शिक्षाशास्त्र

सेवाकालीन अध्यापक-शिक्षा कार्यक्रमों में सुधार के लिये सुझाव

सेवाकालीन अध्यापक-शिक्षा कार्यक्रमों में सुधार के लिये सुझाव

सेवाकालीन अध्यापक-शिक्षा कार्यक्रमों में सुधार के लिये सुझाव

(Suggestions for the Improvement of the In-Service Teacher Education Programmes)

अध्यापकों की सेवाकालीन शिक्षा के लिये विभिन्न कार्यक्रमों का इस ढंग से संगठन किया जाता है कि उनका प्रभाव अध्यापकों के व्यावसायिक विकास पर दृष्टिगोचर नहीं होता। इस उद्देश्य के लिये बहुत भारी सरकारी मशीनरी के बावजूद भी स्कूल अध्यापकों पर इन कार्यक्रमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

यदि इन कार्यक्रमों का अध्यापकों को कोई लाभ नहीं तो इन कार्यक्रमों का संगठन क्या मजाक है?

तब क्या यह दिखावा तथा धन एवं मानव प्रयत्नों की व्यर्थता नहीं?

सेवाकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम इस ढंग से संगठित करने चाहिएँ जिससे वे अध्यापकों की व्यावसायिक कार्यक्षमता में सुधार के लिये प्रभावशाली बन सकें।

इस उद्देश्य के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिएँ-

(1) सेवाकालीन कार्य के लिये अच्छी विधियों तथा तरीकों के लिये निरन्तर खोज होनी चाहिए।

(2) प्रान्तीय सरकारों को इन कार्यक्रमों के संगठन के लिये पर्याप्त आर्थिक सहायता देनी चाहिए परन्तु साथ ही यह देखना भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है कि इस उद्देश्य के लिये धन का अपव्यय नहीं हो रहा अपितु इसक अच्छा प्रयोग हो रहा है।

(3) अध्यापकों को अन्तः सेवा शिक्षा प्रदान करने वाली विभिन्न संस्थाओं के बीच तालमेल होना चाहिए।

(4) पड़ोस में स्थित विभिन्न स्कूलों को अपने अध्यापकों को सेवाकालीन शिक्षा देने के लिये मिलकर काम करना चाहिए । अध्ययन मण्डल (Study Circles), विषय अध्यापकों की संस्थाएँ (Subject Teachers Association) तथा अन्य कार्यक्रम पड़ोस में विभिन्न स्कूलों के पारस्परिक सहयोग से संगठित किये जा सकते हैं।

(5) कार्यक्रम को आरम्भ करने से पूर्व उसकी उचित तैयारी होनी चाहिए। भाग लेने वालों का उचित चुनाव किया जाये। प्रत्येक बार ऐसे निकम्मे आदमियों को उन कार्यक्रमों पर न बुलाया जाये जो स्कूल कार्य से पीछा छुड़ाने के लिये तथा इन कार्यक्रमों में भाग लेते हुए अपना समय नष्ट करने के लिये आते हैं।  केवल योग्य एवं वास्तविक रूप से रुचि लेने वाले अध्यापकों को ही इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिये बुलाया जाये जिससे वे अपने-अपने स्कूलों में जायें तो स्कूल कार्यक्रम में परिवर्तन ला सकें। ऐसे अध्यापकों को कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के समय का महंगाई भत्ता, यात्रा भत्ता तथा अवकाश आदि के रूप में प्रोत्साहन देना चाहिए और तब इस प्रकार के कार्यक्रमों में भाग लेने के आधार पर इनकी पदोन्नति करनी चाहिए।

(6) प्रान्तीय सरकार अध्यापकों की पत्रिकाओं (Teacher’s Journals) को प्रकाशित कर सकती है अथवा इसका प्रबन्ध कर सकती है। इन पत्रिकाओं में अध्यापक अपने अनुभव लिख सकते हैं। सार्वजनिक रुचि की समस्याओं के लिए क्रियात्मक सुझाव तथा समाधान दे सकते हैं। यह सेवाकालीन शिक्षा कार्यक्रमों को प्रभावशाली बनायेगा। अध्यापकों के लिये सेवाकालीन शिक्षा कार्यक्रमों को वास्तविक रूप में प्रभावशाली तथा उपयोगी बनाने के लिये प्रत्येक प्रत्यत्न किया जाना चाहिए जो कि पूर्व सेवा-कालीन शिक्षा कार्यक्रमों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। वर्तमान सभी साधनों को एकत्रित किया जाये ताकि अधिकाधिक संख्या में अध्यापक इन कार्यक्रमों से लाभ उठा सकें।

(7) अध्यापकों की सेवाकालीन शिक्षा के प्रत्येक कार्यक्रम का अनुवर्तन (Followup) होना चाहिए ताकि अध्यापक इन कार्यक्रमों से यथार्थ रूप में लाभ उठा सकें।

(8) शिक्षा महाविद्यालयों तथा प्रशिक्षण स्कूलों के प्रसारण सेवा विभागों (Extension Service Departments) को स्कूल स्तर पर सेवाकालीन कार्यक्रमों के संगठन में सहायता करनी चाहिए। इस प्रकार के कार्यक्रमों में स्कूलों की सहायता करना प्रत्येक प्रशिक्षण संस्थान का कर्त्तव्य होना चाहिए।

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Pankaja Singh

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