शिक्षाशास्त्र

सामाजिक परिवर्तन और शिक्षा | सामाजिक परिवर्तन का अर्थ | सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा | सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप | सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ | सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन और शिक्षा | सामाजिक परिवर्तन का अर्थ | सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा | सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप | सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ | सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन और शिक्षा

परिवर्तन चाहे जिस किस्म का हो वह एक प्राकृतिक नियम है। समय बदलता । चीजें बदल जाती हैं, मनुष्य का आचार-विचार बदल जाता है। परिस्थिति के कारण मनुष्य की नियत, ईमान एवं धर्म भी बदल जाता है। समाज में प्राकृतिक, सांस्कृतिक, नैतिक और व्यावहारिक परिवर्तन हुआ करते हैं। इससे स्पष्ट है कि मनुष्य और उसका समाज परिवतर्नशील है। समाज में होने वाले परिवर्तन प्रत्येक क्षेत्र पर प्रभाव डालते हैं और इस दृष्टि से शिक्षा के क्षेत्र पर भी सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत शिक्षा की क्रिया के द्वारा सामाजिक परिवर्तनों की सभी सम्भावनायें होती हैं। अब स्पष्ट है कि सामाजिक परिवर्तन एवं शिक्षा एक दूसरे को निश्चय ही प्रभावित करते हैं अतः हमें इनके बारे में कुछ विस्तार से जानना चाहिये।

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ

सामाजिक परिवर्तन का सीधा अर्थ है समाज में होने वाले परिवर्तन । समाज मनुष्यों के अन्तर्सम्बन्धों से बना समूह है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के बीच पाये जाने वाले सम्बन्धों में परिवर्तन, अदल-बदल या अन्तर होने को हम सामाजिक परिवर्तन कहेंगे। परिवर्तन शब्द का अर्थ प्रो० फिक्टर ने “अन्तर” बताया है। वह लिखते हैं कि “संक्षेप में परिवर्तन पूर्व अवस्था या अस्तित्व के तरीके में अन्तर या भिन्नता के रूप में परिवर्तन किया जाता है I”

सामाजिक परिवर्तन इस आधार पर सामाजिक संगठन, संरचना और कार्यों में अन्तर अथवा भिन्नता को कहेंगे। प्रो० के० डेविस ने उसी अर्थ को लिया है। उनके अनुसार “सामाजिक परिवर्तन का अर्थ होता है ऐसे अन्तर जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना एवं उसके कार्यों में घटित होते हैं।”

सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा

कुछ समाजशास्त्रियों की परिभाषाओं को. देकर हम सामाजिक परिवर्तन के अर्थ को अधिक स्पष्ट कर सकते हैं। ये परिभाषायें नीचे दी जा रही हैं-

(i) प्रो० जिन्सवर्ग- “सामाजिक परिवर्तन से मैं संरचना में परिवर्तन समझता हूँ। उदाहरण के लिये, समाज के आकार में, उसकी बनावट अथवा भागों के संतुलन में अथवा संगठन के स्वरूप में।”

(ii) प्रो० जेन्सन- “सामाजिक परिवर्तन को लोगों के कार्य करने तथा विचार करने की पद्धतियों में रूपान्तरण कहकर पारिभाषित किया जा सकता है।”

(iii) प्रो० गर्थ और मिल्स- “सामाजिक परिवर्तन के द्वारा हम उसे संकेत करते हैं जो समय के साथ-साथ कार्यों, विकास एवं पतन से सम्बन्धित होता है जो सामाजिक संरचना एंव उनकी उत्पत्ति, विकास एवं पतन से सम्बन्धित होता है।”

(iv) प्रो० मेरिल तथा एल्ड्रिज- “अपने सबसे अधिक ठोस अर्थ में सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य यह है कि समाज के अधिकतर लोग ऐसी क्रियाओं को करने में लगें जो उनके तात्कालिक पूर्व-पितरों के कुछ समय पहले के कार्यों से भिन्न हो।”

सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप

ऊपर की परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है और यह पूरे समाज, उसके सदस्य, उसके कार्यों एवं उसके सम्बन्ध को अपने क्षेत्र में समाविष्ट करता है। इसके अतिरिक्त सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप प्रक्रियात्मक होता है। इसका तात्पर्य यह है कि सामाजिक परिवर्तन भी एक सामाजिक प्रक्रिया है। इस सम्बन्ध में प्रो० मेरिल और एल्ड्रिज के शब्द विचारणीय हैं- “जब मानवीय व्यवहार संपरिवर्तन की प्रक्रिया में होता है तो संकेत करने का यह दूसरा तरीका है कि सामाजिक परिवर्तन घटित हो रहा है।”

परिवर्तन और प्रक्रिया एक दूसरे को सन्निहित करने वाले होते हैं जैसा कि प्रो० मैक- आइवर और पेज ने लिखा है कि “एक प्रक्रिया का अर्थ निरन्तर परिवर्तन है।” (a process means continuous change). इस दृष्टि से भी सामाजिक परिवर्तन एक सामाजिक प्रक्रिया है जो निश्चित ढंग से कुछ शक्तियों के क्रियाशील होने के कारण होता है। इसी से स्पष्ट है कि सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप प्रक्रिया के रूप में पाया जाता है और यह किन्हीं कारणों से होता है।

सामाजिक प्रगति और सामाजिक परिवर्तन में भिन्नता

सामाजिक परिवर्तन होने पर जो अच्छाई आती है वह सामाजिक प्रगति है। सामाजिक प्रगति इस प्रकार एक इच्छित दिशा या मान्यता प्राप्त दिशा में होने वाला सामाजिक परिवर्तन है। इसमें केवल परिवर्तन ही नहीं होता है बल्कि मूल्य-निर्धारण का तत्व भी पाया जाता है। मैकआइवर और पेज महोदय लिखते हैं कि “सामाजिक परिवर्तन की दिशा नहीं वरन् इसमें किसी अन्तिम लक्ष्य की ओर ले जाने वाली दिशा का विचार सन्निहित है।” सामाजिक प्रगति सदा परिवर्तन का सूचक होती है, इससे मनोवांछित उद्देश्य की पूर्ति होती है। सामाजिक प्रगति में मनुष्य सचेतन प्रयल करता रहा है। सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक, सामुदायिक और सामान्य परिवर्तन होता है। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन एवं सामाजिक प्रगति दोनों भिन्न सामाजिक दशाएँ हैं।

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ

सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध में ऊपर जो कुछ कहा गया है उसमें हमें उसकी कुछ विशेषताओं की जानकारी होती है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) सामाजिक परिवर्तन सार्वभौमिक होता है- अर्थात् सभी समाज के संगठन, कार्य एवं रूप में, मनुष्यों के व्यवहार में हमेशा से परिवर्तन समयानुसार होता रहा है।

(ii) सामाजिक परिवर्तन की गति समान नहीं हुआ करती है- अर्थात् परिवर्तन कभी कम कभी ज्यादा होता है तथा कभी धीमे और कभी तेज होता है। यह परिस्थिति पर निर्भर करता है।

(iii) सामाजिक परिवर्तन पूरे समुदाय को प्रभावित करता है- अर्थात् किसी व्यक्ति या समूह विशेष में परिवर्तन से उसे सामाजिक परिवर्तन नहीं माना जा सकता है। इस प्रकार सभी लोगों में परिवर्तन होना अनिवार्य है।

(iv) निश्चित भविष्य कथन करना सम्भव नहीं होता है- अर्थात् सामाजिक परिवर्तन की दिशा निश्चित नहीं कही जा सकती है। कब क्या परिवर्तन होगा यह बताना कठिन है।

(v) सामाजिक परिवर्तन पर समय का प्रभाव पड़ता है- अर्थात् समयानुकूल जो परिवर्तन लोगों में आते हैं उससे सामाजिक परिवर्तन भी होता जाता है। जिस गति से समय चलता है उसी गति से सामाजिक परिवर्तन भी होता है। इसी प्रकार से समय किस ढंग का परिवर्तन चाहेगा उसका प्रभाव भी सामाजिक परिवर्तन पर होता है।

(vi) सामाजिक परिवर्तन होने का कोई कारण अवश्य होता है- अर्थात् सामाजिक परिवर्तन हमेशा सप्रयोजन एवं सोद्देश्य होता है। मानव की आवश्यकताएँ, अभिवृत्तियाँ, रुचियाँ आदि ऐसे कुछ कारण हैं।

(vii) सामाजिक परिवर्तन प्रायः जटिल होता है- क्योंकि समाज का स्वरूप ही जटिल माना गया है। “समाज सम्बन्धों का जटिल जाल है” ऐशी दशा में समाज के परिवर्तन भी सरल न होकर जटिल होते हैं।

(viii) सामाजिक परिवर्तन सर्वथा निश्चित और अवश्य होता है- अर्थात् सामाजिक परिवर्तन एक प्राकृतिक घटना होती है। समय बदलता है, प्रकृति बदलती है तो मनुष्य भी बदलता है और उसके कार्य-व्यापार भी बदलते हैं। भौगोलिक कारण से भी समाज में परिवर्तन हो जाता है। इसीलिए परिवर्तन एक अवश्यंभावी घटना होती है।

सामाजिक परिवर्तन के कारक

अपने समाजशास्त्रीय अध्ययनों के आधार पर समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन के निम्नलिखित कारक बताये हैं जिन्हें कुछ विद्वानों ने कारण भी कहा है-

(i) प्राकृतिक और भौगोलिक कारक जैसे भूकम्प, बाढ़, जलवायु एवं प्राकृतिक स्थिति है।

(ii) जैविक तथा प्रजातीय कारक जिसके अन्तर्गत जन्म, मूल वंश, आनुवंशिकता एवं विकास की दशाएँ शामिल हैं।

(iii) जनसंख्यात्मक कारक अर्थात् लोगों का अधिक संख्या में उत्पन्न होना, मरना, देश-विदेश में आना-जाना, युद्ध आदि का प्रभाव।

(iv) आर्थिक कारक जैसे आर्थिक प्रगति, उद्योग, व्यवसाय, कार्य आदि ।

(v) तकनीकी कारक जैसे मशीन, यंत्र, रेडियो, जहाजरानी, आदि का प्रभाव।

(vi) सांस्कृतिक कारक जैसे प्रथाओं, विश्वासों, आचार-विचार, कला-कौशल, भाषा-साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, मूल्यों, आधार आदर्शों, संस्थाओं के निर्माण में परिवर्तन ।

(vii) राजनीतिक कारक जैसे जनतन्त्र का प्रसार एवं उसकी स्थापना ।

(viii) विधि सम्बन्धी कारक जैसे अपने देश में (MISA) का प्रभाव, दण्ड विधान को लागू करना, पुलिस की व्यवस्था करना।

(ix) मनोवैज्ञानिक कारक जैसे मूल प्रवृत्तियों में परिवर्तन, रुचियों में परिवर्तन, अभिप्रेरणाओं में परिवर्तन आदि।

(x) युद्ध और क्रान्ति एवं शान्ति की स्थितियाँ जिनसे समाज में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन में (i) सहायक और बन्धक कारक-

(i) सहायक कारक (ii) बन्धक कारक
1. कम जनसंख्या होना। 1. अधिक जनसंख्या और कम उत्पादन ।
2. आवागमन-संचार के साधन सुलभ होना। 2. बेकारी, व्यवसाय, उद्योग की कमी।
3. उत्तम कृषि- उद्योग व्यवसाय होना। 3. अशान्ति, क्रान्ति, युद्ध, संघर्ष, झगड़े।
4. शांतिपूर्ण शासन- व्यवस्था। कर्तव्य- परायण नागरिक। 4. सुरक्षा और पुलिस-सेना की उदासी-नता, अव्यवस्था।
5. उत्तम शिक्षा की व्यवस्था। 5. अशिक्षा, अज्ञान की अधिकता।
6. संतुष्ट जीवन, अच्छे- उच्चादर्श, उत्तम जीवन- मूल्य। 6. असन्तुष्ट जीवन, अधोगामी आदर्श एवं मूल्य।
7. सांस्कृतिक अभिवृद्धि। 7. संस्कृति में गिरावट।
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Pankaja Singh

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