इतिहास

संयुक्त राष्ट्र संघ का निर्माण | संयुक्त राष्ट्र संघ का संगठन | संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य | संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों का महत्व

संयुक्त राष्ट्र संघ का निर्माण | संयुक्त राष्ट्र संघ का संगठन | संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य | संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों का महत्व

(1) संयुक्त राष्ट्र संघ का निर्माण-

अगस्त, 1942 में अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री चर्चिल ने एक घोषणा-पत्र (Declaration) जारी किया जो इतिहास में प्रसिद्ध एटलांरिक चार्टर (Atlantic Charter) के नाम से जाना जाता है। ‘एटलांटिक चार्टर’ के अनुसार विश्व के महान् राष्ट्रों ने विश्व शान्ति की स्थापना करने का प्रस्ताव रखा था। जनवरी, 1942 में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस तथा चीन ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे। इसके बाद अन्य 41 राष्ट्रों ने भी इस चार्टर पर हस्ताक्षर किये। इस चार्टर के अनुसार सभी राष्ट्रों ने संयुक्त रूप से फासिस्ट देशों के विरूद्ध मोर्चा लेने की शपथ ली थी और यह भी विश्वास दिलाया था कि उनमें से कोई भी राष्ट्र पृथक रूप से शत्रु से सन्धि नहीं करेगा। अक्टूबर, 1943 में ‘मास्को कान्फ्रेंस’ में विश्व के राष्ट्रों ने विश्व शान्ति के लिये एक अन्तर्राष्ट्रीय संघ के स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। इसकी एक विस्तृत योजना भी तैयार की गया थी। अप्रैल, 1945 में इस योजना पर विचार विमर्श करने के हेतु विश्व के 50 राष्ट्रों ने ‘मेनफ्रांसिकी’ (Sun-francisco) की कांफ्रेंस में भाग लिया और अन्त में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर (Umuel Nations Charter) प्रकाशित किया। अक्टूबर, 1945 तक सभी संयुक्त राष्ट्रों ने इस चार्टर पर हस्ताक्षर कर दिये। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई।

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य-

संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य विश्व में शान्ति स्थापित करना है। उसी के अन्तर्गत इसके विभिन्न उद्देश्यों को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है-

(1) अन्तराष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के विरोधी तत्वों को रोकना और सामुदायिक रूप से ऐसे कार्य करना जिनके द्वारा विश्व शान्ति स्थापित रह सके।

(2) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को शान्तिपूर्वक तरीकों से सुलझाना।

(3) राष्ट्रों के बीच मैत्री सम्बन्धों को बढ़ाने के लिये उचित कदम बढ़ाना।

(4) आर्थिक, सामाजिक और मानवतावादी समस्याओं के समाधान में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।

(5) अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये राष्ट्रों के कार्यों में उचित सामंजस्य की स्थापना करना।

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख विभाग-

अपने विश्व शान्ति के उद्देश्य की प्राप्ति के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 प्रमुख विभागों में बाँटा है-

(1) जनरल असेम्बली (General Assembly) (2) सुरक्षा परिषद् (Security Council) (3) सेक्रेटेरियेट (Secretariate (4) अन्तराष्ट्रीय न्यायालय (International Court) (5) आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् (Economic and Social Council) (6) ट्रस्टीशिप कौंसिल (Trusteeship Council) i

(4) जनरल असेम्बली- जनरल असेम्बली में संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्माण में भाग लेने वाले सभी राष्ट्र सम्मिलित होते हैं। प्रत्येक राज्य को एक मत प्राप्त है। प्रत्येक राज्य एक शिष्ट मण्डल भेजता है जिसमें प्रतिनिधियों की संख्या 5 से अधिक नहीं होनी चाहिये। साधारणतया जनरल असेम्बली की बैठक वर्ष में एक बार होती है किन्तु विशेष परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर अथवा अपने ही सदस्यों के बहुमत की प्रार्थना पर असेम्बली की विशेष बैठक भी बुलायी जा सकती है। इस असेम्बली के विभिन्न कार्य हैं- (1) सुरक्षा परिषद् के द्वारा दिये गये निर्णय पर वाद-विवाद करना। (2) शान्ति सुरक्षा एवं मानव अधिकारों से सम्बन्धित सभी प्रश्नों पर विचार विनिमय करना। (3) सुरक्षा परिषद् के गैर स्थायी सदस्यों, ट्रस्टीशिप कौंसिल तथा आर्थिक व सामाजिक परिषद् के सब सदस्यों का निर्वाचन करना। (4) सुरक्षा परिषद् के साथ मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 सदस्यों का निर्वाचन करना। (5) सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर जनरल सेक्रेटरी की नियुक्ति करना। (6) प्रत्येक सेशन के लिए एक अध्यक्ष चुनना।

इतने अधिकार होते हुए भी जनरल असेम्बली के हाथ में कुछ नहीं है। यह किसी बात के लिये केवल सिफारिश कर सकती है निर्णय नहीं कर सकती।

(5) सुरक्षा परिषद्-

सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारिणी परिषद है। यह एक स्थायी अधिवेशन में बनी रहती है। इसके 11 सदस्य होते हैं जिनमें पाँच बड़े राष्ट्र (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और च्यांग काई शेक का चीन) स्थायी सदस्य हैं और दूसरे छः राष्ट्र जनरल असेम्बली द्वारा दो वर्ष की अवधि के लिये निर्वाचित गैर स्थायी सदस्य होते हैं। एक व्यक्ति दो बार नहीं चुना जा सकता। इस परिषद् के प्रत्येक सदस्य का एक मत होता है। सुरक्षा परिषद का सदस्य न होने पर भी कोई राष्ट्र इसकी बैठक में भाग ले सकता है। यदि जिस विवादित विषय पर विचार-विमर्श हो रहा है उससे वह राष्ट्र भी सम्बन्धित हो। अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा के सम्बन्ध में सुरक्षा परिषद् की जिम्मेदारियाँ महत्वपूर्ण हैं।

(6) सुरक्षा परिषद् के कार्य-

(1) ऐसे झगड़ों और परिस्थितियों का अध्ययन करना तथा उनको रोकना जिससे विश्व शान्ति को खतरा हो। (2) झगड़ा करने वाले दलों को परस्पर सीधी बातचीत करने का अवसर प्रदान करके झगड़े का शान्तिपूर्वक निवारण करना, पंच निर्णय द्वारा फैसला कराना या अपराधी राष्ट्र के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना या सैनिक कार्य द्वारा किसी भी राष्ट्र को अपने निर्णय को मानने को बाध्य करना। (3) अपने सैनिक कार्य को सुचारु रूप से पूर्ण करने के लिये सुरक्षा परिषद् सभी या कुछ सदस्य राष्ट्रों से हवाई, समुद्री और पैदल सेना की भी माँग कर सकता है। (4) पाँच बड़े राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के सदस्य अनिवार्य रूप से होते हैं। उनकी विशेष रूप से अधिकार है कि उनमें से कोई भी सदस्य अपनी इच्छानुसार परिषद् की किसी भी कार्यवाही की निषेधाधिकार (Veto Power) के द्वारा रोक सकता है।

(7) सेक्रेटेरियेट-

संयुक्त राष्ट्र संघ के सेक्रेटेरियेट में एक ‘सेक्रेटरी जनरल’ होता है जिसे जनरल असेम्बली 5 वर्ष के लिये नियुक्त करती है। यह विभाग राष्ट्र संघ के विभिन्न विभागों की कार्यवाहियों के रिकार्ड रखता है। किसी भी प्रकार की सूचना आदि सदस्य राष्ट्र इसी कार्यालय से प्राप्त करते हैं। सेक्रेटरी जनरल संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से राज्यों के साथ पत्र व्यवहार करता है। सेक्रेटरी जनरल सुरक्षा परिषद् का ध्यान उन सभी घटनाओं की ओर आकर्षित करता है जिनसे विश्व शान्ति को खतरे को सम्भावना हो।

(8) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय-

इसका प्रधान कार्यालय हेग में है। इस न्यायालय के 15 न्यायाधीश होते हैं। वे पृथक्-पृथक् अधिवेशनों में जनरल असेम्बली और सुरक्षा परिषद् द्वारा 9 वर्ष की अवधि के लिये निर्वाचित किये जाते हैं। उनका पुनर्निर्वाचन भी हो सकता है। यह न्यायालय उन झगड़ों पर विचार करता है जो उसके सम्मुख सदस्य राज्यों अथवा सुरक्षा परिषद् के द्वारा पेश किये जाते हैं। कभी-कभी गैर सदस्यों के झगड़े भी इसके सामने रख दिये जाते हैं।

(9) आर्थिक और सामाजिक कौंसिल (Economic and Social Council)- 

इस विभाग के 18 सदस्य हैं। ये 9 वर्ष की अवधि के लिये जनरल असेम्बली द्वारा चुन जाते हैं। । इस परिषद् के कार्य हैं- (1) युद्ध के आर्थिक-सामाजिक कारणों को दूर करना, (2) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाने के लिये सम्मेलनों का आयोजन करना, (3) विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये आयोगों की नियुक्ति करना, (4) न्याय, कानून के शासन, मानव अधिकारों और मूलभूत स्वतन्त्रताओं के प्रति सार्वभौमिक आदर की वृद्धि करने के लिये शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रों के बीच सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ शान्ति और सुरक्षा का विकास करने आदि के लिये ‘संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक और सांस्कृतिक संघ’ की स्थापना करना आदि आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् के कार्य हैं।

(10) ट्रस्टीशिप कौंसिल (Trusteeships Council)- 

इस कौंसिल के द्वारा ‘लीग’ निम्न प्रकार के प्रदेशों का शासन करती है- (1) वे प्रदेश जो पहले ‘लीग’ के द्वारा शासित होते थे। (2) वे प्रदेश जिनकी धुरी शक्तियों से लिया गया है।

ऐसे प्रदशों को शासन की दृष्टि से कौंसिल किसी भी राज्य को सौंप देती है। राज्यों को ऐसे प्रदेशों का आर्थिक एवं सांस्कृतिक उन्नति का ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे प्रदेशों को स्वशासन की शिक्षा देने का कार्य भी उन्हीं राज्यों का होता है जिनकी देख रेख में वे प्रदेश छोड़े जाते हैं।

(11) संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों का महत्व-

संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्माण से विश्व कल्याण एवं विश्व शान्ति के कार्य में निम्नलिखित ढंग से सहायता मिल रही है-

(1) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघ (I.L.O.)-  अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघ (International Labour Orgnisation) द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ ने खाद्य, कृषि संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठनों एवं मानव हितैषी अन्यान्य संगठनों के क्षेत्र में विशेष प्रगति की है। (2) पुनः निर्माण तथा विकास के हेतु ‘विश्व बैंक’ तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (World Bank एवं International Monetary Fund) की स्थापना की गयी है। इनके द्वारा युद्ध-जर्जरित संसार में आर्थिक पुनर्निर्माण के कार्य को सुगम बना दिया गया है। (3) कुछ लोगों का मत है कि संयुक्त राष्ट्र संघ राजनीतिक कार्यों में सफल नहीं हो सका। फिर भी सक्ष्म रूप से देखा जाये तो मानना पड़ेगा कि फिलिस्तीन, इण्डोनेशिया और काश्मीर के मामले पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी गम्भीरता का परिचय दिया है।

(12) क्या संयुक्त राष्ट्र संघ सफल होगा?-

कुछ लोगों को संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता पर शंका होती हैं किन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार यह संस्था विश्व शान्ति की स्थापना करने वाली एक मात्र संस्था है। इसके दानों पहलुओं पर ही विचार किया जा सकता है-

1. पक्ष में तर्क- (1) लीग की असफलता का प्रथम कारण था कि उसमें अमेरिका सम्मिलित नहीं हुआ था किन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका के सम्मिलित होने के कारण संघ की असफलता का अधिक प्रश्न नहीं उठता।

(2) “रूस ने द्वितीय महायुद्ध के बीज बोये” ऐसा लोगों का विचार था। किन्तु रूस स्वयं राष्ट्र संघ का सदस्य बन गया है। अतएव संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता की पूर्ण आशा की जाती है।

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रत्येक मामला 2/3 बहुमत से तय किया जाता है। इसमें सर्व सम्मति का होना भी आवश्यक नहीं हैं। इस दृष्टिकोण से भी लीग की अपेक्षा संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता का आशाय की जा सकती है।

(4) लीग को सैनिक कार्यवाही करने की शक्ति प्रदान नहीं की गयी थी किन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिकार है कि यदि कोई राष्ट्र उसके निर्णय को न माने तो उसके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही कर सकता है।

उक्त सभी बातों से हमको यह प्रतीत होता है कि संयुक्त राष्ट्र लीग की अपेक्षा अधिक सफल होगा किन्तु फिर भी हमको इसकी उन कमियों की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये जिनके कारण इस संघ की सफलता में शंका की जा सकती है।

2. विपक्ष में तर्क- (1) संयुक्त राष्ट्र संघ सदस्य राज्यों को प्रभुत्व शक्ति की समानता के सिद्धान्त पर आधारित है। कोई भी राष्ट्र अपनी प्रभुत्व सत्ता के अंश मात्र को भी त्यागने के लिये तैयार नहीं है। अतएव संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों में मनमुटाव का रहना स्वाभाविक ही रहता है जिसके परिणामस्वरूप इसके कार्यों में बाधा पड़ती है।

(2) वीटो (Veto) का अधिकार पाँच बड़े राष्ट्रों को दिया गया है। इस अधिकार के कारण अन्तराष्ट्रीय शान्ति का कोई भी कदम नहीं उठाया जा सकता जब तक कि पाँचों बड़े राष्ट्र उससे सहमत न हो। इतना ही नहीं बल्कि इन पाँच बड़े राष्ट्रों में से किसी के विरुद्ध भी कदम नहीं उठाया जा सकता जब तक वह राष्ट्र स्वयं ऐसा करने की स्वीकृति प्रदान न करे। इस प्रकार पाँच बड़े राष्ट्रों को वीटो का अधिकार देने से संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी कार्यकुशलता में बाधा डाल ली।

(3) लार्ड विन्स्टर न इस राष्ट्र सघ पर आपत्ति करत हुए कहा था-“यह संगठन उन प्रिफेक्टों की तरह हैं जो छोटे बच्चों को अनुशासन में रखना चाहते हैं परन्तु स्वयं उन नियमों से जिनसे वे शासन करना चाहते हैं. बरी रहना चाहते हैं।” इस कथन का आशय यही है कि पांच बड़े राष्ट्र दूसरे छोटे राज्यों का फैसला करने बैठते हैं परन्तु यदि उनके स्वयं के झगड़े हों तो अपने वीटो ( Velo) के अधिकार से उन झगड़ों को टाल जाते हैं।

(4) संयुक्त राष्ट्र संघ को किसी भी राज्य के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का अधिकार किन्तु वह किसी भी राज्य को सैनिक कार्यवाही के लिये सैनिक भेजने पर मजबूर नहीं है कर सकता। संयुक्त राष्ट्र संघ कोरिया’ में सैनिक कार्यवाही करना चाहता था। उसने भारत को कोरिया में सेनायें भेजने का अधिकार दिया था किन्तु भारत ने उसका पालन नहीं किया। इसके साथ ही यदि कोई राष्ट्र या राष्ट्राध्यक्ष विश्व शान्ति को भंग करने का संकल्प कर ही ले तो उसको रोक पाना भी संयुक्त राष्ट्र संघ की सामर्थ्य से बाहर है। ईराक का सद्दाम हुसैन इसका उदाहरण है।

संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व शान्ति की स्थापना करने के लिये बना है। उसके पास लीग की अपेक्षा अधिक शक्ति भी है। किन्तु फिर भी राष्ट्र संघ अपने उद्देश्यों में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि यह न्याय और निष्पक्षता के पथ से विचलित हो जाता है। कश्मीर के प्रश्न पर इसने न्यायपूर्ण कार्य नहीं किया। इसके अतिरिक्त आजकल संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व शान्ति के कार्य करने की बजाय राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। अमेरिका के प्रभाव से प्राय: इसके सभी कार्य प्रभावित होते हैं।

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