शिक्षाशास्त्र

सीखने की प्रक्रिया और उसका विश्लेषण | अधिगम प्रक्रिया का स्वरूप | सीखने के पठार | सीखना और अच्छे व्यवहार का पनपना

सीखने की प्रक्रिया और उसका विश्लेषण | अधिगम प्रक्रिया का स्वरूप | सीखने के पठार | सीखना और अच्छे व्यवहार का पनपना

सीखने की प्रक्रिया और उसका विश्लेषण

अधिगम प्रक्रिया सरल नहीं होती। इसलिए इसे आसानी से समझना सम्भव नहीं है। विश्लेषण करने पर हमें निम्नलिखित विशेषताएँ इस प्रक्रिया में मिलती है-

(क) उत्तेजना-अनुक्रिया- अधिगम अर्जित होता है। इस दृष्टि से व्यक्ति को अपने पर्यावरण कुछ उत्तेजना अवश्य मिलती है और उसके प्रति अनुक्रिया होती है। इस प्रकार अधिगम की प्रक्रिया में उत्तेजना अनुक्रिया होती है।

(ख) उद्देश्य और लक्ष्य- अधिगम एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। जीवन की आवश्यकता- पूर्ति समाज में सम्मान प्राप्ति आदि के उद्देश्य से मनुष्य सीखता है।

(ग) अभिप्रेरण- अधिगम अर्जित होती है अस्तु इसके लिए कुछ न कुछ अभिप्रेरण होना चाहिए। छात्र अधिगम के लिए प्रयत्न क्यों करता है क्योंकि उसे परीक्षा पास करके नौकरी मिल सकती है, सम्मान मिल सकता है।

(घ) प्रत्यक्षण- अधिगम में प्रत्यक्षण होना जरूरी है। यदि विद्यार्थी को अपने लक्ष्य एवं प्रयत्न के परिणाम स्पष्ट दिखाई देने लगता है तो अधिगम सरल एवं सफल भी होता है और विद्यार्थी उसमें लगा रहता है।

(ड.) पुनर्बलन- पुनर्बलन की क्रिया से मनुष्य अधिगम के लिए बाध्य हो जाता है और उसे बल भी प्राप्त होता है। विद्यार्थी को अध्यापक का आदेश, दूसरों की स्पर्धा, सामाजिक प्रतिछा आदि से शक्ति मिलती है।

(च) एकीकरण- अधिगम में मनुष्य को अपनी विभिन्न चीजों को एकीकृत करना पड़ता है किसी प्रयोजन के साथ सबको ग्रंथित करना पड़ता है जिससे सफलता मिलती है।

(छ) साहचर्य- अधिगम की प्रक्रिया में मनुष्य अपने पूर्व अनुभव ज्ञान से नये- अनुभव-ज्ञान का साहचर्य कर लेता है। प्रो० हरबार्ट ने अपने प्रशिक्षण में इसे अपनाया है।

(ज) अनुकूलन- अधिगम की क्रिया में अनुकूलन में एक आवश्यक अंग होता है। विद्यार्थी की प्रकृति का अधिगम सामग्री के साथ अनुकूलन होना चाहिए अन्यथा अधिगम सम्भव नहीं होगा। विद्यार्थी की क्षमता अधिगम सामग्री को भी अपने अनुकूल बना लेती है यदि विद्यार्थी प्रयत्न करता है।

(झ) संपरिवर्तन- अधिगम की प्रक्रिया के फलस्वरूप संपरिवर्तन होता है। मूल व्यवहार शिष्ट एवं परिमार्जित हो जाते हैं।

अधिगम प्रक्रिया का स्वरूप-

अधिगम प्रक्रिया किस प्रकार होती है यह भी संकेत करना अच्छा होगा इसमें सबसे पहले (1) कुछ न कुछ परिस्थिति होती है जिसके उपस्थित होने से समस्या खड़ी होती है। इस समस्या के समाधान के लिए मनुष्य (2) उत्तेजना ग्रहण करता है जिसमें उसका (3) शरीर और प्रतिक्रियाशील होता है। फलस्वरूप (4) अनुक्रिया है जिसकी (5) अनुभूति व्यक्ति को होती है। अनुभूति के अनुकूल व्यक्ति (6) व्यवहार करता है परन्तु यह व्यवहार पहले व्यवहार से पूर्णतया परिवर्तित होता है जिसे संपरिवर्तन कहा जाता है।

परिस्थिति उत्तेजना→ शरीर और मन→ अनुक्रिया अनुभूति→ अवबोधन→ अधिग्रहण-व्यवहार-संपरिवर्तन = अधिगम प्रक्रिया।

स्पष्ट है कि अधिगम प्रक्रिया मनुष्य के द्वारा किया गया वह प्रयल है जिसमें वह अपनी परिस्थिति से उत्तेजना लेता और शरीर तथा मन से व्यवहार करता है। इस प्रकार का व्यवहार पूर्व व्यवहार से बदला हुआ होता है और ऐसे संपरिवर्तन के कारण मनुष्य समाज में सबसे योग्य, बुद्धिमान, कुशल तथा सचेतन प्राणी माना जाता है। जीवन में इस अधिगम प्रक्रिया से उसे क्या-क्या लाभ होते हैं यह हरेक मनुष्य को मालूम हो जाता है क्योंकि हरेक मनुष्य आजीवन कुछ न कुछ अधिगम करता (सीखता) रहता है। जीवन एक क्रियाशील स्थिति है जिसमें नित्य नए अनुभव एवं ज्ञान की प्राप्ति होती है और यही अधिगम की प्रक्रिया है।

सीखने के पठार

अधिगम मनुष्य की प्रगतिकारी प्रक्रिया है। इससे मनुष्य के अनुभव-ज्ञान की प्रगति होती है। परन्तु मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि प्रगति रुक भी जाती है। इस प्रकार तीव्रगति, मन्दगति, स्थिर गति और गतिहीन दशा भी अधिगम क्रिया में पाई जाती है। इसी स्थिर गति की दशा को अधिगम का पठार कहा है। इस सम्बन्ध में प्रो० रॉस ने लिखा है कि “अधिगम की प्रक्रिया की एक प्रमुख विशेषता पठार है यह उस अवधि को बताता जाता है जब अधिगम की क्रिया में कोई उन्नति नहीं होती है।”

प्रो० कश्यप और पुरी ने भी कहा है कि “अधिगम में, एक सामान्य अनुभव यह है कि सन्तोषप्रद प्रगति की एक अवधि के बाद थोड़ी या बिल्कुल नहीं उन्नति का अन्तराल आता है। स्थिरता की इन अवधियों को पठार कहा जाता है।”

(i) अधिगम के पठार के कारण- इन स्थिर दशाओं के होने के कारण हैं, जैसे

(1) शारीरिक-शक्ति कम होना,

(2) रुचि की कमी,

(3) हतोत्साह होना,

(4) ज्ञान, समझदारी की कमी होना,

(5) अनुपयुक्त नीरस विधियों अधिगम का होना,

(6) प्रभावकारी ढंग से अधिगम न होना,

(7) अवधान की कमी,

(8) अवधान का विचलन,

(9) जटिल विषय सामग्री का होना,

(10) बुरी आदतों का प्रभाव पड़ना,

(11) अनुभव की कमी होना,

(12) विभिन्न अंगों में एक पर अधिक दूसरे पर कम बल देना,

(13) दूषित पर्यावरण, गन्दे स्थान,

(14) बुद्धि की कमी,

(15) शारीरिक एवं मानसिक थकान रोग आदि ।

(ii) पठार दूर करने का उपाय- मनोविज्ञानियों के द्वारा पठार दूर करने के उपाय कई बताए गए हैं, जैसे

(1) उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग करना,

(2) अधिगम के लिए अच्छा वातावरण प्रस्तुत करना,

(3) थकान दूर करने के लिए अच्छा भोजन और आराम देना,

(4) विषय को रोचक बनाना,

(5) क्रियात्मक ढंग से अधिगम होना,

(6) विभिन्न तरीकों से अभिप्रेरित करना,

(7) प्रगति का रेकार्ड रखना और स्पर्धा एवं प्रोत्साहन देना,

(8) विभिन्न ढंग से समझाना,

(9) क्षमता एवं योग्यतानुसार विषय होना,

(10) उचित समय पर अधिगम होना,

(11) व्यक्तिगत भिन्नताओं की ओर ध्यान देना,

(12) शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य ठीक रखना,

(13) अधिगम का सोद्देश्य होना,

(14) अध्यापक द्वारा सहानुभूति के साथ व्यवहार करना,

(15) जीवन में अधिगम की समर्थकता होना।

सीखना और अच्छे व्यवहार का पनपना

अधिगम से अच्छे व्यवहार का पनपना कैसे हो सकता है ? यह एक विचारणीय समस्या है। अधिगम प्रक्रिया को देखने से स्पष्ट है कि परिस्थिति व्यवहार उत्पन्न करती है चाहे वह अच्छा हो या बुरा हो। इससे यह साफ-साफ मालूम होता है कि अच्छी परिस्थिति के होने से अच्छा व्यवहार होगा तथा बुरी परिस्थिति से बुरा व्यवहार होगा। अब यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि अच्छा वातावरण, अच्छे साधन, अच्छी संगति के द्वारा अच्छा व्यवहार पनपाया जा सकता है।

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Pankaja Singh

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