शिक्षाशास्त्र

शिक्षा में प्रकृतिवाद | प्रकृति के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य | प्रकृतिवाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य

शिक्षा में प्रकृतिवाद | प्रकृति के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य | प्रकृतिवाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य | Naturalism in Education in Hindi | Meaning of education according to nature in Hindi | Aims of education according to naturalism in Hindi

शिक्षा में प्रकृतिवाद

प्रकृतिवाद के रूपों पर प्रकाश डालते हुए हमने थोड़ा-सा प्रकाश शिक्षा के सम्बन्ध में भी डाल दिया है। यह सही है कि मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप अपने को शिक्षित करने में समर्थ होता है। मनुष्य की निजी प्रकृति और उसके चारों ओर की प्रकृति का प्रभाव उसके अनुभव ज्ञान लेन-देन को प्रक्रिया को अच्छी तरह प्रभावित करती है। जैसे शोर-गुल के वातावरण से चिन्तन-मनन की क्रिया विचलित होना स्वाभाविक है, अतः शान्त वातावरण ही शिक्षा के लिए आवश्यक है और इसको उपलब्ध करना शिक्षा- व्यवस्था की दृष्टि से होना चाहिए। यहाँ प्रकृतिवाद की छाप दिखाई देती है। अब हम शिक्षा के विभिन्न अंगों के साथ प्रकृतिवादी प्रभाव बताने का प्रयत्न करेंगे।

प्रकृति के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य-

शिक्षा का सम्बन्ध मनुष्य की प्रकृति से होता है अतएव प्रकृतिवाद के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य है, मानव प्रकृति का उदात्तीकरण “Education means sublimation of human nature) | इस विचार से शिक्षा वहप और साधन हैं जो मनुष्य में स्वाभाविक रूप से पाय जाने वाले गुणों को ऊँचा उठाती है, विकसित करती है और आगे बढ़ाती है अथवा आन्तरिक गुणों को बाहर प्रकट करती है। प्रकृतिवाद के तीनों रूपों के अनुसार शिक्षा के ऊपर कथित तात्पर्य की व्याख्या तीन ढंग से होती है। जीव विज्ञानियों के अनुसार शिक्षा मनुष्य को अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन में सहायता देती है तभी वह उच्च गुणों से युक्त होता है। जीवन की सभी परिस्थितियों में मनुष्य अपने आपको समर्थ बनाता है, अपनी रक्षा करता है, ऐसी दशा में शिक्षा जीवन के लिए तैयारी मात्र न होकर स्वयं जीवन बन जाती है। इसी आधार पर विकास होता है। अतएव प्रो० रॉस ने लिखा है कि “शिक्षा केवल प्राकृतिक विकास को बढ़ाना है और सच्ची शिक्षा तभी होती है जब बालक की प्रकृति, शक्तियाँ और प्रवृत्तियाँ न्यूनतम निर्देशन के साथ स्वतन्त्र ढंग से विकसित होती हैं।”

जीव विज्ञानी प्रकृतिवाद का प्रभाव शिक्षा पर अधिक पड़ा है और उसने शिक्षा का तात्पर्य किस ढंग से बनाया है इसे हमें जानना चाहिए। जीव वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शिक्षा का तात्पर्य मनुष्य के द्वारा अपने पर्यावरण के साथ उचित अनुकूलन होता है। (Education from biological point of view means proper adaptation to the environment by man) । इस विज्ञान के दो बड़े पोषक हुए हैं-डार्विन और लेमाक। इन लोगों ने जीवन रक्षा के लिए प्रयत्न और पर्यावरण के साथ अनुकूलन पर जोर दिया है। ऐसी दशा में मनुष्य यह प्रयत्न करता है कि वह अपने आपको जीवित रखने के लिए सभी परिस्थितियों एवं समस्याओं से संघर्ष कर उन्हें हल कर और आगे बढ़े। अतएव इस दृष्टि से शिक्षा का तात्पर्य उस प्रयत्न से होता है जो जीवन के लिए किया जाये। दूसरे शब्दों में शिक्षा और जीवन समानार्थी होते हैं।

जीव विज्ञान विकासवादी दृष्टिकोण रखता है अतएव कुछ विचारकों ने विकास को ध्यान में रखकर शिक्षा का तात्पर्य बताया है। इसके विचार से शिक्षा केवल प्राकृतिक विकास को बहुत ही सरल और स्पष्ट ढंग से बढ़ाती है। इस सम्बन्ध में प्रकृतिवाद के पाश्चात्य प्रतिनिधि रूसो का विचार है कि “प्रकृति द्वारा शिक्षा प्राकृतिक सरल मनुष्य को पुनः ला देगी जिसका एकमात्र कार्य एक मनुष्य होना है।’’

इस प्रकार इस दृष्टि से शिक्षा का तात्पर्य मनुष्य को सरल मनुष्य बनाने की क्रिया है। (Education means the activity to make a man a simple man)। इस क्रिया के द्वारा मनुष्य की शक्तियों का स्वतन्त्र विकास होगा, उसमें सभी शारीरिक, बौद्धिक तथा भावात्मक गुण अपने आप विकसित होंगे। इससे शिक्षा मानव के विकास की क्रिया होती है।

प्रकृतिवाद ने स्वतन्त्र विकास को सामने रख कर समाज में जनतन्त्रवादी दृष्टिकोण को भी आगे बढ़ाया है और रूसो इसका प्रतिपादक माना गया है। जनतन्त्रवादी शिक्षा मानवतावादी भी मानी गई है। अतएव इस आधार पर शिक्षा वह क्रिया मानी जाती है। जिससे मानव में स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व का विकास होता है। (Education is regarded as that activity by which development of freedom, equality and fraternity takes place in man) |

भारतीय प्रतिनिधि हम टैगोर को लेते हैं। इन्होंने प्रकृतिवाद की ओर जो सुझाव दिखाया है उसके अनुसार शिक्षा का तात्पर्य भी हमें समझना चाहिए। इनका कहना है कि “सच्ची शिक्षा तो संग्रहीत सामग्री के सही प्रयोग में, उसकी वास्तविक प्रकृति को जानने में और उसे जीवन के साथ एक वास्तविक जीवन रक्षा के रूप में निर्माण करने में होती है।”

वास्तव में टैगोर भी रूसो के समान शिक्षा को वह क्रिया मानते थे जिससे “पूर्ण मनुष्यता” का निर्माण हो। (In fact Tagore also regarded education like Rousseau as an activity which builds up a complete manhood) शिक्षा इस प्रकार मनुष्यता के विकास की सरल और प्राकृतिक प्रक्रिया है। (Education is thus the simple and natural process development of manhood.)

प्रकृतिवाद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य-

शिक्षा का तात्पर्य जानने के बाद हम उसके उद्देश्य को भी समझें। प्रकृतिवाद के अनुसार हमें शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य मिलते हैं:-

(1) मनुष्य की आन्तरिक प्रवृत्तियों का मार्गान्तरीकरण और उदात्तीकरण- पूर्ण मनुष्यता के लिए यह उद्देश्य आवश्यक है। मनुष्य को सरल एवं प्राकृतिक ढंग से आगे बढ़ाने में यह उद्देश्य माना गया है। इससे वांछित मार्ग पर मनुष्य बढ़ता है।

(2) जीवन की परिस्थितियों का सामना करने, हल करने में मनुष्य की योग्यता तथा शक्ति का विकास- यदि यह उद्देश्य न रखा जाये तो मनुष्य जीवन धारण करने में असमर्थ होगा। अतएव शारीरिक एवं मानसिक तौर पर मनुष्य को सभी परिस्थितियों को जीतने के लिए तैयार करना शिक्षा का उद्देश्य है।

(3) अनुकूलन की क्षमता का विकास- विकासवादी शिक्षाशास्त्रियों ने इस उद्देश्य पर जोर दिया है क्योंकि मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो अपने आपको पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने में समर्थ बनाता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसका शारीरिक एवं मानसिक विकास उचित रूप से नहीं हो पाता है।

(4) मनुष्य की प्राकृतिक शक्तियों का पूर्ण रूप से विकास- पेस्टालोजी तथा उसके पूर्व रूसो ने लिखा है कि शिक्षा के द्वारा मनुष्य की प्राकृतिक शक्तियों का पूर्ण विकास होना चाहिए। पूर्ण विकास में लोगों ने स्वतन्त्र और स्वाभाविक विकास को रखा है।

(5) सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करने की योग्यता का विकास- कुछ प्रकृतिवादी इस उद्देश्य पर बल देते हैं। हर्बर्ट स्पेन्सर ने “जीवन की तैयारी” और जॉन डीवी ने “जीवन और शिक्षा” की बात की है। इन दोनों के विचारों को मिला देने से सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करने की योग्यता आती है और प्रकृतिवाद इस उद्देश्य की ओर ध्यान देता है।

(6) मनुष्य की जातीय विशेषताओं का विकास- प्रो० बर्नार्ड शा जैसे प्रकृतिवादी विचारक ने बताया है कि हमें जो गुण अपनी शारीरिक आनुवांशिकता से नहीं मिल पाते उन्हें हम शिक्षा के द्वारा पूरा करते हैं। ऐसी दशा में शिक्षा का उद्देश्य जातीय विशेषताओं और गुणों को मनुष्य में विकसित करना होता है। इसीलिए शिक्षा का कार्य जातीय अनुभवों को सुरक्षित रखना है और समयानुसार उन्हें हस्तान्तरित भी करना है।

(7) मनुष्य की व्यक्तिगत शक्तियों का विकास- प्रकृतिवाद व्यक्ति के विकास पर जोर देता है अतएव शिक्षा का उद्देश्य अलग-अलग मनुष्य की निजी मूलशक्तियों, क्षमताओं, योग्यताओं, रुचियों एवं रुझानों का विकास प्रकृतिवाद के अनुसार माना गया है। इसका दो साधन है-आत्मानुभूति और आत्म-प्रकाशन जैसा कि प्रो० नन ने बताया है।

प्रकृतिवाद के पाश्चात्य प्रतिनिधि रूसो को लिया जा सकता है। इन्होंने शिक्षा के उद्देश्य के बारे में इस प्रकार बताया है, “शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक को उसकी अपनी समस्त नैसर्गिक एवं जन्मजात शक्तियों, प्रवृत्तियों और इच्छाओं के विकास में सहायता करना है।”

(The main aim of education is to help the child in the development of his all natural and inner powers, tendencies, and desires.)

प्रकृतिवाद के भारतीय प्रतिनिधि टैगोर हैं जिन्होंने प्रकृतिवादी दृष्टि से शिक्षा का उद्देश्य इस प्रकार बताया है, “इस समय हमारा ध्यान आकर्षित करने वाली प्रथम और महत्वपूर्ण समस्या हमारी शिक्षा और हमारे जीवन में सामंजस्य स्थापित करने की है। अतः हमारी शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को यह योग्यता तथा क्षमता प्रदान करना है जिससे कि वह जीवन के साथ पूर्ण सामंजस्य लाने में समर्थ हो सके।”

(At present the first and important problem attracting our attention is to establish harmony between education and life. So the aim of our education is to provide man that ability and capacity so that he becomes capable of making full harmony with life.)

इन दोनों विचारकों की बातों को ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि दोनों की दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की प्राकृतिक क्षमताओं का प्राकृतिक ढंग से विकास करके मनुष्य को ऊँचा उठाना है।

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Pankaja Singh

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