शिक्षाशास्त्र

शिक्षा में छनाई सिद्धान्त | शिक्षा में निस्यन्दन सिद्धान्त | Filtering Principles in Education in Hindi | Dissertation Principles in Education in Hindi

शिक्षा में छनाई सिद्धान्त | शिक्षा में निस्यन्दन सिद्धान्त | Filtering Principles in Education in Hindi | Dissertation Principles in Education in Hindi

शिक्षा में छनाई सिद्धान्त अथवा निस्यन्दन सिद्धान्त (Filteration Theory in Education)

अंग्रेज यह चाहते थे कि उनको हमेशा ऐसे भारतीय मिलते रहें जो उनके व्यापार व प्रशासन में उनकी सहायता करते रहें, अतः उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का प्रचलन किया। एक बात उनके साथ यह भी स्मरणीय है कि वह अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार जनसाधारण में तेजी से नहीं करना चाहते थे। कारण था कि वह भारतीय जन समाज में अपने अधिकार एवं कर्तव्यों के प्रति जागृति नहीं पैदा होने देना चाह रहे थे।

मिशनरियों का पहले से ही कहना था कि यदि उच्च वर्ग की इच्छी जाति के कुछ हिन्दू ईसाई धर्म में दीक्षित कर लिए जायें तो निम्न वर्ग उनका अनुसरण सहज ही करने लगेंगे। ईस्ट इंडिया कम्पनी के संचालकों ने 1830 में मद्रास सरकार को यह आदेश दिया था कि वह उच्च वर्ग को ही शिक्षा देने के पक्ष में है। अंग्रेज चाहते थे कि यदि उच्च वर्ग उनका भक्त रहेगा तो उनका विरोधी कोई नहीं खड़ा हो सकेगा। लॉर्ड मैकाले ने भी 1835 के विवरण-पत्र में कहा था कि “इस समय हमें ऐसे वर्ग की जरूरत है जो हमारे तथा भारतीय जनता के बीच सम्बन्ध स्थापित करे। यह वर्ग रंग-रूप में तो भारतीय हो किन्तु रुचि, विचारों तथा बुद्धि में अंग्रेज हो।” साथ ही 31 जुलाई 1937 को एक विज्ञप्ति में उसने स्वीकार किया था कि “वर्तमान समय में हमारा उद्देश्य निम्न वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष शिक्षा प्रदान करना नहीं है।” मैकाले के साथ सहमति व्यक्त करते हुए बंगाल की ‘लोक शिक्षा समिति’ ने 1839 में वही मत व्यक्त किया कि हमारे प्रयास अभी उच्च वर्ग की शिक्षा के लिए ही होने चाहिएँ । आकलैण्ड ने मैकाले व बंगाल की शिक्षा समिति के सुझाव को सरकारी नीति में बदलते हुए यह घोषणा की कि “सरकार को शिक्षा उच्च वर्ग को ही प्रदान करनी चाहिये, जिससे सभ्यता छन-छन कर जनता में पहुँचेगी।” अंग्रेजों की यह नीति काफी समय तक चलती रही, जिसका प्रभाव भारतीय शिक्षा पर बहुत दिनों तक बना रहा।

निस्यन्दन सिद्धान्त (Filteration Theory)

छनाई के सिद्धान्त का अभिप्राय यह था कि जनसाधारण में शिक्षा उच्च वर्ग से छन-छन कर पहुंचाई जाये। इस सिद्धान्त के मूल में तीन महत्वपूर्ण बातें थीं, जो एक-दूसरे से अलग होते हुए भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं-

(1) अंग्रेज एक ऐसे वर्ग को शिक्षित करना चाहते थे जो उनमें शासन के कार्य के लिए सही हो क्योंकि कम्पनी को छोटी-छोटी जगहों के लिए विलायत से कर्मचारी लाने पड़ते थे। अतः उन्होंने यह सही समझा कि ऐसे कर्मचारियों का निर्माण यहीं क्यों न किया जाये। अत: उच्च वर्ग को शिक्षा प्रदान कर शासन के महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करके शासन को सुदृढ़ करना था।

(2) उच्च वर्ग को शिक्षा प्रदान की जाये जिसका असर निम्न वर्ग पर, उनके आचार-विचार, रहन-सहन व सभ्यता पर पड़ेगा। साथ ही निम्न वर्ग की शिक्षा का स्वरूप स्वतः निर्धारित हो जायेगा।

(3) कुछ व्यक्तियों को जो राजभक्त हों चाहे वे उच्च वर्ग के हों या निम्न वर्ग के हों, शिक्षित करके उनके ऊपर जनसाधारण की शिक्षा का भार अर्पित कर देना । कारण था कि शिक्षा के क्षेत्र में निम्न वर्ग के लिए छूट थी क्योंकि यह लोग ईसाई मिशनरियों के चक्कर में जल्दी पड़ जाते थे।

समालोचनात्मक मूल्यांकन

छनाई के सिद्धान्त के कार्यान्वयन से सबसे बड़ा लाभ शिक्षा की सरकारी नीति निर्धारण होने से हुआ। इसके कारण भारतीय शिक्षा का स्वरूप निर्धारित हुआ ऐसा अनेक विद्वानों का मत है, लेकिन वास्तव में हम इससे यह जरूर मानते हैं कि शिक्षा सम्बन्धी सरकारी नीति का स्वरूप जरूर निर्धारित होगा लेकिन हम इस बात से सहमत नहीं कि शिक्षा के क्षेत्र में लाभ हुआ। कारण है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तीव्रता आई तथा कुछ लोग शिक्षित हो गये। सरकार को काम करने के लिए राज्यपदों व कम्पनी के कार्यों के लिए आदमी भी पद पर था अथवा कम्पनी का गुलाम पढ़-लिखकर बना भारतीय जनसमूह को घृणा की दृष्टि से देखने लगा। उन्हें गँवार, मूर्ख, पोंगा व बुद्धू समझने लगा। यह मनोवृत्ति शिक्षा में इतनी रच-बस गई कि आज तक यह अपने कुछ न कुछ रूपों व अंशों में विद्यमान है।

जहाँ तक जनसाधारण की शिक्षा के उत्तरदायित्व शिक्षित भारतीयों के संभालने का प्रश्न था वह भी पूरा न हुआ क्योंकि शिक्षित भारतीय अंग्रेजी व पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण कर अपने को साधारण जनता का देवता समझने लगे। शासक बना हुआ अधिकारी साधारण जन वर्ग से कैसे सम्पर्क बनाये रखता। पाश्चात्य शिक्षा का विद्वान् महापंडित भारतीय जनसाधारण को शिक्षा प्रदान कर अपने समकक्ष कैसे खड़ा कर सकता था, उसकी प्रतिष्ठा व सम्मान का सवाल जो था।

इस प्रकार अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय जनकल्याण की कल्पना भी न कर सके। इस वर्ग के रहन-सहन का स्तर ऊँचा था तथा अपने ही देश में वह अपने को अजनबी मानते थे, यही नहीं अफसरी के घमंड में जनता पर अत्याचार करने से भी न चूकते थे। इस प्रकार से जनसाधारण की शिक्षा उपेक्षित रह गई । भारतीय शिक्षण संस्थाएँ जिन्हें भारतीय शिक्षा का प्राण बताया गया था, की खूब उपेक्षा की गई उनकी ओर दृष्टि उठाकर देखने वाला कोई सरकारी अधिकारी शेष न रह गया। बी. दयाल साहब ने इस संघर्ष में एडम के विचार अपनी पुस्तक में प्रस्तुत किये हैं। एडम ऐसा विद्वान है जिसने छनाई के सिद्धान्त की कड़ी आलोचना के साथ ह अंग्रेजों की शिक्षा की नीति से अपनी असहमति जतायी है।

छनाई का सिद्धान्त भारत में स्थायित्व न पा सका इसके निम्नलिख्तिा कारण थे-

(1) सरकार ने अंग्रेजी स्कूलों की संख्या जैसे ही बढ़ाई, जनसाधारण शिक्षित होने लगा। यह विद्यालय शिक्षितों ने आजीविका चलाने के लिए खोले थे।

(2) अनेक भारतीय जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की, व्यापक दृष्टिकोण के समर्थक थे। अतः सरकारी प्रलोभन अथवा नौकरी के प्रभाव में आकर वे देश-प्रेम और मानवता को न भूल सके।

(3) भारतीयों में अंग्रेजी शिक्षा से जागृति आई व उनमें अंग्रेजों के प्रति भक्ति के स्थान पर विरोध के भाव पैदा हुए। अतः सिद्धान्त का उद्देश्य पूरा न हुआ।

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Pankaja Singh

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