संगठनात्मक व्यवहार

संगठनात्मक व्यवहार की अवधारणा एवं परिभाषा | संगठनात्मक व्यवहार के प्रतिरूप | Concept and Definition of Organisational Behaviour in Hindi | Models of Organisational Behaviour in Hindi

संगठनात्मक व्यवहार की अवधारणा एवं परिभाषा | संगठनात्मक व्यवहार के प्रतिरूप | Concept and Definition of Organisational Behaviour in Hindi | Models of Organisational Behaviour in Hindi

संगठनात्मक व्यवहार की अवधारणा एवं परिभाषा

(Concept and Definition of Organisational Behaviour)

संगठनात्मक व्यवहार से तात्पर्य है किसी संगठन में मानवीय व्यवहार का निरूपण या अध्ययन। यह संगठन में मानवीय व्यवहार को बेहतर रूप में समझने, नियन्त्रण करने तथा भविष्यवाणी करने से सम्बन्धित है। मूलतः यह दो शब्दों का योग है- ‘संगठन’ एवं ‘व्यवहार’ । ‘व्यवहार’ किसी लक्ष्य के प्रति निर्देशित होता है तथा दैवीय नहीं होता है। संगठन से आशय सचेतन रूप में समन्वित इकाई से है जिसमें दो या अधिक व्यक्ति सम्मिलित होते हैं तथा जो एक सामान्य उद्देश्य या उद्देश्यों के समूह को प्राप्त करने के लिये सापेक्षतः सतत् आधार पर कार्य करते हैं। संयुक्त रूप में, संगठनात्मक व्यवहार अध्ययन का एक ऐसा क्षेत्र है जो संगठन के भीतर व्यक्तियों, समूहों तथा संरचना पर पड़ने वाले प्रभाव को खोजने से सम्बन्धित है ताकि ऐसे ज्ञान का उपयोग संगठनात्मक प्रभावशीलता में सुधार के लिये किया जा सके। पोर्टर लालर तथा हैकमन का मत है कि, “संगठनात्मक व्यवहार संगठन में व्यवहार का अध्ययन है। यह ‘व्यक्ति’ एवं ‘संगठन’ दोनों की अन्तर्क्रिया पर प्रकाश डालता है।”

संगठनात्मक व्यवहार को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है:

डेविस तथा न्यूस्ट्रॉम (Davis and Newstrom) के अनुसार, “लोग संगठनों में किस प्रकार व्यवहार करते हैं, इसका अध्ययन करना तथा प्राप्त जानकारी या ज्ञान का उपयोग करना ही संगठनात्मक व्यवहार है। यह मानव हित के लिये मानव उपकरण है।”

उपर्युक्त विश्लेषण से संगठनात्मक व्यवहार के बारे में निम्न बातें स्पष्ट होती हैं-

(1) संगठनात्मक व्यवहार ‘मानव व्यवहार’ का अध्ययन है।

(2) यह संगठनों के भीतर व्यक्तियों, समूहों एवं स्वयं संगठन (इसके विभिन्न घटकों) के व्यवहार, अन्तर्क्रियाओं तथा उनके पारस्परिक प्रभावों का अध्ययन है।

(3) इस अध्ययन का द्देश्य संगठन की प्रभावशीलता एवं निष्पादन में वृद्धि करना है।

निष्कर्ष- इस प्रकार “संगठनात्मक व्यवहार किसी संगठन में कार्यरत व्यक्तियों, समूहों तथा संगठन के विभिन्न घटकों के व्यवहार तथा उनसे उत्पन्न प्रभावों तथा वातावरण के साथ उनकी अन्तर्क्रियाओं का अध्ययन है ताकि इस ज्ञान के संगठन को प्रभावी एवं उद्देश्य प्रेरक बनाया जा सके।” यह एक शैक्षिक अध्ययन है जो व्यक्तियों तथा संगठन संरचना का संगठन के भीतर होने वाले प्रभावों का अध्ययन करने तथा इससे प्राप्त जानकारी का संगठन की प्रभावशीलता में वृद्धि करने हेतु उपयोग में लाने से सम्बन्ध रखता है।

संगठनात्मक व्यवहार के प्रतिरूप

(Models of Organisational Behaviour)

कीथ डेविस ने प्रबन्ध विचारों के परिप्रेक्ष्य में संगठनात्मक व्यवहार के चार प्रतिरूपों का विकास किया है। इसका मत है कि, “संगठनात्मक व्यवहार की किस्म के सन्दर्भ में संगठनों में विभिन्नता पायी जाती है और इस विभिन्नता का प्रमुख कारण प्रत्येक संगठन में प्रबन्ध चिन्तन का प्रभुत्व है। प्रबन्धक जैसा सोचते हैं, वैसा ही करते हैं। चूंकि संगठन का प्रबन्ध संस्था की जलवायु को निर्धारित करता है, अतः इसी वजह से संगठनात्मक व्यवहार का प्रतिरूप महत्वपूर्ण हो जाता है।”

संगठनात्मक व्यवहार के पांच प्रतिरूप

प्रतिरूप निर्भर है

निरंकुश सत्ता

संरक्षक

पोषक

सहयोगी  

(1) प्रबन्धकीय अभिमुखन

अधिकार सत्ता

न्यूनत संसाधन मुद्रा

नेतृत्व समर्थन

साझेदारी टीमवर्क

(2) कर्मचारी अभिमुखन

आज्ञापालन

सुरक्षा

जॉब निष्पादन

उत्तरदायित्व

(3) कर्मचारी मनौवैज्ञानिक परिणाम

बोस पर निर्भरता

संगठन पर निर्भरता

सहभागिता

स्व-अनुशासन

(4) कर्मचारी आवश्यकताओं की पूर्ति

जीविका

भरण-पोषण

उच्च स्तरीय

आत्म विकास

(5) निष्पादन परिणाम

न्यूनतम

निष्क्रिय सहयोग

जागरुक प्रेरणा

मध्यम स्तरीय उत्साहजनक

निरंकुश प्रतिरूप औद्योगिक क्रान्ति से पूर्व के समय से सम्बद्ध है जिसमें कर्मचारियों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे पबन्धकों के आदेशों का आँख मूंद कर पालन करें। ऐसा संगठन पूर्णतः शक्ति पर निर्भर होता था। कर्मचारी प्रबन्ध वर्ग पर आश्रित रहता था और उसकी आवश्यकतायें भी न्यूनतम मात्रा में ही सन्तुष्ट होती थीं। संगठनात्मक व्यवहार का यह प्रतिरूप मेकप्रेगर द्वारा प्रतिपादित ‘ध्योरी एक्स’ के समान है।

संरक्षक प्रतिरूप (Custodial Model) में प्रबन्धक कर्मचारियों को मौद्रिक पुरस्कार देकर कार्य कराता है। यद्यपि इसमें कर्मचारियों को बेहतर कार्य सुरक्षा प्रदान की जाती है, फिर भी वे संगठन पर आश्रित रहते हैं तथा प्रबन्ध से निष्क्रियता के साथ सहयोग करते हैं।

पोषक प्रतिरूप में कर्मचारियों की उच्च स्तरीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है और वे संगठनात्मक निर्णय में सहभाजन करते हैं। परिणामतः उन्हें का करने की अधिक प्ररेणा प्राप्त होती है।

सहयोगी प्रतिरूप में श्रम तथा प्रबन्ध वर्ग आपस में टीम भावना से अनुशासित होकर कार्य करते हैं। इस साझेदारी के कारण कर्मचारियों की आत्म-विकास सम्बन्धी आवश्यकता की भी पूर्ति सम्भव होती है और उनमें कार्य के प्रति प्रतिबद्धता की भावना का विकास होता है।

संगठनात्मक व्यवहार के सम्बन्ध में उपयुक्त प्रतिरूप का चयन बदलती हुयी मानवीय आवश्यकताओं, प्रजातान्त्रिक मूल्यों तथा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। मायर्स ने सम्पूर्ण औद्योगिक जगत में एक अध्ययन द्वारा निष्कर्ष निकाला है कि प्रबन्धकों की प्रविधियां में जैसे-जैसे नवीनता आती जाती है, वैसे-वैसे ही संगठनात्मक व्यवहार के नवीन प्रतिरूपों का विकास होता जाता है। अतः प्रबन्धक को पद्धति एवं आकस्मिकता विचारधारा का ज्ञान होना आवश्यक है ताकि वह’ आवश्यकतानुसार अपने कार्य हेतु उपयुक्त प्रतिरूप का प्रयोग कर सकें।

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