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संस्कार का अर्थ | संस्कारों के प्रकार | आधुनिक भारत में संस्कारों का रूप | प्रमुख हिन्दू संस्कारों का वर्णन

संस्कार का अर्थ | संस्कारों के प्रकार | आधुनिक भारत में संस्कारों का रूप | प्रमुख हिन्दू संस्कारों का वर्णन

संस्कार का अर्थ

सामान्य रूप में संस्कार का अर्थ है- पूर्ण करना, परिमार्जित करना, आत्म प्रजनन का गुण, स्मृति चिह्न, पवित्र करने वाला अनुष्ठान आदि। अंग्रेजी भाषा के Ceremony, Rites या Sacrament आदि शब्दों में संस्कार की ध्वनि अवश्य है परन्तु अर्थ समान नहीं है। मुसलमानों के ‘सुन्नत’ तथा ईसाइयों के ‘बतिस्मा’ संस्कार तो हैं परन्तु हिन्दू संस्कारों तथा इनमें अन्तर है। हिन्दू संस्कारों का दार्शनिक तथा धार्मिक महत्व है। हिन्दू संस्कारों का सम्बन्ध उन धार्मिक क्रियाओं तथा अनुष्ठानों से है जो मनुष्य की शुद्धता तथा शारीरिक एवं मानसिक परिष्कार के लिये आवश्यक माने गये हैं। सारांश में संस्कारों का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति में आत्मविश्वास, उत्तरदायित्व तथा कर्तव्यनिष्ठा उत्पन्न करना है।

संस्कारों के प्रकार

आश्वालायन सूत्र के अनुसार ग्यारह संस्कार हैं तथा पारस्कर सूत्र के अनुसार तेरह। वैवानस गृह सूत्र के अनुसार बारह तथा गौतम धर्म सूत्र के अनुसार चालीस संस्कार हैं। इन सभी सूत्रों का सामान्य विवेचन करने पर हमें निहित होता है कि प्रमुख हिन्दू संस्कार सोलह हैं। इन संस्कारों का वर्णन निम्नलिखित है-

(1) गर्भाधान संस्कार- इस संस्कार के अनुसार पति के लिए यह आवश्यक है कि वह ऋतु स्नान से शुद्ध हुई पली के पास जाये तथा पुत्र प्राप्ति की कामना करे।

(2) पुंसवन संस्कार- गृह्य सूत्रों के अनुसार पुंसवन संस्कार गर्भ धारण के दूसरे या तीसरे मास में सम्पन्न किया जाता है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार इस संस्कार द्वारा पति-पत्नी के समीप जाकर यह प्रार्थना करता है कि वह वीर पुत्रों को जन्म दे।

(3) सीमन्तोन्नयन संस्कार- यह संस्कार गर्भधारण के चौथे मास में किया जाता है। यह संस्कार अग्नि की स्थापना से आरम्भ होता है। इसके अन्तर्गत शुक्ल पक्ष में जब चन्द्रमा पुलिंग नक्षत्रों से युक्त होता है तो पति पत्नी के केशों को सजाता है तथा उसे यज्ञशाला में ले जाता है। यहाँ पर उपस्थित वृद्ध स्त्रियाँ उसे वीर पुत्र उत्पन्न होने का आशीर्वाद देती हैं।

(4) जात-कर्म संस्कार- यह शिशु जन्म के अवसर पर किया जाता है। इस संस्कार के तीन अंग हैं-मेघाजनन, आयुष्य तथा बल । इस संस्कार द्वारा पिता अपनी सन्तान को हाथों में लेकर उसे सांसारिक बाधाओं से बचाने का कर्म करता है।

(5) नामकरण संस्कार- यह संस्कार प्रायः शिशु जन्म के ग्यारहवें दिन किया जाता है। इस संस्कार में बच्चे का नाम रखा जाता है।

(6) निष्क्रमण संस्कार-निष्क्रमण का अर्थ बाहर निकालना है। इस संस्कार में पिता बालक को सर्वप्रथम सूर्य के दर्शन कराता है।

(7) अनप्राशन संस्कार- इस संस्कार द्वारा छठे महीने में बालक को यज्ञादि के पश्चात् उसे घी मिलाकर चावल, दही, शहद आदि खिलाया जाता है।

(8) चूडाकर्म संस्कार- यह मुण्डन संस्कार है। इसका सम्पादन जन्म से तीसरे वर्ष में किया जाता है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार इस संस्कार द्वारा बालक के हर्ष, सौभाग्य तथा उत्साह की वृद्धि होती है।

(9) कर्णवेधन संस्कार- यह संस्कार तीसरे या पाँचवें वर्ष में किया जाता है। बालक के कान तथा बालिका के कान तथा नाक छेदे जाते हैं और उसमें बाली, लौंग आदि पहनाये जाते हैं।

(10) उपनयन संस्कार- इस संस्कार का बड़ा महत्व है क्योंकि इसके सम्पादन के उपरान्त द्विजत्व प्राप्त होता है। ब्राह्मण के आठवें, क्षत्रिय के ग्यारहवें और वैश्य का बारहवें वर्ष में उपनयन संस्कार होता है।

(11) विद्यारम्भ संस्कार- यह संस्कार बालक की आयु के छठे वर्ष में किया जाता है। स्नान के पश्चात् कैपीन और कटिवस्त्र धारण करता है तथा इसके पश्चात् गुरु मन्त्रों द्वारा बालक के विद्यारम्भ का संस्कार शुरू करता है।

(12) समावर्तन संस्कार- इस संस्कार द्वारा ब्रह्मचारी गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है।

(13) विवाह संस्कार- विवाह संस्कार द्वारा विवाहित जीवन में प्रवेश होता है। इस संस्कार द्वारा व्यक्ति का सामाजीकरण होता है।

(14) वानप्रस्थ संस्कार- इस संस्कार द्वारा व्यक्ति के जीवन का तीसरा चरण प्रारम्भ होता है। वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने से पूर्व जो अनुष्टान तथा पूजा आदि की जाती है, उसे वानप्रस्थ संस्कार कहा जाता है।

(15) सन्यास संस्कार- इस संस्कार का सम्बन्ध सन्यास धारण करने से है। इसमें मन्त्रोच्चारण के साथ सन्यास धारण करने वाले का यज्ञोपवीत तथा केश जल में प्रवाहित कर दिये जाते हैं।

(16) अन्त्येष्टि संस्कार- इस संस्कार का सम्पादन मृत शरीर को भस्मान्त करने के लिये किया जाता है। इस संस्कार का उद्देश्य आत्मा की परितुष्टि करना है।

इस प्रकार हिन्दू संस्कारों में जन्म के पूर्व से लेकर मृत्योपरान्त तक के क्रियाकलाप सम्मिलित हैं। इन संस्कारों द्वारा जीवन का आध्यात्मिक, भौतिक तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विकास होता है।

आधुनिक भारत में संस्कारों का रूप

आधुनिक भारत में संस्कारों के प्रति आस्था में कुछ कमी आ गई है। इसके अनेक कारणों में प्रमुख कारण आर्थिक है। संयुक्त परिवार प्रथा के विघटन द्वारा भी संस्कार सम्पादन करने के प्रति उदासीनता आ गई है। फिर भी गर्भाधान, अन्नप्राशन, नामकरण, उपनयन, विवाह तथा अत्येष्टि संस्कार अभी भी किये जाते हैं।

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Pankaja Singh

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