वाले यह जानने के लिये प्रयोग करते हैं कि क्या उनकी संसार के सम्बन्ध में समझ वास्तविक है। इस प्रकार दोनों की विचारधाराएँ अपने अधिगम के अस्तित्व को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करने में सहायता प्रदान करती हैं।

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Pankaja Singh

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