इतिहास

सामाजिक-धार्मिक पुनरुत्थान में स्वामी विवेकानन्द | भारत के सामाजिक-धार्मिक पुनरुत्थान में स्वामी विवेकानन्द का योगदान | अधुनिक भारत के जागरण में स्वामी विवेकानन्द | समाज एवं धर्म के क्षेत्र में विवेकनन्द के योगदान | विवेकानन्द का योगदान

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सामाजिक-धार्मिक पुनरुत्थान में स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी कल्पनाओं को कार्यरूप देने के लिए एक संगठन तैयार किया जो आज रामकृष्ण मिशन के नाम से जाना जाता है। अपने देश में संन्यासियों की निःस्वार्थ सेवा का आदर्श परम्परा से चलता आया है। इसी को ध्यान में रखकर स्वामी जी ने चाहा कि एक ऐसी संस्था स्थापित की जाय जिसके सदस्य सेवा भाव से देश के लोगों का नैतिक उत्थान कर उन्हें आत्मसम्मान तथा देश-सेवा का पाठ पढ़ा सकें। इस दृष्टि से संन्यासी विवेकानन्द का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

विदेश से लौटने के पश्चात् विवेकानन्द ने प्रचार कार्य की ओर ध्यान दिया। सन् 1899 ई० के आरम्भ में बेलूर में संस्था के मठ का स्थान निश्चित हो गया। आज भी बेलूर का मठ रामकृष्ण मिशन का प्रधान केन्द्र बना हुआ है। यहाँ संन्यासियों के लिए निश्चित नियमों का प्रचलन किया गया। दो पत्रिकाओं का प्रकाशन ‘प्रबुद्ध-भारत’ अंग्रेजी में तथा ‘उद्बोधन’ बंगाली में आरम्भ हुआ जिसमें विवेकानन्द के भाषणों का प्रकाशन किया गया। इसके अतिरिक्त, देश के अन्य भागों में भी संगठन के प्रधान केन्द्रों की स्थापना की गयी जिनके माध्यम से मिशन की गतिविधियों की जानकारी जनता को प्राप्त होती रही। यह केन्द्र वास्तव में कालान्तर में लोगों के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा के स्रोत बन गये। सामाजिक उत्थान की दृष्टि से स्वामी जी के कार्य । विशेष उल्लेखनीय माने जा सकते हैं। देश के अनेक भागों में व्याप्त गरीबी और अज्ञानता के प्रति उन्होंने संघर्ष करने का संकल्प किया। इसके लिए, उन्होंने औपचारिक रूप से, 5 मई, 1897 को अपने गुरुदेव के नाम पर ‘रामकृष्ण मिशन’ संस्था की स्थापना की। इसके अन्तर्गत समाज-सेवा के अनेक कार्यक्रम अपनाए गए। सन् 1897 में मुर्शिदाबाद और अन्य स्थानों में अकाल पीडितों की सहायता तथा सन् 1898 में प्लेग महामारी में राहत कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय थे। स्वामी जी द्वारा स्थापित मठ आज भी देश-विदेश में भारत के आध्यात्मिक गौरव की गाथा का सफलतापूर्वक प्रचार कर रहा है।

देश के बाहर विदेशों में भी प्रचार कार्य के लिए स्वामी जी के द्वारा अनेक केन्द्रों की स्थापना की गयी। सन् 1899 ई० में विवेकानन्द पुनः अमेरिका गये तथा वहाँ के अनेक नगरों में संस्था शाखाओं की स्थापना की। न्यूयार्क की वेदान्त सोसायटी को उन्होंने नया जीवन दिया और उसे आध्यात्मिक शिक्षा देने वाले केन्द्र में परिणत कर दिया। इसी प्रकार वे कैलीफोर्निया गये, लास एंजेल्स तथा सैनफ्रान्सिस्को में भी वेदान्त का प्रचार करने वाली समितियों का गठन किया।

इस प्रकार, विवेकानन्द ने अपने जीवन-काल में ही देश-विदेश में भारतीय धर्म की व्याख्या तथा उसके अनेक अंगों की सही जानकारी के लिए अनेक संस्थाओं की स्थापना की। यह संस्थाएं अपने उद्देश्य में भली-भांति सफल हुईं तथा विदेशों में भारत के धर्म, संस्कृति के विषय में जो भ्रम थे, वे भी दूर हो सके।

विवेकानन्द का योगदान

स्वामी विवेकानन्द हमारी सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के प्रवर्तक माने जा सकते हैं। 19वीं शती में हिन्दू-धर्म, संस्कृति जिस प्रकार आघातों को सह रहा था, उसे सक्षम बनाने तथा गौरवपूर्ण स्थान दिलाने का श्रेय स्वामी जी को ही दिया जा सकता है। व्यक्तिगत तथा सामाजिक उत्थान को शंखनाद कर उन्होंने भारत की नई पीढ़ी को कर्मठता का एक नवीन संदेश-एक नया आदर्श दिया और राष्ट्रीयता के पौधे को अपने विचारों से एक विशाल वट वृक्ष के रूप में परिणत कर दिया।

अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के मंतव्यों को व्यावहारिक जामा पहनाने का कार्य विवेकानन्द की दूसरी उपलब्धि कही जा सकती है। हिन्दू-धर्म के पुनरुत्थान की प्रक्रिया में उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने बड़ी सेवा की तथा हिन्दू धर्म को एक गौरवपूर्ण स्थान दिलाने में सफल हुआ।

विवेकानन्द का दृष्टिकोण अन्तर्राष्ट्रीय तथा मानवतावादी था। उन्होंने उस संकट की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जो विश्व में आध्यात्मिकता की कमी के कारण मानवीय दुर्गुणों के रूप में पश्चिम में अपनी जड़ें जमा रहा था। इसीलिये उन्होंने पश्चिम वालों से कहा कि निवृत्ति मार्ग अपना कर संकुचित दायरे से निकलकर वे सम्पूर्ण मानवता की सेवा का व्रत ले। भारतीय सन्दर्भ में उनका विचार समीचीन था कि जहाँ भारत जैसे विशाल देश को गरीबी और दासता में जकड़कर रखा जाएगा वहाँ विश्व में शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती।

विवेकानन्द युगदृष्टा कहे जा सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सामयिक परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन कर नये निष्कर्ष निकाले थे। उनके विचार में भौतिक साधन-सम्पन्न समाज को निवृत्ति तथा भारत सरीखे निर्धन तथा परतंत्र देश को प्रवृत्ति मार्ग अपनाना चाहिए। इसीलिए उन्होंने भारतीयों को मिथ्या आडम्बरों और धार्मिक कट्टरता छोड़कर कर्मवाद तथा सेवाभाव की शिक्षा के माध्यम से अपना नैतिक उत्थान करने के लिए प्रोत्साहित किया।

स्वामी जी ने भारतीय समाज तथा संस्कृति को एक दिशा प्रदान की, विशेषकर उस समय जबकि भारतीयों को आत्मसम्मान के लिए पग-पग पर संघर्ष करना पड़ रहा था। भारतीय नवयुवकों को उन्होंने 19वीं शती के नवोत्थान की भूमिका में एक निश्चत आदर्श तथा मार्ग राष्ट्र की उन्नति के लिए बतलाया। नई पीढ़ी के लोगों में उन्होंने देश के प्रति भक्ति जगायी, एवं उसके अतीत के प्रति गौरव एवं भविष्य के प्रति आशा एवं आस्था उत्पन्न की। उनकी प्रेरणा से लोगों में स्वाभिमान तथा आत्मनिर्भरता के भाव जगे। रवीन्द्रनाथ ने स्वामी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा है कि यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को समझना चाहिए। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने एक स्थान पर लिखा है कि “स्वामी विवेकानन्द का धर्म राष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाला धर्म था।”

स्वामी विवेकानन्द भारतीय समाज के उन्नायकों में कहे जा सकते हैं। समाज का दो वर्ग- स्त्रियाँ तथा अछूत जो सदियों से सामाजिक दासता में पिस रहा था, इन्हें स्वामी जी ने सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने में अगुआई की। उन्होंने नारियों के सम्बंध में गर्जना की- “संसार की सभी जातियाँ नारियों का समुचित सम्मान करके ही महान हुई हैं। जो जाति नारियों का सम्मान करना नहीं जानती, वह न तो अतीत में उन्नति कर सकी, और न आगे उन्नति कर सकेगी।” हरिजनों के प्रति उनकी समान दृष्टि थी। केष्टा नामक संथाल को भोजन कराकर उन्होंने कहा, “तुम साक्षात् नारायण हो, मुझे सन्तोष है कि भगवान ने मेरे समक्ष भोजन किया है।”

आधुनिक भारत वस्तुतः स्वामीजी का ऋणी रहेगा, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से भारतीयों को पुराने गौरव का स्मरण कराकर आगे बढ़ने का सम्बल दिया। उसकी ओजस्वी वाणी-“साहस का सूर्य उदित हो चुका है, भारत का उत्थान अवश्य होगा, किसी में यह दम नहीं कि वह भारत को रोक सके, भारत अब फिर से निद्रा में न पड़ेगा, यह भीमाकार देश फिर से अपने पाँवों पर खड़ा हो रहा है” आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

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Pankaja Singh

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