शिक्षाशास्त्र

शैक्षिक समाजशास्त्र का महत्व | शैक्षिक समस्याओं के समझने में किस प्रकार सहायक

शैक्षिक समाजशास्त्र का महत्व | शैक्षिक समस्याओं के समझने में किस प्रकार सहायक

शैक्षिक समाजशास्त्र का महत्व

प्रो० जे० एस० रूसेक ने लिखा है कि “समाजशास्त्र सभी सामाजिक प्रक्रियाओं को समाविष्ट करता है।” यदि ऐसी बात हैं तो निश्चय ही शैक्षिक समाजशास्त्रय के अध्ययन का महत्व होगा। किन दृष्टियों से इस विषय का महत्व होता है यह यहाँ पर विचारणीय होता है। नीचे कुछ विचार इस सम्बन्ध में दिये जा रहे हैं –

(1) व्यक्ति की अन्य व्यक्तियों के साथ सही ढंग के व्यवहार करने में सफल बनाने के विचार से शैक्षिक समाजशास्त्र महत्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि शैक्षिक समाजशास्त्र व्यक्ति के सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन करता है।

(2) शिक्षक एवं विद्यार्थी के आपसी सम्बन्ध जानने की दृष्टि से भी शैक्षिक समाजशास्त्र महत्वपूर्ण होता है। ऐसे सम्बन्ध की स्थापना में भी शैक्षिक समाजशास्त्र उपयोगी माना जाता है।

(3) शैक्षिक समाजशास्त्र समाज में शैक्षिक माँगों, समाज के हित में उसके उद्देश्यों के निर्धारण, समाज के अनुकूलन शैक्षिक नियोजन, अर्थ-व्यवस्था आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। सच्चे परिपार्श्व में शिक्षा की व्यवस्था करना शैक्षिक समाजशास्त्र की सहायता से संभव होता है। अतः यहाँ भी इसका महत्व प्रकट होता है।

(4) समाज को गतिशील बनाने, ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने एवं नियंत्रित और संगठित करने में जो योगदान शैक्षिक समाजशास्त्र का पाया जाता है उससे भी उसकी महानता एवं महत्ता प्रकट होती है क्योंकि समाज को गतिशील बनाने, ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने का एकमात्र साधन समाज की शिक्षा ही है।

(5) समाज की समस्याओं का समाधान शिक्षा के द्वारा कैसे हो सकता है, इस दिशा में भी शैक्षिक समाजशास्त्र महत्वपूर्ण बताया गया है क्योंकि प्रत्येक समस्या पर चिन्तन की जरूरत होती है जो शास्त्र की क्रिया से सम्भव होता है। फलतः इस दृष्टि से भी शैक्षिक समाजशास्त्र महत्वपूर्ण होता है।

(6) शिक्षाशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है और शैक्षिक समाजशास्त्र उसका एक अंग है। अतः शिक्षाशास्त्र के अध्येताओं के लिए शैक्षिक समाजशास्त्र काफी महत्वपूर्ण होता है। शिक्षा की संस्था (विद्यालय) सामाजिक परीक्षण एवं प्रयोग का स्थान है जहाँ लड़कों को समाज के जीवन के लिए तैयार किया जाता है। यह कैसे सम्भव हो सकता हैं, इसे शैक्षिक समाजशास्त्र ही बताता है। अतएव शैक्षिक समाज का महत्व कई दृष्टियों से दिखाई देता है।

शैक्षिक समस्याओं के समझने में किस प्रकार सहायक

शैक्षिक समाजशास्त्र समाज के सभी लोगों, सभी संस्थाओं, सभी क्रियाओं से सम्बन्धित अध्ययन होता है। वह समाज की सभी समस्याओं को समझता है। शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है, इस कारण समाजशास्त्र शैक्षिक समस्याओं को समझता और सुलझाता है यहीं उसका महत्व दिखाई देता है।

शैक्षिक समस्याओं को समझने में पहले वह विद्यार्थी, अध्यापक, विद्यालय के वातावरण, समाज की परिस्थितियों एवं राजनीतिक, शासनिक प्रबंध आदि की जानकारी करता है तथा मनोवैज्ञानिक ढंग से उन्हें हल करता है। समस्याओं पर चिन्तन-मनन भी करता है तथा उसी के अनुकूल आदर्श एवं मानक प्रस्तुत करता है। विभिन्न प्रकार से सभी के बीच कल्याणकारी सम्बन्ध बनाता है तथा शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के लिए उन्हें तैयार करता है और सक्रिय बनाता है। इस दृष्टि से शैक्षिक समाजशास्त्र की भूमिका शैक्षिक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक दर्शन की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

समाजशास्त्र का एक अंग शैक्षिक समाजशास्त्र है। समाजशास्त्र समाज के लोगों, उनकी क्रियाओं एवं विचारधाराओं से भी सम्बन्ध रखता है। इसीलिए तो समाजशास्त्र का एक अंग समाज मनोविज्ञान और दूसरा अंग समाज-दर्शन है। इन दोनों का सम्बन्ध विद्यालय समाज (विद्यार्थी, अध्यापक, प्रबन्धक, कर्मचारी वर्ग) से होता है। यहाँ शैक्षिक समाजशास्त्र की व्यापकता दिखाई देती है। जहाँ केवल शैक्षिक मनोविज्ञान और शैक्षिक दर्शन से काम नहीं चलता है वहाँ शैक्षिक समाजशास्त्र शैक्षिक समस्याओं को समझने व सुलझाने में सफल होता है।

निष्कर्ष

ऊपर के विचारों से स्पष्ट है कि शैक्षिक समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। प्रो० ए० के० सी० ओटावे ने लिखा है कि “शिक्षा वह क्रिया है जो समाज में होती है और उसका उद्देश्य तथा उसकी विधियाँ समाज की प्रकृति पर निर्भर करती हैं जिस समाज में यह होती है।”

प्रो० ओटावे के उपर्युक्त कथन से ज्ञात होता है कि शिक्षा तथा समाज की संयुक्त क्रिया के परिणामस्वरूप शैक्षिक समाजशास्त्र बना है। विद्यालय एक सामाजिक व्यवस्था है जो समाज की जटिल संरचना में कार्य करता है और इस सामाजिक व्यवस्था को ठीक से चलाने के लिए शैक्षिक समाजशास्त्र महत्वपूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण होता है।

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Pankaja Singh

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