शिक्षाशास्त्र

सतत् शिक्षा |  सतत् शिक्षा से होने वाले लाभ | सतत् शिक्षा की सामाजिक एवं शैक्षिक प्रासंगिकता

सतत् शिक्षा |  सतत् शिक्षा से होने वाले लाभ | सतत् शिक्षा की सामाजिक एवं शैक्षिक प्रासंगिकता

सतत् शिक्षा की सामाजिक एवं शैक्षिक प्रासंगिकता-

भारत जैसे विकासशील देश की सर्वप्रमुख संकटकालिक अवस्था है- इसमें शिक्षा का अपव्यय एवं अवरोधन। इसका प्रमुख कारण है कि शैक्षिक रूप से उन्मुख परिवारों और समाज में उनके आवश्यक शैक्षिक प्रयासों का अभाव। प्रायः जिन घरों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होता है, उन्हीं घरों के बालक औपचारिक शिक्षा भी आसानी से ग्रहण कर लेते हैं परन्तु जिन घरों में शिक्षा का पर्याप्त प्रकाश नहीं फैला है, वहाँ पर अभी भी बालक या तो प्रवेश नहीं लेते अथवा प्राथमिक कक्षाओं में प्रवेश लेने के पश्चात्  शिक्षा छोड़कर चले जाते हैं।

यह शिक्षा भारतीय परिवेश को ऐसे ही घर के बालकों को शिक्षा की प्रमुख धारा में सम्मिलित होने के आवश्यक अवसर जुटाती है।

(1) इस शिक्षा तथा आजीवन शिक्षा का अर्थ चार बुनियादी शब्दों पर आधारित है। ये शब्द हैं- (i) जीवन, (ii) आजीवन, (iii) सतत्, (iv) शिक्षा।

इन पदों को विभिन्न परिस्थितियों में जिस-जिस अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है, उसी के अनुरूप इनके रूवरूप को स्पष्ट कर लिया जाता है।

(2) भारतीय परिवेश में सतत् शिक्षा को उन समस्त शैक्षिक क्रियाकलापों से किया जाता है जो विद्यालयों एवं स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा नवसाक्षरों तथा ऐसे शिक्षितों के लिए चलाया जाता है जोकि ज्ञान तथा कौशल में आवश्यकतानुसार वृद्धि करके बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा तकनीकी परिवेश में सुसमायोजित करने में सहायक होता है जबकि आजीवन शिक्षा का सम्बन्ध व्यक्ति के समस्त जीवन से होता है जोकि उसे प्रत्येक परिस्थिति में अपने वैयक्तिक वर्चस्व को, सामंजस्य को, अनुकूलन को बनाये रखने में सहायक सिद्ध होती है।

(3) यह शिक्षा एक व्यापक प्रत्यय है जोकि प्राथमिक, माध्यमिक, औपचारिक, अनौपचारिक तथा औपचारिकेतर शिक्षा प्रणालियों को अपने में निहित करती है जबकि आजीवन शिक्षा का क्षेत्र इन विशेषणों से भी परे व्यक्ति की विभिन्न अवस्थाओं के सम्बन्ध से है।

(4) आजीवन अधिगम प्रक्रिया में घर की व्यापक भूमिका रहती है जबकि इस शिक्षा में इसका अपेक्षाकृत कम कार्य होता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवनकाल में पारिवारिक अधिगम के माध्यम से सतत् शिक्षा के रूप में चलती रहती है।

(5) आजीवन शिक्षा प्रणाली में समुदाय को अहं भूमिका रही है। यह व्यावसायिक एवं सामाजिक शिक्षा के क्षेत्र में अपनी शैक्षिक भूमिका सतत् रूप से अदा करती है।

(6) स्कूल, कॉलेज एवं प्रशिक्षण संस्थान सतत् आयाम शिक्षा के महत्त्वपूर्ण अभिकरण हैं किन्तु मात्र अभिकरण नहीं हैं। अब इन औपचारिक अभिकरणों का शिक्षा पर आधिपत्य समाप्त हो गया है। इस प्रकार औपचारिक अधिकरण को शैक्षिक अभिकरण से पृथक नहीं किया जा सकता।

(7) यह शिक्षा, शिक्षा के लम्बवत् आयाम में सातत्य लाने का प्रयास करती है। इसके साथ ही जीवन में शैक्षिक क्षैतिज समन्वयता का मार्ग भी प्रशस्त करती है।

(8) इस शिक्षा, शिक्षा के प्रजातांत्रिक मूल्यों को परिपोषक हैं जबकि आजीवन शिक्षा का सम्बन्ध मानव मात्र के कल्याण से है।

(9) सतत् एवं आजीवन शिक्षा दोनों ही लचीली, विविधतायुक्त तथा वैयक्तिक आवश्यकताओं के अनुकूल होती है।

(10) इस शिक्षा के दो प्रमुख घटक हैं- सामान्य एवं व्यावसायिक जबकि आजोवन शिक्षा का ऐसा कोई वर्गीकरण सम्भव नहीं है।

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Pankaja Singh

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