शैक्षिक तकनीकी

शिक्षण प्रतिमान का अर्थ | शिक्षण प्रतिमानों की विशेषताएँ | प्रतिमान का अर्थ

शिक्षण प्रतिमान का अर्थ | शिक्षण प्रतिमानों की विशेषताएँ | प्रतिमान का अर्थ | Meaning of teaching model in Hindi | Characteristics of Teaching Models in Hindi | meaning of model in Hindi

शिक्षण प्रतिमान का अर्थ

शिक्षण एवं अधिगम एक-दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि इन्हें एक दूसरे से पृथक कर दिया जाये तो इनका महत्व कम हो जायेगा। जहाँ शिक्षण होता है वहाँ अधिगम भी आवश्यक है। कॉर्न बेक (Conmbach) कहते हैं कि शिक्षण सिद्धान्त का प्रतिपादन अधिगम सिद्धान्तों की सहायता से किया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षण के सिद्धान्तों का प्रमुख आधार अधिगम सिद्धान्त माने गये हैं। गैने (Gagne) महोदय कहते हैं कि अधिगम की स्थिति (Conditions of Learning) शिक्षण के लिए मूल आधार है। इस प्रकार गैने भी कॉर्न बेक का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि शिक्षण के सिद्धान्तों को अधिगम के सिद्धान्तों पर आधारित किया जा सकता है।

ब्रूनर ने भी शिक्षण सिद्धान्तों को पाठ्यक्रम में प्रतिबिम्बित होना स्वीकार किया है।

शिक्षण तकनीकी ने यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षण का अर्थ अधिगम के लिए उचित परिस्थितियाँ पैदा करना है और अधिगम का है व्यवहार परिवर्तन शिक्षण का लक्ष्य केन्द्रित होना आवश्यक है। मनुष्य के व्यवहार परिवर्तन को तीन भागों में बाँटा गया है- (i) ज्ञानात्मक, (ii) भावात्मक, और (iii) क्रियात्मक। इन तीनों का क्षेत्र बड़ा व्यापक है।

वर्तमान युग में विभिन्न प्रकार के ज्ञान, विभिन्न प्रकार की क्रियाओं और विभिन्न प्रकार की भावनाओं के विकास के लिए विभिन्न प्रकार की अधिगम परिस्थितियों के निर्माण की विभिन्न योजनाएँ विकसित हुई हैं। शिक्षण तकनीकी में इनको शिक्षण प्रतिमान कहते हैं। ये प्रतिमान हमें इस बात का सुझाव देते हैं कि शिक्षण तथा अधिगम परिस्थितियाँ किस प्रकार जुड़ी हुई हैं।

प्रतिमान का अर्थ (Meaning of Model)-

मॉडल प्रतिमान का ही हिन्दी रूपान्तरण है। मॉडल क्या है? इसे हम निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं-

कुम्ब एवं अन्य के अनुसार, “Model is an abstraction of the world……a model of the world which is tested by comparing its consequenes to the observed data.”

इसी प्रकार एच.सी. वाईल्ड (H.C. Wyld)- कहते हैं कि “प्रतिमान किसी आदर्श के अनुरूप व्यवहार को ढालने की प्रक्रिया को कहा जाता है।”

पी. भटनागर एवं एस. भटनागर के अनुसार, “शिक्षण या अधिगम या शिक्षण अधिगम के सिद्धान्तों का किसी व्यवहार की प्राप्ति के लिए, किसी के लिए, किसी प्रारूप के अनुसार दी जाने वाली क्रिया प्रतिमान कहलाती है।”

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शिक्षण प्रतिमान से तात्पर्य ऐसे सम्प्रत्यात्मक परिप्रेक्ष्य से है जिसके माध्यम से शिक्षण एवं अधिगम की क्रियाएं नियोजित एवं निष्पादित होती हैं। इस परिप्रेक्ष्य के अभाव में पूरा शिक्षण कार्य अन्धेरे में तीर चलाने की तरह सम्पन्न होता है।

शिक्षण प्रतिमान का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Teaching Models)-

शिक्षण प्रतिमान के सम्बन्ध में विभिन्न लोगों के भिन्न-भिन्न विचार हैं जिन्होंने अपने- अपने तरीके से परिभाषाएं दी हैं जिनमें प्रमुख रूप से निम्न प्रकार हैं-

जायस एवं वैल (Joyce and Weil), “शिक्षण प्रतिमान वह योजना या पद्धति है जिसे किसी पाठ्यक्रम अथवा कोर्स को स्वरूप प्रदान करने, अनुदेशात्मक सामग्री का डिजाइन तैयार करने और किसी कक्ष व अन्य परिस्थितियों में अनुदेशन का मार्ग दर्शन करने हेतु प्रयोग में लाया जा सके।”

अथवा के अनुसार, “शिक्षण प्रतिमान को अधिगम उद्देश्यों, वातावरण सम्बन्धी दशाओं और अन्य प्रक्रियाओं का सम्मिलित रूप कहा जा सकता है।”

हायमान के अनुसार, “शिक्षण प्रतिमान शिक्षण के बारे में सोचने विचारने की एक रीति जो वस्तु के अन्तर्निहित गुणों को परखने के लिए आधार प्रदान करती है।”

लाल, रमन बिहारी के अनुसार, “शिक्षण प्रतिमान शिक्षण लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सीखने की उचित परिस्थितियों के निर्माण की कार्य प्रणाली के प्रारूप होते हैं।

पौल डी. ईगन (Paoul. D.Eggen) के अनुसार, “विशिष्ट अनुदेशनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निर्मित उपचारात्मक शिक्षण व्यूह रचनाएँ (शिक्षण नीतिया) ही प्रतिमान है।”

डॉ. एस.मित्तल (DcS. Mittal) के अनुसार, “शिक्षण उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु विभिन्न विधियों, प्रविधियों योजनाओं तथा स्वरूपों को प्रयोग में लाया जाता है। जिन्हें शिक्षण प्रतिमान कहते हैं।”

कुलश्रेष्ठ (Kulshreshtha) के अनुसार, “शिक्षण प्रतिमान शिक्षण प्रक्रिया में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु पूर्व निर्धारित प्रारूप के अनुकूल विभिन्न शिक्षण क्रियाओं, विधियों नीतियों, प्रविधियाँ अथवा युक्तियों युक्त एक मुक्त, गत्यात्मक, सुनियोजित बहुमुखी प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत प्रेरक शैक्षिक वातावरण वांछित विकास के साथ छात्रों में वांछित व्यवहार परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।

एन.के जंजीरा एवं अजीत सिंह (N.K. Jangira and Ajit Singh) के अनुसार “शिक्षण प्रतिमान क्रमबद्ध एवं अन्तर सम्बन्धित तत्त्वों का वह समूह है जो निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शैक्षिक क्रियाओं एवं वातावरणीय सुविधाओं की योजना बनाने एवं उन्हें क्रियान्वित करने में सहायता करता है।

जंगीरा एवं सिंह आगे लिखते हैं, “The model has the support of a rationales justified by a viable theory. It tells about what the model stands for and why it purports, to accomplish this. Empirical support towards the workability of the models also contributes one of the requirements of justified them.”

इस प्रकार उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षण प्रतिमान विद्यार्थी की आवश्यकतानुसार ऐसा वातावरण एवं परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है जो उसके अधिगम या सीखने में अधिक से अधिक सहायक हो। वे शिक्षक द्वारा छात्र के मार्गदर्शन हेतु क्रम बद्ध तत्वों को प्रदान करते हैं।

इसका प्रयोग प्रमुख रूप से तीन अवस्थाओं में किया जाता है- (i) जब कोई आदर्श प्रस्तुतक्षकरना हो अथवा किसी आदर्श को छात्र अपने व्यावहारिक जीवन में उतारता है।

(ii) किसी बड़ी वस्तु अर्थात् वह वस्तु जिसे कक्षा कक्ष में शिक्षण के दौरान नहीं ला सकते अथवा जिसे लाने में बहुत सी समस्याएं आती हैं उसका उसी अनुपात अथवा पैमाने के अनुरूप प्रतिरूप अथवा नकल के रूप में, जैसे-हृदय की कार्य प्रणाली, हाथ, हवाई जहाज, ट्रेन आदि।

(iii) अधिक कोमल व सूक्ष्म रूप में प्रयुक्त करते हैं इसमें तीन बातें निहित हैं- क्रिया की संरचना, पहचान करने वाला केन्द्र तथा क्रियाओं की व्याख्या।

इस प्रकार जब हम इन्हें शिक्षण में प्रयुक्त करते हैं तो इनको शिक्षण प्रतिमान का नाम देते हैं।

शिक्षण प्रतिमानों की विशेषताएँ (Characteristics of Teaching Models) –

शिक्षण प्रतिमानों की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(1) शिक्षण प्रतिमान के सीखने के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण करना, शिक्षक तथा शिक्षार्थियों के बीच अन्तः क्रिया का होना तथा शिक्षण के सरल, स्पष्ट तथा बोधगम्य बनाने के लिए उपयुक्त नीतियों तथा युक्तियों का प्रयोग करना आदि निश्चित आधारभूत तत्व होते हैं जिन्हें ध्यान में रखकर उनका निर्माण किया जाता है।

(2) ये शिक्षा के व्यक्तित्व में गुणात्मक वृद्धि करते हैं।

(3) इनके प्रयोग से शिक्षक में शिक्षण कला विकसित होती हैं।

(4) इनका आधार चिन्तन है। समस्याओं को लेकर उन पर चिन्तन और प्रयोग किये जाते हैं तो धारणाओं में स्पष्टता आती है। ऐसी स्थिति में ही इनका विकास होता है।

(5) इनका निर्माण मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है।

(6) इनमें मौलिक प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं। जैसे शिक्षक का व्यवहार कैसा है? वह उचित अनुचित व्यवहार क्यों करता है? इसका छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है ? आदि।

(7) शिक्षण प्रतिमान शिक्षण तथा शिक्षार्थी दोनों को ही उपयुक्त अनुभव प्रदान करते हैं।

(8) इसमें विद्यार्थियों की रुचियों का उपयोग किया जाता है। हरबर्ट (Herbart) महोदय की पंचपद प्रणाली आज छात्रों की रुचियों के उपयोग के कारण ही प्रासंगिक बनी हुई।

(9) इनके द्वारा उचित शैक्षिक वातावरण भी तैयार किया जाता है।

(10) ये शिक्षक-शिक्षार्थी के मध्य अन्तःक्रिया को निर्देशित करते हैं।

(11) शिक्षण प्रतिमान शिक्षण के लिए निर्देशक का कार्य करते हैं।

(12) शिक्षण प्रतिमान सामान्यतया शिक्षक के व्यक्तिगत मतों, दर्शन, चिन्तन एवं मूल्यों पर अधारित होते हैं।

(13) प्रतिमानों का विकास निरंतर अभ्यास अनुभव और प्रयोग के प्रचात् होता है।

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Pankaja Singh

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