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सम्पर्क भाषा हिंदी | संविधान की संकल्पना

सम्पर्क भाषा हिंदी | संविधान की संकल्पना

सम्पर्क- भाषा हिन्दी

संविधान में हिन्दी की तीन भूमिकाएँ अपेक्षित हैं। एक तो संघ की राजभाषा के रूप में, दूसरी राज्यों और प्रदेशों की राजभाषा के रूप में तथा तीसरी संघ और राज्यों के बीच तथा एक दूसरे राज्यों के बीच पारस्परिक पत्राचार की भाषा अर्थात् सम्पर्क-भाषा के रूप में। इनमें से दूसरी भूमिका तो हिन्दी ‘निभा रही है और स्थिति पूर्णतः संतोषजनक न भी हो तो कम से कम असंतोषजनक तो नहीं ही कही जा सकती है। छह हिन्दी-भाषा राज्यों और एक केन्द्र-शासित प्रदेश (दिल्ली) ने इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया है और गत 32 वर्षों से इसके विस्तार, प्रसार और परिष्कार में वे अथक रूप से लगे हुए हैं।

संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी को मिल मान्यता कागजों पर तो है, किन्तु उसका क्रियान्वयन कुछ ही अंशो में हो पाया है। उसका कारण भी स्पष्ट है और जिन कारणों से अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में अनिश्चित काल के लिए स्वीकृति दी गई है, वे भी स्पष्ट हैं। परिणाम यह है कि केन्द्र में द्विभाषी नीति चल रही है। यह नीति बहुत अंशों में क्रियान्वित भी हो रहे रही है। (जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज दोनों भाषाओं में जारी होते हैं, संसद की अधिकृत कार्यवाही दोनों भाषाओं में जारी होती है आदि) और क्रियान्वतन के लिए मशीनरी भी स्थापित की हुई है- जैसे मंत्रालयों में सलाहकार समितियाँ हैं, हिन्दी अधिकारी हैं और हिन्दी नीति की देख-रेख राजभाषा विभाग करता है। यह बहुत संतोष की बात है कि इस नीति के क्रियान्वयन के लिए और इस बात के लिए कि हिन्दी पिछड़ न जाय, सुनिश्चित और सुनिर्धारित मशीनरी काम कर रही है। फिर भी ऐसा लगता नहीं है कि इस प्रक्रिया के चलते हिन्दी अंग्रेजी का स्थान ले लेगी। वह बढ़ती तो रहेगी, अब तक बढ़ती रही है, पर जब तक अंग्रेजी के स्थान लेने की कोई प्रक्रिया उसे नहीं दी जाती तब तक वह कभी भी देश की एकमात्र राजभाषा बन जाये, ऐसा नहीं लगता।

संविधान की संकल्पना-

इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पर्क भाषा की है जिसके लिए संविधान ने संकल्पना की थी। कश्मीर यदि केरल से आज किसी विदेशी भाषा में पत्राचार करता है और उसके स्थान पर भारत की किसी भाषा का प्रयोग करना चाहता है तो वह भाषा हिन्दी होनी चाहिए। इसलिए संविधान की धारा 346 में यह प्रावधान किया गया कि केन्द्र और राज्यों के बीच तथा राज्यों में एक-दूसरे के बीच पारस्परिक संप्रेषण व पत्राचार आदि की भाषा भी वहीं होगी जो संघ की राजभाषा स्वीकृत है। संविधान की उस धारा के पारित होते समय इसका आशय यह था कि 1950 से लेकर 15 वर्षों तक, जब तक कि अंग्रेजी को भी संघ की सह-राजभाषा माना गया है। हिन्दी या अंग्रेजी-सम्पर्क-भाषा की भूमिका निभाएँगा। और 15 वर्षो बाद केवल हिन्दी ही सम्पर्क भाषा रहेगी। यह सुविदित है कि स्थितियों के नया मोड़ लेने के कारण 1963 में संसद ने राजभाषा अधिनियम पारित किया। 1967 में पुनः संशोधी राजभाषा अधिनियम पारित किया गया जिसके अनुसार 15 वर्ष बाद भी अंग्रेजी संघ की सह-राजभाषा के रूप में स्वीकृत हुई। इस प्रकार संघ के कार्यों द्विभाषी-नीति स्थापित हुई। सम्पर्क-भाषा के संदर्भ में यह व्यवस्था की गई कि हिन्दी भाषी राज्यों और केन्द्र के बीच तथा ऐसे व काराशूदा राज्यों के बीच पारिस्परिक संचार के लिए सम्पर्क-भाषा हिन्दी होगी। शेष राज्य केन्द्र से तथा आपस में एक दूसरे से अंग्रेजी में सम्पर्क करेंगे।

सम्पर्क-भाषा की भूमिका में भी वर्तमान में यही द्विभाषी नीति चल रही है, किन्तु स्पष्ट है कि अनन्त काल तक यह स्थिति नहीं चल सकती, न चलनी चाहिए। अन्ततः जिस किसी दिन हमारे हिन्दी भाषी प्रदेश यह अहसास करेंगे कि पारस्परिक सम्पर्क-भाषा के रूप में एक विदेशी भाषा को लदे रहने की बजाय वे किसी भारतीय भाषा को क्यों न अपना लें, उस दिन शायद स्वेच्छा से वे पसन्द करें कि संविधान की धारा 346 की मंशा के तहत स्वीकृत सम्पर्क भाषा हिन्दी को क्यों न काम में ले लिया जाए। महाराष्ट्र पंजाब, गुजरात आदि राज्य हैं अहसास कर चुके हैं।

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Pankaja Singh

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