राजनीति विज्ञान

संविधान का अभिप्राय | संविधान क्या है? | संविधान का अर्थ और परिभाषा | संविधान के लक्षण | संविधान की अनिवार्यता | संविधान का महत्व | संविधान के निर्माण के साधन | संविधान का अभिप्राय एवं निर्माण

संविधान का अभिप्राय | संविधान क्या है? | संविधान का अर्थ और परिभाषा | संविधान के लक्षण | संविधान की अनिवार्यता | संविधान का महत्व | संविधान के निर्माण के साधन | संविधान का अभिप्राय एवं निर्माण

संविधान का अभिप्राय (संविधान क्या है?)

संवैधानिक सरकार का अभिप्राय, किसी संविधान के निबन्धन के अनुसार सरकार से कुछ ज्यादा होता है। इस कथन की व्याख्या कीजिए तथा उन सक्तियों को बताइये जो संवैधानिक सरकार के विरुद्ध कमजोर करने और नष्ट करने के लिए कार्य करती है?

भूमिका-

राज्य के स्वरूप के सम्बन्ध में सर्वप्रथम यूनानी दार्शनिकों ने विचार किया। राजतंत्र के मौलिक तत्वों पर विचार करके उन्होंने बताया कि किन व्यक्तियों के हाथों में राज्यशक्ति रहनी चाहिए। प्लेटो और अरस्तू ने राज्य के आधारभूत सिद्धान्त बताकर संविधान का वर्गीकरण किया । समय बीतने के साथ-साथ इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि यूरोपीय देशों में तानाशाही राजतंत्र के विरुद्ध क्रांति का आह्वान हुआ और प्रजातंत्र का विकास प्रारम्भ हुआ। फ्रांस में लिखित संविधान का जन्म हुआ। अमेरिका के अलिखित संविधान को लिखित बनाया गया। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जर्मनी, बेल्जियम, इटली इत्यादि देशों में संविधान का निर्माण किया गया।

इस प्रकार, संविधान का सम्बन्ध किसी देश के शासन से है। राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत “संविधान’ शब्द का अभिप्राय उस बनावट से है, जो राज्य के ढाँचे और स्वरूप का वर्णन करता है। किसी देश के संविधान को पढ़कर उस देश की मनोदशा और शासन पद्धति का हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आज की 20वीं शताब्दी में संविधान’ शब्द की महत्ता में  अत्यधिक वृद्धि हुई है।

संविधान का अर्थ और परिभाषा

(Meaning and Definition of Constitution)

संविधान अंग्रेजी शब्द ‘कान्स्टीट्यूशन’ (Constitution) का हिन्दी रूपान्तर है। इसका अभिप्राय सरकार की बनावट, वाँचे तथा संगठन से है। प्रत्येक सरकार के सफल संचालन के लिए कुछ लिखित या अलिखित नियमो, सिद्धान्तों, नीतियों तथा कार्यक्रमों की भी आवश्यकता होती है। इन तमाम चीजों का संग्रह ही संविधान कहलाता है। किसी भी देश के संविधान के अध्ययन से हम यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि उस राज्य का प्रशासनिक ढाँचा कैसा है, उस सरकार के कौन-कौन से महत्वपूर्ण अंग हैं ? आज संविधान के अन्तर्गत निम्नलखित महत्वपूर्ण तथ्यों का स्पष्टीकरण होता है:-

  1. शासन का स्वरूप तथा संगठन,
  2. सरकार के विभिन्न अंगों का संगठन तथा कार्य,
  3. सरकार के विभिन्न अंगों में सम्बन्ध,
  4. नागरिक अधिकार तथा कर्तव्य, और
  5. प्रशासन और जनता में सम्बन्ध ।

आज संविधान का महत्व राजनीतिविज्ञान के छात्रों के लिए काफी बढ़ गया है। यही कारण है कि राजनीतिविज्ञान के विभिन्न विद्वानों ने संविधान की विभिन्न परिभाषाएँ दी हैं-

  1. अरस्तू- “संविधान वह यंत्र है, जो राज्य के कार्यालयों का संगठन निर्धारित करता है।”
  2. ऑस्टिन- “संविधान एक ऐसी चीज है, जो सर्वोच्च संगठन के गठन को नियमित करता है।”
  3. बाइस- “संविधात निश्चित नियमों का वह संग्रह है, जिसमें सरकार की कार्यविधि निहित है और जिसके द्वारा उसका संचालन होता है।”
  4. डायसी- “संविधान उन वस्तुओं के समूह को कहते हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राज्य की सर्वोच्च सत्ता की शक्ति के वितरण और प्रयोग को निश्चित करते हैं।”
  5. लॉस्की- “नियमों का वह भाग संविधान है, जिनके द्वारा यह निश्चित होता है कि (क) ऐसे नियम कैसे बनाये जाएँ, (ख) कैसे बदले जाएँ, और (ग) उन्हें कौन बनाये।”
  6. गेटेल- “वे मौलिक सिद्धान्त जिनके द्वारा किसी राज्य का स्वरूप निर्धारित होता है, संविधान कहलाता है।”
  7. गिलक्राइस्ट- “संविधान उन सारे लिखित और अलिखित विधियों एवं नियमों का संग्रह है, जिसके आधार पर किसी देश की शासन-व्यवस्था संगठित की जाती है, शासन के विभिन्न अंगों के मध्य शक्तियों का विभाजन होता है और उन सिद्धान्तों का निर्धारण किया जाता है, जिन पर उन शक्तियों का प्रयोग किया जाता है।”
  8. सी० एफ० स्ट्राँग- “संविधान से राज्य के उन नियमों तथा सिद्धान्तों का बोध होता है, जिनके द्वारा सरकार की शक्तियाँ, शासितों के अधिकार तथा दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध निश्चित किये जाते हैं।”
  9. लेविस- “संविधान से तात्पर्य राज्य के ढाँचे से अथवा राज्य में राज्यसत्ता के प्रबन्ध अथवा वितरण से है।”

संविधान के लक्षण-

राजनीतिशास्त्र के विविध विद्वानों ने संविधान के लक्षण भिन्न-भिन्न प्रकार से किये हैं। सर जेम्स मैकिनटोश के अनुसार, “संविधान उन लिखित व अलिखित आधारभूत कानूनों के समूह को कहते हैं, जो कि उच्च पदाधिकारियों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकारों और जनता के सबसे महत्वपूर्ण विशेषाधिकारों को मर्यादित करते हैं।” अमेरिकन विद्वान् कूले के अनुसार, “संविधान राज्य के उस आधारभूत कानून का नाम है, जिसमें कि उन सिद्धान्तों का प्रतिपादन हो, जिनके अनुसार राज्य की सरकार स्थापित की गई हो, और जिनके द्वारा राज्य की प्रभुत्व शक्ति का संविभाग किया गया हो और यह निर्देश किया गया हो कि इस प्रभुत्व-शक्ति के विविध अंश किन व्यक्तियों में निहित रहेंगे और वे इसका प्रयोग किस प्रकार से करेंगे।” स्विस विद्वान् बोनों के अनुसार, “संविधान उस आधारभूत कानून को कहते हैं, जिसके अनुसार राज्य की सरकार का संगठन किया जाता है, और जिसके अनुसार व्यक्तियों और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध निश्चित किया जाता है। यह संविधान लिखित और अलिखित दोनों प्रकार का हो सकता है।” डायसी के अनुसार, “संविधान उन कानूनों के समूह को कहते हैं, जो कि प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से राज्य की प्रभुत्व-शक्ति के संविभाग और प्रयोग को निश्चित करते हैं।’ प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् जेलीनेक के अनुसार, “संविधान उन कानूनों का नाम है, जिनके द्वारा राजशक्ति को प्रयोग में लाने वाले प्रधान साधनों का स्वरूप निश्चित किया जाता है, और इन विविध साधनों का निर्माण कैसे किया जाय, इनमें परस्पर क्या सम्बन्ध हो, इनका कार्य-क्षेत्र क्या हो और इनमें से प्रत्येक का राज्य के साथ क्या सम्बन्ध हो, ये बातें जिनसे निर्धारित होती हैं।”

विविध विद्वानों ने संविधान के जो लक्षण किये हैं, उन पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान द्वारा सरकार के स्वरूप और संगठन को निश्चित किया जाता है। संविधान यह प्रतिपादित करता है कि किस राज्य की सरकार के विविध अंग कौन-कौन से हैं, इन विविध अंगों की क्या शक्ति है, क्य कार्य-क्षेत्र हैं, उनके परस्पर क्या सम्बन्ध हैं और उनका राज्य के साथ क्या सम्बन्ध है। विधान के कारण सरकार और उसके विविध अंगों (विभागों) की शक्ति निश्चित हो जाती है, और उसका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। राज्य और सरकार दो भिन्न सत्ताएँ हैं। प्रभुत्वशक्ति राज्य में निहित है, सरकार में नहीं । सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न राज्य अपनी राजशक्ति के प्रयोग का अधिकार सरकार को प्रदान करता है। ऐसा करते हुए वह संविधान द्वारा यह निश्चित कर देता है कि सरकार कहाँ तक, किस सीमा तक शक्ति का प्रयोग कर सकती है, जनता के कौन-से ऐसे आधारभूत अधिकार हैं जिनका सरकार अतिक्रमण नहीं कर सकती, वे कौन-से साधन हैं जिनसे जनता अपने इन अधिकारों की रक्षा कर सकती है, सरकार का स्वरूप क्या होगा, उसके विविध भाग व अंग कौन-कौन से होंगे, इनका निर्माण किस ढंग से होगा, और इनमें परस्पर क्या सम्बन्ध रहेगा। संवर्गात्मक व संघात्मक राज्यों में संविधान द्वारा यह भी निश्चित कर दिया जाता है कि राजशक्ति का प्रयोग किस प्रकार केन्द्रीय और प्रादेशिक सरकारों में विभक्त रहेगा, और इन सरकारों में पारस्परिक सम्बन्ध क्या होगा। संविधान द्वारा इन सब बातों के भलीभाँति स्पष्ट हो जाने का परिणाम यह होता है कि सरकार व उसका कोई विभाग अपनी मर्यादा, शक्ति व कार्य-क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर पाता, और सरकार स्वेच्छाचारी व निरंकुश नहीं होने पाती।

संविधान लिखित (Written) और अलिखित (Unwritten) दोनों प्रकार का हो सकता है। ग्रेट ब्रिटेन सदृश राज्यों में बहुत से कानून, जो कि सरकार तथा उसके विविध विभागों की शक्ति और क्षेत्र को मर्यादित करते हैं, लेखबद्ध नहीं किये गये हैं। ये कानून परम्पराओं और प्रथाओं पर आश्रित हैं यद्यपि इनमें भी वही बल है जो लेखबद्ध कानूनों में होता है। ब्रिटेन का राजा शासन, व्यवस्थापन एवं न्यायसम्बन्धी बहुत अधिक शक्ति रखता है, पर प्रथा के अनुसार वह उसका प्रयोग नहीं कर सकता। संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, भारत आदि राज्यों के संविधान लिखित हैं। पर उनमें भी परम्परा तथा प्रथा का महत्व कम नहीं है । संविधान में जहाँ लेखबद्ध कानून के अन्तर्गत होते हैं, वहाँ साथ ही अलिखित प्रथाओं और परम्पराओं का भी उसमें समावेश रहता है।

संविधान की अनिवार्यता-

यह सम्भव नहीं है कि कोई राज्य संविधान के बिना रह सके। जेलीनेक के अनुसार कोई राज्य ऐसा नहीं हो सकता, जिसका संविधान न हो । जिन राज्यों में किसी निरंकुश स्वेच्छाचारी राजा का शासन हो, उनमें भी किसी-न-किसी रूप में संविधान का होना अनिवार्य होता है। संविधान के अभाव में राज्य राज्य नहीं रहेगा, उसकी दशा ‘अराजक’ हो जायेगी।

जेलिनेक के इस मन्तव्य की सत्यता को फ्रांस के उदाहरण द्वारा भलीभाँति स्पष्ट किया जा सकता है। लोकतंत्र रिपब्लिक की स्थापना से पूर्व फ्रांस में बूढे वंश के निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी राजाओं का शासन था। ये राजा अपनी इच्छा को ही कानून समझते थे। पर इनके शासन में भी फ्रांस में एक प्रकार के संविधान की सत्ता विद्यमान थी। वहाँ कतिपय ऐसे कानून विद्यमान थे, जिनका उल्लंघन राजा भी नहीं करते थे। उदाहरण के लिए, राजा कोई ऐसा नया टैक्स नहीं लगा सकता था जो फ्रांस की पार्लियामेंट (एस्टेट्स-जनरल) ने स्वीकार न कर लिया है। मध्यकाल की यह फ्रेंच पार्लियामेंट जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होती थी, इसे जनता का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता था। इसमें राज्य की विविध श्रेणियों (जागीरदार, पादरी तथा सर्वसाधारण लोग) के व्यक्ति सम्मिलिति हुआ करते थे। इनके शामिल होने का ढंग क्या था, इसे लिखने की यहाँ आवश्यकता नहीं। किन्तु इतना निर्देश कर देना पर्याप्त है कि नये टैक्स लगाने के सम्बन्ध में फ्रेंच राजाओं की शक्ति इस एस्टेट्स-जनरल द्वारा मर्यादित होती थी। फ्रेंच राजाओं की यह शक्ति भी नहीं थी कि राजगद्दी पर किस क्रम से राजवंश के लोग आरूढ़ हों, इस बात के नियमों में वे स्वेच्छापूर्वक परिवर्तन कर सकें । राजा द्वारा प्रचारित किया हुआ कोई कानून तब तक क्रिया में परिणत नहीं हो सकता था, जब तक कि पार्लमां (एक प्रकार के न्यायालय) उसे अपने यहाँ दर्ज न कर लें। 1789 में जब फ्रांस में राज्य क्रांति का सूत्रपात हुआ, तो क्रांतिकारी नेता इन्हीं म्परागत कानूनों पर जोर देते थे, और राजा की स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध जनता की रक्षा करने को उत्सुक थे। कोई राजा चाहे कितना ही निरंकुश क्यों न हो, वह किसी व्यवस्था का अनुसरण अवश्य करता है। इस व्यवस्था को चाहे ईश्वरीय विधान कहिये, चाहे परम्परागत नियम तथा प्रथा कहिये, पर स्वेच्छाचारी एकतन्त्र राजा भी किन्हीं निश्चित नियमों का पालन करते हैं, उन्हीं के अनुसार शासन करते हैं। यदि राज्य में कोई भी नियम न हो, मर्यादा का सर्वथा अभाव हो, तो अराजकता की दशा उपस्थित हो जायेगी।

संविधान का महत्व

(Importance of Constitution)

किसी भी देश के संविधान के अध्ययन से उस देश के सामाजिक ढाँचे की झलक मिल जाती है। विश्व का प्रत्येक राज्य अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल ही अपने संविधान की रचना करता है। चूंकि विश्व के विभिन्न राज्यों की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं, इसलिए सभी देशों के संविधान एक- जैसे नहीं होते। संविधान की आवश्यकता के सम्बन्ध में राजनीतिशास्त्र के विद्वानों में काफी मतभेद है। कुछ विद्वानों का कहना है कि सभी देशों के लिए संविधान आवश्यक नहीं है। इसी आधार पर डी० टॉकविले आदि विद्वानों ने बताया है कि ब्रिटेन में कोई संविधान नहीं है। लेकिन, यह न्यायसंगत तर्क नहीं है। ऐसे विद्वानों की राय में केवल लिखित नियमों के संग्रह को ही संविधान कहते हैं, परन्तु संविधान का यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता। संविधान तो समस्त नियमों-उपनियमों,लोकाचारों तथा अभिसमयों का संग्रह है। इसलिए ब्रिटेन में लिखित संविधान के नहीं होने पर भी अभिसमयों का बोलबाला है, जो संविधान को अलिखित रूप प्रदान करते हैं। संविधान के अभाव में हम किसी राज्य की कल्पना नहीं कर सकते । जेलिनेक ने कहा है कि “संविधान की अनुपस्थिति में राज्य को अराजकता कहा जाता है।” इसलिए संविधान के बिना किसी देश का सफल शासन-संचालन नहीं हो सकता। राज्य का स्वरूप चाहे जो कुछ भी हो, सबके लिए संविधान की आवश्यकता है। प्रजातंत्र, गणतंत्र, अधिनायकवादी, साम्यवादी इत्यादि शासन- प्रणालियों के लिए भी संविधान की आवश्यकता है। संविधान की आवश्यकता और महत्व को हम निम्नलिखित रूप में रख सकते हैं-

(i) संविधान के कारण ही किसी राज्य के स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है।

(ii) संविधान ही सरकार, के विभिन्न अंगों पर नियंत्रण स्थापित करता है और उन्हें तानाशाह होने से बचाता है।

(iii) संविधान ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों की रक्षा करता है। यह नागरिक स्वतंत्रताओं (civil liberties) की धरोहर है।

(iv) संविधान एक ध्रुतारे के समान है, जो शासक को हमेशा दिशानिर्देश देता है और उसका मार्गदर्शन करता है।

(v) संविधान ही सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सम्बन्ध बनाये रहता है और उसमें जो मनमुटाव पैदा होता है, उसे वह स्पष्ट करता रहता है।

(vi) संविधान एक दर्पण (mirror) है, जिसमें उस देश के भूत, वर्तमान और भविष्य की झलक मिल जाती है।

संविधान के निर्माण के साधन

(Sources for Formation of Constitution)

किसी भी संविधान का निर्माण निम्नलिखित चार प्रमुख साधनों से होता है:-

  1. स्वीकृति द्वारा (By Consent)– अनेक आधुनिक संविधानों का निर्माण स्वीकृति द्वारा होता है। ये मध्यकाल के निरंकुश शासकों द्वारा घोषित प्रलेखों के प्रतिफल हैं, जैसे-जापान का संविधान ।
  2. निश्चित निर्माण द्वारा (By deliberate creation)-कुछ संविधानों का निर्माण संविधान निर्मात्री सभाओं या शासकों के विचार-विमर्श और विवेक के बाद किया गया है; जैसे-अमेरिका, भारत, कनाडा आदि का संविधान |
  3. क्रान्ति बारा (By revolution)- विश्व के कुछ देशों के संविधान का निर्माण क्रांति द्वारा होता है। ऐसा तब होता है जब जनता या सेना दमनकारी शासन से ऊबकर आन्तरिक क्रांति कर बैठती है और इस प्रकार नये संविधान को जन्म देती है। उदाहरण के लिए, फ्रांस की राज्यक्रांति के बाद निर्मित संविधान, सोवियत संघ का 1917 ई० का संविधान तथा मिस्र आदि देशों के संविधानों को ले सकते हैं।
  4. क्रमिक विकास द्वारा (By gradual revolution)-विश्व के कुछ देशों के संविधान अपने क्रमिक विकास के परिणाम हैं; जैसे-ग्रेट ब्रिटेन का संविधान, जिसने निरंकुश राजतंत्र से प्रजातंत्र का रूप धारण कर लिया है।

जहाँ तक संविधान के विकास का प्रश्न है, संविधान एक वृक्ष की तरह होता है, जो समय के अनुसार बढ़ता रहता है। उसकी जड़ें मजबूत होती हैं और बाद में अनेक शाखाएँ निकल आती हैं। संविधान-रूपी वृक्ष के विकास के निम्नलिखित तीन साधन होते हैं:-

  1. संशोधन द्वारा (By Amendment)- प्रायः सभी लिखित संविधानों में संशोधन लाने की प्रक्रिया का उल्लेख कर दिया जाता है। संविधान जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, वैसे- वैसे संशोधन उसमें होते जाते हैं। भारतीय संविधान में अब तक 57 संशोधन हो चुके हैं। किसी देश के संविधान में संशोधन जटिल तो किसी देश में सरल होता है, जहाँ साधारण कानून की प्रक्रिया से ही परिवर्तन लाया जाता है।
  2. न्यायालयों के निर्णय द्वारा (By judicial decision)-न्यायाधीश संविधान के विभिन्न उपबन्धों की व्याख्या करते हैं और उसे स्पष्ट रूप देते हैं। ऐसा करने से संविधान का रूप नया हो जाता है। यही कारण है कि अमेरिकी संविधान को न्यायाधीशों द्वारा निर्मित संविधान कहा जाता है।
  3. रीति-रिवाजों द्वारा (By Customs and conventions)-जब संविधान प्रयोग में आता है तब उसे चलाने के लिए कुछ प्रथाएँ चल पड़ती हैं। ये प्रथायें चिरकाल तक प्रयोग में आने के बाद लिखित कानून के समान महत्वपूर्ण हो जाती हैं और इसका प्रभाव संविधान पर पड़ता है।

अतएव, संविधान का निर्माण और विकास दो बातें होते हुए भी एक निश्चित संविधान की आवश्यकताएँ हैं। जिस किसी भी संविधान का निर्माण होता है, कालक्रम में उसमें विकास भी होता रहता है। 26 जनवरी, 1950 से भारतीय संविधान का विकास होता रहा है जो आज अपने निर्मित ढाँचे से बिल्कुल भिन्न हो गया है।

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Pankaja Singh

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